Thu. Jan 17th, 2019

शतायु कविवर घिमिरेः एक शब्दचित्र : डा. तुलसी भट्टराई

माधवप्रसाद घिमिरे (साहित्यकार)

 

यहाँ पर उनके ही शब्दों द्वारा अभिनन्दन किया जायः
गाउँछ गीत नेपाली ज्योतिको पंख उचाली
जय, जय जय हे नेपाल सुन्दर शान्त विशाल
सुन्दर शान्त विशाल. ।
गण्डकी, कोशी, कर्णाली, मेची र महाकाली
लेक र बेंसी ब्युँझाउँछन् लहर लाखौं उचाली
गाउँछ गीत नेपाली. ।

हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018,शताब्दी पुरुष कविवर घिमिरे जी के बारे मे लिखना कठिन कार्य है । इन सौ सालों में उनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है । तब नया–क्या लिखा जाय । दर्जनों अभिनन्दन ग्रन्थ दर्जनों विशेषांक एवं असंख्य लेख रचना उनके बारे में प्रकाशित हो चुके हैं । कइ शोधार्थी श्री घिमिरे के साहित्यिक कर्म के सम्बन्ध में पी.एच.डी कर चुके हैं । दर्जनों शोधार्थी स्नातकोत्तर तह में शोधपत्र लिख चुके हैं । पोखरा के प्राध्यापक माधव वियोगी ने तो राष्ट्रकवि पर विशालकाय महाकाव्य ही लिखा है । मुझे लगता है, अब राष्ट्रकवि के बारे में लिखने का विषय ही नहीँ है । अब उनके उपर जो भी लिखा जाय सब दुसरों का अनुकरण सा होगा ।

घिमिरे जी का जन्म वि.सं. १९७६ असोज ७ गते (ई.सं. १९१९ सेप्टेम्बर २३) लमजुङ जिला के पुस्तुन गाव में हुआ था । इनके पिता गौरीशंकर एवं माता का नाम द्रौपदी देवी था । इनकी पहली पत्नी गौरी २२ साल की उम्र में शान्ति और कान्ति दो पुत्रियों को जन्म देकर दिवंगत हो गयी । फिर दूसरी कन्या महाकाली से विवाह हुआ । महाकाली की ओर से चार पुत्रियाँ मन्जु, उषा, किरण एवं ज्योति तथा दो पुत्र इन्दीवर एवं राजीव हैं । पुत्रियों एवं दोनों पुत्रों की सेवा कवि जी को प्राप्त है । यह था राष्ट्रकवि का पारिवारिक सन्दर्भ ।
स्नातक तहका अध्ययन पूरा करने के बाद घिमिरेजी ने कुछ समय तक अपने ही गाव क्षेत्र के विद्यालय में अध्यापन किया । वि.सं. १९९९ में वे राजधानी काठमाडौं में अपने जीवन की सार्थकता ढूँढने के लिए आ गये । भाषानुवाद परिषद में उनको नौकरी मिल गयी । तीन ताल बाद गोरखा पत्र में सहायक सम्पादक बने । वे अभी ठीक से अपने पैर पर खडेÞ भी नहीं हुये थे, उसी वक्त पत्नी गौरी का निधन हुआ ।
पत्नी गौरी के निधन के बाद गोरखापत्र की नौकरी छोड़कर अपने गाँव में रहने लगे । वहीं पर आधार शिक्षा लमजुङ के प्रधानाध्यापक बन गये । करीव ८ वर्ष इन्होंने शिक्षण क्षेत्र में बिताया । कॉलेज ऑफ एजुकेशन में प्रशिक्षक के रूप में काम करते वक्त वे कुछ लिखने और प्रकाशन करन लगे थे । पत्नी गौरी के वियोग मे गौरी नामक काव्य लिख चुके थे । कवि गोष्ठियों में कविताएँ सुनाया करते थे । उस समय राजा महेन्द्र से भी दो–एक बार दर्शन भेट कर चुके थे ।

