Sun. Sep 23rd, 2018

की–होल सर्जरी आधुनिक प्रविधि है, जिसमें मरीजों को ज्यादा पीड़ा नहीं होती है : डां रंगीना साह

हिमालिनी अंक अगस्त २०१८ |कॉलेज ऑफ मेडिकल साइन्स भरतपुर चितवन से एमबीबीएस तथा स्त्री रोग विशेषज्ञता का अध्ययन पूरा करने के बाद भी डा. रंगीना साह को लगा कि मेरा अध्ययन अभी भी अधूरा है । महिला तथा प्रसूति संबंधी विशेष रोग एवं समस्याओं में अगर आप्रेशन करना पड़ता है तो नेपाल में परम्परागत आप्रेशन विधि की जो प्रक्रिया है, उससे महिलाओं को कुछ ज्यादा ही पीड़ा झेलनी पड़ती है । इसी को मद्देनजर करते हुए डा. रंगीना ने ठान लिया कि २१वीं शताब्दी में आकर भी इस तरह का पीड़ा का सामना करना दुर्भाग्य की बात है, अब यह बर्दास्त नहीं होगा । डा. रंगीना चाहती थी कि नेपाल में भी विकसित देशों की तरह नयी प्रविधि का उपचार सर्वसुलभ हो सके । इसीलिए उन्होंने डॉक्टर संबंधी अपनी औपचारिक पढ़ाई पूरा करने के बाद भी अपने उद्देश्य के अनुसार आधुनिक प्रविधि ल्याप्रोस्कोपी (दूरबीन प्रविधि से सर्जरी) सीखने के लिए भारत के मुम्बई, कानपुर, दिल्ली स्थित एम्स, गोरखपुर स्थित स्टार हस्पिटल में पहुँच कर ट्रेनिङ लिया । तब भी उनको सन्तुष्टि नहीं मिली । उसके बाद वह जर्मन पहुँच गई और जर्मन स्थित ‘किल युनिभर्सिटी’ से तालिम प्राप्त किया । किल युनिभर्सिटी वह विश्वविद्यालय है, जहां पहुँच कर तालिम प्राप्त करना हर डॉक्टरों का एक सपना रहता है । डा. रंगीना ने भी वही से दो महीने पहले ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि संबंधी विशेषज्ञता हासिल की । इसी सन्दर्भ मे. डा. रंगीना के साथ हिमालिनी सम्वाददाता लिलानाथ गौतम ने बातचीत किया है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–

