Sat. Feb 23rd, 2019

काठमांडू उपत्यका की विशेषताएँ : प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

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हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | ऐतिहासिक या धार्मिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की यात्रा मे निकलने वाले यात्रियों के लिए एक ऐसे व्यक्ति या पुस्तक–पुस्तिका की आवश्यकता होती है जो उसे उस स्थान के ऐतिहासिक महत्व या पौराणिक घटनाओं के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दे सके । ऐसा व्यक्ति या पुस्तक गाइड कहलाता है । यदाकदा स्थानीय व्यक्ति और विद्वतजन के साथ की मुलाकात और बातचीत भी इस मामले में सहायक हो जाते है । अतः पर्यटन में गाइड का महत्वपूर्ण स्थान होता है । मुझे भी अपनी यात्राकाल में ऐसे कई व्यक्ति मिले, जिनके सहयोग से मेरी यात्रा मनोरंजक, सुखद और ज्ञानवद्र्धक होती रही । पिछले अंकों में अपनी यात्राकाल में मिले लोगों से दर्शनीय स्थलों के महत्व के संबंध में प्राप्त जानकारियों से पाठकों को अवगत कराने की मेरी कोशिश स्थानाभाव के कारण अधूरी रही ।

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काठमांडू उपत्यका के दर्शनीय और पर्यटकीय महत्व के संबंध में जहाँ विभिन्न किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं का स्थान है वहीं लोगों का जन–जीवन भी परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और रीति–रिवाजों से भरा और उन्हींपौराणिक कथाओं से संबद्ध पाया जाता है । नेवाः भाषा के एक लेखक नेमसिंह नकर्मी बताते हैं कि नेवाः संप्रदाय के लोग अपना प्रत्येक कार्य भगवान गणेश की पूजा से शरू करते हैं । शायद यही कारण है कि काठमांडू के हर कोने में गणेश जी का मंदिर पाया जाता है । दूसरे नेवाः लेखक ज्योतिरत्नशाक्य ने तो काठमांडू उपत्यका के विभिन्न दिशाओं में स्थापित चार गणेश के महत्वपूर्ण मंदिरों का ही उल्लेख किया, जिसकी चर्चा मैं पहले के अंकों में कर चुका हूँ ।

काठमांडू के नेवाः संप्रदाय की एक महत्वपूर्ण देवी है, जो जीवितकुमारी ९ीष्खष्लन न्यममभकक० के नाम से सुविख्यात है । नेवाः संप्रदाय के शाक्यवंश की कन्या मात्र को इस पद के लिए चयन किया जाता है । ऋतुमति होने के बाद वे इस पद से मुक्त हो जाती हैं और उनका स्थान शाक्य वंश की ही दूसरी कन्या ग्रहण करती हैं । कुमारी के चयन की एक विशेष विधि और प्रक्रिया है । वर्तमान कुमारी ४ वर्ष की बालिका हैं । उनका निवास कुमारीघर में होता है और उनके साथ उनके माता–पिता भी रहते हैं । काठमांडू उपत्यका के तीनों जिलों में उनकी उपस्थिति नेपाल मंडल की ऐसी विशेषता है जो अन्यत्र कहीं देखने और सुनने को नहीं मिलती । इनका दर्शन पाने के लिए देशी–विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है । काठमांडू की अपनी विभिन्न यात्राकाल में मुझे बसंतपुर दरबार परिसर में अवस्थित कुमारी मंदिर में इन जीवित कुमारी के हाथों दो बार टीका (तिलक)प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो दो बार इन्द्र जात्रा के अवसर पर दूर से दर्शन करने का अवसर मिला । इनकी रथ यात्रावर्ष में एक बार भाद्र शरूक्लद्वादशी के दिन आठ दिनों तक निकाली जाती है ।

काठमांडू की यह एक प्राचीन रथयात्रा है, जिसका प्रारंभ काठमांडू के अंतिम मल्ल राजा जयप्रकाश के शासनकाल में हुआ । और इसका संबंध भी इतिहास और पौराणिक गाथाओं से है । पौराणिक कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में जब देवराज इन्द्र कोलासुर नामक असुर से पराजित हुए तब वे ब्रह्माजी के पास गए और उन्हें अपनी व्यथा सुनाने लगे । ब्रह्माजी उन्हें अपने साथ जगदम्बा भवानी के पास ले गए । सारा वृत्तांत सुनने के बाद जगदम्बाभवानी ने कहा– ‘आप चिंता न करें देवराज, मैं मानव कन्या के रूप में जन्म लूँगी और आजन्म कुमारी रहकर उस दुष्ट का संहार करुँगी । ’ देवराज को यह वरदान देने के बाद उन्होंने कुमारी के रूप में जन्म प्राप्त किया और कोलासुर का संहार किया । इस प्रकार कुमारी एक देवी के रूप में स्थापित हुईं और शताब्दियों से पूजनीय रही है । इनके महत्व को जानकर पृथ्वीनारायण शाह ने काठमांडू में विजयप्राप्त करने के पश्चात कुमारी के हाथों टीका ग्रहण किया और उनकी पूजा को निरंतरता प्रदान की । राजाओं के शासनकाल में नेपाल के प्रत्येक राजाकुमारी के दर्शनार्थ जाते रहे, विजयादशमी के पावनअवसर पर उनसे टीका प्राप्त करते रहे । गणतंत्र की स्थापना हो चुकने पर भी नेपाल के राष्ट्रपति कुमारी की रथयात्रा की शोभा बढ़ाया करते हैं ।

