Wed. Nov 21st, 2018

द्वन्द्व की सम्भावना बढ़ रही है : उपेन्द्र झा

मधेश के २२ जिलों से एकमुष्ट उठने वाले विरोध के स्वर को अब छिन्न भिन्न कर दिया गया है । अब जबकि सब अपने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सिमट गए हैं, पश्चिम के प्रदेशों में संघीयता खारेजी की माँग उठने लगी है । संघीयता का नकारात्मक बहस करा कर सरकार ने देश में अच्छा खासा जनमत तैयार कर लिया था

उपेन्द्र झा, अप्रैल २०१८ अंक, हिमालिनी | राज्यविहीनता की अवस्था में पीड़ा भोग रहे बहुमत जनसंख्या वाले समुदाय ने अपने बलिदानी संघर्ष के माध्यम से संघीय प्रणाली की स्थापना करके परम्परागत विभेदकारी राज्यसत्ता में बदलाव तो लाया, इस आशा और विश्वास के साथ कि जनता को एक बेहतर जीवन शैली मिल सके । किन्तु जन अपेक्षा पूरा करनेवाली संघीय प्रणाली को इतना विकृत बनाकर पेश किया गया कि यह किसी को गँवारा न हुआ । संघीय प्रणाली में मधेश ६ टुकड़ों में बँट गया । २२ जिलों का मधेश ८ जिलों में सिमट गया । अमृतभोग की चाह में जनता को बिष का कड़वा घूँट पिलाया गया ।
२००७ साल से २०६२ साल तक लड़ी गई लडाईयाँ जिस नाम से भी सम्बोधित हो, पारस्परिक सामन्तों की लड़ाई थीं । वर्गीयसत्ता को खत्म करने के बजाय सिर्फ शासक को बदल कर सत्ता कब्जा करना इनलोगों का अभीष्ट था । जनता का साथ तो शक्ति संचय का माध्यम था । असल में सत्ता के चरित्र को धरोहर के रूप में अक्षुण्ण रखना ही इन के संघर्षों का मूल मन्त्र था । श्रेणीबद्ध सामन्तों की लड़ाई में देश विकास से तो बञ्चित रहा ही, आत्मनिर्भरता के अभाव में स्वाभिमान भी बन्धक रहा । राज्यसत्ता के कुलीन वर्ग सुख और वैभव प्राप्त कर विलासिता की जिन्दगी बसर करते रहे । देश पर–निर्भरता के दलदल में क्रमशः डूबता गया । नेपाली जनता की जिन्दगियाँ अभाव, मँहगाई और फाकाकसी की पीड़ा में कराहती रहीं । फलतः अधिकारवादी आन्दोलन का उदय हुआ । शोषक सामन्तों के विरुद्ध मधेश ०६३ साल में अकल्पनीय रूप से आन्दोलित हुआ तो शासकवर्गों के तोते उड़ गए । समग्र मधेश की एकता से घबराया शासकवर्ग इस घटना की काट का अस्त्र खोजने में जुट गए । चुँकि मधेश की मूल माँग समग्र मधेश एक प्रदेश थी, इस में वर्गीय अस्तित्व खतरे मे जाने के भय से सारी पार्टियों ने पारस्परिक अन्तर्विरोध मिटा कर एकता कर ली । मधेश की आवाज में थारु, आदिवासी÷जनजाति, दलित, महिला, मुस्लिम, अल्पसंख्यक, पिछड़ावर्ग आदि अधिकार माँगने वालोंं की  ऐसी जमात तैयार हुई कि शासकवर्ग बहस के मुद्दों से संघीयता को अलग नहीं कर सका ।
जब संघीय प्रणाली की बहस से ये भाग नहीं सके तब इन्होंने एक दशक तक (०६३–०७३) संघीय प्रणाली का नकारात्मक बहस करा कर ऐसा बिष घोल दिया कि राजनीति ही जहरीला बन गया । संघीयता सबों के लिए अपाच्य हो गया । मधेश की सारी इच्छाओं, आकाँक्षाओं, सम्भावनाओं और अवसरों पर पानी फेरते हुए शासकों ने मधेश को ६ टुकड़ों मे विभक्त कर संघीयता दे दी । यही संघीयता मधेश के लिए प्रत्युत्पादक बन गया । संविधान घोषणा को मधेश ने जहरीला घूँट समझ कर काला दिवस के रूप में मनाया । संविधान के विरोध में मधेशी, जनजाति, थारु सबों का एकत्व विरोध शासक के सामने बड़ी चुनौती थी जिसका सामना करना आसान नहीं था । तत्कालीन के. पी. ओली की सरकार को सिकस्त देने के