Thu. May 23rd, 2019

सबसे न्यारी काशी : बिम्मी शर्मा

यात्रा संस्मरण


हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 |दुनिया के सब से पुराने शहर और सभ्यता मे से एक है काशी । काशी जहां जीव को मोक्ष मिलता है । इसीलिए अपने जीवन का समापन काशी में हो इस के लिए लोग काशीवास करते हैं । काशी के बारे में कहा जाता है कि यह भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है इसीलिए यहां पर कोई भी विघ्न वाधा, विपदा या प्राकृतिक प्रकोप नहीं आता । भुकंप से भी यहां ज्यादा क्षति नहीं होती । काशी जिसका प्राचीन नाम आनन्द वन है और जिस को वाराणसी या बनारस के नाम से ज्यादा जाना जाता है । यह शहर अपने आप में अनोखा है और जाने कितने ही इतिहास और अलौलिककता अपने छिपाए बैठा है यह शहर क्या देशी और क्या विदेशी काशी के आकर्षण में बँधे हुए सारे चले आते हैं ।
काशी की गलियां बहुत मशहूर हैं । जो काशी गया और उस ने यहां की तंग गलियों को देखा नहीं तो इसका मतलब उस ने असली काशी को देखा ही नहीं । काशी बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय या राजघाट में नहीं देखा जा सकता । काशी को देखना है तो यहां की तंग गलियों में घूमिए और बिदांस जिदंगी का मजा लीजिए । काशी की गलियों में अलमस्त जिदंगी ठिठकी खड़ी है । जहां लोगों को काम में या घर जाने को जल्दी नहीं होती । पान का बीड़ा मुंह में दबाए लोग ऐसे खडेÞ बतियाते रहते हैं कि सारी दुनिया का बोझ इन्होंने उठा रखा है । काशी के वासिन्दे इतने सहयोगी और दयालु होते हैं कि कोई गली में रास्ता भटक जाए और गुमसुम सा खड़ा रहे तो खुद आ कर पूछते हैं कि ‘रास्ता भूल गए क्या’ ? हां में सिर हिलाने पर रास्ता बता देंगे नहीं हुआ तो पहुंचा भी देगें । किसी को भी जल्द अपना बनाने की कला काशी के लोगों के खून में है । मिठाई के शौकीन बनारसियों को गली में मिले किसी अंजान शख्स से भी परिचय के बाद मिठाई खाने के लिए या पान के लिए पूछ लेते हैं ।

काशी बनारसी साड़ी और मिठाई के लिए मशहूर है । काशी में जितनी मिठाई की वेराईटी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती । काशी की मिठाई बढि़या ही नहीं होती सस्ती भी होती है । एक जलेबी के स्वाद में ही अंतर है काशी और अन्य जगहों की जलेबी में । काशी की जलेबी इतनी स्वादिष्ट होती है की मुँह मे डालते ही घुलने लगती है । और बनारसी साडि़यों का तो कहना ही क्या । सस्ती से सस्ती और मंहगी दामों वाली अनेक रूप और रंग की बनारसी साड़ी हाजिर है मन को ललचाने के लिए । गंगा नदी की तरह ही काशी में दूध और दही भी बहता है । काशी जा कर यहां का दूध और लस्सी नहीं पिया तो काशी घूमने का मजा फीका ही रह जाएगा । हर गली और मुहाने पर दूध, दही और लस्सी की दुकान हाजिर है । उसी तरह गर्मागर्म जलेबी और कचौडि़यां भी लोगों का स्वागत करने के लिए तैयार है ।

हम यहां पर गली संकरी होने पर रोना रोते है कहीं भी आने जाने में दिक्कत का सामना करते हैं । हम में से बहुत से लोगों के पास कार खरीदने कि क्षमता नहीं है फिर भी हम ४० या ६६ फिट की सड़क का ख्वाब देखते है और वैसे ही जगह पर रहना भी चाहते हैं । पर काशी में ऐसा नहीं हैं यहां पर ज्यादा कारोबार या व्यापार इन्हीं तंग गलियों में होते है । ज्वैलरी की बड़ी सी दुकान से ले कर बनारसी साड़ी की शो रूम भी इन्हीं गलियों में है । ५ फिट चौड़ी गली में ही पान और चाय की दुकान से ले कर मिठाई, सोने चांदी की दुकान और बनारसी साड़ी की गद्धी भी यहीं हैं । इसी गली में साँढ और गाय का रोमांस भी देखा जा सकता है और इसी गली में मोटर साईकल और स्कूटी की दौड़ भी देखने को मिल जाती है । न मोटर साईकल या स्कूटी सवार किसी को छेड़ता है न सांढ ही अपने सींग से किसी को मारता है । सब मजे में है और अपना काम कर रहे हैं बिना किसी को डिस्टर्ब किए । जो कार खरीद सकता है वह भी और जो नहीं खरीद सकता वह भी उसी गली में अपनेपन के साथ रहते हैं बिना किसी शिकायत के । इस दृष्टि से देखा जाए तो काशी की इन गलियों में विश्व का सबसे सुंदर साम्यवाद का रूप देखा जा सकता है । जहां किसी में किसी प्रकार का भेद नहीं है । हर वर्ग और जात का इंसान सौहार्दता से एक दूसरे के साथ मिल कर भाईचारे के साथ रह रहे हैं ।

