Fri. Sep 21st, 2018

किसी वक्त संविधान के प्रस्तावना से ले कर अनुसूची तक संशोधन के लिए आवाज उठाने वाले मधेशवादी दल अभी काठमाण्डौ में सरकार निर्माण के भूलभुलैया में फंसे दिख रहे हैं और नागरिकता पीडि़त सिडीओ के दफ्तर मे भटकने को मजबूर है ।


चुनावी बुखार अचानक से मधेशवादियों को इस तरह से जकड़ लिया कि उस के कारण आज मधेश आठ जिलों में सीमित हो गया है

किसी राजनीतिक दल ने मधेश आन्दोलन का शंखनाद नही किया था । यह आन्दोलन मधेशी जनता ने किया था । सदियों से दबे आक्रोस का स्व–विस्फोटन था वह आन्दोलन । तत्कालीन मधेशी जनअधिकार फोरम के संयोजक उपेन्द्र यादव ने नेपाल के अन्तरिम संविधान मे संघीयता शब्द का समायोजन न करने के कारण संविधान को काठमाण्डौ के माइतीघरमण्डला में जलाया और उनके गिरफ्तार होने के बाद मधेश मे आन्दोलन ने तीब्रता पायी थी । समग्र मधेश अर्थात झापा से कंचनपुर का मैदानी भाग आन्दोलन के आग मे जल उठा था, सिर्फ अभी का दो नम्बर प्रदेश में सिमटा हुआ मधेश नही ।
तभी से नेपाल में क्षेत्रीय पार्टी के उदय होने की सम्भावना दिखने लगी । तत्कालीन मधेशी जनअधिकार फोरम राजनीतिक दल में तबदील हो गया । उस वक्त नेपाल के राष्ट्रीय दल कहलाने वाले नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले जैसे दलों में रहे मधेशी नेता रातो रात मधेशवादी हो गए । कुछ तो पार्टी परित्याग करके मधेशी जनअधिकार फोरम में आ गए । उस से यह भी स्पष्ट हुआ था कि कथित राष्ट्रीय दल में अधिकार के मामले में वो ‘सफोकेसन’ मे थे । वे न तो कुछ बोल पा रहे थे न बगावत की ताकत थी उनमें । आन्दोलन जब रुकने का नाम नही ले रहा था उसी वक्त तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. गिरिजा प्रसाद कोइराला ने देश के नाम सम्बोधन कर आन्दोलन को रोकने का आगाज किया था परंतु वैसा हुआ नहीं और अन्त में मधेशी जनअधिकार फोरम के साथ राज्य को २२ बुंदे लिखित सम्झौता करना पड़ा । जिस सम्झौता में मधेशी आन्दोलनकारियाें की तरफ से फोरम के संयोजक उपेन्द्र यादव ने हस्ताक्षर किया ।
गौरतलब है कि आन्दोलन फिर भी नही रुका और नेपाली कांग्रेस मे अपना उर्जावान समय गवा चुके महंथ ठाकुर के नेतृत्व मे गठित तत्कालीन तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी का गठन हुआ और साथ मे मधेश के नाम पर सदाबहार राजनीति करते आ रहे नेपाल सदभावना पार्टी संयुक्त रूप मे आन्दोलन के अखाडेÞ में उतर गए । ५४ मधेशी की शहादत के बाद फिर एक बार तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला के साथ ८ बुंदे लिखित सम्झौता के बाद मधेश आन्दोलन का अल्प विराम हुआ था ।
नेपाल हुए ऐतिहासिक प्रथम संविधानसभा के चुनाव में मधेशवादी दलों ने भी अपना हिस्सा दिखाया । संख्यात्मक हिसाब से ठीकठाक सीटों पर अपनी जीत दर्ज की । परंतु वह क्रान्ति और जीत फलित नही हो पायी । सिंहदरबार में अपना स्थान सुनिश्चितता के लिए केवल संघर्ष नहीं किया इनलोगों ने अपितु कई भागों में मे विभाजित भी हो गए । और संगठनिक हिसाब से ‘प्यारालाइज्ड’ हो गए । फलस्वरूप दूसरे संविधानसभा के चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा मधेशवादी दलों को, जो ५४ शहीद हुए थे उन की कुरबानियों की भी लाज नही रख पाए और आम जनता की नजराें से गिर गए ।
