Thu. May 23rd, 2019

भारत पाकिस्तान का बढ़ता तनाव और संशय का दौर : डा. श्वेता दीप्ति

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |भारत के पुलवामा में १४ फरवरी को हुए आतंकवादी हमले ने एक बार फिर से विश्व का ध्यान पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया है । आखिर क्यों विश्व के किसी भी कोने में जब आतंकवादी घटना घटती है तो नजरें पाकिस्तान की ओर मुड़ जाती हैं । जग जाहिर है कि पाकिस्तान की जमीन पर आतंकवादी को प्रश्रय मिलता है । पर अफसोस तो इस बात का भी है कि स्वयं पाकिस्तान भी उन आतंकवादियों का शिकार होता आया है । २०१४ में जब पाकिस्तान पेशावर शहर के आर्मी स्कूल पर आतंकवादी हमला हुआ था तो पूरा विश्व सदमे में था । क्योंकि सवाल मासूम बच्चों का था । तालिबान के चरमपंथियों ने स्कूल की चारदीवारी से अंदर घुसकर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई थीं जिसमें १४० बच्चे मारे गए थे । सिलसिला आज भी रुका नही है क्योंकि आज भी स्कूलों को निशाना बनाया जा रहा है । यानि चरमपंथियों के निशाने पर बच्चे हैं जिन्हें वो अपनी कट्टरपंथी शिक्षा देना चाहता है । बावजूद इसके पाकिस्तानी सरकार आइएसआइ को अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्रय देती रही है आतंक को प्रश्रय देती रही है और विश्व के सामने शाँति का राग भी अलापती रही है ।

पड़ोसी राष्ट्र भारत में आतंकवाद कोई नयी बात नहीं है, बल्कि यह पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से बढ़ रहा है । भारत में आतंकवाद को औपनिवेशिक विरासत का अभिन्न अंग माना जाता है । ब्रिटिश ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का पालन किया और अंततः उपमहाद्वीप को दो राष्ट्रों में विभाजित किया, जो बाद में बांग्लादेश की आजÞादी के बाद तीन में बट गया । आजÞादी के बाद और विभाजन के बाद हिंसा और आतंकवाद अभूतपूर्व था । धर्म, विश्वास और समुदाय के आधार पर विभाजन ने नफरत, हिंसा, आतंकवाद, अलगाववादी और सांप्रदायिक विभाजन का बीज बोया और लंबे समय तक यह फलते–फूलते रहे हैं । जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद एक आम बात है । व्यापक गरीबी, बेरोजÞगारी, युवाओं, किसानों और मजÞदूर वर्ग की उपेक्षा और भावनात्मक अलगाव प्रांत में उग्रवाद के मुख्य कारण हैं । सीमाओं में शत्रुतापूर्ण बल भी बहुत मदद कर रहे हैं । भारत की सहायता के साथ बांग्लादेश के एक स्वतंत्र राज्य बन गया जो कि पाकिस्तान को बर्दाश्त नहीं हुआ । जिसकी भड़ास वह समय समय पर निकालता रहा है । भारत में जब भी आतंकवादी हमले हुए उसकी कड़ी पाकिस्तान से जा मिलती है ।

भारत के मुम्बई में जो श्रृंखलाबद्ध बम विस्पmोट हुए थे उसकी योजना पाकिस्तान में बनी थी । पाकिस्तानी सरकार द्वारा आतंकवाद और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों में आतंकवाद के उग्रवाद की आवाज के बावजूद आतंकवादियों, कट्टरपंथियों को आईएसआई और अन्य ऐसे समूहों और एजेंसियों द्वारा चलाए जा रहे गुप्त और सुस्थापित शिविरों में उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है । इन चरमपंथियों को वहां एक बहुत सुरक्षित रहने की जगह मिलती है ।

११ सितंबर, २००१ में अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़ा और भयानक आतंकवादी हमला हुआ । अलकायदा आतंकी संगठनों के सदस्यों ने दो यात्री विमानों का अपहरण कर उन्हें न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के दो टावरों से टकरा दिया था, जिससे ये दोनों इमारते गिर गई थीं । तीसरा विमान पेंटागन से टकराया था और अगवा किया गया चौथा विमान पेंसिलवेनिया में गिर गया था । हमले में करीब ३ हजार लोगों की जानें गई थीं । और इसके सरगने को छिपने की जगह मिली थी पाकिस्तान में । १० वर्षों के बाद २०११ में दहशतगर्दी के जिस चेहरे ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया को खÞौफÞजÞदा कर रखा था, आखिÞरकार पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपे सबसे बड़े आतंकी का खÞात्मा हो गया । आतंकी संगठन अलकÞायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी सेना ने मार गिराया । .

