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केरुंग से काठमांडू का सफर : भारत के दरवाजे पर दस्तक तो नहीं ? : डॉ. श्वेता दीप्ति

मध्य से दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव जो पाकिस्तान से लेकर म्याँमार तक और हिंद महासागर तक दिख रहा है उसकी वजह से भारत का परंपरागत दबदबा कुछ कम हो गया है

तिब्बत के ऊपर ल्हासा तक जो रेल लाइन है, उसे बढ़ाकर काठमांडू तक लाए जाने की योजना है । इसके लिए कई ब्रिज और सुरंगें बनानी होंगी, जो काफी कठिन काम के साथ–साथ पर्यावरणीय तथा भौगोलिक दृष्टिकोण से बेहद खतरनाक भी माना जा रहा है और सबसे बड़ी बात कि इसमें काफी खर्च भी आएगा, जिसके लिए देश की क्षमता नहीं है । उधार लेने की सूरत में देश को ३०÷४० साल तक कर्ज चुकाते रहना होगा

डॉ. श्वेता दीप्ति,हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | प्रधानमंत्री ओली की चीन यात्रा ने नेपालियों की आँखों में जिस सपने को पनपने का सुअवसर दिया है, वह वास्तविक धरातल से फिलहाल कोसों दूर है । पर सपने ही यथार्थ की भूमि तैयार करते हैं यह भी एक सच ही है । सवाल यह है कि केरुंग से काठमान्डौ की रेल परियोजना का यथार्थ क्या है ? यह चीन की शुभचिन्तक सोच को दर्शाती है या उसके विश्वसम्राट बनने की सोची समझी नीति है ? इसे खंगालने की आवश्यकता है ।

चीन की नेपाल–नीति : नेपाल का विकास या अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति ?

किसी भी राष्ट्र के लिए उसके पड़ोसियों की अहमियत, उसे आगे बढ़ाने या किसी ट्रैप में फंसाने, दोनों ही मामलों में अतिमहत्वपूर्ण होती है । यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका के संदर्भ में सीधे तौर पर देखी जा सकती है । अगर अमेरिका के पड़ोसी कनाडा और मैक्सिको जैसे देश नहीं होते, तो अमेरिका संभवतः दुनिया की महाशक्ति कभी नहीं बन पाता । राष्ट्रीय हितों के विस्तृत क्षितिज तलाशने और उन्हें स्थायी आधार देने में पड़ोसी देश बेहद निर्णायक होते हैं । चीन की विस्तारवादी सोच और विश्व को अपने समक्ष झुकाने की नीति से इंकार नहीं किया जा सकता है । इतना ही नहीं उसके पड़ोसी भी जाने अनजाने उसके सपने को पूरा करने में सहायक बन रहे हैं ।
देखा जाय तो अपनी इसी विस्तारवादी नीति के तहत चीन अपना कदम–दर–कदम आगे बढा रहा है । श्रीलंका में महिंदा राजपक्ष, मालदिव में अब्दुल्ला यामीन और बांग्लादेश तक में खालिदा जिया और पाकिस्तान की राजनीति चीन के इस नीति के शिकार हो चुके हैं और अब नेपाल इस राह पर कदम बढा चुका है । बुनियादी ढांचे की अहम परियोजनाओं में निवेश उन राजनीतिक नेतृत्व को खासा आकर्षक लगता है, जिन्हें चीन संरक्षण दे रहा है । काठमांडू में रेलवे, श्रीलंका में हंबातोता परियोजना, या माले के पास नया शहर ऐसी परियोजनाओं के कुछ उदाहरण हैं जो देखने में काफी आकर्षक हैं और इसलिए इसके दूरगामी प्रभाव जो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को चरमरा सकती है उससे नजरें चुरायी जा रही हैं ।
वर्ष २००० के मध्य से दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव जो पाकिस्तान से लेकर म्याँमार तक और हिंद महासागर तक दिख रहा है उसकी वजह से भारत का परंपरागत दबदबा कुछ कम हो गया है । बीजिंग अपनी आर्थिक नीति के तहत पूरे उप महाद्वीप में इतनी भारी मात्रा में वित्तीय निवेश करता है और ऋृण देता है कि उससे उबरना सहज ही मुमकिन नहीं है । इतना ही नहीं अपनी रणनीतिक धौंस जमाने से भी बाज नहीं आता है । उसकी सबसे पहली कोशिश है कि किसी भी तरह एशिया में भारत की मजबूत स्थिति को कमजोर किया जाय । यही कारण है कि हर उस देश में उसकी घुसपैठ बड़े ही शालीन तरीके से जारी है जो विकास की राह पर बढ़ने के सपने देख रहे हैं । अपनी विस्तारवादी सपने को हकीकत का रूप देने के क्रम में अविकसित देशों को विकास के सपने बाँटना और फिर उसे भारी मात्रा में ऋृण देना ही उसकी प्रमुख नीति है । एशिया में भारत के बढ़ते दबदबे से खुन्नस खाया चीन पहले ही पाकितान में बड़ा निवेश कर के उसे अपना ’बेस्ट फ्रेंड’ बना चुका है । अब चीन अपनी इसी रणनीति के तहत कमोवेश नेपाल को भी भारत के खिलाफ खड़ा करने की जुगत में है । इसके लिए चीन ने पहले ही जमीन तैयार करनी शुरू कर दी थी । एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने के मकसद से ही चीन लगातार नेपाल में अपना निवेश बढ़ाता जा रहा है । हर टेंडर में कम से कम बोली लगाकर चीन ने नेपाल में कुछ बड़े–बड़े प्रोजेक्ट्स अपने नाम कर लिए हैं । चाहे वह पोखरा इंटरनैशनल एयरपोर्ट हो या कुछ हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्ट्स, वर्तमान में चीन के पास नेपाल के सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट्स हैं । आंकड़ों में देखें तो नेपाल में फिलहाल ३४१ बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है । इनमें से १२५ चीन के पास हैं, ५५ दक्षिण कोरिया के पास, ४० अमेरिका, २३ भारत, ११ यूके और ६९ अन्य देशों के पास हैं । इसी कड़ी में अगली कड़ी है चीनी रेल ।