दूसरे संविधानसभा चुनाव के बाद संविधान निर्माण प्रक्रिया के दौरान फिर आन्दोलन का आगाज हुआ मधेशवादी दलों के द्वारा कुछ इस तरह कि, लोगों की नजरों में मधेश आन्दोलन का वो पर्यायवाची शब्द सा बन गए । वैसे तो मधेश आन्दोलन का वृतान्त किसी एक लेख में समेटना सम्भव नही है । परंतु आन्दोलन के ग्यारह बर्ष पूरा होने के बाद आखिर मधेश ने क्या प्राप्त कर पाया और क्या गवाया, इस पर संक्षेप में चर्चा करने का प्रयास किया गया है इस आलेख में ।
यह मधेश आन्दोलन की ही देन है कि ‘मधेश’ शब्द का अन्तराष्ट्रीयकरण हो पाया । मधेश और मधेशी क्या है जगत के सारे लोग जान पाए हैं । जबकि पिछले वक्त से मधेश को तराई कहा जाता था और मधेश को स्वीकारने में गैर मधेशी लोग अग्रपंक्ति में हुआ करते थे । जबकि तराई फकत भुगोल को चित्रित करता है और मधेश पहचान को । गजेन्द्रनारायण सिंह, बेदानन्द झा और बाबा राम जनम तिवारी जैसे मधेश के पक्ष में वकालतकर्ताओं की संघीयता का ‘रोडम्याप’ को मुर्त रूप दिलाने मे सम्भव हुआ । यद्पि संघीयता का अर्थपूर्ण अवतरण नही करवा पाए । न ही मधेश द्वारा खोजा गया पहचान मिली । इस संघीयता से न तो सम्पन्नता का आधार ही दिख रहा है न पहचान की । उसी तरह तत्कालीन माओवादियों ने समावेशी समानुपातिक मुद्दा को उठाया था परंतु मधेश आन्दोलन की ही देन है सरकार को बाध्य होकर संविधान मे समावेशी समानुपातिक को स्थापना करना पड़ा । लेकिन नेपाल के शासक वर्गों ने नेपाल के खस—आर्य जो कि हरेक हिसाब से सम्पन्न हैं उनको सबसे ज्यादा आरक्षण दे कर समावेशी समानाुपातिक जैसे आदर्श सिद्घान्त पर कुठाराघात किया है । इस मुद्दे पर माओवादी की चुप्पी लाजमी है परंतु मधेशवादी दलों की चुप्पी लज्जास्पद है ।
एक अहम उपलब्धि ही है कि पिछले मधेश आन्दोलन अर्थात सन् २०१५ मे किये गए मधेश आन्दोलन मे मारे जाने वाले और घायल आन्दोलनकारियों को न्याय सहित उचित क्षतिपुर्ती के लिए नेपाल सरकार से किए गए तीन बुंदे समझौता के तहत एक उच्च स्तरीय छानबीन आयोग का गठन करवा पाया । सन् २००७÷०८ में नेपाल सरकार द्वारा किए गए मधेशियाें की हत्याओं की कोई छानबीन नहीं हो पायी थी । परंतु मधेश उच्च स्तरीय आयोग अपना अनुसंधनात्मक प्रतिवेदन नेपाल सरकार को सौंप चुका है परंतु उसको सार्वजनिक और लागु करबाने के लिए मधेशवादी दलो के द्वारा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मधेशवादी दल अभी सरकार बनाने में पूर्णतः व्यस्त है । अगर ऐसा है तो यह कालान्तर में उन को दर्द और पछतावे के सिवा कुछ नहीं मिलेगा ।
मधेश आन्दोलन की ही देन है कि मधेश अब राजनितिक हिसाब से सचेत हुआ है । अब सरकार के द्वारा सीमांतकृत वर्ग के विरुद्घ किया गया कोई भी विभेदकारी निर्णय हो उस में अपना हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाने से मुकरते नहीं । दर्जनो मधेशी कलमवाज युवा तैयार हो चुके हंै मधेश मे ं। परंतु रणनीतिक हिसाब से मधेशवादी नेताओ में चेतना का उतना विकास नही हो पाया है । सिस को बया करता है नेपाल में कानून न बन पाने के कारण मधेशियाें को नागरिकताविहीन की समस्या झेलनी पड़ रही है । जी हाँ, दर्जनाें कानून बनना बाकी है संविधान घोषणा पश्चात । गौरतलब है कि मधेश में नागरिकता की समस्या सदियों से है । मधेश आन्दोलन के दौरान मधेशियाें को सपना दिखाया गया था कि