Wed. Nov 21st, 2018

सरकारी शोषण से मधेस में कुपोषण : अजय कुमार झा

समय बीत जाने के वाद कुपोषित बच्चों को हम चाहकर भी सुन्दर व्यक्तित्व नहीं प्रदान कर सकते ।
कुपोषण मुख्यतः ६ रूपों में दिखाई देता है–
१, जन्म के समय कम वजन, २. बचपन में बाधित विकास, ३. रक्त अल्पतता, ४. विटामिन ए की कमी, ५. आयोडिन की कमी संबंधित बिमारियां, ६. मोटापा

हिमालिनी, अंक अक्टूबर, २०१८ | कुपोषण ! शब्द सुनते ही हम उर्जाहीन महसूस करने लगते हैं । न बोलने में अच्छा लगता है और न ही सुनने में । कुपोषण, अर्थात पोषण की कमी ।
यह किसी भी क्षेत्र में हो सकता है । परन्तु हम भोजन में विटामिन, कैलशियम, प्रोटीन, वसा और लौह तत्वों जैसे पोषण युक्त खाद्य पदार्थों की कमी के कारण होनेवाले शारीरिक और मानसिक दुर्बलता तथा कुपोषण के बारे में आज चर्चा करने जा रहे हैं । कुपोषण की समस्या का सबसे पहला कारण गरीबी और अशिक्षा है । लेकिन नेपाल के सन्दर्भ में वह राजनीतिक षडयंत्र जो अबतक के मधेस विरोधी मानसिकता से ग्रसित नेपाली सरकार द्वारा योजनाबद्ध तरीके से मधेसियों के साथ होता आ रहा है, वह प्रमुख कारण है । हम मधेसियों के कुपोषण का मौलिक कारण प्रकृति प्रदत्त नहीं बल्कि मानव निर्मित है । क्योंकि जहाँ की मिट्टी भौतिक रूप मे सुपोषित और सुक्ष्म रूप में सुवाषित हो, वहाँ के निवासी विना राजकीय षडयंत्र के शारीरिक रूप से दुर्बल और बौद्धिक रूप से दिवालिया हो ही नहीं सकता ।


आज सातो प्रदेस में सर्वाधिक दो नंबर प्रदेस के ५७.८ प्रतिशत महिलाएं रक्ताल्पता की शिकार हैं, जिनकी उमर १५ से ४९ साल का है । स्मरण रहे, यह समय जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । क्योंकि सन्तान का जन्म इसी में संभव है । यही कारण है की मधेस में सभी प्रदेशों से ज्यादा ५९.४ प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं । वही, जहाँ अन्य प्रदेशों में भिटामिन ए की पूर्ति ९३.५ प्रतिशत तक की गई है, वही दो नंबर प्रदेश में सिर्फ ७७.५ महिला और बालबालिकाओं में पहुचाया गया है । योजना बद्ध रूप मे स्वास्थ तथा पोषण पर काम करने वाले सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थाओं को मधेसियों की पहुँच से बाहर रखा गया है । और जो कार्यक्रम चल रहा है, उसे कागजÞ में ही सीमित किया जा रहा है ।

आज हम विकास के क्षेत्र में चाँद और मंगल ग्रह को चूमने लगे हैं । कृत्रिम गर्भाधान से प्रयोगशाला में बच्चे पैदा करने लगे हैं । शब्दों की ध्वनि से बड़े बड़े मशीने संचालित करने लगे हैं । परन्तु पाषाण युग से आज के वैज्ञानिक युग तक भी हम कुपोषण से मुक्त नहीं हो पाएं । उसके मूलतः दो ही कारण हैं एक गरीबी तो दूसरी उससे बड़ी जो दिखाई पड़ती है वो है अज्ञानता । और इन दोनों के उदगम स्थान सरकारी उदासीनता है ।