Rangina Shah
डां रंगीना साह

० कहा जाता है कि आप्रेशन जगत में आधुनिक प्रविधि माने जानेवाला ‘ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि’ के बारे में आपने हाल ही में विशेषज्ञता हासिल की है । क्या है ल्याप्रोस्कोपी प्रवधि ?
– हां, मैंने दो महीने पहले ही जर्मन से ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि में अपनी विशेषज्ञता हासिल की है । यह कोई नयी प्रविधि तो नहीं है, लेकिन नेपाल जैसे विकासोन्मुख देशों के लिए नयी ही मानी जाती है । ल्याप्रोस्कोपी जर्मन प्रविधि है, जो महिलाओं की प्रसूतिजन्य विभिन्न समस्या तथा आमसाय संबंधी समस्या, जहां आप्रेशन करना पड़ता है, उसके लिए इस प्रविधि का प्रयोग होता है । परम्परागत आप्रेशन प्रविधि के विकल्प के रूप में ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि का प्रयोग होता है ।
० नेपाल के लिए ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि बिल्कुल नयी है ?
– नहीं, कुछ साल पहले से ही ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि से नेपाल में भी उपचार होता आ रहा है । लेकिन सर्वसुलभ नहीं है, सभी हास्पिटलों में भी नहीं है । मेरे खयाल से अल्का हास्पिटल के अलावा काठमांडू उपत्यका में ग्राण्डी और मेडिसिटी में भी है । उपत्यका बाहर विराटनगर लगायत शहरों में भी है । मैं तो चाहती हूं कि नयी प्रविधि हर हस्पिटल में होनी चाहिए, लेकिन नहीं है । प्रायः अधिकांश हास्पिटल में पुरानी प्रविधि के अनुसार ही आप्रेशन किया जाता है ।
० ऐसा क्यों होता है ?
– विशेषतः नयी प्रविधि के बारे में जनता में जानकारी नहीं है । नयी प्रविधि का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में शंका भी पैदा होती है ।
० पुरानी प्रविधि तथा नयी प्रविधि से जो ऑप्रेशन किया जाता है, उसके बीच में क्या अन्तर होता है ?
– जमीन–आसमान का अन्तर रहता है । पुरानी प्रविधि के अनुसार आप्रेशन करते हैं तो शरीर (पेट) को काटकर वहां एक छेद बनाना पड़ता है, जो कुछ ज्यादा ही लम्बा और बड़ा होता है । पुरानी प्रविधि के अनुसार ८ से १० सेन्टीमीटर स्किन को काटना पड़ता है । सिर्फ स्किन ही नहीं, उसके भीतर रहे विभिन्न मांशपेशीजन्य लेयर को भी काटना पड़ता है । तब ही हम लोग उस जगह में पहुँच जाते हैं, जहां हमें आप्रेशन करना है । इस तरह परम्परागत प्रविधि में मानव शरीर में आवश्यकता से ज्यादा ही घाव बनाया जाता है, जिससे मरीजों को ज्यादा पीड़ा झेलनी पड़ती है । लेकिन ल्याप्रोस्कोपी सर्जरी, जिसको हम लोग ‘की–होल सर्जरी’ भी कहते हैं, इस में शरीर को ज्यादा काटने की जरुरत नहीं है । शरीर (पेट) में लगभग १ सेन्टीमीटर का होल बनाते हैं तो काफी है । एक सेन्टीमीटर की होल से हम लोग कैमरा को अन्दर ले जाते हैं और किस अंग में आप्रेशन करना है, उसको देखते हैं । उसके बाद उस जगह (आप्रेशन की आवश्यकता वाले अंग) तक आप्रेसनजन्य औजारों को पहुँचाने के लिए अन्य कुछ जगहों में आवश्यकतानुसार छोटे–छोटे छेद (होल) बना कर आप्रेशन किया जाता है ।
० नयां प्रविधि से आप्रेशन पर उसका फायदा क्या–क्या हो सकती है ?
– पहले ही कह चुकी हूँ कि परम्परागत प्रविधि से आप्रेशन करते हैं तो पेट में आवश्यकता से बड़ा ही चोट लग जाता है, जो डाक्टरों की बाध्यता भी है । ऐसी अवस्था में स्वाभाविक है– घाव भी बड़ा होता है, जो ठीक होने में कुछ ज्यादा ही दिन लगता है । ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि में घाव छोटा–सा रहता है, जो जल्द ही ठीक होता है और पीड़ा भी कई गुना कम होती है । जिस अंग का हम लोग आप्रेशन करते हैं, उसमें दाग भी बन जाता है । अगर घाव ज्यादा है तो दाग ज्यादा और घाव छोटा है तो दाग भी कम होता है । अर्थात् बड़ा और छोटा घाव के बीच जो अन्तर होता है, यहां भी वही अन्तर होता है । आप्रेशन के बाद घाव पक न जाए, इसके लिए डॉक्टर विभिन्न एन्टिबायोटिक का प्रयोग करते हैं । अगर घाव छोटा–सा रहता है तो एन्टिबायोटिक भी कम ही प्रयोग होता । आप्रेशन के बाद हॉस्पिटल में भर्ती होकर रहने का समय भी कम होता है । उदाहरण के लिए परम्परागत प्रविधि से उपचार करते हैं तो कम से कम मरीजों को ५ से ७ दिन तक हस्पिटल में रहना पड़ता है । लेकिन ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि से उपचार करते हैं तो २४ घण्टा के अन्दर मरीज अपने घर जा सकते हैं । विशेष कारण से कुछ लोगों को ४८ से ७२ घण्टा तक हस्पिटल में रहना पड़ता है, उससे ज्यादा नहीं ।
आज की २१वीं सदी में महिला हो या पुरुष हर व्यक्तियों का जीवन व्यस्त रहता है । इसीलिए आप्रेशन के कितने दिनों के बाद मरीज अपने दैनिक कामों में लौट सकते है ? इस तरह की जिज्ञासा भी रहती है । परम्परागत प्रविधि से आप्रेशन करते हैं तो दैनिक जीवन में लौटने के लिए कुछ हफ्ता लगेगा । लेकिन की–होल प्रविधि से आप्रेशन करते हैं तो सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार ४ दिनों के बाद ही महिला अपने दैनिक जीवन में लौट सकती हैं । लेकिन व्यवहारिक जीवन में इसमें कुछ जटिलता दिखाई दिया है । तब भी ५ से७ दिनों के भीतर महिला अपने दैनिक कामों में लौटने में सक्षम रहती है ।
