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नेपाल में बनेगा जैन सर्किट : नरेन्द्र मोदी

मुरलीमनोहर तिबारी, वीरगंज, हिमालिनी अंक जुलाई 2018 ।दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है । जैन धर्म के संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे । वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है । माना जाता है कि वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है, वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे । मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है । आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है । जैन शब्द जिन शब्द से बना है । जिन बना है ‘जि’ धातु से जिसका अर्थ है जीतना । जिन अर्थात जीतने वाला । जिसने स्वयं को जीत लिया उसे जितेंद्रिय कहते हैं ।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनकपुर भ्रमण के दौरान जैन सर्किट बनाने की घोषणा हुई, इसके संदर्भ में नेपाल के प्रबुद्ध उद्योगपति अशोक वैद कुछ वर्षों से आवाजÞ उठाते आ रहे है, उन्होंने बताया, भारत के सम्माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के जनकपुर भ्रमण में रामायण सर्किट, बुद्ध सर्किट और जैन सर्किट की बात आई । नेपाल, जैन तीर्थंकर की भूमि रही है, भद्रबाबू स्वामी ने काठमांडू में साधना की थी । पारसनाथ, जैन के २३वें तीर्थंकर थे, उनका पारसनाथ मंदिर, महुवन में है । पारसनाथ मंदिर लगभग १००० वर्ष पहले का है। उन्हीं के नाम पर इस जिला का नाम पर्सा हुआ । उस मंदिर में जैनों की मूर्तियां मिली, कुछ मूर्तियां चोरी हो गई, लेकिन अभी भी दो तीन मूर्तियां है, उसे शिवालय में परिवर्तन कर दिया गया है । वह बहुत प्राचीन मंदिर है उसके भग्नावशेष से ही मालूम होता है कितना प्राचीन मंदिर है । दूसरा जनकपुर में दो तीर्थंकर की स्थली है मल्लिनाथ और नेमिनाथ की । जनकपुर में हर साल हजारों तीर्थ यात्री गुजरात से आते हैं, ये सभी जैन लोग हैं, वहां तो कुछ है नहीं लेकिन वे लोग उस भूमि को प्रणाम कर चले जाते हैं । प्रमुख जैन तीर्थ में श्री सम्मेद शिखरजी (गिरिडीह, झारखंड), अयोध्या, कैलाश पर्वत, वाराणसी, तीर्थराज कुंडलपुर (महावीर जन्म स्थल), पावापुरी (महावीर निर्वाण स्थल), गिरनार पर्वत (पालीताणा), श्रवणबेलगोला, बावनगजा (चूलगिरि), चांदखेड़ी, पालिताणा तीर्थ आदि आते हैं ।
मोदी जी ने जो जैन सर्किट की बात कि उससे भारत–नेपाल में इन्हीं जैन धर्म स्थली को जोड़ने और संरक्षण का काम होगा ।
जैन सर्किट में ५२.३९ करोड़ रूपये की लागत से वैशाली, आरा, पटना, राजगीर, पावापुरी और चंपापुरी मार्ग के किनारे विकास योजना तय किया गया है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जैन तीर्थंकर के जन्मस्थली की सुरक्षा–व्यवस्था, सुविधाएं, जन्मस्थली तक जाने वाली सड़क, बिजली की उपलब्धता आदि की जानकारी ली । मुख्यमंत्री ने जैन धर्मावलंबियों द्वारा जन्मस्थली में बनाए जा रहे मंदिर के बारे में भी जानकारी प्राप्त की । साथ ही इसे अमलीजामा पहनाने की रूपरेखा पर विचार–विमर्श किया । इससे राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों का कायाकल्प होने वाला है । इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से राशि भी जारी कर दी गई है । पर्यटन विभाग के प्रस्ताव पर भारत सरकार ने राज्य में धार्मिक सर्किट निर्माण के लिए ३०० करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है । भारत का पहला जैन सर्किट बनारस में बनेगा । पीपीपी मॉडल पर बनने वाले इस सर्किट पर करीब ५०० करोड़ रुपये खर्च होंगे । प्रदेश सरकार ने फस्र्ट फेज में इसके लिए २५ करोड़ रूपये जारी कर दिए हैं । इसी महीने लखनऊ में सरकार के साथ एमओयू साइन होने के साथ ही काम शुरू हो जाएगा ।