आज एक बार फिर अमेरिका चिंतित है ओसामा विन लादेन के बेटे हमजा लादेन को लेकर जिसने धमकी दी है कि वह अमेरिका से अपने पिता की मौत का बदला लेगा । अमेरिका ने हमजा की सूचना देने वाले के लिए दस लाख डालर देने की घोषणा की है ।
भारत और पाकिस्तान का तनाव फिलहाल युद्ध की दस्तक दे रहा है । जबकि हम सभी जानते हैं कि युद्ध किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता और न ही युद्ध शौक से किया जाता है । परन्तु आज के हालात में यह लग रहा है कि भारत अब निर्णय चाह रहा है । वहीं पाकिस्तान चाहे जितने भी एटमी शक्ति के दावे कर ले किन्तु यह कटु सत्य है कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर पाकिस्तान युद्ध की तबाही झेल नहीं पाएगा । वैसे अभी भारतीय पायलट को अभिनन्दन को छोड़कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जो संदेश देना चाह रहे थे वो वहाँ भी सफल नही हो रहे क्योंकि जिस समय अभिनन्दन को लौटाने की प्रक्रिया चल रही थी उस समय भी सीमा पर गोलियाँ चल रही थीं । अब भी भारत पाकिस्तान की सीमाएँ रक्तरंजित हैं रोज भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं ।

दोनों ओर के नागरिक आतंक और डर के साए में जीने को मजबूर हैं । पाकिस्तान कहता कुछ और है करता कुछ और यही वजह है कि आज आतंक की लड़ाई में विश्व के सभी शक्तिशाली देश भारत के साथ खड़े हैं । यहाँ तक कि इस मुद्दे पर चीन भी भारत के साथ आ खड़ा हुआ है । देखा जाय तो आज भारत अपनी कूटनीति से पाकिस्तान को विश्व परिदृश्य में अलग थलग करने में सफल रहा है । पाकिस्तान की सीमा में जाकर आतंकी ठिकानों पर भारत ने हमला किया वो भी विश्व को अपने समर्थन में लेकर यह बताता है कि भारत आज आतंक की लड़ाई में विश्व को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है । एक ताजी तसवीर देखने को मिली भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के बीच आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक को आपरेशन (ओआईसी) की बैठक में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पहुँची । जहाँ उन्हें गेस्ट आफ आनर के रूप में निमंत्रण दिया गया था । इस वजह से पाकिस्तान ने ओआईसी की बैठक में भाग नहीं लिया । ये वो मंच है जिसकी नींव पाकिस्तान ने रखी थी जहाँ कभी भारत को बोलने से रोक दिया गया था वहाँ भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आतंकवाद और आतंकवादी को ललकार कर आईं । यह परिदृशय बताता है कि भारत की तस्वीर दुनिया के नक्शे पर आतंकवाद के मसले पर मजबूती के साथ बदल चुकी है ।
जो विरोध करते हैं उन्हें समझना होगा कि यह लड़ाई पाकिस्तान से नहीं है लड़ाई आतंकवाद से है जिसके लिए पाकिस्तान को ईमानदारी से सामने आना होगा क्योंकि आतंक का दर्द वह भी झेल रहा है । विकास की गति से अधिक वहाँ बरबादी की गति है इस सच को समझना होगा । वहाँ एक ऐसा तबका है जो शांति नहीं चाहता उसे हमेशा सुलगती हुई सीमा चाहिए जिसे पाकिस्तान के सरकार को समझना होगा और अपनी छवि सुधारनी होगी ।

