Thu. Apr 25th, 2019

नेपालको पुनः हिन्दू राष्ट्र बनाना, कितना संभव कितना असंभव ? : डा. श्वेता दीप्ति

किन्तु आज विश्व नक्शे में कोई भी हिन्दू राष्ट्र नहीं है । क्या यह पतन की पराकाष्ठा नहीं है ?


हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | सन् २००८, वह वर्ष जिसने विश्व पटल पर नेपाल की पहचान बदल दी । नेपाल का वह गौरव जो उसे विश्व के अन्य देशों से अलग करता था, एक गौरवमयी इतिहास का परिचायक बनाता था और विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र होने का जो सम्मान उसे प्राप्त था उसे नेपाल ने गँवा दिया ।
बावजूद आज दस वर्षों के उपरांत भी वक्त बेवक्त नेपाल को पुनः हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की माँग उठती रही है । वैसे राजनीतिक स्तर पर देखा जाय तो यह माँग एक राजनीतिक शगूफा भी माना जा सकता है । पर इससे परे अगर विश्लेषण करें तो लगता है कि आखिर नेपाल को क्यों नहीं हिन्दू राष्ट्र माना जाय ? नेपाल का अतीत और इतिहास साक्षी है कि यह भूमि सदैव हिन्दू धर्म का पोषक और रक्षक रहा है, ऐसे में इसकी पहचान को पुनः स्थापित करने की माँग नाजायज तो नहीं हो सकती ? राष्ट्र का निर्माण अगर जनता से है, तो उसी जनता की बहुलता को नजरअंंदाज करने का औचित्य क्या है ? आज आवश्यकता एक नजर नेपाल के अतीत, हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पर डालने की है ।

नेपाल का अतीत
किसी भी मान्यता को स्थापित करने के लिए सत्य तथ्य एवं इतिहास के साक्ष्य की आवश्यकता होती है । नेपाल का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसकी नींव हिन्दुत्व पर टिकी हुई है । नेपाल दक्षिण एशियायी हिमालयी राष्ट्र है ।  इसके उत्तर में स्वशासित राज्य तिब्बत है, जो आज भी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है । यानी नेपाल और चीन के बीच अवस्थित है तिब्बत । नेपाल के दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत अवस्थित है । धर्मावलम्बियों की दृष्टि से नेपाल मे ९० प्रतिशत से ज्यादा नागरिक हिन्दू हैं ।  देखा जाय तो यह प्रतिशत भारत में हिन्दुओं के आनुपातिक प्रतिशत से भी अधिक है । इस मायने में नेपाल विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू धर्मावलम्बी राष्ट्र भी है । नेपाल भौगोलिक विविधता वाला ऐसा देश है, जहां का तराई इलाका गर्म है तो हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं वाला इलाका बेहद ठंडा भी है । संसार की सबसे ऊंची १४ हिमश्रृंखलाओं में से आठ नेपाल में अवस्थित हैं ।

प्राचीन नेपाल (मिथकीय युग)
भारत और नेपाल का मिथकीय युग एकसाथ शुरू होता है । हिंदू मान्यताओं एवं धर्मग्रन्थों के अनुसार नेपाल की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास मनु से आरम्भ माना जाता है । इतिहासकारों के अनुसार मनु ही नेपाल के पहले राजा थे, जिन्होंने सत्ययुग में यहां राज किया । तब नेपाल सत्यभूमि के नाम से जाना जाता था । त्रेतायुग (सिल्वर युग ) में नेपाल को तपोवन तथा द्वापरयुग (ताम्र युग ) में इसे मुक्तिसोपान भी कहा जाता था । कलियुग (लौहयुग ) यानी मौजूदा समय में इसे नेपाल कहा गया । सत्ययुग में सौर्य वंश ने नेपाल की सभ्यता व संस्कृति के विकास में भरपूर योगदान किया । आज का सौर्य कैलेंडर और उस पर आधारित त्योहार इसी वंश की देन हैं ।
