Sat. Apr 20th, 2019

हिन्दू संस्कृति का एकता सूत्र है कुंभ : राज सक्सेना

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हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 | आमतौर पर अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि हिन्दू संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है ? । विभिन्न मतभिन्नताएं पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांधे रखती है । वस्तुतः यह आश्चर्य का विषय तो है ही कि प्राकृतिक वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की विभिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं ?
भारत के ऋषि–महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षुण्ण रखने के लिए हिन्दू मतावलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आवरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ठ सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है । एकसूत्रता के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार स्थानों पर बारह वर्ष के अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध नहीं है । इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे अर्द्ध–कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया । जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में छै वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्तिपीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश को, भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है । यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की एकात्मता का एक सूत्र ।

कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि, निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धारित अवधि में होने वाले सामूहिक स्नान का नाम है । जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है । इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है ।

कुंभ वास्तविक रूप में भारत का सबसे प्राचीन सामाजिक उत्सव है । एक सौ चौवालीस वर्षों के वाद आने वाला योग कुंभ को महापर्व का स्वरूप प्रदान करता है । वस्तुतः जहां सब तीर्थों का सम्मिलन हो वही कुंभ का स्वरूप है । भारतीय पौराणिक ग्रंथ कुंभ के सन्दर्भों से भरे पड़े हैं । संस्कृत साहित्य में कुंभ की व्यापक व्याख्या है । ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमा का एक ही नक्षत्र में होना आकाश में कुंभ की संरचना करता है । अथर्ववेद की ऋचा (४÷३४÷७ तथा १९÷५३÷३) के अनुसार ब्रह्मा जी कहते हैं–“मनुष्यों के भोजन, संपोषण और संवृद्धि के साधनों से परिपूर्ण करने वाले चार कुंभों को चार स्थानों पर प्रदत्त करता हूं । इसी प्रकार नारद पुराण के अनुसार अमृत बिन्दुओं की वृष्टि ही कुंभ के चार पर्वों को जन्म देती है (६६÷४०÷४५).”

कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत–कुंभ–घट या घड़ा) से सम्बद्ध है । आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र–मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत–घट भी था । अमृत–घट को राक्षसों ने हस्तगत कर लिया । उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे (हरिद्वार–उत्तराखण्ड), प्रयाग–उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश)और नासिक–महाराष्ट्र) । माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत–घट रखने से उसमें से कुछ बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए । यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह–नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है । स्कन्धपुराण के अनुसार भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है । जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है । प्रयाग में गंगा–यमुना के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में पड़ना आवश्यक होता है ्र इसी प्रकार बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर कुम्भ पर्व का आयोजन होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है– वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, मेष राशि का सूर्य, सिंह राशि पर वृहस्पति, तुला राशि पर चन्द्रमा, स्वाति नक्षत्र, व्यतिपात योग और उज्जयिनी का क्षिप्रातट । इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह राशि पर सूर्य और वृहस्पति, पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो ।
कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट प्रक्रिया का नाम है । प्रारम्भिक, मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं । नदी तट पर कई कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपडि़यों के नगर बस जाते हैं । बड़े–बड़े आलीशान शामियाने व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं । अस्थाई सड़कें, पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं की अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध किया ही जाता है ।
इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान पन्द्रह जनवरी मकर संक्राति को शुरु हुआ है तथा अंतिम स्नान चार मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है । कुछ स्नानों को शाही स्नान कहा जाता है । इस बार मकर संक्रान्ति के बाद दूसरा शाही स्नान चार फरवरी पौष पूर्णिमा और तीसरा शाही स्नान दस फरवरी बसंत पंचमी को पड़ रहा है । इसके अतिरिक्त पौष पूर्णिमा २१ जनवरी, माघी पूर्णिमा १५ फरवरी और महाशिवरात्रि ०४ मार्च को भी स्नान दिवस निश्चित हैं ।
कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही प्राप्त है । इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है । भारत में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है । प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी । बल्कि कहीं–कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था । ऐसे भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ । आज भी अखाड़े के अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है । जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है–
तेरह अखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन ‘आवाहन’ अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता है । इसकी स्थापना सन ५४७ में हुई थी । इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद सन ६४७ में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में है । सन ८५५ में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा सन ९०४ में जन्मा । जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन १०६० में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई । इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य महिलाएं भी हो सकती हैं । ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं । इसकी शाखाएं हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं । इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है । निरंजनी अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है । शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झारखण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार में है । यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन १६६४ में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था । वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं ।
वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी–वस्त्र तक) युवा सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे । कालान्तर में इनके कई कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है । अकबर के काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन ‘आईने अकबरी’ मे मिलता है । अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन, बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई । अखाड़ों का सदस्य शारिरिक रूप से स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म केलिए मर मिटने को तैयार हो ।
प्रयाग के कुंभ से कुंभ के इतिहास की एक सबसे बड़ी दुर्घट्ना की दुःखद स्मृति भी जुड़ी है । सन १९५२ में नागा साधुओं के हाथियो के बिगड़ जाने के कारण मची भगदड़ में एक लाख से अधिक लोग मारे गए थे ।
कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत–मतान्तरों की विभिन्न उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक अलग ही अनुभव है । हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित मानव जन–समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महानगर का स्वरूप प्रदान कर देता है । जिधर देखो लाखों झोपड़ी, टिन शेड, प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही है कहीं भगवान का निवास । हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता है । हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता है, लगता है कि उत्तर–दक्षिण, पूर्व–पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं । सारा भारत एक हो गया है । विभिन्न मत–मतान्तर और उप–संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं । बाकी बची कुछ दूरियां भी शनैः–शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के निश्चत अन्तराल में, जो इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध–कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है । विधर्मियों और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?
इस प्रयाग राज कुम्भ को तो जोगी और मोदी ने यादगार बनाने के लिए गंगा तट पर पूरा अत्याधुनिक महानगर ही बसा दिया है । इस कुम्भ में मोदी के आमन्त्रण पर डेढ़ सौ से अधिक विदेशी राजनयिक और राज नेता भारत के इस सांस्कृतिक महाकुम्भ का प्रत्यक्ष दर्शन करने पधार रहे हैं । यह भी इस कुम्भ को एक विलक्षण और अनुपम गौरव प्रदान करेगा और भारत की छवि को शीर्ष पर पंहुचाने का कारक बनेगा ।

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