आतंकवाद एक वैश्विक समस्या

आज आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और इसे अलगाव में हल नहीं किया जा सकता है । इस वैश्विक खतरे से लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहकारी प्रयासों की आवश्यकता है और दुनिया के सभी सरकारों को एक साथ और लगातार आतंकवादियों पर हमले करने चाहिए । विभिन्न देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग से वैश्विक खतरे को कम किया जा सकता है । जिन देशों से आतंकवादियों के स्प्रिंग्स को स्पष्ट रूप से पहचाना जाये उन्हें आतंकवादी राज्य घोषित किया जाना चाहिए । किसी भी आतंकवादी गतिविधि के लिए देश में लंबे समय तक कामयाब होना तब तक बहुत मुश्किल होता है जब तक कि इसके लिए मजबूत बाहरी समर्थन न हो । आतंकवाद को अब तक कुछ भी नहीं मिला है और ना इससे कुछ हल भी निकला है । यह हम सब लोग बहुत अच्छे से जानते है । यह संपूर्ण व्यर्थता है, आतंकवाद में विजय या पराजय नहीं होता, केवल जनता का नुकसान होता है अगर आतंकवाद जीवन का एक रास्ता बन जाता है तो हम विभिन्न देशों के राज्यों के प्रमुख नेताओं को दोषी कहते हैं । यह दुष्कार्य का चक्र अपनी स्वयं की रचना है और हम केवल उनके संयुक्त और जमा किए गए गलत प्रयासों की जांच कर सकते हैं । आतंकवाद मानवता के खिलाफ एक अपराध है और इसे पूरी कोशिश से निपटा जाना चाहिए और उसके पीछे की ताकतों को उजागर करना चाहिए । आतंकवाद, प्रतिकूल जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और हमारे साथ कठोर व्यवहार करता है ।
भूमण्डलीकरण के दायरे के साथ ही आतंकवाद का भी दायरा बढ़ता गया और आज यह सुरसा के मुँह की तरह विभिन्न रूपों में फैल रहा है । इसमें लिंग आधारित आतंकवाद, अभिजातवादी आतंकवाद, दलित चेतनावादी आतंकवाद, क्षेत्रीय पृथकतावादी आतंकवाद, सांप्रदायिक आतंकवाद, जातीय आतंकवाद, जेहादी आतंकवाद, विस्तारवादी आतंकवाद से लेकर प्रायोजित आतंकवाद तक शामिल हैं । वस्तुतः आतंकवाद एक ऐसा सिद्धांत है जो भय या त्रास के माध्यम से अपने लक्ष्य की पूर्ति करने में विश्वास करता है । आज आतंकवाद एक संगठित उद्योग का रूप धारण कर चुका है । एक जगह से आतंक खत्म होता नजर आता है, तो दूसरी जगह यह तेजी से सर उठाने लगता है । कभी सम्भ्यताओं के संघर्ष के बहाने तो कभी धर्म की आड़ में रोज तमाम जीवन लीलाओं का यह लोप कर रहा है । इसका शिकार शिशु से लेकर वृद्धजन तक हैं । आतंक फैलाने वाले लोग अपने आप को राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी या निष्ठावान सैनिक कहलाना पसंद करते हैं । ‘इनसाइक्लोपीडिया आफ दि सोशल साइंसेज‘ के अनुसार, आतंकवाद वह पद है जिसका प्रयोग विधि अथवा विधि के पीछे सिद्धांत की व्याख्या के लिए किया जाता है और जिससे एक संगठित समूह या पार्टी अपने स्पष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति मुख्य रूप से व्यवस्थित हिंसा के प्रयोग द्वारा करता है ।