पहाड़ों और जंगलों से आच्छादित नेपाल  तत्कालीन तपस्वियों यथा– कण्व, विश्वमित्र, अगत्स्य, वाल्मीकि, याग्यवलक्य व दूसरे ऋषियों की तपस्थली थी । भारत के राजा दुष्यंत ने नेपाल के ही कण्व ऋषि की पुत्री शकुन्तला से शादी की थी । उसी के पुत्र भरत के नाम से आज का भारत है । विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों में नेपाल की चर्चा है । जनकपुर के न्यायप्रिय राजा जनक का भी विवरण इन्हीं ग्रंन्थों में मिलता है । माना जाता है कि रामायण की रचना यहीं के सप्तगंडकी नदी के तट पर की गई । महर्षि वेदव्यास यहीं पैदा हुए थे । नेपाल के दमौली (व्यास नगर) में व्यास गुफा है, जो इस अवधारणा की पुष्टि करती है । इसी तरह महाभारत में उल्लिखित महाराज विराट भी नेपाल के विराटनगर के राजा थे । ये सारे तथ्य इस बात के सबूत हैं कि मंजूश्री के कांठमांडो घाटी में आने से काफी पहले नेपाल का अस्तित्व था । स्वयंभू पुराण में वर्णित है कि चीन से कांठमांडो आकर मंजूश्री ने नागदह नामक विशाल झील के इर्दगिर्द लोगों को बसाया । उसने मंजूपत्तनम नामक शहर बसाया और धर्मांकर को राजा बनाया । इसके बाद से नेपाल का इतिहास कांठमांडों के इर्दगिर्द घूमता है । इसके बाद यहां कई राजवंशों ने शासन किया । ये हैं– आहिर या गोपाल, किरात, लिच्छवी, मल्ल और शाह ।
नेपाल शब्द की उत्पत्ति के बारे मे ठोस प्रमाण कुछ नही है, लेकिन एक प्रसिद्ध विश्वास के अनुसार यह शब्द ने नामक ऋषि तथा पाल (गुफा) से मिलकर बना है । माना जाता है कि एक समय में बागमती और विष्णुमती नदियों संगमस्थल पर ने ऋषि की तपस्थली थी । ने ऋषि ही यहां के राजा के सलाहकार थे । सामान्य तौर पर इस हिमालयी भूभाग पर गोपाल राजवंश का शासन था । इस वंश के लोग नेपा भी कहे जाते थे । इसी नेपा नाम से गोपालवंश शासित भूभाग नेपाल कहा गया ।
एक मान्यता यह भी है कि काठमांडो घाटी में रहने वाली नेवार जनजाति के नाम पर नेपाल नाम पड़ा होगा । गंडकी महात्म्य में एक राजा नेपा का उल्लेख है जिसने यहां न सिर्फ शासन किया बल्कि तमाम राज्यों को जीता भी । भगवान शंकर नेपा के आराध्य थे । इसी राजा ने अपने नाम पर इस राज्य का नाम नेपाल रखा ।
तिब्बती भाषा में ने का अर्थ होता है घर और पाल का अर्थ होता है ऊन । अर्थात वह इलाका जहां ऊन पाया जाता है । इस ने और पाल से नेपाल बना होगा । जबकि नेवारी भाषा में ने का अर्थ बीच में और पा का अर्थदेश होता है । यानी ऐसा देश जो दो देशों के बीच में अवस्थित हो । भारत और चीन के बीच अवस्थित होने के कारण ही इसका नाम नेपाल पड़ा होगा । दरअसल तमाम जनश्रुतियां हैं जिनके आधार पर नेपाल शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है । मगर प्राचीन नेपाल और नेपाल शब्द की इस व्युत्पत्ति के संदर्भ में ठोस लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है क्योंकि तत्कालीन समय में विधिवत इतिहास लिखा भी नहीं गया ।
