Sun. Sep 23rd, 2018

त्रिकोणीय अधिकार व्यवस्थापन

सात प्रदेश में से सिर्फ एक प्रदेस में मधेसी दलों का बहुमत और मुख्यमंत्री है । वह भी खस के गले नहीं उतर रहा है ।

केन्द्रीय सरकार की बागडोर हमेशा उन लोगों के अधीन रहेगी और रहती आयी है जो लोग कभी भी मधेसी, जनजाति, मुस्लिम और थारु को शक्ति सम्पन्न देखना नहीं चाहेंगे । 

 

स्थानीय, प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच त्रिकोणात्मक शक्ति व्यवस्थापन अपने आप में एक जटिल कार्य है । उसमे भी जब सब कुछ नया हो तो समस्या का पहाड़खड़ा होना भी स्वाभाविक हो जाता है । नेपाल के सन्दर्भ में देखा जाय तो माओवादी जनयुद्ध और मधेसियों के जन–आन्दोलन में हुए सैकड़ों बलिदानी के फलस्वरूप संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना हुई । विभिन्न उतारचढ़ाव, संधि–समझौता के तहत नेपाल को सात प्रदेश में विभाजित किया गया । मधेसियों के साथ षडयंत्र को निरंतरता देते हुए आठ जिला में मधेस राज्य को सीमित कर दिया गया । जो दो नंबर प्रदेश के नाम से जाना जाता है । नेपाल में एक यही वह प्रदेश है जिस में जिसने अहंकारी खसवाद की सत्ता को जड़ से उखाड़फेका है । बांकी छह प्रदेशों में वाम गठबंधन का बोलबाला है । शुरु से ही मधेसी स्वायतत्ता की बात करते आ रहे हैं । अब, जब की प्रादेशिक सरकार बन चुकी है, प्रदेश दो के लिए दूसरी चुनौती सामने आ खड़ा हुई है । जिसका सीधा सम्बन्ध अधिकार से है । एक ओर खस शासक जो हैकमवादी और सर्वसत्तावादी हैं, पूरे नेपाल पर एकछत्र राज करते आए हैं, और आगे भी अपना प्रभुत्व जमाए रखना चाहते हैं । वहीं दूसरी ओर मधेसी जनसमुदाय है जो खस की कूटनीति और दमन से मुक्ति हेतु एड़ी चोटी एक किए हुए है ।



राजनीतिक गंभीरता और कूटनीतिक दृष्टि से देखा जाय तो राजा,राणा, पहाड़ी, ब्राहमण और क्षेत्री को संघीयता नहीं चाहिए । वो तो केन्द्रभिमुखी शासन पद्दति के संरक्षक और सामंतवादी क्रूर सोच के पोषक हैं । जब कि प्रदेश और स्थानीय तह के कारण उनके हाथों से सत्ता और शक्ति संवैधानिक रूप से स्वतः स्खलित हो चुका है । बस एक यही कारण है कि वाम का उग्र राष्ट्रवाद का नारा सफल हुआ । फिर से पृथ्वीनारायण शाह का गुणगान किया जा रहा है । जो की राजतंत्र का प्रतीक है । इतिहास गवाह है, जब राज मानदेव के पिता धर्मदेव की मृत्यु हुई तो अपने को स्वतंत्र घोषणा करने वाले सामन्तों को मानदेव ने हाथी पर सवार हो के मामा के सहयोग से दबा दिया और राष्ट्र को विखंडन से बचाया । एकदम वही सोच और संस्कार आज भी उन लोगों के भीतर सुक्ष्म रूप में विद्यमान है । जो कभी भारत को गाली देकर तो कभी मधेसियों को अपमानित और पददलित कर प्रकट होता रहता है । प्रदेश के निर्माण में अवरोध के रूप में सृजना किए गए सीमांकन, भाषायी द्वंद्व, धार्मिक उन्माद और नामांकन से क्या प्रमाणित होता है ? संविधान निर्माण तथा प्रदेश का प्रारूप तैयार होने के बावजूद भी कुछ षड्यंत्रकारी मस्तिष्क प्रदेश सरकार को कमजोर करने और स्थानीय तह तथा प्रदेश के बीच अधिकार नियोजन और व्यवस्थापन के नाम पर संघर्ष और टकराव का वातावरण सृजन करने का षडयंत्र कर रहे हैं ।


मधेस प्रदेश और मधेसियों के विकास से और अधिकार संपन्नता से ही खस को चिढ़ है । नही तो समग्र मधेस प्रदेश का इतना कड़ा विरोध नहीं होता । मधेस को टुकड़ा टुकड़ा कर कमजोर बनाने की क्या आवश्यकता थी ? वाम एकता का मनोविज्ञानिक केंद्र बिंदु भी मधेसी मुद्दा ही है ।

