Mon. Oct 15th, 2018

आरोप प्रत्यारोप के बीच जनकपुर ने दिल खोलकर मोदीजी का स्वागत किया : श्वेता दीप्ति

 ठंडे पड़े रिश्तों में गर्माहट के आसार

सम्पादकीय, हिमालिनी, मई अंक 2018 ।    भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीसरी नेपाल यात्रा धार्मिक यात्रा होते हुए भी कई मायनों में राजनीतिक स्तर पर भी सफल मानी जा सकती है । लम्बित कई योजनाओं के पूरी होने की उम्मीद जगी है और प्रधानमंत्री ओली की नरमी और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की नीति के कारण ठंडे रिश्तों में एक गर्माहट भी नजर आ रही है । प्रधानमंत्री ओली नेपाल को विकास की राह पर ले जाने के लिए तत्पर नजर आ रहे हैं और इस राह में भारत को साथ लेकर आगे बढ़ना निश्चय ही एक सकारात्मक कदम साबित होगा । भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की दिली इच्छा थी जनकपुरधाम जाने की पर पिछली दोनों यात्राओं में विभिन्न कारणों को दिखाते हुए यह सम्भव नहीं हो पाया था । किन्तु देर आए दुरुस्त आए । मोदी जी की इच्छा तो पूरी हुई ही, उससे अधिक मधेशी जनता की इच्छा पूरी हुई है । मधेश की जनता आतुर थी अपने अतिथि के आत्मिक स्वागत के लिए । आरोप प्रत्यारोप के बीच जनकपुर ने दिल खोलकर हृदय से स्वागत किया, जो यादगार रहेगा । भारत द्वारा माता जानकी को समर्पित सौ करोड़ की राशि का अगर सही सदुपयोग हुआ तो निश्चय ही जनकपुरधाम का कायाकल्प तय है । रामायण सर्किट और यातायात की सहज सुविधा जनकपुरधाम के लिए पर्यटकीय दृष्टिकोण से महत्तवपूर्ण सिद्ध होगी ।
इन सबके बीच दो नम्बर प्रदेश के मुख्यमंत्री लालबाबु राउत गद्दी फिलहाल नागरिक अभिनन्दन के दौरान अपने सम्बोधन की वजह से चर्चा में आ गए हैं । जहाँ उनके सम्बोधन ने उन्हें मधेश का हीरो बना दिया है वहीं दूसरी ओर बेवजह की खलबली नजर आ रही है । देश संघीयता में जा चुका है, पर व्यवहारिक रूप में इसके अभ्यास की अभी आदत नहीं बनी है, शायद इसलिए यह बैचेनी नजर आ रही है । मधेश की समस्या तो पहले ही विश्व पटल पर अंकित हो चुकी है फिर इसे किससे छुपाया जा रहा है ? ऐसे में एक जनप्रतिनिधि का अपनी ही मिट्टी, अपनी ही जनता और अपनी ही सरकार के समक्ष उनकी समस्याओं को याद दिलाना कदापि अनुचित नहीं है । और फिर ऐसा होना कोई नई बात नहीं है, इसका गवाह नेपाल का इतिहास है । ऐसे में मुख्यमंत्री लालबाबु को पक्ष विशेष की ओर से कटघरे में खड़ा करना एक बार फिर से खुद की बीमार मानसिकता को ही दर्शाना है । इस बात को जितनी तूल दी जाएगी यह माना जाय कि लालबाबु मधेश की जनता के दिल में उतनी ही गहराई से जगह बनाएँगें । कम से कम इसी बहाने एक बार फिर मधेश की समस्या सामने तो आई । सरकार को यह सोचने पर बाध्य होना होगा कि मधेश की मिट्टी में जो असंतोष के बीज दबे हैं, उन्हें वृक्ष बनने का अवसर ना दें और समय रहते इसका समाधान करें । क्योंकि दबी हुई चिंगारी को विपरीत हवा का एक रुख भी सुलगा सकता है ।

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