मेरे लिए काशी मेरे पिता की जन्म भूमि और माँ की कर्म भूमि है । मैं जब भी काशी की इन गलियों मे घूमती थी तो मन ही मन सोचती थी की कभी मेरे माता, पिता भी इसी तरह इन गलियों में घूमे होंगे और मुझे आभास होता था कि वह भी मेरे साथ ही चल रहे हैं । मेरी मां ने मुझे काशी की इन गलियों और मशहूर जगहों के बारे में इतनी बार बतायी थी कि मुझे काशी में कहीं अजनवी पन महसूस नहीं हुआ । मां की बातों और जानकारी के कारण लगता था कि मैं पहले भी यहां आ चुकी हूं । काशी इसी लिए भी मेरे दिल के पास है कि यह मेरे माता पिता के लिए बहुत ही खास था । और मां के निधन का गम भुलाने के लिए मैं घटों तक काशी की गलियों में भटकती रहती थी । क्योंकि इस से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था जैसे कि मैं अपनी माँ की गोद मे ही बैठी हुई हूं ।

काशी और यहां बहने वाली गंगा जी दोनों एक दूसरे के परिपूरक हैं । काशी का असी गंगा घाट अपने आप में अलौकिक है । हर घाट की अपनी महत्ता है पर इन में से भी सबसे ज्यादा विख्यात है दशा श्वमेध और मणिकर्णिका घाट । मणिकर्णिका घाट पर लाशों को जलते देखना जीवन की निस्सारता को प्रत्यक्ष देख कर बैराग्य भाव मन में घर कर जाता हैं । मणिकर्णिका के मसान घाट पर एक मिनट भी चिता बुझती नहीं है । यहां पर दिन, रात किसी भी प्रहर में लाश को जलते हुए देखा जा सकता है । इसी लिए इस को विश्व का सबसे बड़ा मसान घाट अर्थात महा मसान कहा जाता है । कहा जाता है कि जहां पर चिता में लाश के जलने के बाद शरीर को मोह माया के बधंन से ही नहीं जन्म, मरण के चक्र से भी मूक्ति मिल जाती है । पहले इस का नाम चक्र पुष्करणी तीर्थ था । जहा पर नहाने आई देवी पार्वती की नहाते समय कान की मणी गिर जाने से इस का नाम मणिकर्णिका घाट पडा ।

दशाश्वमेध घाट के नजदीक ही विश्व विख्यात काशी विश्वनाथ का मंदिर और काशी का मुख्य बाजार स्थित है । और यही पर पतित पावनी गँगा जी की वह आरती पूरे विधि विधान के साथ की जाती है जिस को देखने के बाद कुछ भी देखना शेष नहीं रह जाता । हृदय को द्रवित करने वाली गंगा जी की इस आरती को देखने के लिए घाट पर विदेशियों का तांता लगा रहता है । वे सब नाव पर चढ़ कर आरती को बड़े ही मनोयोग से देखते हैं । सिर्फ आरती ही नहीं काशी की गलियों में इस शहर के इतिहास को टटोलते और फोटो खींचते हुए इन विदेशियों को देखा जा सकता है । बिटल्स के गायक जर्ज हैरिसन को काशी ने अपने आकर्षण में ऐसा बांधा कि उन्होंने मरने के बाद अपनी अस्थि को यहीं काशी में प्रवाहित करने की इच्छा जाहिर कि थी । इतना ही नहीं जार्ज हैरिसन के अपनों ने उन की इच्छा बमोजिम यहां पर मदिंर भी बना रहे हैं जो निर्माणाधीन है ।
इसी से पता चलता है कि काशी तीनों लोकों में इतनी न्यारी क्यों है ? क्यों कि काशी के लोग मन से जीते हैं और आगन्तुक को अपनाने और गले लगाने के लिए आतुर रहते हैं । यहां के लोगों में कोई भी बनावटीपन नहीं है और यही काशी की पहचान है । कंधे पर गमछा डाल कर और पैर में चप्पल पहने लोग ऐसे जिदांदिली से चलते है कि लगता है कि उन की जिदंगी में चिंता, फिक्र के लिए कोई जगह ही नहीं है । इसी लिए तो काशी सब से प्यारी और दुनिया मेंसब से न्यारी है ।
काशी के जितने भी बडेÞ और विख्यात मदिंर है सब इन्ही तंग गलियों में ही स्थित हैं । चाहे फिर वह बाबा विश्वनाथजी का मदिंर हो या काशी के कोतवाल काल भैरव का मदिंर हो । शक्तिपीठ विशालाक्षी मदिंर, संकटा का मदिंर और मंगला गौरी का मदिंर सभी इन्ही गलियों में है । गली छोटी या तंग भले ही हो पर बिजली की बत्ती और सिसिटिवी कैमरे से सुसज्जित है । काशी हर समय गुलजार है । यह सभी को अपने मोहपाश में बांध लेती है चाहे वह जार्ज हैरिसन हो या मैं । मेरे लिए तो काशी अपनी जड़ों की पहचान करने की अन्तर मन की एक यात्रा थी । जहां मंै इन गलियों में बरसों पहले गुजारे हुए अपने माता पिता के काशी के उन अनगिनत वर्षो की यादों को साथ में लिए हुए थी । जहां उन के पद चिन्हो पर उनकी उन्ही पदचापों को ढूँढती हुई उन्हीं की परछाईं बन कर चल रही थी ।

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