लिए मधेश ने नाकाबन्दी का कठोर निर्णय लिया तथा अनिश्चितकालीन आन्दोलन को आगे बढ़ाया । देश में हाहाकार की अवस्था खड़ी हो गयी । सरकार आमने सामने नहीं लड़ सकती थी । सरकार ने प्रलोभन का अस्त्र फेंका और मधेश आन्दोलन चारो नाल चित्त हो गया । आन्दोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को पीछे धकेला गया । अगुवा को आगे लाया गया और संविधान कार्यान्वयन का माहौल बनाया गया । विरोध का स्वर शान्त हो गया । सरकार को संविधान कार्यान्वयन के तहत स्थानीय, प्रदेश सभा और प्रतिनिधी सभा के लिए चुनाव करवाना था । बिना विरोध के चुनाव सहज ढंग से सम्पन्न हुआ । एमाले शक्तिशाली पार्टी के रूप में स्थापित हुआ । विरोध करनेवाली नेपाली काँग्रेस, माओवादी, मधेशवादी पार्टियाँ सब देखती रह गयीं और एमाले शीर्ष पार्टी के रूप में उभर कर सामने आयी । एमाले शक्तिशाली पार्टी बनने के बाद माओवादी, एमाले के साथ विलय करने का निर्णय ले चुका है । निकट भविष्य में ही दोनो पार्टियाँ एक हो जायेंगी ।
६ प्रदेश पर अभी बाम गठबन्धनों का कब्जा है । समूचे देश में हंगामा कर रहे मधेशियों को ८ जिलों का एक प्रदेश देकर उन्हें कैद कर दिया गया है । बाँकी भाग के मधेशियों को अपनी पहचान बदलने के लिए बाध्य कर दिया गया है । मधेश के २२ जिलों से एकमुष्ट उठने वाले विरोध के स्वर को अब छिन्न भिन्न कर दिया गया है । अब जबकि सब अपने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सिमट गए हैं, पश्चिम के प्रदेशों में संघीयता खारेजी की माँग उठने लगी है । संघीयता का नकारात्मक बहस करा कर सरकार ने देश में अच्छा खासा जनमत तैयार कर लिया था । अब शान्त वातावरण में संघीयता खारेजी का मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर संसद में ले जाना कौन सी बड़ी बात होगी ।
संघीयता की गगनभेदी आवाज के सामने शीर्ष तीन दलों के नेतृत्वकर्ता मजबूर थे इसलिए स्वयं को पाश्र्व में रखकर विगत काल में संघीयता के विरोध में चित्रबहादुर के.सी., कमल थापा, सी.पी. मैनाली, नारायणमान बिजुक्छे, रामशरण महत आदि को प्रवक्ता बनाकर प्रयोग किया गया । असल में संघीयता स्थापना करने में किसी की रजामन्दी न थी । जिस ढंग से ७ प्रदेश की अवधारणा लाया जा रहा था, उसके सब विरोधी थे । न मधेशी, जनजाति, थारु, दलित कोई इस ७ प्रदेश की संरचना से खुश थे, न गैर मधेशी पार्टियाँ ही । आज वो संघीयता विरोधी स्वर उभरने लगे हैं । सरकार से निर्देशित ६ प्रदेश संघीयता खारेजी के मुद्दा को वैधानिक रूप से निर्णय कराकर संसद मे दे तो दो तिहाई वाला संसद संघीयता को राजनीति बृत से बाहर निकालने मे किञ्चित भी नहीं सोचेगा । संघीयता वैधानिक रूप से जाने की इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता ।
दो तिहाई प्राप्त कर बाम सरकार ने राजनीतिक वृत में गहरी जड़ जमा ली है । लोकतान्त्रिक शक्तियाँ अपने बौनेपन की खीझ को छुपा नहीं पा रही है । बाम और लोकतान्त्रिक शक्तियों में राजनीतिक असन्तुलन बढ़ा है । मधेश राजनीतिक हार से उबाल पर है । गाय काट कर खाने की इजाजत माँगने वाले हिन्दू को चिढ़ाने में मशगूल हैं । इस बात से राजनीति में जबरदस्त उबाल आया देखने को मिल रहा है । इयू ने खस आर्य को आरक्षण देने के मसले पर विरोध जताया है । सरकार ने जहाँ इयू पर आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है, वहीं अधिकारवादियों ने इयू को ठीक कहा है । सरकार ने इयू को अपनी गलती सुधारने के लिये कहा है, किन्तु सरकार की बात मानने के लिये वह कतई तैयार नहीं है । सरकार उनको नेपाल छोड़ने तक का आदेश दे सकता है । किसी समय नेपाल में रहे बेलायत का राजदूत एण्ड्रयू स्पाक्र्स ने नेपाल के नयाँ संविधान में धर्म परिवर्तन के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात उठाई थी, जिस का काफी विरोध हुआ था । बेलायती राजदूत को माफी माँगने और वापस जाने के लिये मजबूर होना पड़ा था । उस समय उसके समर्थन में कोई खड़ा न था । आज उसकी बात को अच्छा समर्थन मिल रहा है । इयू यहाँ की जनजातियों पर अच्छी पकड़ बनाये हुए है । शक्तिशाली बाम सरकार इयू के इस हरकत को किस कदर झेलेगा ये भविष्य ही बता सकता है । फिलहाल द्वन्द्व उठाने के लिये इयू ने एक पत्ता तो फेंक ही दिया है । स्मरण रहे, इयू का खून इनलोगों की धमनियों मे अभी भी बह रहा है । २५ वर्षों से नेपाल में अपने उद्देश्य स्थापना हेतु क्रियाशील इयू इनको कभी नहीं अखरा । इनका निवेश हस्तक्षेप नहीं था । धर्म निरपेक्षता यूँ ही नहीं स्थापना हुई थी । कल जिसके बल पर शान था, पहचान था, खेमा परिवर्तन के साथ वो शत्रु नजर आने लगा । ये राजनीतिज्ञ बेइमानी भी इमान्दारीपूर्वक नहीं करते । इयू की आवाज अपने निवेश के एवज में बहुत कम है ।
वरिष्ठ सरकार के विरुद्ध इयू का पहला आक्रमण यहाँ के असन्तुष्टों को जगाने के लिए पर्याप्त है । असन्तुष्टों के ढेर पर बलपूर्वक सरकार बनाना अपने ही विनाश का कारण न बन जाय, विश्लेषकों का मानना है । असन्तुष्टता की तपिश पर अमन चैन खोजने वाली सरकार परिस्थिति की नजाकत को समझ ले तो काफी है । सहज रूप से देखा जाय तो ये एकमना सरकार को अपने कार्यकाल पूरा करने में कहीं कोई अवरोध नहीं है । किन्तु ऐसा होगा नहीं । अजीर्ण आर्थिक सहायता पाकर जिस कदर चीन को आन्तरिक मामले का चाणक्य बनाया गया है और दूसरे चाणक्य की बिदाई की गयी है, असन्तुष्टता का बढ़ना लाजिमी है । राजनीति में ये मौसमी प्रवृति अपने ही विनाश का कारण बनता है । नेपाल में चीन का प्रभाव अप्रत्याशित रूप में बढ़ना भारत को किस रूप में रखेगा, इसका सन्तुलन नसमझने वाले द्वन्द्व का शिकार तो होंगे ही, अपना वजूद भी खो बैठेंगे । नेपाल में चीन की हस्तक्षेपकारी उपस्थिति से डेमोक्रेटिक पावर सेन्टर की असन्तुष्टता पूर्ण रूप में बढ़ी है । इसने राजनीति में अस्थिरता को जन्म दिया है । इयू का आक्रमण इसी श्रृँखला की एक कड़ी है ।
नेपाल में चीन की सक्रियतापूर्ण उपस्थिति भारत के प्रभाव को विस्थापित करने के उद्देश्य से ही बढी है । अमेरिका और इयू को भी ठेस लगी है । नीयतवश चीन के प्रभाव में डूबी नेपाल सरकार असन्तुष्टों को खुश नहीं कर सकती । या यूँ कहिये कि चीन नेपाल सरकार को किसी के प्रभाव में अभी जाने नहीं देगा । पास और दूर के रिश्ते से कुटनीतिक सन्तुलन नहीं आ सकता । अतः द्वन्द्व आना लाजिमी है । राजनीतिक मैदान में द्वन्द्व की सम्भावना बढ़ रही है । द्वन्द्व चाहे जिस कारण से उठे, राजनीतिक वृत से संघीयता विलीन होने की प्रवल सम्भावना है । क्योंकि इसका पक्षधर कोई नहीं रहा ।

 

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