कुपोषण, गर्भावस्था से ही शुरू हो जाता है । जो जन्म के ६ माह से ३ वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है या दिखाई पड़ता है । ६ माह से ३ वर्ष की उम्र में बच्चे के लिए माँ का दूध पर्याप्त नहीं होता । बच्चा खुद खा पाने या मांग पाने में असमर्थ होता है । हर घंटे दो घंटे में विशेष पौष्टिक खाद्य और पेय पदार्थों की नितांत आवश्यकता होती है । क्योंकि इस दौरान बच्चों का शारीरिक विकास द्रुत गति से होता है, तो वही पर ८.५ बुद्धि का भी विकास हो जाता है । फिर पुरे जीवन में २.५ हीं बुद्धि का विकास हम कर पाते हैं । जबकि हम इसे नजरअंदाज कर यहीं से भयंकर भूल करना शुरू कर देते हैं । जिसका दुष्परिणाम संतान को ही नहीं, बल्कि पूरे वंश, पीढ़ी, समाज, राष्ट्र और मानव सभ्यता को भुगतना पड़ता है । क्योंकि समय बीत जाने के वाद कुपोषित बच्चों को हम चाहकर भी सुन्दर व्यक्तित्व नहीं प्रदान कर सकते ।
कुपोषण मुख्यतः ६ रूपों में दिखाई देता है–
१, जन्म के समय कम वजन, २. बचपन में बाधित विकास, ३. रक्त अल्पतता, ४. विटामिन ए की कमी, ५. आयोडिन की कमी संबंधित बिमारियां, ६. मोटापा
बच्चों में कुपोषण मुख्यतः दो प्रकार का होता है । सूखे वाला कुपोषण, सूजन वाला कुपोषण । कुपोषण के सूचक के रूप में बच्चे की उम्र एंव ऊंचाई के अनुरूप उसका वजन कम होना, उसके हाथ पैर पतले और कमजोर होना परन्तु पेट बढ़ा होना । बच्चे को बार बार संक्रमण होना और बीमार पड़ना हमेशा थकान महसूस होना । आँखें धंसी हुई होना । रोग प्रतिरोधी क्षमता का कमजÞोर होना । रूखी त्वचा और रूखे बाल । मसूडों में सूजन, मसूडों से रक्तस्राव । दांतों में सड़न । वजÞन और ऊचाई का अनुपात कम होना । ध्यान केंद्रित ना कर पाना । विकास में कमी । मांस पेशियों में दर्द । पेट फूला होना व्यवहार में चिड़चिड़ापन । सीखने में असमर्थ होना । अत्याधिक रोना इसके साथ ही कुपोषण यदि गंभीर स्थिति में पहुंच जाए तो कुछ इस तरह से लक्षण नजर आते हैं । कमजोर हड्डियां और जोड़ों में दर्द । हड्डियाँ बाहर से ही दिखाई देना । त्वचा का सामान्य से ज्यादा सांवला पड़ जाना । मांसपेशियों का कमजÞोर होना । नाखूनों का टूटना । बालों का झड़ना या बालों का रंग बदलना । भूख ना लगना । बच्चों का बिना वजह रोना । शरीर का बहुत पतला व कमजÞोर होना । पेट का फूल जाना आदि आदि ।
अब ध्यान देनेवाली बात यह है कि, किसी भी समाज और राष्ट्र के विकास और सुरक्षा का आधार वहाँ के युवावर्ग होते हैं । वह भी शारीरिक रूप से सुपोषित, स्वस्थ, सबल और शक्तिशाली तथा मानसिक रूप से सुशिक्षित, संयमी, साहसी और सृजनशील हो तब । लेकिन नेपाल के परिवेश में देखा जाय तो, पहाड़, हिमाल और जंगलो में रहनेवाले नेपाली नागरिक शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक कुपोषित होते थे । लेकिन आज वो नेपाल सरकार के आँखों की ज्योति होने के कारण शारीरिक लम्बाई और मानसिक चतुराई में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं । जबकि नेपाली साहित्य में भी मधेस में अच्छा खाना मिलता है, भात मिलता है । यह उल्लेख है । इससे प्रमाणित होता है की हम मधेसी पहले अच्छे थें, और अब कमजोर होते जा रहे हैं । यह सत्य है कि किसी भी समाज की खुशहाली उसके निवासियों के स्वास्थ्य से जुड़ी होती है । जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो इसका संबंध शिशुओं और माताओं से सबसे पहले होता है । जिस समाज में प्रतिवर्ष नवजात शिशुओं और प्रसव के दौरान माताओं की मृत्यु दर लाखों में हो, उसे खुशहाल नहीं कहा जा सकता । कुपोषण के मामले में विश्व के अनेक देश शर्मनाक स्थिति में हैं । इनमें भारत की स्थिति भी ऐसी ही है । सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुपोषण को चिकित्सकीय आपातकाल घोषित कर दिया जाना चाहिए । कुपोषण के आंकड़े आपातकालीन सीमा से ऊपर हैं ।

