Tue. Sep 25th, 2018

राजकीय कामकाज की भाषा ः कहाँ क्या हो ?

संविधान सम्मत तथ्य है कि नेपाल एक राज्य तो है लेकिन एक ही राष्ट्र नहीं

खास कर प्रदेश नं. २ में तीन खेमे दिखते हैं । कुछ उग्र मैथिलों ने इसकी पहली शुरुआत की है । कुछ दिवालिया प्राज्ञिक मंडले लोग भी इसमें शामिल हैं । उनके अनुसार प्रदेश का नाम मिथिला और प्रादेशिक कामकाज की भाषा मैथिली होनी चाहिए शायद !

गोपाल ठाकुर
यह सर्वविदित है कि इस संविधान को मुकुट–विहीन महाराजाओं के खस–गोर्खा साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिए लाया गया है । इस विषय पर बहस जारी है । राज्य की कामकाज की भाषा के विषय पर यह संविधान पुरातन निरंतरता ही है । फिर भी दोषी दिमाग जब भी सशंकित होता है, इस कथन को इस संविधान ने भी कहीं–कहीं पर आत्मसात किया है । भाषा व्यवस्थापन के विषय पर कुछ बात इस संविधान में भी उनके चंगुल से बाहर आ गया है ।
नेपाल में बोली जाने वाली सभी मातृभाषाएँ राष्ट्रभाषा हैं (धारा ६, नेपाल का संविधान) । संवैधानिक प्रावधान के अनुसार नेपाल में १२३ राष्ट्रभाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया है । यानी यह धारा स्वीकार करती है कि नेपाल विभिन्न राष्ट्रों का एक संगठित रूप है । इसलिए यह संविधान सम्मत तथ्य है कि नेपाल एक राज्य तो है लेकिन एक ही राष्ट्र नहीं
फिर भी अपनी विरासत को कायम रखने के लिए सरकारी कामकाज की भाषा के विषय पर इस संविधान का चरित्र धारा (७–१) में साम्राज्यवादी शासकीय चरित्र ही दिखता है ः देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली नेपाली भाषा नेपाल की सरकारी कामकाज की भाषा होगी । यह वाक्य इससे पहले के संविधानों में कामकाजी भाषा के बारे में जो वाक्य लिखा जाता था उसी की निरंतरता है । जी हाँ, इसने सामंती साम्राज्य को अर्ध सामंती अर्ध पूँजीवादी वर्णसंकर साम्राज्य में परिणत जरूर किया है । इससे पहले मैं उद्घोष कर चुका हूँ कि यह संविधान ना संघीयता, ना गणतंत्र, ना लोकतंत्र कुछ का भी संरक्षण करने की हैसियत नहीं रखता ।
इसके साथ ही प्रदेश नं. २ के साथ साथ मधेशी भूभाग सम्मिलित अन्य प्रदेशों में राज्य की कामकाजी भाषा संबंधी विवाद सतह में आया दिखता है । यह भी अपने–आप में अल्पज्ञता का नमूना लगता है । केंद्र में यानी संघीय कामकाज की भाषा शासकों की एक मात्र तथाकथित नेपाली भाषा ही क्यों होगी ? इस विषय पर खसेतर सामंत क्यों नहीं बोलते हैं ? भाषा अभियंताओं को भी मौन देखा जा रहा है । इसका कारण यह है कि अब यह मधेश और मधेशी के अलावा अन्य राष्ट्रीयताओं के सरोकार का विषय नहीं है शायद । यह भी समन्यायिक नहीं है । गैर–मधेशियों के लिए भी समन्यायिक नहीं है । यह इसलिए कि मधेशियों की मातृभाषा के रूप में रही मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारी, संथाल, राजवंशी, दनुवार, ताजपुरिया आदि भाषाओं का तो राजशाही भी कुछ खास नहीं बिगाड़ सकी तो अब किसकी क्या ताकत ? हाँ, यदि क्षतविक्षत हुई हैं तो गैरमधेशी जनजातियों की भाषा, संस्कृति, जीवनशैली को करीब–करीब समाप्त कर कथित ‘नेपाली’ लिवास में सजाने में शासकों ने बहुत हद तक सफलता जरूर प्राप्त की है ।
रही बात कथित मधेशवादी नव महाराजाओं की, तो वे ही हैं हमारे दादे के जमाने में जमींदार होकर शोषण करने वाले, हमारे पिता के समय में पंच होकर शोषण करने वाले और अभी कथित मधेशवादी होकर आम मधेशियों की शहादत पर अपने समधी, समधन, पत्नी, प्रेमिकाओं को नजराना के रूप में राजनीतिक पद–प्रतिष्ठा का चरम दुरूपयोग करने वाले कलंकित चेहरे ! ये किसी समय कैसा भी कुकर्म करने में नहीं शरमाते ! नारायणहिटी से सिंहदरबार तक की इनकी स्वामीभक्ति का परिणाम है यह निकृष्ट संविधान !
उस समय कोई कोइराला भक्त तो कोई ओली भक्त होता आम मधेशियों को सीमा–नाका पर छोड़कर सिंहदरबार में पैठ जमाने वाले यही एहशान फरामोश लोग थे । अभी भी प्रदेश की राजधानी, कामकाज की भाषा के बारे में आम जनता की तह में जारी विवादों पर ये नहीं बोलते । नहीं बोलने की कुत्सित मंशा यह है कि ये सिंहदरबार के निर्णय को अंतःस्करण से शिरोधार्य करेंगे और बाह्य रूप में मधेश में विमति जताते हुए अपनी रोटी सेकने या गोटी फिट के लिए कुछ दशक और दुरूपयोग करेंगे । क्योंकि अब तक की इनकी विशेषता ही यही है ।