शाक्यवंश की यह बालिका तलेजु भवानी का अवतार मानी जाती है । दशहरा के अवसर पर कन्यापूजन का एक कारण संभवतः यह भी है । तलेजु भवानी मल्ल राजाओं की कुलदेवी भी थी । बसंतपुर क्षेत्र परिसर में एक टीले के ऊपर विद्यमान तलेजु भवानी का मंदिर वि.सं. १६३२ में स्थापित की गयी थी । तलेजु भवानी मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि वह पौराणिक काल में देवराज इन्द्र की माता थीं । पौराणिक गाथा के अनुसार देवासुर संग्राम में मेघासुर देवराज इन्द्र को पराजित कर माता तलेजु को इन्द्रलोक से लंका ले गया । जब भगवान श्री रामदेवी सीता को छुड़ाने लंका गये और रावण को युद्ध में पराजित कर देवी सीता को अयोध्या ले जाने लगे तब वे देवी सीता के साथ–साथ तलेजु भवानी को भी ले आये । कालांतर में विभिन्न घटनाओं के कारण तलेजु भवानी सिमरौनगढ़ पहुँची । वहाँ से भक्तपुर के मल्ल राजा यक्षमल्ल इनकी मूर्ति को भक्तपुर ले आए । बाद में अपनी राजधानी को तीन पुत्रों में विभाजित करने के उपरांत देवी तलेजु भवानी की मूर्ति को उपत्यका के तीन नगरों की राजधानियों में स्थापित की गयी ।

बसंतपुर दरबार क्षेत्र में अवस्थित इनके मंदिर के पास ही दक्षिण दिशा में संकटमोचन हुनुमानजी की विशाल मूर्ति है । सत्रहवी शताब्दी के प्रतापी मल्ल राजाद्वारा वि.सं. १७२८ में स्थापित इस विशाल मूर्ति के कारण वहाँ का क्षेत्र हनुमानढोका के रूप में सुप्रसिद्ध है ।
बसंतपुर क्षेत्र में इन्द्रजात्रा और कुमारी की रथयात्रा के अवसर पर संध्याकाल में मंचन किया जाने वाला एक नृ्रत्य समारोह को चार चाँद लगा देता है । इन जात्राओं के साथ इस नृत्य का उतना ही गहन संबंध है जितना अँगुली और नाखून का होता है । लिच्छवीकालीन राजा गुणदेव द्वारा शरू की गयी यह परंपरा आज पर्यंत कायम रहना इस नृत्य की लोकप्रियता और इसके महत्व को दर्शाता है । नेवाः भाषा में राक्षस को लाखे कहा जाता है । पर कई लोग इसे रक्षक मानकर इसकी पूजा भी किया करते हैं । नर्तक द्वारा राक्षस का मुखौटा पहनकर कुमारी के रथ के आगे–पीछे नाचने का अर्थ संभवतः कुमारी की रक्षा करना रहा होगा । यह मेरी सोच है । वास्तविकता जो भी हो समारोह के अवसर पर लाखे उपस्थित दर्शकाें को भरपूर मनोरंजन प्रदान करने में सफल रहता है ।

एक बार बसंतपुर दरबार स्क्वायर में घूमते समय पत्रकार कुमार रञ्जित मिल गए । बातों–बातों में मैने लाखे की चर्चा की । इस पर वह कहने लगे– ‘चलिये लाखे से मिला देते हैं । ’ मन में लाखे के संबध में एक भय लिए मैं उनके साथ चल पड़ा । वह मुझे उस क्षेत्र में ले गये जहाँ लाखे नृत्य का अभिमंचन करने वाला व्यक्ति निवास करता है । लाखे अर्थात राक्षस की वेष–भूषा और भावभंगिमा में पूरे जोश के साथ उछल–कूद करने वाला व्यक्ति सामान्य और सीधा–साधा सा युवक दिख रहा था । उसके विनयशीलता से भी मैं दंग रह गया । इसके बाद तो एक बार इन्द्रजात्रा के अवसर पर उसकी ही बस्ती में निकट से उसके नृत्य को देखने का अवसर मिला । शायद उसने मुझे पहचान लिया और अपने भयावह वेषभूषा में चामर हिलाते हुए मेरे निकट आकर नाचने लगा । पर उसकी भाव भंगिमा से मेरा दिल दहलने लगता ।
दर्शक के रूप मेें निकट से लाखे अर्थात राक्षस की भयावह वेष–भूषा और मुखौटा धारण किये हुए व्यक्ति को पूरे जोश और राक्षस की भावभंगिमा के साथ उछल–कूद करते और दोनों हाथों से चामर हिलाते हुए देखकर जहाँ मनोरंजन प्राप्त होता है वहीं दिल भी दहल उठता है । पर इस नृत्य ने अब एक लोकप्रिय नेपाली लोक नृत्य का रूप प्राप्त कर लिया है । (शेषअगले अंक में) ।

संदर्भ सामग्री
हाम्रा चाडपर्व……रवि चालिसे
काठमाडौं उपत्यकाका विश्व सम्पदाहरू……….नेमसिंह नकर्मी

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