केंद्र से सीधे पालिका अर्थात स्थानीय तह को जोड़कर शक्ति संपन्न बनाने का दुश्चक्र सुक्ष्म रूप में प्रदेस को कमजोर, मजबूर और शक्तिहीन बनाकर क्रमशः अनुपयोगी और अनावश्यक प्रमाणित कर आम लोगों में संघीय सरकार के प्रति वितृष्णा और निराशा की भावना जगाने का षडयंत्र होने लगा है । याद रहे केन्द्रीय सरकार की बागडोर हमेशा उन लोगों के अधीन रहेगी और रहती आयी है जो लोग कभी भी मधेसी, जनजाति, मुस्लिम और थारु को शक्ति सम्पन्न देखना नहीं चाहेंगे । अतः बड़ी ही गंभीरता और उदारता पूर्वक हमें सोचना होगा । सात प्रदेश में से सिर्फ एक प्रदेस में मधेसी दलों का बहुमत और मुख्यमंत्री है । वह भी खस के गले नहीं उतर रहा है ।
केन्द्रीय नेता और समस्त बुद्धिजीवी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्तागण इस दो नंबर प्रदेश को कमजोर, शक्तिहीन, अधिकार शून्य बनाने तथा भाषिक, धार्मिक और जातीय विभेद के चक्रव्यूह में फसाकर दीनहीन बनाने के अभियान में लगें हुए हैं । हम मधेसी लोग उनके द्वारा सृजित इस चक्रव्यूह में फसकर अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं । यहीं पर सतर्क और सावधान होने की जरुरत है । केंद्र सरकार द्वारा सुनियोजित रूप में हो रहे प्रदेश के अधिकार कटौती का हमें डटकर विरोध करना होगा । क्योंकि इससे हम कमजोर होंगे न की खस शासक । यहाँ यह सवाल खड़ा कर के मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का भरपूर प्रयास किया जाएगा कि जब अन्य छ प्रदेस की जनता को मतलब नहीं है तो फिर दो नंबर प्रदेश वाले क्यों चिल्ला रहे हैं ? मैं ध्यानाकर्षण कराना चाहूँगा कि मधेस प्रदेश और मधेसियों के विकास से और अधिकार संपन्नता से ही खस को चिढ़ है । नही तो समग्र मधेस प्रदेश का इतना कड़ा विरोध नहीं होता । मधेस को टुकड़ा टुकड़ा कर कमजोर बनाने की क्या आवश्यकता थी ? वाम एकता का मनोविज्ञानिक केंद्र बिंदु भी मधेसी मुद्दा ही है ।

सामान्य रूप से प्रभुसत्ता का विभाजन संघीय एवं राज्यसरकारों के मध्य उनके संविधान में उल्लेखित होता है जो उस संविधान को अंतिम रूप से पुष्ट करता है । साधारणतया संघीय सरकार को ऐसे कार्यों के संचालन का भार दिया जाता है जिन्हें खर्चीला अथवा दुरूह होने के कारण राज्य स्वयं चलाने में असमर्थता महसूस करता हैं ।अतः इन कार्यों के संचालन के लिए वे सब इकाइयाँ अपनी राजशक्तियों का एक निश्चित भाग संघीय सरकार को अधिकार एवं साधन के रूप में प्रदान कर देते हैं । शेष अन्य विषयों में राज्य स्वयं कार्यभार वहन करता हैं । एवं उसके प्रतिरूप अधिकार एवं साधन संविधान द्वारा लेते हैं । इस प्रकार एकात्मक संविधान (यूनिटरी संविधान) के विपरीत संघात्मक संविधान एक ही संविधान के अंतर्गत दोहरी राज्य व्यवस्था की स्थापना करता है । परिणामस्वरूप ऐसे संघ के नागरिक दो प्रकार की सरकारों, संघीय (केंद्र) एवं राज्य (प्रदेश) सरकारों के अधीनस्थ होते हैं । परन्तु सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य हमारे यहाँ तीसरी सरकार स्थानीय सरकार भी है । जो राज्य(प्रदेस) सरकार पर भारी पड़ने जा रहा है ।

