Mon. Nov 19th, 2018

कान्तिपुर की विषनीतिः मधेशियों को एकतावद्ध ही करेगा : कैलाश महतो

भाषा हमारी, तथ्यांक आप का… ? बोलते मधेशी हैं, और हिसाब आप का कैसे ?

गिने चुने चन्द महापुरुषों के अलावा सारे मधेश आन्दोलन आम मधेशियों ने की । शहादत आम लोगों ने दी । मगर आन्दोलन के सफलता के बाद मधेशी के नामपर वे ही मनुवादी और अत्याचारी सुकुमार नेपाल सरकार के चम्चे फायदे के लिए आगे दिखाई पड़ते रहे हैं

२०७४ माघ १३ गते के कान्तिपुर में राजीव रञ्जन द्वारा लिखित “मैथिलीले उचित स्थान पाएन”नामक विचार लेख में मैथिली भाषा के प्रति चिन्ता जाहिर की गयी है । उन्होंने मैथिली भाषा को देवी सीता के नाम से भी जोडने की कृपा की है । मिथिला को संस्कृत और संस्कृति से सुसज्जित क्षेत्र समेत मानकर मिथिलावासियों को प्रसन्न करने का भी पुण्य काम किया है । अंग्रेजों से जोड़कर उन्होंने भाषा के जरिये ही शासक अपना साम्राज्य फैलाने के इतिहास को भी इंगित किया है ।
श्री रञ्जन ने नेपाल में नेपाली भाषा बोलने वालों का प्रतिशत् जहाँ ४४.६५ लिखा है, वहीं मधेश में मैथिली बोलने वालों का प्रतिशत् ११.७५ का आँकडा दिया है । साथ ही उन्होंने मधेश में बोली जाने वाली ३५ बज्जिका भाषाओं को भी मैथिली का ही प्रकार बताया है । उन्होंने नेपाली इतिहासकारों ने शाही शासन के तले मिथिला के बदले मधेश व तराई शब्द का प्रयोग करने के आरोप के साथ गौतम बुद्ध नेपाल में जन्म लेकर राष्ट्रीय पहचान बनाने की भी बात कही है ।




 मगर मजबूरी में नेपाली बोलने वाले कितने प्रतिशत के लोग इस भाषा से नफरत करते हैं, इसका भी तथ्यांक लेना बेहद जरुरी है ।
रञ्जन जी को इतना तो अब जान ही जाना चाहिए कि मधेश का इतिहास और उसके भाषाओं के बारे में मधेशियों ने खुद खोज तलाश करने की क्षमता बना ली है । अभी जब मधेश में भाषा के उपर लोग खुद अपने अपने खोज तथा प्रमाण के साथ बहस में व्यस्त हैं, रञ्जन जी को नेपाली विषनीति प्रयोग कर मधेश में नेपाली खिलौने बेचने के लिए नयाँ बाजार खोजना तकलीफदेह हो सकता है । वह कान्तिपुर, जो राष्ट्रीय समाचारपत्र कहलाता है, ने मधेश इत्तर बातों को छाती खोलकर स्थान देता है और मेरे जैसे विचारों को कभी स्थान देने की कोई गली नहीं खोलता ।



मधेश पीडि़त है । समग्र मधेश को नेपाली साम्राज्य ने पीडि़त किया है । एक तरफ मधेश नेपाली साम्राज्य के दोहन का शिकार है, वहीं दूसरी तरफ अपने आन्तरिक उपनिवेश से भी उत्पीडि़त है । नेपाली साम्राज्य को मधेश पर शासन करने की छूट देने में माहिर वे ही आन्तरिक उपनिवेशकर्ता हैं जो नेपालियों के साथ हर कालखण्ड में एकता कर आम मधेशियों पर राज किया है । गिने चुने चन्द महापुरुषों के अलावा सारे मधेश आन्दोलन आम मधेशियों ने की । शहादत आम लोगों ने दी । मगर आन्दोलन के सफलता के बाद मधेशी के नामपर वे ही मनुवादी और अत्याचारी सुकुमार नेपाल सरकार के चम्चे फायदे के लिए आगे दिखाई पड़ते रहे हैं । आज के संघीय गणतान्त्रिक हालात में भी वे लोग ही सत्ता में हैं जो बीते हुए कल के पंचायत और प्रजातान्त्रिक मधेश लूटतन्त्र में रहे । उन तिकड़मबाज बुद्धिजीवियों में इतने भी बुद्धि नहीं आयी कि जीवनभर नेपालियों की गुलामी कर उच्च पदों से रिटायर्ड होकर पेंसन के रकम से मजे से कटने वाली बाकी के अपने जीवन को मधेश की भलाई में अर्पण करें ।