नेपाल के प्रमाणिक इतिहास को ऐतिहासिक  इमारतों, सिक्कों, मंदिरों, देवी–देवताओं की प्राचीन मूर्तियों, कलात्मक अभिलेख और तत्कालीन साहित्य और १८०० ईसवी के आसपास के क्रानिकल्स (बस्मावलीज) से ही प्रमाणिक प्रकाश डाला जा सकता है । इनमें से सबसे प्रमाणिक क्रानिकल्स को ब्राह्मणों और बज्रकाचार्य ने संतलित किया है । ये राजा द्वारा किए गए धार्मिक कार्यों का विवरण है ।
इनमें से एक को राणा बहादुर शाह के समय में बौद्ध भिक्षु पाटन ने लिखा था । डेनियल राइट ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया है । इसमें राजा का इतिहास और कुछ घटनाएं वर्णित हैं मगर इन क्रानिकल्स से सभ्यता, संस्कृति या लोगों के रहन–सहन के बारे में कुछ पता नहीं चलता है ।
नेपाल के इतिहास पर प्राचीन काल में हाथों से लिखी गईं पांडुलिपियों से भी प्रकाश डाला गया है । इनके अलावा हिंदुओं के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों यथा( पुराणों, रामायण और महाभारत इत्यादि में नेपाल के विवरण मिलते हैं । इनकी मदद से भी नेपाल का इतिहास लिखा गया है । मसलन रामायण में नेपाल के जनकपुर के राजा जनक की पुत्री सीता से अयोध्या के राजकुमार राम का विवाह का विवरण है । महाभारत के युद्ध में नेपाल के राजा के भाग लेने का जिक्र भी मिलता है । दमयन्ती के स्वयंबर में नेपाल के राजा ने भाग लिया था । नेपाल के इतिहास के ये सभी लिखित साक्ष्य हैं । नेपाल का इतिहास लिखने के लिए प्रस्तर और ताम्र अभिलेखों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । ये अभिलेख पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच संस्कृत में लिखे गए हैं । इनमें चंगूनारायण के मंदिर से प्राप्त अभिलेख प्रमुख हैं । हालांकि लिच्छवी राजा शिवदेव के बाद के शासकों के अभिलेख अभी तक नहीं मिले हैं । १४वीं शताब्दी से मल्ल राजाओं के शासनकाल के अभिलेख प्रचुर मात्रा में मिलते हैं । प्राचीन भवन, मंदिर व स्तूप भी प्राचीन नेपाल की कहानी कहते हैं । इनमें चांगूनारायण, पशुपतिनाथ, हनुमान ढोका, पाटन का कृष्णमंदिर भक्तपुर का पांचमंजिला न्यातापोल, स्वयंभूनाथ, बौद्धनाथ, महाबौद्ध प्रमुख है । मल्ल राजाओं के बनवाए मंदिर और मूर्तियां ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । विभिन्न जगहों से मिले सिक्के नेपाल के इतिहास की कड़ी हैं ।  भारतीय और यूरोपीय इतिहासकारों के विवरणों और ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई से मिले अवशेषों में भी प्राचीन नेपाल दर्ज है । काठमांडू घाटी में नवपाषाण युग के अवशेष पाए गए हैं ।

१८ वीं शताब्दी से पहले का नेपाल