नेपाल में लगभग तीन लाख के करीब जैन धर्मालंबियों की उपस्थिति है । नेपाल में जैन धर्म के प्रमुख व्यक्तित्व जो इसके प्रचार प्रसार में लगे हैं उसमें सबसे पहला नाम आता है, स्व.हुलास चंद जी गोलछा, स्व.तुलारामजी दुगड़, स्व. नथमल बैद, भीखाराम जी नोलखा । अशोक वैद जी जैन धर्म के बारे में बताते है, जैन धर्म का मूल अहिंसा है, इसका मूल मंत्र, जियो और जीने दो है । महावीर स्वामी के सिद्धांत अनुसार अहिंसा, अनेकांतवाद, स्यादवाद, अपरिग्रह और आत्म स्वातंत्र्य । मन, वचन और कर्म से हिंसा नहीं करना ही अहिंसा है । अनेकांतवाद अर्थात वास्तववादी और सापेक्षतावादी, बहुत्ववाद सिद्धांत और स्यादवाद अर्थात ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत । तेरापंथ धर्मसंघ आचार्य भिक्षु द्वारा स्थापित अध्यात्म प्रधान धर्मसंघ है, जिसकी स्थापना २९, जून,१७६० को हुई थी । यह जैन धर्म की शाश्वत प्रवहमान धारा का युगधर्म के रूप में स्थापित एक अर्वाचीन संगठन है, जिसका इतिहास लगभग २५० वर्ष पुराना है । प्रारम्भ में इस धर्म संघ में तेरह साधु तथा तेरह ही श्रावक थे, इसलिए इसका नाम ‘तेरापंथ’ पड़ गया । संस्थापक आचार्य श्री भिक्षु ने उस नाम को स्वीकार करते हुए उसका अर्थ किया, ‘हे प्रभो ! यह तेरा पंथ है ।’ तेरापंथ का अपना संगठन है, अपना अनुशासन है, अपनी मर्यादा है । इसके प्रति संघ के सभी सदस्य सर्वात्मना समर्पित हैं । साधु–साध्वियों की व्यवस्था का संपूर्ण प्रभार आचार्य के हाथ में होता है । आचार्य भिक्षु से लेकर आज तक सभी आचार्यों ने साधु–साध्वियों के लिए विविधमुखी मर्यादाओं का निर्माण किया है । बीरगंज, नेपाल में तेरापंथ भवन का उद्घाटन २००८ में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. रामवरण यादव ने किया ।
अशोक बैध जी आगे बताते हैं कि, कुलकरों की परम्परा के बाद जैन धर्म में क्रमशः चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ वासुदेव और नौ प्रति वासुदेव मिलाकर कुल ६३ महान पुरुष हुए हैं । इन ६३ शलाका पुरुषों का जैन धर्म और दर्शन को विकसित और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है । सम्राट अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उनके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था । लगभग इसी समय, मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियां कपड़े पहनाकर रखी जाए या नग्न अवस्था में । इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं । आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया । ईसा की पहली सदी में आकर जैन धर्म को मानने वाले मुनि दो दलों में बंट गए । एक दल श्वेतांबर कहलाया, जिनके साधु सफेद वस्त्र (कपड़े) पहनते थे, और दूसरा दल दिगंबर कहलाया जिसके साधु नग्न (बिना कपड़े के) ही रहते थे । माना जाता है कि दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा चरित्र को लेकर है । दिगंबर आचरण पालन में कुछ अधिक कठोर हैं जबकि श्वेतांबर कुछ उदार हैं । श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं जबकि दिगंबर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं । यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है ।
आचार्य महाश्रमण के बारे में अशोक बैद जी बताते हैं कि, वे एक ऐसी आलोकधर्मी परंपरा का विस्तार है, जिस परंपरा को महावीर, बुद्ध, आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने अतीत में आलोकित किया है । अतीत की यह आलोकधर्मी परंपरा को आचार्य महाश्रमण एक नई दृष्टि प्रदान कर रहे हैं । यह नई दृष्टि एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का, एक नए युग का सूत्रपात कहा जा सकता है। आचार्य महाश्रमण का जन्म १३ मई १९६२ को हुआ, उनका जन्म नाम मोहन दुगड़ है । जैन श्वेतांबर तेरापंथ के ग्याहरवें संत अथवा आचार्य हैं । महाश्रमण पुज्य राष्ट्र संत, योगी, आध्यात्मिक नेता, दार्शनिक, लेखक, वक्ता और कवि हैं ।