वि.सं. २०१४ में गठित तत्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान में श्री घिमिरे सदस्य पद में नियुक्त हुए । राजा महेन्द्र स्वयं प्रतिष्ठान के कुलपति थे । २०२६ तक वे सदस्य बने रहे । २०३६–२०४५ तक १० वर्ष अर्थात् दो कार्यकाल उपकुलपति बने । फिर २०४५–२०४७ तक कुलपति पद पर आसीन हुये । २०५९ में राजपरिषद् के सदस्य के रूप में भी स्थापित हुए । अर्थात् श्री घिमिरे राष्ट्र के अत्युच्च पद प्राप्त करने में सफल हुये । इनको अपने जीवन में पीछे की ओर मुड़कर देखना नही पड़ा । आगे ही बढ़ते रहे ।
एक दर्जन से अधिक विभिन्न संघ संस्थाओं से उनकी आवद्धता है । मान, सम्मान, पुरस्कार, अभिनन्दन की बाते करें तो कम से कम एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है । गिना जाय तो एक हजार के करीव होंगे सभी छोटे बडेÞ पुरस्कारों सम्मानों का विवरण ।
फिर भी घिमिरे जी को मिले कुछ प्रमुख पदक, मान और पुरस्कारो ंकी तो चर्चा करनी ही होगी । जैसे श्री ५ वीरेन्द्र शुभराज्याभिषेक पदक २०३१, सुप्रसिद्ध गोरखा, दक्षिणबाहु प्रथम २०५६, महाउज्वल राष्ट्रदीप प्रथम २०७५, नेपाली सेना का मानार्थ सहायक रथी २०७४, त्रिभुवन विश्वविद्यालय से महाविद्यावारिधि २०७२, रथारोहण एवं नागरिक अभिनन्दन २०६० एवं २०७५, राष्ट्रकवि की उपाधि २०६०, राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार २०५९, भूपालमान सिंह कार्की पुरस्कार २०५६, साझा पुरस्कार २०५४, २०५८, आदिकवि भानुभक्त पुरस्कार २०५२, सीताराम साहित्य पुरस्कार २०५१, सीताराम साहित्य पुरस्कार २०५१, मातली मंगले नाटक के लिए राजा वीरेन्द्र के द्वारा विशेष पुरस्कार २०३८, त्रिभुवन प्रज्ञा पुरस्कार २०३५ ।
श्री घिमिरे को नेपाल सरकार की ओर से राष्ट्रकवि उपाधि के साथ–साथ आजीविका की व्यवस्था भी है । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान के वे आजीवन प्राज्ञ हैं । इतना कुछ लिखने पर भी इनके काव्य, कविता एवं रचनाओं के बारे में तो उल्लेख ही नहीं हो पाया है । श्री घिमिरे की पहली कविता ज्ञानपुष्य शीर्षक में वि.सं. १९९२ के गोरखापत्र में छपी थी । उसके वाद उनकी कविताएँ पत्रपत्रिकाओं में निरन्तर छपती रही ।
कृति के रूप में घाम पानी, बाल लहरी, सुन पंखी चरी, बिजुला र बिजुले नाम से बालसाहित्य के चार कृति प्रकाशित हैं । उन के काव्यों में नवमन्जरी, गौरी, राजेश्वरी, राष्ट्र निर्माता, इन्द्रकुमारी, राहुल यशोधरा ये छः मुख्य है ।
गीति नाटकों में शकुन्तला, मालती मंगले, विषकन्या, हिमालपारि हिमालवारि, देउकी, बालकुमारी एवं अश्वत्थामा प्रकाशित है । अश्वत्थामा नाटक अंग्रेजी में अनूदित हुआ है । इस कृति को नोबेल पुरस्कार कमिटी जेनेवा में भी भेजा गया था ।
इनके कविता संग्रह हैं–चैत वैशाख, आफ्नै बाँसुरी आफ्नै गीत, चारु चर्चा एवं गीत संग्रह । एक कथासंग्रह भी है–मनचिन्ते मुरली । श्री घिमिरे ने नागानन्द संस्कृत नाटक एवं दुर्गा सप्तशती संस्कृत से नेपाली मे अनुवाद किया है । सम्पादन कला में भी श्री घिमिरे का अच्छा योगदान रहा है । इन्होंने इन्द्रेणी, और कविता दो पत्रिकाओं का संपादन किया है । पच्चीस वर्ष का खण्डकाव्य का भी सम्पादन किया था ।
श्री घिमिरे का एक महाकाव्य भी प्रकाशोन्मुख है । सम्भवतः इसी शताब्दी वर्ष के अन्दर प्रकाशित होगा । करीव तीन दशक से इस महाकाव्य पर कलम चलाते आये हैं । श्री घिमिरे स्वयं के कथनानुसार यह अपने ही ढंग का विशिष्ट महाकाव्य होगा । इस महाकाव्य का नाम है–ऋतम्भरा 
कविवर घिमिरे राष्ट्रवादी कवि है । राष्ट्रीय चेतना के कवि है । नेपाल और नेपाली के पक्ष में, राष्ट्रीयता के पक्ष में लिखते हैं । शताब्दी पुरुष घिमिरे जी में आधुनिक–अत्याधुनिक चेतना और जागरणशील चिन्तन है ।
श्री घिमिरे प्रकृतिप्रेमी तथा प्रकृतिपूजक कवि हैं । हिमाल, पहाड़, पशुपक्षी आदि इनकी कविता के बिम्ब हैं । वे मूलतः हिमाली कवि अर्थात् प्रकृतिपरक कवि हैं । राष्ट्रीयता और स्वाधीनता इन्हें प्रिय है । वे अपनी कविता में सटीक तरह के और मार्मिक भाव व्यक्त करते हैं ।
घिमिरेजी की कविताओं में मानवतावाद, भ्रातृभाव, विश्वबन्धुत्व की भावना व्याप्त है । उनकी कविता मे विविध रस, ध्वनि एवं अलंकार का प्रयोग हुआ है । बालबालिकाओं से लेकर युवा, प्रौढ, एवं बृद्धों तक सभी प्रकार के पाठकों के लिए इन की कवितायें पठनीय हैं । इन्हें छन्दवादी कवि के रूप में पुकारा जाता है ।
श्री घिमिरे प्रेरक कवि हैं । इनकी कविताओं में मिट्टी की सुवास है । आशा, विश्वास और जीवन्त भाव परिपूर्ण है । वैसे श्री घिमिरे को क्लासिक कवि के रूप में विश्लेषण करने वाले समालोचक भी हैं ।
कई समीक्षक श्री घिमिरे को काव्य के पारखी कवि मानते हैं । सांस्कृतिक चेतना के केन्द्र कवि के रूप में स्वीकार करते हैं । वे काव्यशास्त्र के कवि है । शब्द, अर्थ और भाव के संयोजन से उत्कृष्ट कविता का रचना करना उनकी विशेषता है ।