स्वास्थ्य तथा जनसङ्ख्या मन्त्रालय द्वारा किए गए पिछला स्वास्थ्य सर्वेक्षण में नेपाल में ४१ प्रतिशत बालबालिका दीर्घ कुपोषण से ग्रसित पाए गए हैं । नेपाल, विश्व के न्यून पोषण बाला देशों की श्रेणियों में पड़ता है । नेपाल में अभी भी १२ प्रतिशत शिशु कम तौल के जन्म लेते हैं ।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भुखमरी कुपोषण का चरम रूप है । शिशु मृत्युदर असामान्य होने का प्रमुख कारण भी कुपोषण ही है । अतःआज के युग में भुखमरी को बर्दास्त नहीं किया जा सकता है । जहाँ एक ओर गरीबी निवारण के नामपर हजारों लोग अमीर हो गए, पांच सितारे होटल घर के बराबर हो गया और विदेशी गाडि़यों का ताँता लग गया, वही गरीब नागरिक गरीब ही रह गए । गरीबी तथा कुपोषण के नामपर सरकारी और गैर सरकारी संघ संस्था और कार्यकर्ताओं ने जितनी रकम ब्रह्मलूट की तरह लुटा है, उतना रकम सीधे जनता के नामपर खाते में डाल दिए जाते तो आज नेपाल में गरीबी ०.५ रहती, और हम सभ्य देश के नागरिक कहलाते । इसप्रकार देखा जाय तो, जनता के अगुआ तथा उच्चपदस्थ कर्मचारियों की मिलीभगत के परिणामस्वरूप देश में गरीबी विद्यमान है । नहीं तो रातोरात नेतागण करोड़पति कैसे बन जाते ? पहाड़ और हिमाल के खानावदोस लोग कर्मचारी बनते हीं काठमांडू में महल कैसे खड़ा कर लेत ? क्या कभी इन लोगों की संपत्ति विवरण पर आयोग बैठाया गया है ? आखिर चोर चोर मौसेरे भाई जो हुए !

शहरी क्षेत्र में अत्यधिक पोषण, भोजन ग्रहण करने के कारण मोटापा, लकवा, कैंसर, रक्तचाप जैसे रोग के शिकार अति पोषण के कारण हो रहे हैं । परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में एकही प्रकार के न्यून पोषण युक्त भोजन के कारण अल्प पोषण और कुपोषण के शिकार हो रहे हैं । एक तथ्यांक अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के ८४ प्रतिशत लोग एक ही प्रकार के अल्प पोषित आहार लेने को बाध्य हैं तो वही शहर के ११ प्रतिशत लोग अति भोजन के अभ्यासी हैं ।

राष्ट्रीय योजना आयोग ने पहली बार गरीबी का बहुआयमिक सूचकांक के आधार में प्रतिवेदन तैयार किया है । जिस के अनुसार नेपाल की कुल जनसख्या सन् २०१४ तक में दो करोड़ ५७ लाख में २८.६ प्रतिशत अर्थात् ७३ लाख ६५ हजार नेपाली गरीब की श्रेणी में दिखाया गया है । सातो प्रदेश की गरीबी का तथ्यांक प्रतिवदेन में उल्लेख किया गया है । नेपाल केन्द्रीय तथ्यांक विभाग के जीवनस्तर सर्बेक्षण मापन अनुसार वार्षिक १९ हजार दो सौ ६२ रुपैया से कम आय वाले नेपालियों को गरीब की सूची में रखा गया है ।