चीनी रेल : नेपाल के हित या अहित का सफर ?

वर्तमान में नेपाल विकास के सुनहरे सपनों के बीच साँसे ले रहा है । समझौतों और सहमति की एक लम्बी फेहरिश्त नेपाल के हिस्से में है जो प्रधानमंत्री ओली की चीन यात्रा के दौरान सौगात में मिली है । इसी सौगात की एक कड़ी है नेपाल के बीच तिब्बत के केरुंग से लेकर काठमांडू तक रेलवे लाइन बिछाने के समझौते पर हस्ताक्षर । चीन के ६ दिन के दौरे पर गए प्रधानमंत्री केपी ओली और चीन के मौजूदा प्रीमियर ली केकियांग के बीच दोनों देशों को जोड़ने के लिए सड़क, रेल और हवाई मार्ग बनाने के बारे में समझौते हुए हैं । दोनों देशों ने उम्मीद जताई है कि द्विपक्षीय सहयोग के तहत हुए इस ऐतिहासिक समझौते से एक नए युग की शुरुआत होगी । इसके अलावा आपसी सहयोग के लिए आप्टिक फाइबर नेटवर्क से भी दोनों देशों को जोड़ने के संबंध में सहमति हुई है ।
नेपाल के विकास के लिए यह एक अच्छी कोशिश है । किन्तु इन सब के बीच कुछ आशंकाएँ भी हैं, जो नेपाल और चीन की भौगालिक और आर्थिक स्थिति को लेकर चिन्तन का विषय है । तिब्बत के ऊपर ल्हासा तक जो रेल लाइन है, उसे बढ़ाकर काठमांडू तक लाए जाने की योजना है । इसके लिए कई ब्रिज और सुरंगें बनानी होंगी, जो काफी कठिन काम के साथ–साथ पर्यावरणीय तथा भौगोलिक दृष्टिकोण से बेहद खतरनाक भी माना जा रहा है और सबसे बड़ी बात कि इसमें काफी खर्च भी आएगा, जिसके लिए देश की क्षमता नहीं है । उधार लेने की सूरत में देश को ३०÷४० साल तक कर्ज चुकाते रहना होगा । अर्थात हमारी कई पीढि़यों को इस कर्ज के भार से दब कर रहना होगा । इसके बारे में नेपाल को सोचना होगा । दूसरी बात कि इससे देश को क्या आर्थिक फायदा होगा यह सोचना भी सरकार का काम है । ट्रेन को पहाड़ की छाती चीर कर पटरी पर अगर दौड़ा भी लेते हैं तो क्या देश सचमुच विकास की पटरी पर दौड़ पाने में सक्षम होगा ? क्योंकि नेपाल के लिए चीन खरीदार नहीं, लेकिन चीन के लिए नेपाल खरीदार है । उससे भी अहम बात कि यहाँ तक पहुँचने की राह प्राविधिक दृष्टिकोण से बहुत कठिन है । तिब्बती उच्च सतह से काठमान्डौ के कम ऊँचाई में रेल चलने के समय में गति नियंत्रण भी एक चुनौती है । केरुंग से काठमान्डौ तक की रेलमार्ग दूरी लगभग ७२ किलोमीटर होगी । इस रेलमार्ग के लिए अधिकतर सुरंग और पुल निर्माण की आवश्यकता होगी । केरुंग नाका समुद्री सतह से करीब चार हजार पाँच सौ मीटर की ऊँचाई में है वहीं रसुवा का स्याफ्रुबेसी एक हजार पाँच सौ मीटर की ऊँचाई में है । इसी तरह काठमान्डौ एक हजार तीन सौ मीटर की ऊँचाई में है । चीनी रेल को केरुंग से स्याफ्रुबेसी आने में तीन हजार मीटर नीचे आना होगा । ७२ किलोमीटर की छोटी दूरी में तीन हजार दो सौ मीटर ऊपर नीचे होने पर रेल की घर्षण स्थिति अधिक होगी जिसके लिए विशेष प्रविधि की आवश्यकता है, जो अत्यंत मँहगी और चुनौतीपूर्ण है । सवाल यह है कि अगर नेपाल इस योजना के लिए पूरी तरह चीन पर आश्रित होता है, तो इसकी स्थिति पाकिस्तान की तरह होनी तय है और अगर यह आर्थिक भागीदार बनता है तो कैसे और कहाँ से ? बावजूद इसके अगर यह रेल परियोजना सफल हो भी जाती है तो क्या नेपाल के लिए यह फायदे का सौदा होगा ? चीन से नेपाल आनेवाली कार्गो तो भरी आएगी पर क्या नेपाल से वह भरी हुई वापस जाएगी ? और अगर वह खाली जाती है तो पूरी सम्भावना है कि चीन के साथ व्यापार घाटा अपनी पूरी चरम सीमा पर होगा । इसलिए नेपाली सामान के लिए चीन बाजार बने इसकी तैयारी आवश्यक है किन्तु व्यवहारिकता में यह कपोल कल्पना ही दिखती है ।