श्री रञ्जन ने जो नेपाली भाषा बोलने वालों का तथ्यांक दिया है, वह कितना भरोसेमन्द है ? नेपाली साम्राज्य का तथ्यांक अगर सही होता तो मधेश आन्दोलन क्यों होते ? शहादतों की कतारें क्यों लगती ? नेपाली बोलने वालों का प्रतिशत कितना है, यह हम तो नहीं कह सकते । मगर मजबूरी में नेपाली बोलने वाले कितने प्रतिशत के लोग इस भाषा से नफरत करते हैं, इसका भी तथ्यांक लेना बेहद जरुरी है । नेपाली नेपालियों की भाषा है । उसका तथ्यांक नेपाल किस उद्देश्य से किस प्रकार लेता है, उसमें मधेशियोें का खास मतलब ही नहीं है । मगर मधेशी भाषा बोलने वालों का सही तथ्यांक नेपाली साम्राज्य दे, इसपर मधेश को कोई भरोसा नहीं है । ३५ बज्जिका भाषा मैथिली भाषा के प्रकार होने का दावा आप कैसे कर सकते हैं ? भाषा हमारी, तथ्यांक आप का… ? बोलते मधेशी हैं, और हिसाब आप का कैसे ?
जिस जनकपुर का आपने सीता का संस्कृत और संस्कृति का अनुपम सौन्दर्य कहा है, आज वह भूमि किसके कारण बंजर हुई है और जानवरों के स्थान रहे घने जंगलों के बस्तियों में चन्द ही दिनों में आधुनिक स्वर्ग उतर आया है ? जिस सीता को आपने जनकपुर से जोडने की कोशिश की है, वह सीता उस भूमि की ही नहीं है । जहाँ पर आज जनकपुर अवस्थित है, वह सेन राजाओं की भूमि रही है । एक बात आपने सही कही है कि भाषा से उपनिवेश निर्माण होता है, जो मधेश भी कहता है । नेपाली भाषा ने हककित में मधेश में अपना उपनिवेश कायम किया है जैसे अंगे्रजी ने किया है इतिहास में । नेपाली भी भारत की ही भाषा होने की जानकारी आप जैसे लेखक को होनी चाहिए ।
मैथिली की बात मधेशकीसमस्या है । इसके उपर चल रही बहस मधेश के लोग खुद सुलझा लेंगे । आप जैसे नेपाली विद्वानों की आवश्यकता नहीं है । चुटकी लेकर चुगली करके मैथिल मधेशियों को अपने तरफ आकर्षित करने का दिवा स्वप्न देखना बहादुरी नहीं हो सकता । मैथिली भाषा को बढावा देने के नामपर बाकी के मधेशियों से सम्बन्ध तोड़ने की जो नेपाली विषनीति है, वह कतई सफल नहीं हो पायेगी ।
जैसे एमाले और माओवादी बीच तथा काँग्रेस और राप्रपा के बीच के झगडों को मधेशी दल नहीं समझ पाते, न सुलझा पाते, उसी प्रकार मधेशी समुदायों के बीच उत्पन्न असमझदारियों को नेपाली पार्टिंयाँ या बुद्धिजीवी नहीं समझ सकते, न सुलझा सकते । अब नारद मुनि और शकुनी की भूमिकायें मधेश में चलाना असंभव है ।

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