रही बात प्रदेशों की राजधानी और कामकाजी भाषा के विवाद को सुलझाने का, तो सब से पहले ये प्रदेश तो राजशाही द्वारा बनाये गए पाँच विकास क्षेत्र से अधिक अर्थपूर्ण तो हैं ही नहीं । इसलिए समग्र मधेश एक प्रदेश के साथ साथ राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार सहित राष्ट्रीय पहचान पर आधारित प्रदेश निर्माण के लिए नई उँचाई पर संघर्ष उठाने का विकल्प नहीं है । किंतु यह कहने मात्र से फिलहाल नहीं भी उठ सकता है । इसलिए अभी संविधान प्रदत्त अधिकारों को संस्थागत करते जाने का रास्ता भी अख्तियार किया जा सकता है । इसके लिए प्रदेश सभा के दो–तिहाई बहुमत के निर्णय अनुरूप सैद्धांतिक रूप में राजधानी तय करने के संवैधानिक अधिकार का प्रदेश सभा उपयोग कर सके तो बेहतर है । यदि ऐसा नहीं कर पाने की परिस्थिति आई तो प्रदेश के दो–तीन शहरों में राजधानी के अधिकारों को प्रत्यायोजित करते हुए भी इस विवाद को सुलझाया जा सकता है ।
कामकाज की भाषा के विषय पर भी केंद्रीय अर्थात् संघीय स्तर पर ही राज्य को बहुभाषिक बनाने के लिए सभी भाषा–अधिकारकर्मियों को आज ही से लगना लाजÞमी होगा । किंतु इस विषय पर इस निकृष्ट संविधान के मौन रहने के कारण कुछ अधिक बल लगाना पड़ सकता है । ठीक इसके विपरीत संविधान की धारा (७–२) ऐसा कहती है–
नेपाली भाषा के अतिरिक्त प्रदेश अपने प्रदेश के भीतर बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली जाने वाली एक या एक से अधिक अन्य राष्ट्रभाषाओं को प्रदेश कानून के तहत प्रदेश की सरकारी कामकाज की भाषा निर्धारण कर सकता है ।
संविधान निकृष्ट होने के बावजूद प्रादेशिक स्तर पर हल्का ही सही उदार जरूर है । इस संवैधानिक उदारता का हम उपयोग कर सकें तो बेहतर है । इसके लिए सब से पहले संविधान की इस धारा से जोड़ कर प्रदेश सभा से प्रादेशिक कानून बनाना अत्यावश्यक है । इसके बाद कथित ‘नेपाली’ के अलावा कितनी भाषाओं को सरकारी कामकाज में लाया जा सकता है, उतनी भाषाओं के बारे में निर्णय कर अधिक सहज होने की स्थिति है । यह संविधान तो इसलिए भी निकृष्ट है कि संविधान अगर किसी भाषा को राज्य से जोड़ता है और किसी को तोड़ता है तो यही निकृष्टता है । जनता की आवश्यकता को देखते हुए राज्य को भाषा प्रयोग की नीति लेनी चाहिए ।
किंतु इस विषय पर प्रादेशिक स्तर पर ही अनावश्यक विवाद हो रहा है । खास कर प्रदेश नं. २ में तीन खेमे दिखते हैं । कुछ उग्र मैथिलों ने इसकी पहली शुरुआत की है । कुछ दिवालिया प्राज्ञिक मंडले लोग भी इसमें शामिल हैं । उनके अनुसार प्रदेश का नाम मिथिला और प्रादेशिक कामकाज की भाषा मैथिली होनी चाहिए शायद ! किंतु उन्हें थोड़ी लज्जा जरुर आनी चाहिए कथित नेपाली के नाम पर खस–गोर्खा महाराजाओं के महेंद्रीय मंडले कुकृत्य को प्रदेश नं. २ में मिथिला और मैथिली के नाम पर करते वक्त । क्या इसका प्रतिरोध नहीं होगा ? जरूर होगा, भोजपुरी भाषियों ने भी भोजपुरी की मांग कर रखी है, तो हिंदी के पक्ष में भी अच्छा ही जनमत है । किंतु ये अभियंता किसी एक ही भाषा के पक्ष में क्यों लगे हैं ? देश की ही दूसरी राष्ट्राभाषा मैथिली, तीसरी भोजपुरी और आम संपर्क की भाषा के रूप में हिंदी तथा आवश्यकता अनुसार अन्य राष्ट्रभाषाओं को भी कामकाजी बनाया जाए तो हमारे पारंपरिक शासकों के अलावा नुकसान किसे पहुँचेगा ? लेकिन मिथिला के इतिहास के नाम पर केवल मैथिली, इसके विरोध में केवल भोजपुरी और नेपाल की ही दूसरी संपर्क भाषा के रूप में केवल हिंदी की ही बात करना एक तरह का मंडले चरित्र प्रदर्शन ही है । जहाँ तक प्रदेश नं. २ का नामकरण का सवाल है, इसे पूर्वी मधेश कह कर आगे बढ़े तो कोई अंतर नहीं दिखता । क्योंकि समग्र मधेश एक प्रदेश जब तक नहीं बनता, ‘मधेश’ कहना उपयुक्त नहीं दिखता तो मिथिला या भोजपुरा या अन्य किसी आंशिक नाम के समग्रता को नहीं समेटता ।
अतः वस्तुस्थिति के अनुसार राजनीतिक निचोड़ निकालता हुआ हमारी ही भूमि से निकला ‘बसुधैव कुटुम्बकं’ या सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद का सिखाया ‘मनुष्य की अंतर्राष्ट्रीय जाति’ निर्माण का अग्रगामी मार्गचित्र शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व में ही संभव है ।

वाणस्थली, चंद्रागिरि–७, काठमाड़ो ।
फेब्रुअरी ३, २०१८

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