१८वीं शताब्दी से पहले नेपाल देश काठमांडू घाटी तक सीमित था । यानी काठमांडू का वृहद इतिहास ही नेपाल का इतिहास है । १४वीं शताब्दी के पहले का इतिहास हिंदू महाकाव्यों के अलावा बौद्ध और जैन स्रोंतों पर ज्यादा आधारित है । नेपाल का दस्तावेजी इतिहास लिच्छवी वंश के शासक महादेव (४६४ शताब्दी से ५५० ईसवी) के चांगूनारायण मंदिर से प्राप्त अभिलेख से शुरू माना जा सकता है । लिच्छवियों ने नेपाल में ६३० साल तक शासन किया । इनका आखिरी शासक था जयकामादेव ।
लिच्छिवियों के पतन के बाद १२वीं शताब्दी में अरिमल्ल के राजगद्दी हासिल करने  के साथ ही मल्ल राजाओं का शासन शुरू होता है जो दो शताब्दियों यानी १४वीं शताब्दी के आखिर तक कायम रहता है । इन्हीं शासकों ने कांतिपुर नामक शहर को बसाया जिसे आज हम काठमांडो के नाम से जानते हैं । इन दो शताब्दियों में महत्वपूर्ण सामाजिक व आर्थिक सुधार किए । पूरे काठमांडो घाटी में संस्कृत भाषा को स्थापित किया । जमीन की पैमाइश के नए पैमाने ईजाद किए। जयसाथीतिमल्ल ने १५वीं शताब्दी के आखिर तक काठमांडो घाटी पर शासन किया । इसके मरने के साथ ही घाटी का यह साम्राज्य १४८४ ईसवी में तीन टुकड़ों, काठमांडो, भक्तपुर और पाटन में विभक्त हो गया । मल्ल राजाओं की शक्ति क्षीण होते ही पृथ्वी नारायण शाह ने काठमांडो घाटी पर हमला किया । इसी शाह वंश ने आगे चलकर नेपाल का एकीकरण किया । मल्ल वंश के आखिरी शासक थे, काठमांडो में जयप्रकाश मल्ल, पाटन में तेज नरसिंह मल्ल और भक्तपुर में रंजीत मल्ल ।

शाह राजवंश और नेपाल का एकीकरण
आधुनिक नेपाल के एकीकरण का श्रेय शाहवंश के पृथ्वीनारायण शाह  १७६९÷१७७५ ईसवी) को जाता है । शाह वंश के संस्थापक द्रव्यशाह  १५५९÷१५७० ईसवी) के नौंवें उत्तराधिकारी पृथ्वीनारायण अपने पिता नर भूपाल शाह के बाद उस समय के ताकतवर गोरखा शासन की कमान १७४३ ईसवी में संभाली । जिस तरह भारत और चीन के बीच तिब्बत है उसी तरह काठमांडू और गोरखा के बीच नुवाकोट था ।
पृथ्वीनारायण शाह ने अपना विजय अभियान १७४४ ईसवी में नुवाकोट की जीत से शुरू किया । इसके बाद काठमांडू घाटी के उन सभी ठिकानों को अपने कब्जे में ले लिया जो सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण थे । इसके बाद काठमांडो घाटी का संपर्क बाकी दुनिया से कट गया । सन् १७७५ में कुटी दर्रा पर कब्जे के बाद पृथ्वीनारायण ने अंततः काठमांडो घाटी का तिब्बत से व्यापारिक संपर्क भी छिन्नभिन्न कर दिया । अब पृथ्वीनारायण शाह ने घाटी में प्रवेश करके कीर्तिपुर पर हमला कर दिया । अब तक बेखबर सो रहा मल्ल शासक जयप्रकाश मल्ल घबरा गया और ब्रिटिश सेना से मदद मांगी । १७५६ में ईस्ट इंडिया की और से कैप्टेन किंलोच अपने सिपाहियों के लेकर मदद के लिए हाजिर हुआ । पृथ्वीनारायण शाह की सेना ने फिंरंगियों को परास्त जयप्रकाश मल्ल की उम्मीदों को धूल में मिला दिया ।