सातो प्रदेश में सबसे गरीब ६ नम्बर प्रदेश है, इस में ५१.२२ प्रतिशत लोग गरीब हैं । अत्यधिक गरीबी के दूसरे नंबर स्थान में दो नंबर प्रदेश ही है, जिसमें ४७.८९ प्रतिशत नागरिक गरीब हैं । याद रहे ! दो नंबर प्रदेश मधेसी बहुल प्रदेश है । फिर भी जनसंख्या के आधार पर सर्वाधिक २५लाख नागरिक इसी प्रदेस के नागरिक को गरीबी रेखा के नीचे दिखाया गया है । और जब हम समग्र मधेश की बात करेंगे तो गरीब मधेसियों का जो तथ्यांक सामने आएगा, वह कितना हृदय विदारक होगा इसकी एक झलक मधेस के सामुदायिक विद्यालय के छात्रों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । जहाँ हजारों बच्चों में सुपोषित बच्चों को अंगुली पर और कुपोषितों को मास में गिनना पड़ जाय ।
ऊपर के तथ्यांक राष्ट्रीय योजना आयोग ने अक्सफोर्ड पोभर्टी एन्ड ह्युमन डेभलपमेन्ट इनिसियटिभ (ओपीएचआई) के सहकार्य में राष्ट्रीय बहुआयामिक गरीबी तथ्यांक को संकलन करने का कार्य किया है । जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनस्तर के १० सूचकांको का विश्लेषण कर, प्रतिवेदन में स्वास्थ्य अन्तर्गत कुपोषण और बालमृत्यु तथा शिक्षा में स्कूल जाने का वर्ष और उपस्थिति के साथ ही जीवनस्तर के मापन में खाना बनाने की इन्धन, सरसफाइ, पानी, विद्युत, सम्पत्ति के साथ साथ बसोबास की अवस्थाओं को सूचकांक का आधार मानकर बहुआयामिक गरीबी का सूचकांक सार्वजनिक किया गया है ।
८ वस्तुगत रूप में कुपोषण के कारणों का नीचे उल्लेख कर रहा हूँ । परन्तु नेपाल के संदर्भ में सबसे बड़ा कारण सरकार की द्वैध नीति ही है ।
१. गरीबी २. खाद्य उत्पादन में कमी ३. अस्वच्छ वातावरण ४. अशिक्षा ५. आहार एवं पोषण की जानकारी न होना ६. पोषण सम्बन्धी प्रशिक्षण का अभाव ७. बड़े परिवार ८. सामाजिक कुरीतियाँ एवं अंधविश्वास ९. भोज्य पदार्थों में मिलावट १०. स्वास्थ सुविधाओं का अभाव ११. शुद्ध पेयजल का अभाव १२. भोजन सम्बन्धी गलत आदतें १३. बाल विवाह १४. फास्ट फुड का अधिक प्रचलन १५. भोजन बनाने की वैज्ञानिक विधि का अभाव, १६. अल्म्युनियम के वस्तुओं का अत्यधिक प्रयोग, १७. नशा का सामूहिक उपयोग, उपवाश और व्रत ही उभर के सामने आता है ।
कुपोषण के प्रभाव ः कुपोषित गर्भ से रोगी, बौने, सुस्त मनस्थिति, अपाहिज आदि परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए भार बच्चे हीं जन्म लेते हैं । जिसे खुद अपना जीवन एक भार सा लगने लगता है । एक शोकाकुल और दीनदुखी समाज का निर्माण होता है, जिन्हें दूसरो के आगे भिक्षा हेतु हाथ फैलाना पड़ता है ।अल्प कुपोषित बच्चें भी मानवता के लिए अनुपयुक्त सावित होते हैं, तो पूर्ण कुपोषितों का तो कहना ही क्या । अतः कुपोषण सिर्फ व्यक्ति को ही नहीं, अपितु परिवार, समाज, राष्ट्र और पूरे विश्व को प्रभवित कर नकारात्मकता की ओर, अशांति और विनाश की ओर धकेल देता है ।
कुपोषण से बचने के लिए इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक लगता है । छोटा परिवार हो, पोषण शिक्षा की व्यवस्था किया जाय, साफ और स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो, नियमित भोजन के साथ शौचालय का प्रयोग हो, ठीक समय पर टीकाकरण किया जाय, सन्तुलित भोजन के साथ ही वैज्ञानिक पाक विधि का प्रयोग हो, नित्य व्यायाम और २१ वर्ष के वाद ही वैवाहिक कार्यक्रम की व्यबस्था की जाय तो बहुत हदतक हम कुपोषण और बीमारियों से बच सकते हैं ।
कुपोषण को महंगे गाडी और होटलों में आराम पÞmरमाते हुए किए जा रहे कार्यक्रमों और विचार गोष्ठियो के नामपर करोड़ों का बजट स्वाहा करने से नहीं रोका जा सकता । इसके लिए मजबूत जन समर्पण और निष्पक्ष पहल की आवश्यकता है । जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये कड़ा और दूरगामी नीतियां निर्धारित नहीं होगी, भ्रष्टाचारियों के विशेष न्यायालय के तहत अविलम्ब कड़ी से कड़ी सजा का निर्माण नहीं होगा तबतक कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है ।
नोट ः मानव मात्र के विकास और कल्याण के लिए एक सुयोग्य, इमानदार, कर्मठ और दूरगामी सोच से संम्पन्न सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय भाव से भावित व्यक्ति ही देश और नागरिक का समुचित विकास कर सकता है ।
इस लेख को तथ्यमूलक बनाने में सहयोग कर्ता श्री ब्रजेस कुमार झा जो पिछले १० वर्षो से पोषण पर काम करते आ रहे हैं, वो हाल में महोत्तरी के जिला बहु क्षेत्रीय पोषण योजना के संयोजक रूप में कार्यरत हैं । तथा शिक्षिका रेखा कुमारी राय जिन्होंने महिला और बालबालिका सम्बन्धी विशेष जानकारी उपलब्ध कराई है । उन दोनों को विशेष धन्यवाद !

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