० दोनों उपचार प्रविधि में लगनेवाले मूल्य के अन्तर के बारे में कुछ कहेंगी ?
– अन्तर तो अवश्य है, लेकिन ज्यादा नहीं । नयी प्रविधि से आप्रेशन किया जाता है तो अवश्य ही वहां औजार भी नयी प्रविधि के अनुसार ही होता है, उसका मूल्य भी कुछ ज्यादा ही पड़ जाता है । इसीतरह परम्परागत आप्रेशन के लिए जो औजार प्रयोग किया जाता है, उस को साफ करने के बाद बार–बार प्रयोग कर सकते हैं । लेकिन ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि में ऐसा नहीं होता, ज्यादा से ज्यादा एक औजार को ५ से १० बार तक दुहराया जाता है, उससे ज्यादा नहीं । औजारों के मूल्य में अन्तर होना और औजार बार–बार प्रयोग न होने के कारण ‘आप्रेशन–कस्ट’ में कुछ अन्तर पड़ जाता है । लेकिन निजी अस्पतालों के बीच जो प्रतिस्पर्धा है, उस को देखते हैं तो अन्य अस्पताल जहां परम्परागत विधि से आप्रेशन किया जाता है, उसकी तुलना में अलका अस्पताल में होनेवाला ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि ही सस्ती है ।
० ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि में आधारित रहकर काम करनेवाले डाक्टरों की जनशक्ति नेपाल में कितनी हैं, इसके बारे में आप का क्या खयाल है ?
– इस प्रविधि को अपनाकर काम करनेवालों डाक्टराेंं की संख्या नेपाल में ज्यादा नहीं हैं । आम लोगों को भी नयी प्रविधि के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है । मैं २ साल पहले की कुछ एक बात रखना चाहती हूं । २ साल से अलका हास्पिटल में ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि से आप्रेशन होता आ रहा है । लेकिन २ साल पहले अगर १० लोग ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि के बारे में पूछते थे तो, उसमें से सिर्फ १ व्यक्ति ही नयी प्रविधि से आप्रेशन के लिए तैयार हो जाते थे । लेकिन आज १० लोग इसके बारे में पूछते हैं तो कम से कम ५–६ व्यक्ति नयी प्रविधि से उपचार करने के लिए तैयार होते हैं । इसी से पता चलता है कि लगभग आधी जनसंख्या आज भी ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि से अनभिज्ञ हैं, और उन लोगों की मानसिकता रहती हैं कि पुरानी प्रविधि से ही आप्रेशन करना ठीक रहेगा ।
० ऐसा क्यों होता है ?
– मुख्यतः प्रविधि के प्रति जानकार न होना । ‘ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि ठीक है’ यह बात सिर्फ मैं और अलका हास्पिटल नहीं कह रहा है । अर्थात् नयी प्रविधि के बारे में सिर्फ एक डाक्टर तथा हास्पिटल से कहने पर भी नहीं होगा । विकसित देशों में जितनी भी नयी प्रविधि प्रयोग में आ रही है, उसको प्रयोग में लाने से पहले कई परीक्षण किया जाता है । चारों ओर से सही ठहराने के बाद ही उसको प्रयोग में लाया जाता है । जर्मन जैसे विकसित देशों से शुरु ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि आज संसार में ही लोकप्रिय होता जा रहा है । लेकिन जनचेतना की कमी से नेपाल में आज भी इसके ऊपर आशंका किया जाता है । विकसित देशाें में सही साबित प्रविधि को अगर हम लोग गलत ठानते हैं तो उससे प्राप्त होनेवाले लाभ से भी हमें ही वंचित रहना पड़ेगा । हमारे सम्पर्क में जो आते हैं, उन लोगों को हम लोग यही बात बताते हैं । तब भी कई लोग नयी प्रविधि के अलावा परम्परागत प्रविधि की ओर ही आकर्षित होते हैं । यहां तक कि कई हस्पिटल के डाक्टर भी कहते हैं कि ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि की तुलना में परम्परागत प्रविधि ही सही है । ऐसी अवस्था में मरीज खुद अपने को ही प्रश्न करें कि शिक्षित और विकसित देशों में जो प्रविधि प्रयोग में आ चुका है, वह कैसे परम्परागत प्रविधि से गलत है ?
० ल्याप्रोस्कोपी सर्जरी के संबंध में अन्य कोई भ्रम ?
– हां, कुछ लोग कहते हैं कि ल्याप्रोस्कोपी सर्जरी छोटा–सा ट्युमर के लिए ठीक है, बड़ा ट्युमर का अप्रेशन इस प्रविधि से सम्भव नहीं है । लेकिन यह गलत सोच है । मेडिकल रिकार्ड के अनुसार ल्याप्रोस्कोपी सर्जरी से ६ केजी से भी अधिक बड़ा ट्युमर का आप्रेशन हो चुका है । अलका हस्पिटल के रिकार्ड के अनुसार १ से २ केजी का आप्रेशन सामान्य हो चुका है, जो ल्याप्रोस्कोपी प्रविधि से किया गया है । लेकिन सामान्य लोगों की जिज्ञासा रहती है– २ केजी का ट्युमर कैसे छोटे–से होल को बनाकर निकाला जाता है ? हां, यह एक स्वाभाविक प्रश्न भी है । लेकिन २ केजी का ट्यूमर एक ही पीस में बाहर नहीं निकाला जाता । उसको छोटा–छोटा बनाकर निकाला जाता है ।

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