बड़े नाटकीय तरीके से पृथ्वीनारायण शाह ने २५ सितंबर १७६८ को काठमांडो पर तब कब्जा कर लिया जब वहां के लोग इंद्रजात्रा उत्सव मना रहे थे । काठमांडो के लोगों ने तो पृथ्वीनारायण शाह का राजा के तौर पर स्वागत किया मगर जयप्रकाश मल्ल भाग निकला । उसने पाटन में शरण ली । जब एक सप्ताह बाद पृथ्वीनारायण शाह ने पाटन को कब्जे में ले लिया तो जयप्रकाश मल्ल और पाटन का राजा तेजनरसिंह मल्ल दोनों ने भक्तपुर में शरण ली । भक्तपुर भी नहीं बचा और नेपाल के एकीकरण अभियान में यह भी जीत लिया गया । इस विजय के बाद १६९ में कांठमांडो को आधुनिक नेपाल की राजधानी बना दिया गया । विभिन्न जातियों को राष्ट्रीयता के दायरे में लाने का पृथ्वीनारायण शाह ने वह अभूतपूर्व कार्य किया जिसके चलते एकीकरण के बाद एक छत्र नेपाल राष्ट्र बन पाया । अंग्रेजों के हमले ने इस एकीकृत नेपाल को भारी क्षति पहुंचाई । अंग्रेजों के साथ नेपाल का पश्चिमी तराई खासतौर पर बुटवल और सेवराज को लेकर था । अंग्रेजों ने १८१४ ईसवी में नेपाल के पश्चिमी सीमा पर स्थित नालापानी पर हमला कर दिया । अंग्रेजी सेना भारी पड़ी और नेपाली सेना को महाकाली नदी का पश्चिमी किनारा खाली करना पड़ा । अंग्रेजों के साथ १८१६ ईसवी में सुगौली की संधि करनी पड़ी जिसमें नेपाल की पश्चिमी सीमा महाकाली और मेची नदियों तक सीमित हो गई । इस समय राजा गिरवान युद्ध विक्रम शाह नेपाल का राजा था । उनके प्रधानमंत्री भीमसेन थापा थे । इस संधि से नेपाल का वह हश्र नहीं हुआ जो भारतीय राजाओं का हुआ । नेपाल और शाहवंश का इस संधि के बाद भी वजूद रहा मगर भारत की रियासतों को एक–एक कर लील गए अंग्रेज और नतीजे में अंततः भारत गुलाम हो गया । नेपाल पर गुलामी की मोहर नही लगी ।
इस तरह नेपाल का इतिहास बताता है कि नेपाल सदैव हिन्दू राजाओं के हाथ में रहा और उनके द्वारा हिन्दू धर्म संरक्षित और सुरक्षित  रहा । जिसका प्रमाण नेपाल और खास कर काठमांडू के हर गली चौराहे पर अवस्थित मंदिर है, जिसके कारण काठमांडू को मंदिरों का शहर भी कहा जाता है ।

वर्तमान नेपाल
नेपाल सदियों से हिंदू राष्ट्र था मगर दुनिया के नक्शे से अब यह आखिरी हिंदू राष्ट्र के रूप में मिट चुका है । लिच्छवि, मल्ल और अंततः शाहवंश के आखिरी राजा ज्ञानेन्द्र हिंदू राष्ट्र नेपाल के अंत का साक्षी रहा । यहां यह कहना मुनासिब होगा कि ज्ञानेन्द्र की सत्तालोलुपता भी राजशाही के पतन का कारण बनी । ज्ञानेन्द्र प्रशासनिक तौर पर एक कमजोर शासक साबित हुए जो बदलते नेपाल को भांप नहीं पाये । नतीजे में  माओवादी नेता प्रचण्ड ने लंबी लड़ाई के बाद इस राजशाही को पहले बुलेट और फिर बाद में बैलेट (मतपत्र ) से बेदखल कर दिया ।
सत्य तथ्य है कि हर पुरानी व्यवस्था व सत्ता को नई चुनौतियों के सामने झुकना पड़ा है । रुढि़यों में डूबे हिंदू धर्म को पहले बौद्ध और फिर जैनियों ने चुनौती दी । सत्ता, समाज व व्यवस्था सभी कुछ बदल दिया । भक्ति व समाज सुधार आंदोलनों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इसके बाद मुस्लिम व हिंदू व्यवस्था को अपेक्षाकृत प्रगतिशील अंग्रेजों व ईसाई मिशनरियों ने चुनौती दी । धर्म और आस्था पर टिके हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध व जैन मतावलंबियों के बनाए समाज व सिद्धांत को