नागरिकता विहीनता की अवस्था का सामना अब मधेशी को नहीं करना पड़ेगा । अभी नेपाल के संविधान के धारा ११ (३) में कहा गया है कि जन्मसिद्ध नागरिक की सन्तान जिस के माँ और बाप दोनो नेपाली नागरिक हैं उनके सन्तान को नेपाल का वंशज नागरिकता दिया जाएगा । यह एक बाध्यात्मक संबैधानिक व्यवस्था है । फिर भी प्रमुख जिला अधिकारी (सिडिओ) का कहना है कि जब तक संघीय कानून नहीं बन जाता तब तक हम लोग नागरिकता नहीं दे सकते । परंतु नागरिकता के इस जटिलता को सुलझाने के लिए मधेशवादी दल की तरफ से कोई भी पहल नही हो रहा है ।
किसी वक्त संविधान के प्रस्तावना से ले कर अनुसूची तक संशोधन के लिए आवाज उठाने वाले मधेशवादी दल अभी काठमाण्डौ में सरकार निर्माण के भूलभुलैया में फंसे दिख रहे हैं और नागरिकता पीडि़त सिडीओ के दफ्तर मे भटकने को मजबूर है ।
पिछला मधेश आन्दोलन विश्व की नजर अपनी ओर आकर्षित करने मे सफल हुआ था । जिसका कारण था आन्दोलन के दौरान की गई मधेशियों की हत्या और मधेशवादी दल के द्वारा नेपाल भारत सीमा पर की गई नाकाकस्सी । लगभग छ महीनाें तक नेपाल भारत सीमा बीच अवस्थित नोम्यान्स ल्याण्ड पर किए गए धरना और आन्दोलन के कारण दोनो देश के बीच व्यापार तो प्रभावित हुआ ही था उस के कारण नेपाल और भारत के बीच कूटनीतिक सम्बन्धाें पर भी जोरदार धक्का लगा और जिस उदेश्य के कारण नाका पर आन्दोलन किया गया वह भी सफल नही हुआ और नाहक में मधेश को बदनामी का जहर पीना पड़ा । नाटकीय ढंग से नोम्यान्सलेन्ड से आन्दोलन को समाप्त किया गया ।
अजीब हालात है मधेशी राजनीति की । जिस संविधान को न मानने की कसम खायी थी मधेशवादियो ने उसी संविधान को स्वीकार कर चुनाव में भी सहभागी हुए । संघीय समाजवादी फोरम पहले और राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल बाद में । चुनावी बुखार अचानक से मधेशवादियों को इस तरह से जकड़ लिया कि उस के कारण आज मधेश आठ जिलों में सीमित हो गया है । यह आमजन का मानना है । आठ जिला यानि प्रदेश—२ जहाँ मधेशीवादी दल आज मधेश सरकार बनाकर अपना खोखला विजय का परचंम लहराने को आतुर दिख रहा है । आन्दोलन के वक्त समग्र मधेह दो प्रदेश के नारा लगाने वाले मधेशवादी दल मधेश के पुर्वी और पश्चिमी दोनो भाग मे संगठनिक लंगड़ापन का शिकार हो चुके हैं ।
अब देखना यह है कि मधेशवादी दल आठ जिला वाले प्रदेश में सिमट कर मनोरंजित रहेंगे या मधेश का अपना पुराना पूरब से पश्चिम तक का चार किल्ला को स्थापित कर पाएंगे ? ऐसे में जरुरी है मधेश के नागरिक समाज, पत्रकार एवं सचेत नागरिक सभी को मधेशवादी नेताओ को आइना दिखाते रहना चाहिए ।
उपर उल्लेखित विश्लेषण में एक भी ऐसी उपलब्धि ऐसी नहीं है जो पूर्ण है । यह तकलीफ देने वाला तथ्य है । क्या बीतता होगा उन परिवारों पर जिसने अपनो को खोया मधेश को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए ? इस आलेख को विराम देने से पहले मैं सारे महान शहीदां के प्रति हार्दिक श्रद्धा सुमन अर्पण करते हुए कहना चाहता हूँ कि मधेश की लड़ाई अभी भी जिन्दा है । शहीदाें ने जो सपना देखा था उस को पूरा करने के लिए दिनरात ईमानदार प्रयास करना होगा सभी को अपनी–अपनी जगह से । यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धान्जली होगी ।

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