संघात्मक संविधान से हमारी अपेक्षाएँ होती हैं ः
प्रथम— राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच समझदारीपूर्ण संवैधानिक विभाजन , जिसका हमारे यहाँ घोर अभाव है ।
द्वितीय— संघीय संविधान की प्रभुसत्ता अर्थात न तो केंद्र और ना ही प्रदेश सरकारें संघ से पृथक हो सकती हैं । जिसका बनाबटी डर खस के हृदय में घर किए हुए है ।
तृतीय— संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभेदरहित विभाजन का लिखित होना भी आवश्यक है ।
चतुर्थ— संविधान का संशोधन समय सापेक्ष परिवर्तन में समग्र समायोजन एवं विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जाय ।
पंचम— किसी भी प्रकार का विवाद जो केंद्र एवं प्रदेश सरकारों के बीच में संवैधानिक कार्यसंचालन में कर्तव्य, अधिकार अथवा साधनों के विषय में उपस्थित हो जाय तो निर्णय के लिए सर्वोच्च न्यायालय को सविधान के संघात्मक प्रावधानों की व्याख्या करने का पूर्ण अधिकार हो ।
षष्ठं— सभी प्रकार के संवैधानिक जटिलताओं से निकास तथा अधिकार व्यवस्थापन के लिए जनमत संग्रह को अन्तिम आधार माना जाय ।
इसी प्रकार लोकतंत्र और संघीय संरचना को सशक्त बनाने के लिए शक्ति विकेन्द्रीकरण भी एक आधारभूत सिद्धान्त है । संघात्मक शासन प्रणाली में शक्ति स्वतः विभाजित होती है और एकात्मक शासन में शक्ति केन्द्र में निहित होती है । जिसका प्रमाण राजतंत्र के शासन व्यवस्था और संघीय गणतंत्र होने से पहले का नेपाल है । इसलिए राज्य (केन्द्र) अपने स्थानीय क्रियाकलाप के संचालन हेतु केन्द्रीय और स्थानीय इकाइयों को शक्ति विकेन्द्रित करता है । यद्यपि संघीय शासन का भी प्रादेशिक सरकार अपने स्थानीय इकाइयों को शक्ति का विकेन्द्रीकरण करती है । शक्ति का विभाजन और विकेन्द्रीकरण में मूलभूत अन्तर यह है कि विभाजित शक्ति वापस नहीं होती है लेकिन विकेन्द्रित शक्ति केन्द्र द्वारा ऐच्छिक समय में वापस लिया जा सकता है । जिस बात की शंका आम जनमानस में देखी जा सकती है ।
संवैधानिक शक्ति और अधिकार को समझदारी और सुविधा के आधार पर (केन्द्र,प्रदेस और स्थानीय) सरकार के लिए व्यवस्थापन कर संघीय शासन प्रणाली को सशक्त और प्रभावकारी बनाया जा सकता है ।
– केन्द्रीय सरकार के लिए प्रतिरक्षा, मुद्रा,वैदेशिक सम्बन्ध,संचार और वित्त व्यवस्था के साथ राष्ट्रीय महत्व के विषय आदि ।
– प्रादेशिक सरकार के लिए कानून और व्यवस्था, जन स्वास्थ्य, प्रशासन जैसे स्थानीय महत्व के विषय ।
– विशेष अधिकार के तहत केन्द्र और प्रदेस सरकार दोनों को इतना अधिकार हो कि वह अपने–अपने कार्यक्षेत्र को अधिक उन्नत बनाने के लिए कानून बनाने को स्वतंत्र हो । जिससे सक्रीयता और सृजनशीलता को शक्ति प्रदान हो सके । मानवीय जीवन शैली के विकासक्रम को किसी भी राजनैतिक या सांस्कृतिक घेरे में सीमित करना समग्र मानवता का ह्रास होगा । संविधान के किसी भी सूची–अनुसूची धारा–उपधारा में यदि मानवीय विकास और मूल्यों जो कि आर्थिक, भौतिक, शैक्षिक और चेतनागत रूप से सम्बंधित हो, का अवरोध करता है तो वह स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है । संविधान वह सर्वमान्य और सर्वग्राह्य लिखित दस्तावेज होता है, जिसमे आम जनभावनाओं को समुचित और सुव्यवस्थित रूप में अधिकार प्रत्योजन किया गया होता है । वहीं तंत्र सर्वोत्तम और ह्रदयग्राह्य होता है जिसमे सभी के सुन्दर भविष्य का खयाल किया गया हो । जो सर्वजन हिताय हो । जो सर्वसम्मति से निर्मित हो । जो प्रतिभाओं की इज्जत करता हो । जो सबका सम्मान करता हो । अन्यथा वह एक कागजके टुकड़ेसे ज्यादा हैसियत का नहीं हो सकता । नेपाल के सन्दर्भ में ऐसे अनेकों एकांगी संविधान मिलेंगे जो आज कागज के टुकड़े ही हैं । अतः संविधान की गरिमा और महिमा वहाँ की जनता द्वारा की गयी स्वीकृति और सम्मान पर निर्भर होता है । न की मुठ्ठीभर लोगों के षडयंत्र पर । याद रहे एक सौ वर्षों के भीतर विश्व में देशों की संख्या में दो गुनी बढोत्तरी हो चुकी है । यह तानाशाही और षडयंत्रकारी सोच के मुँह पर दिया गया तमाचा ही है । जिसकी निरंतरता कोई नहीं चाहता ।

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