वामपंथी आंदोलनों ने चुनौती दी । इन सभी चुनौतियों ने एक ऐसी अलग दुनिया कायम कर दी जिसका लोहा पथभ्रष्ट हो चुके पुराने समाज को भी मानना पड़ा । इन परिवर्तनों से ऐसा नहीं हुआ कि कोई पूरी तरह से मिट गया । सुधारों के जरिए वह भी अपना वजूद कायम रखे हुए है । नेपाल में जनता ने परिवर्तन का स्वागत किया मगर अकर्मण्य राजशाही मिट गई । जनता की आंखों में इसी परिवर्तन की ललक प्रचणड ने देख ली थी । इसी परिवर्तन की लहर में नेपाल भारत की तरह गणतंत्र राष्ट्र हो गया । १८वीं शताब्दी में नेपाल के एकीकरण और हिंदू धर्म व संस्कृति के लिए पृथ्वीनारायण शाह ने न सिर्फ नेपाल का एकीकरण किया था बल्कि एक ऐसे मजबूत हिंदू राष्ट्र नेपाल का निर्माण किया, जिसने अपने ताकत के बल पर चीनियों को रोका और अंग्रेजों को भी अपनी ताकत से धूल चटा दी थी । भारत में हिंदू सत्ता अंग्रेजी शासन के आगे टिक ही नहीं पाई । मगर नेपाल अप्रैल २००८ के पहले तक दुनिया का इकलौता हिंदू राष्ट्र बना रहा । नेपाल के इस उत्थान पतन की कहानी एक ऐसे हिंदू राष्ट्र की कहानी है जो सदियों तक भारत के मनीषियों की तपस्थली रहा है । नेपाल के प्राचीन इतिहास में एक बार झांककर देखें तो वहां नेपाल नहीं भारत भी दिखाई देगा । आदिकालीन नेपाल के साथ माओवादियों के सत्तासीन होने की गाथा नेपाल में ऐतिहासिक परिवर्तन की गाथा है । जिसने राष्ट्र के हर क्षेत्र में उथलपुथल ला दिया और जो आज भी स्थायित्व की तलाश में है ।

क्या है हिन्दू धर्म ?
अब बात करें हिन्दू धर्म की । यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दू धर्म सनातन धर्म है । सनातन का अर्थ है– ‘शाश्वत’ या ‘हमेशा बना रहने वाला’।, सनातन अर्थात जो सदा से है, जो सदा रहेगा, जिसका अंत नहीं है और जिसका कोई आरंभ नहीं है वही सनातन है ।
विश्व में केवल हिन्दू धर्म ही ज्ञान पर आधारित धर्म है, बाकी सब तो किसी एक व्‍यक्ति के द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं । इसलिए हिन्दू धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है और उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती है, एक मात्र हिंदू धर्म ही ऐसा धर्म है, जो समय–समय पर अपने नियमों की समीक्षा करके उनमें सुधार करता रहा है । हिन्दू धर्म एक खुला धर्म है जो विचार से नहीं अपितु विवेक से विकसित हुआ है । इसके विपरीत अन्य धर्म चाहे वह इस्लाम हो चाहे ईसाई या कोई अन्य, सभी बंद धर्म है, जो एक व्यक्ति मात्र के विचारों पर आधारित है और जो यह मानकर चलते हैं कि समय अपरिवर्तित रहता है और व्यक्ति का विवेक भी । इन धर्मों में विचारों के विकास का कोई महत्व नहीं है । यही कारण है कि इन धर्मों में विशेष आग्रह अथवा वैचारिक कट्टरता पाई जाती है ।
नेपाल को एक नया संविधान मिला जिसमें एक शब्द है, बहुधार्मिक । भाषा, संस्कृति और जाति को ‘बहु’ कह सकते हैं । किन्तु धर्म को बहु नहीं कह सकते क्योंकि धर्म केवल एक है और वह है सनातन धर्म । इसके इतर सभी  पन्थ हैं । पंथ यानि वह दिशा या राह जो व्यक्ति विशेष के द्वारा दिखाई जाती है और जिसका अपनी इच्छानुसार अनुशरण किया जाता है ।