‘बुढेससम्मन् पनि ज्यून जानौं
यो जीवनीको रस प्यून जानौं ।’
– राष्ट्रकवि घिमिरे

राष्ट्रकवि माधव घिमिरे का शताब्दी जन्मोत्सव वर्ष चल रहा है । शताब्दी कवि घिमिरे का अभिनन्दन, सम्मान एवं गोष्ठी सभाओं के आयोजन हो रहे हैं । लैनचौरस्थित उनके निवास पर शताब्दी कवि के दर्शन के लिए प्रतिदिन लोगों का तांता लगा रहता है ।
राष्ट्रकवि घिमिरे पत्नी महाकाली के साथ बैठककक्ष में बैठकर मधुर मुस्कान के साथ लोगों का स्वागत सम्मान ग्रहण करते हैं । उपर की पंक्तियाँ–वृद्धावस्था तक जीने की कला और जीवन का आनन्द ग्रहण करने की कला होना चाहिए । यह बात घिमिरे के जीवन की सार्थकता लगती हैं ।
कवि निवास में रौनक छाया हुआ है । एक बड़ा सा कमरा उनके मान सम्मान, पदक, अभिनन्दन से सजा हुआ है । यह कमरा भी देखने लायक है ।
मानव जीवन के लिए निर्धारित आयु सीमा सौ साल है । श्री घिमिरे यह निर्धारित आयु प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं । शताब्दी आयु प्राप्त व्यक्ति देवत्व की श्रेणी में पहुंचता है । अर्थात् शताब्दी मनुष्य देवतुल्य कहलाता है । शताब्दी मनुष्य का आशीर्वाद भी फलदायी होता है ।
यहाँ पर उनके ही शब्दों द्वारा अभिनन्दन किया जायः
गाउँछ गीत नेपाली ज्योतिको पंख उचाली
जय, जय जय हे नेपाल सुन्दर शान्त विशाल
सुन्दर शान्त विशाल. ।
गण्डकी, कोशी, कर्णाली, मेची र महाकाली
लेक र बेंसी ब्युँझाउँछन् लहर लाखौं उचाली
गाउँछ गीत नेपाली. ।

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