यहाँ पर स्पष्ट करना जरूरी है कि आतंकवाद और हिंसा पूर्ण रूप से एक ही नहीं हैं। आतंकवाद मात्र हिंसा नहीं है बल्कि यह आतंक से विवश करने की एक विधि है, जिससे लोगों को उन कार्यों को करने के लिए बाध्य किया जाता है जिसे वे मृत्यु, भय चोट या पीड़ा के बिना नहीं कर पाते । आतंकवाद में एक राजनीतिक उद्देश्य निहित होता है, जो उसे आपराधिक हिंसा से पृथक करता है । वस्तुतः आतंकवाद एक लघु व सीमित संगठन द्वारा संचालित होता है और इसको अपने निश्चित लम्बे प्रोग्राम और लक्ष्य से प्रेरणा मिलती है और उसी के लिए आतंक उत्पन्न किया जाता है । जबकि हिंसा के पीछे कोई संगठित कार्यक्रम व सुनियोजन नहीं होता है एवं इसमें बौद्धिकता का भी पूर्ण अभाव होता है । सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि वर्तमान में आतंकवाद एक राजनीतिक कार्य की सशक्त पद्धति के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैला रहा है । तमाम देश अन्य देशों में अपने हितों को साधने के लिए प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता । यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्था भी आतंकवाद के समूल उन्मूलन के लिए कड़े कदम नहीं उठा पाती है । मात्र घोषणा पत्र जारी करने, शांति सैनिक भेजने से आतंक की समस्या खत्म नहीं होती बल्कि इसके लिए समुचित संसाधनों एवं राजनैतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है ।
मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम एवं भगवान श्री कृष्ण का उदाहरण हमारे सामने है । श्री राम ने जहाँ अपने स्वभाव व मर्यादा के दम पर तमाम राक्षस–राक्षसियों का खात्मा किया, वहीं ‘रावण‘ रूपी आतंक को भी बानरों–रीछों की संगठित सेना द्वारा खत्म कर ‘राम राज्य‘ की स्थापना की । श्रीराम का बनवासी होना इस बात का प्रतीक था कि आतंक को खत्म करने के लिए राजसत्ता से ज्यादा प्रतिबद्धता जरूरी है, सैनिकों की बजाय उनकी एकता व सूझबूझ जरूरी है । श्रीराम का आतंकवाद के विरूद्ध अभियान सामूहिक उत्तरदायित्व व सामूहिक नेतृत्व का परिणाम है, जिसमें वे लोकनायक के रूप में उभरते हैं । श्री कृष्ण ने कौरवों की १८ अक्षौहिणी सेना को अपने नेतृत्व, कुशल मार्गदर्शन, एकता एवं सक्षम कूटनीति के चलते ही परास्त किया । रामायण और महाभारत के युद्ध इतिहास का एक नया अध्याय रचते हैं तो सिर्फ इस कारण कि उन्होंने आतातायियों के संगठित आतंक के विरूद्ध जनमानस को न सिर्फ एकत्र किया बल्कि मानवता को यह संदेश भी दिया कि ‘‘सत्य सदैव विजयी होता है ।” कालांतर में महात्मा बुद्ध व महावीर जैन ने अहिंसा को धर्म से परे मानव जीवन की सद्वृत्तियों से जोड़ा । आधुनिक काल में महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी राज रूपी आतंक को खत्म करने के लिए सत्याग्रह एवं अहिंसा का सहारा लिया । उन्होंने प्रतिपादित किया कि कोई भी आतंक एक लंबे समय तक नहीं रह सकता, बशर्ते उसके खात्मे के लिए किसी प्रायोजित आतंक का सहारा न लिया जाय । महात्मा गाँधी मानसिक आतंकवाद को ज्यादा बड़ी समस्या मानते थे न कि भौतिक आतंकवाद को । इसी कारण उन्होंने विचारों को खत्म करने की बजाय उसे बदलने पर जो दिया ।
निश्चिततः आतंकवाद आज विश्वव्यापी समस्या है । भौतिक आतंकवाद की बजाय ‘मानसिक‘ एवं ‘प्रायोजित‘ आतंकवाद में इजाफा हुआ है । आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने वाले देश यह भूल जाते हैं कि आतंक का कोई जाति, धर्म लिंग या राष्ट्र नहीं होता । अपनी क्षुधा शांत करने के लिए आतंकी अपने जन्मदाता को भी निगल सकता है । ऐसे में जरूरत आतंक के केंद्र बिन्दु पर चोट करने की है । श्री राम भी रावण को तभी खत्म कर पाए जब उन्होंने उसके नाभि स्थल पर बाण भेंदा । आज भी आतंकवाद के खात्मे के लिए इसी नीति को अपनाने की जरूरत है ।

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