धर्म का सामान्य अर्थ धारण किया गया गुण है । और इसके दस लक्षण बताए गए हैं–धैर्य, क्षमा, दमन, आस्तेय, शौच, ईन्द्रिय निग्रह, धी (बुद्धि, विवेक), विद्या, सत्य और अक्रोध । इसी को वैदिक ग्रन्थ में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ।’ कहा गया है, इसे ही भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ और इसे ही हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ कह कर इसका अनुशरण करते हैं ।
नेपाल के संविधान २०७२ के प्रस्तावना में लिखा गया शब्द  ‘बहुधार्मिक’  पन्थीय विचार को सनातन धर्म के समकक्ष बना दिया है । संविधान में प्रयुक्त इस शब्द ने  हिन्दू, बौद्ध, किराँत आदि के अस्तित्व को नीचे लाकर ईसाई, ईस्लाम और बहाई के समकक्ष ला खड़ा किया है । जिसमें स्वाभाविक रूप से सुधार की आवश्यकता महसूस की जाती है किन्तु दुर्भाग्य की इस पर सही ज्ञान के अभाव की वजह से चुप्पी छाई हुई है ।

क्या हिन्दू राष्ट्र की मांग अनुचित है ?
विश्व में ईसाइयों के १५७, मुसलमानों के ५२, बौद्धों के १२, जबकि यहूदियों का १ राष्ट्र है । भारत, श्रीलंका, कम्बोडिया वो राष्ट्र हैं जो हिन्दू राष्ट्र था और नेपाल २००८ तक एकमात्र हिन्दू राष्ट्र बना रहा । किन्तु आज विश्व नक्शे में कोई भी हिन्दू राष्ट्र नहीं है । क्या यह पतन की पराकाष्ठा नहीं है ? भारत और नेपाल में एक वर्ग है जो यह मानता है कि अगर ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित कर सर्व जाति पन्थों का परमकल्याण साधा जा सकता है, तो हिन्दू राष्ट्र की पुनःस्थापना में आपत्ति क्यों ? जब भी हिन्दू राष्ट्र की बात चलती है तो इसका विरोध क्यों होता है ?  क्यों इसे असंवैधानिक माना जाता है ? अत्यंत विकसित और लोकतान्त्रिक देश होने पर भी इंग्लैण्ड एक ‘ईसाई’ राष्ट्र हो सकता है, तब ९० प्रतिशत हिन्दू जनसंख्यावाला नेपाल देश ‘हिन्दू राष्ट्र’ क्यों नहीं बन सकता ? पाकिस्तान और बांग्लादेश के संविधान में ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ लिखा है, तब नेपाल के संविधान में, ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द क्यों नहीं लिखा जा सकता ? जब इस्लामी राष्ट्रों में हिन्दू रह सकते हैं, तो ‘हिन्दू राष्ट्र में मुसलमान और ईसाई क्यों नहीं रह सकते ? उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योकि हिन्दुत्व की जड़ें किसी एक पैगम्बर पर टिकी न होकर सत्य, अहिंसा सहिष्णुता, ब्रह्मचर्य , करूणा पर टिकी हैं । तुलसीदास जी ने लिखा है परहित सरिस धरम नहीं भाई । पर पीड़ा सम नहीं अधमाई । अर्थात दूसरों को दुख देना सबसे बड़ा अधर्म है एवं दूसरों को सुख देना सबसे बड़ा धर्म है । यही हिन्दू धर्म की भी परिभाषा है । ऐसे में हिन्दू धर्म से इतर धर्मवालों को ऐसे राष्ट्र में रहने से कोई कठिनाई नहीं हो सकती है ।