कृष्ण, महावीर, बुद्ध, जीसस के साथ ही साथ भारतीय अध्यात्म आकाश के अनेक संतों(आदि शंकराचार्य, कबीर, नानक, रैदास, मीरा आदि की परंपरा से ऐसे जीवन मूल्यों को चुन–चुनकर युग की त्रासदी एवं उसकी चुनौतियों को समाहित करने का अनूठा कार्य उन्होंने किया । जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है जो उनके प्रवचनों–विचारों से अस्पर्शित रहा हो । योग, तंत्र, मंत्र, यंत्र, साधना, ध्यान आदि के गूढ़ रहस्यों पर उन्होंने सविस्तार प्रकाश डाला है । साथ ही राजनीति, कला, विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, शिक्षा, परिवार, समाज, गरीबी, जनसंख्या विस्फोट, पर्यावरण, हिंसा, जातीयता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण, भ्रुणहत्या और महंगाई के विश्व संकट जैसे अनेक विषयों पर भी अपनी क्रांतिकारी जीवनदृष्टि प्रदत्त की है ।
जब उनकी उत्तराध्ययन और श्रीमद्भगवदगीता पर आधारित प्रवचन श्रृंखला सामने आई, उसने आध्यात्मिक जगत में एक अभिनव क्रांति का सूत्रपात किया है । एक जैनाचार्य द्वारा उत्तराध्ययन की भांति सनातन परम्परा के श्रद्धास्पद ग्रंथ गीता की भी अधिकार के साथ सटीक व्याख्या करना न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि प्रेरक भी है । इसीलिए तो आचार्य महाश्रमण मानवता के मसीहा के रूप में जन–जन के बीच लोकप्रिय एवं आदरास्पद हैं । वे एक ऐसे संत हैं, जिनके लिए पंथ और ग्रंथ का भेद बाधक नहीं बनता । आपके कार्यक्रम, विचार एवं प्रवचन सर्वजनहिताय होते हैं । हर जाति, वर्ग, क्षेत्र और सम्प्रदाय की जनता आपके जीवन–दर्शन एवं व्यक्तित्व से लाभन्वित होती रही है ।
आचार्य महाश्रमण का देश के सुदूर क्षेत्रों— नेपाल, भूटान,आसाम, बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि में अहिंसा यात्रा करना और उसमें अहिंसा पर विशेष जोर दिया जाना प्रासंगिक है, क्योंकि आज सारा संसार हिंसा के महाप्रलय से भयभीत और आतंकित है । जातीय उन्माद, सांप्रदायिक विद्वेष और जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव, ऐसे कारण हैं जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हीं कारणों को नियंत्रित करने के लिए आचार्य महाश्रमण प्रयत्नशील हैं । इन विविध प्रयत्नों में उनका एक अभिनव उपक्रम है— ‘अहिंसा यात्रा’ । आज अहिंसा यात्रा एकमात्र आंदोलन है जो समूची मानव जाति के हित का चिंतन कर रहा है । उनकी पदयात्रा सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के लिए होती है । अहिंसा की योजना को क्रियान्वित करने के लिए ही उन्होंने पदयात्रा के सशक्त माध्यम को चुना है और अभी तक ६०००० कि.मी.से ज्यादा पदयात्रा कर चुके है । नेपाल में पदयात्रा के दौरान पर्सा में अवस्थित पारसनाथ मंदिर भी गए । इनसब बातों से जैन सर्किट की महत्ता के बारे में मालूम होता है ।
भारत और नेपाल ने संयुक्तरूप में बुद्ध सर्किट के लिए गठित संयुक्त कार्यदल के बैठक में पर्यटन प्रवर्धनसम्बन्धी १४ बुँदे सहमतिपत्र में हस्ताक्षर किया । सहमति अनुसार नेपाल सरकार के माँगअनुरूप भारतीय पक्ष ने भारत के सरकारी कर्मचारी उपलब्ध कराकर विशेष सुविधा में नेपाल के पर्यटकीय क्षेत्र के भ्रमण को भ्रमण प्याकेज में रखने का सहमति किया है । नेपाल आने वाले भारतीय सवारी साधन को प्राप्त सुविधा अनुसार ही भारत जाने वाले नेपाली सवारी साधन को भी सहज अनुमति प्राप्त होने के विषय में सहमति हुआ है । दो देश के बीच विभिन्न बॉर्डर जोड़ने वाले सड़क तथा पुल के निर्माण कार्य में शीघ्रता लाने की सहमति हुई ।
नेपाल के धार्मिक तथा सांस्कृतिक पर्यटन प्रवर्धन के लिए जनकपुर में मिथिला संग्रहालय स्थापना करने में भारतीय पक्ष से सहयोग होगा । नेपाल के मांग अनुरूप भारतीय हिमाल आरोहण करने वाले को नेपाली नागरिक की तरह सहजरूप में आरोहण प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया जाएगा । नेपाल में पर्यटन विश्वविद्यालय स्थापना करने में दोनों देश शैक्षिक कार्यक्रम एवं विद्यार्थी के लिए प्रयोगात्मक कक्षा के लिए आपसी सहयोग आदानप्रदान करेंगे । दो देश बीच पर्यटन के सम्भाव्यता, प्रवर्धन और बजारीकरण में सहकार्य के विभिन्न कार्य बढ़ाने में दोनों देश के निजी क्षेत्र के सहभागिता में इन्डो नेपाल टुरिजम फोरम गठन किया जाएगा
– सीपु तिवारी

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