भारत पर इसका असर

विश्लेषक मानते हैं कि नेपाल का चीन की ओर बढ़ता रुझान और चीन की बढ़ती महत्तवाकांक्षा भारत के लिए चिन्ता का विषय बन सकता है । फिलहाल जो रेलवे योजना दिख रही है वह भारत की सीमा तक नहीं है, तो ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इससे साफतौर पर भारत को कोई खतरा दिखाई नहीं देता है । लेकिन भविष्य में अगर ये रेल लाइन काठमांडू से आगे बढ़ा दी जाती है और भारत की सीमा तक आ जाती है तो चीन का माल भारत के दरवाजे पर खड़ा होगा । जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर गहराई से प्रभाव पड़ेगा और जिसका पूरा फायदा चीन को होगा नेपाल को नहीं । अगर हम ये मानते हैं कि चीन नेपाल को अपना सामान बेचना चाहता है, तो इससे बड़ा मजाक कुछ नहीं हो सकता क्योंकि चीन अपना बाजार भारत को बनाना चाहता है नेपाल को नहीं । देश की आर्थिक दशा तो ऐसी है कि ट्रेन की महंगी टिकट नेपाली जनता की जेब के लिए मुश्किल होगी । कटु सत्य है कि सस्ती चीजों के मद्देनजर चीन के लिए नेपाल एक बाजार हो सकता हैे, लेकिन बड़ी मशीनरी के लिए वह भारत का ही मुंह देखेगा । इतना ही नहीं तस्करी का बाजार भी गर्म होगा इस अंदेशे से भी इनकार नहीं किया जा सकता है । यों तो बार बार नेपाल भारत को आश्वस्त करता आया है कि नेपाल की धरती भारत की सुरक्षा अथवा विरोधी गतिविधियों के लिए प्रयोग नहीं की जाएगी । पर क्या यह आश्वासन भारत के लिए काफी होगा यह सोचने वाली बात है ।

चीन की दूरदृष्टि

अगर चीन की दूरगामी सोच को परखें तो साफ है कि उसका मकसद नेपाल के आन्तरिक विकास से अधिक भारत के दरवाजे पर अपना माल लाना है, चाहे इसके लिए उसे नुकसान ही क्यों न झेलना पड़े । फिर वो इस नीति से भारत पर बेल्ट एंड रोड परियोजना का हिस्सा बनने का दवाब बनाना चाहता है क्योंकि, ऐसी स्थिति बन सकती है कि कल को भारत के व्यापारी ही अपनी सरकार से कहेंगे कि भारत इतना बड़ा मौका हाथ से क्यों जाने दे रहा है ?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत एशिया के देशों से मध्य पूर्व को जोड़ना चाहते हैं । हालांकि कई जानकार कहते हैं कि इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से चीन, सुपर पावर बनने का अपना ख्वाब पूरा करना चाहता है । चीन लगातार भारत से इसमें शामिल होने की गुजारिश करता आ रहा है हालांकि अब तक भारत इससे इंकार करता रहा है । इस योजना के तहत शुरू हुई चीन÷पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर (सीपीईसी) परियोजना में शामिल होने से भारत ये कहते हुए इंकार कर चुका है कि इसके पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुजरने से उसकी संप्रभुता का उल्लंघन होता है । परन्तु नेपाल को बिसात बनाकर चीन अपना पासा फेक चुका है और उसे पूरी उम्मीद है कि भारत का बदलता परिवेश उसके पक्ष में होगा क्योंकि भारत के व्यापारी ही इस बात के लिए भारत सरकार पर दवाब डालेंगे । यानि जाहिर है कि नेपाल के विकास की राह सीधे सीधे चीन की महत्तवाकांक्षा की पूर्णता से आबद्ध है ।
फिलहाल तो प्रधानमंत्री ओली जी ने जिस सपने को दिखाया था नेपाली जनता उसे देखने में मगन है । भविष्य में इसका स्वाद कितना मीठा और कितना कड़वा होगा यह वक्त बताएगा ।

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