हिन्दू धर्म पृथ्वी को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात ‘पूरे विश्व को एक परिवार’ माननेवाला और ‘सर्वेऽत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः ।’ अर्थात ‘इस विश्व के सब लोग सुखी और निरोगी रहें’, ऐसी प्रार्थना करनेवाला धर्म है तो ऐसे धर्म का हमें सम्मान कर इसे अपनाना चाहिए । अन्य किसी भी धर्म के पास इतना उच्च कोटि का ज्ञान नहीं है । वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण के माध्यम से ऋषि मुनियों ने हमारे लिए यह ज्ञान लिखकर रखा है, तब भी हिन्दुओं को यह कहना पडता है कि ‘स्वधर्माभिमान निर्माण करो ।’ यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है । हिन्दुओं के अधःपतन का मुख्य कारण उनका धर्मविषयक अज्ञान ही है । हिन्दुओं को यह ज्ञात नहीं है कि उनके धर्मकर्तव्य कौन से हैं । हिन्दुओं को अब उनके धार्मिक कर्तव्यों का स्मरण करवाने की, अर्थात उन्हें साधना के लिए प्रवृत्त करने की आवश्यकता है । ज्ञान की इसी कमी की वजह से और गरीबी की वजह से आज धर्म परिवर्तन धड़ल्ले से हो रहे हैं । अगर धर्म परिवर्तन का कारण बौद्धिक स्तर है, तो यहाँ स्वतंत्रतता है कि आप कोई भी धर्मावलम्बी हो सकते हैं । किन्तु ऐसा है नहीं, धर्म परिवर्तन वो कर रहे हैं जिन्हें अपने धर्म का सही ज्ञान नहीं है, या जो गरीबी से जूझ रहे हैं और जिन्हें चंद पैसे का लोभ यह कार्य करवा रहा है ।
राजतंत्र के पतन के बाद भी नेपाल आज तक स्थिर नहीं हो पाया है । भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से जूझता नेपाल एक बार फिर से राजतंत्र को याद करने पर विवश है । हालाँकि राजतंत्र की वापसी की सम्भावना क्षीण है, किन्तु गौरवशाली हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना आज भी नेपाली जनमानस के दिलों में पल रही हैं । जनता आज गणतंत्र और राजतंत्र में तुलना करने लगी है और गाहे बगाहे उनकी जुबान से यह निकलने लगा है कि आज से अच्छा तो राजतंत्र था । ऐसा सिर्फ इसलिए कि जनता अपने ही नेताओं से छली जा रही है । गणतंत्र स्थापना का सबसे पहला प्रहार था नेपाल की चिरपरिचित पहचान को ही छीन लेना । जिसके दूरगामी प्रभाव की कल्पना शायद उस समय नही की गई थी, पर आज धर्मपरिवर्तन का भयावह सच इस परिवर्तन के प्रभाव को दर्शा रहा है । मंदिरों की जगह चर्च और मस्जिदें ले रही हैं । जहाँ इनके बनने पर कोई सवाल नहीं उठता वहीं एक मंदिर की स्थापना पर कई सवाल उठ खड़े होते हैं । धर्मनिरपेक्षता की परिकल्पना तुष्टीकरण का स्थान ले रही है । स्वतंत्रता के बाद से  भारत की राजनीति जिस तरह तुष्टिकरण की रही है, आज नेपाल भी उसी नक्शेकदम पर चल रहा है । ऐसे में एक बार फिर से अतीत को खंगालने की आवश्यकता आन पड़ी है । देश की पहचान, संस्कृति और परम्पराओं की सुरक्षा खतरे में है, उससे उबारने के लिए एक सशक्त कदम भी उठाने की आवश्यकता है । ऐसे में अगर सदियों की पहचान पुनः कायम भी होती है तो इसमें हर्ज ही क्या है ?

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