Thu. Jan 17th, 2019

मिथिला और देवघाट नेपाल भारत सम्बन्ध की अटूट कड़ी : डॉ. श्वेता दीप्ति

“अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैप सप्तैता मोक्षदायिकाः ।।”

गरुड़ पुराण के अनुसार इस पृथ्वी पर अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची अवन्तिका, पूरी और द्वारावती का विशेष महत्तव है । पंडित रुद्रधर झा ने अपनी पुस्तक गूढ तत्व समीक्षा में लिखा है कि उक्त श्लोक में आए माया पद से महामाया जगज्जननी जनकनन्दिनी जानकी जी के आविर्भाव की भूमि मिथिला को स्थान देना ही सर्वथा उचित है । मिथिला का महत्त्व बस इस एक ही कारण से नही जाना जाता है । मिथिला पृथ्वी की सर्वोत्तम भूमि मानी गई है, जिसे पृथ्वी का मस्तक भी कहा जाता है । इतना ही नहीं मानव जाति के लिए मोक्ष प्राप्ति का स्थान भी मिथिला भूमि को माना गया है ।

क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में नित्य एवं निरतिशय होने से परम पुरुषार्थ मोक्ष का प्रापक ब्रह्मज्ञान मिथिला की राजधानी जनकपुर में रहने वाले महाराज जनक के पास ही था,इसकी पुष्टि बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखित श्लोक से होती है कि–‘जनको जनक इति ब्रुवन्तो वैधावन्ति ब्रह्मज्ञानार्थमिति शेषः’ । ब्रह्मज्ञान के लिये ‘जनक जनक’ चिल्लाते हुए लोग मिथिला की ओर दौड़ते हैं । राजा जनक ने ब्रह्मज्ञान के साथ यह भी शिक्षा दी कि–जब हम ब्रह्म ज्ञान की अविच्छिन्न धारा के साथ राज्य का भी सञ्चालन करते हैं, तो उसके साथ गृहःस्थाश्रम का सञ्चालन तो सहजता से ही हो सकता है । इसीलिये तो प्रसिद्ध है कि जब व्यासजी के घोर आग्रह करने पर भी ब्रह्मनिष्ठ शुकदेवजी ब्रह्मज्ञान की धारा के विच्छिन्न हो जाने के भय से विवाह करने के लिये किसी तरह भी राजी नहीं हुए, तब व्यासजी ने राजा जनक से गृहःस्थाश्रम सञ्चालन के साथ ब्रह्मज्ञान की धारा को अविच्छिन्न रखने का प्रकार सीखने के लिये शुकदेवजी को राजा जनक के पास भेजा । राजा जनक ने दूध से भरे कटोरे को शुकदेवजी की तलहत्थी पर रखबाकर कहा कि आप पूरे उद्यान की भ्रमण कर के आएँ पर ध्यान रहे कि दूध का एक बूँद भी छलकना नहीं चाहिए । और साथ ही अन्य किसी को भी उनके साथ जाने से मना कर दिया । शुकदेवजी बड़ी सावधानी से निरन्तर दूध पर नजर रखते हुए पूरे उद्यान का भ्रमण कर जब राजा जनक के पास आये, तब उनसे राजा जनक ने उद्यान का वर्णन करने के लिये कहा, तो शुकदेवजी ने उत्तर दिया कि हम तो निरन्तर दूध पर ही नजर रखने के कारण जब उद्यान का कोई दृश्य देख ही नहीं सके तब उसका वर्णन कैसे करें ? इसके पश्चात् शुकदेवजी को राजा जनक ने कहा कि यदि तुम इसी तरह सदा अपनी आत्मा पर मन रखते हुए संसार का कार्य करते रहोगे तो ब्रह्मज्ञान की धारा अविच्छिन्न ही चलती रहेगी । तब शुकदेवजी ने शादी की, जिससे कि उनके चार पुत्र हुए । यह कथा देवी भागवत में आयी है । इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि मिथिला और राजा जनक का कितना महत्तवपूर्ण स्थान है । मिथिला की चर्चा रामचरित मानस के उत्तर कांड में कुछ इस तरह हुई है ।

इहाँ वसत मोहि सुनु खग ईशा ।
बीते कलप सात अरु बीसा ।।

अभी से सत्ताइस चौयुगी (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिनामक चतुर्युगी) से पहले त्रेता युग में राम चरित मानस के उत्तर काण्ड में काक भुसुण्डीजी के द्वारा गरूड़ जी को कहे गए इस चौपाइ के आधार पर २७ कल्पों पहले त्रेता युग में ही मिथिला की राजधानी जनकपुर में सतावन पीढी तक चली । ब्रह्मज्ञानी जनकों की वंशावली में बाइसवें जनक श्री सीरध्वज नामक राजा जनक के द्वारा अनेकों वर्ष तक महाअकाल पड़ने पर चलाये गये सुवर्णमय हल के सीर (सीता नामक अग्रभाग) से मिथिला की पावनतम् भूमि के अन्यतम भाग सीतामही (प्रसिद्ध सीतामढी) से आविर्भूत हुई जगज्जननी जनकनन्दिनी सीताजी ने मिथिला को लोकोत्तर गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया । जो अयोनिजा परमेश्वरी भगवती के रूप से सर्वत्र पूजित होती हैं ।
माँ जानकी के जन्म को लेकर कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं । बात त्रेतायुग की है, जब मिथिला के राजा जनक हुआ करते थे । दरअसल राजा जनक, निमि के पुत्र थे । किसी समय तत्कालीन आर्यावर्त में सूर्य नाम का एक सूर्यवंशीय क्षत्रिय का शासन था । इसी वंश में श्री रामचन्द्र जी कभी अवतार लिए थे । इसी सूर्य नामक राजा के पुत्र ‘मनु’ हुए । मनु महा मेधावी पुरूष थे । उन्होंने ‘मनुःमृति‘ रूपी महान ग्रंथ का निर्माण किया । मनु के पुत्र ‘इक्ष्वाकु’ अयोध्या के राजा हुए । इक्ष्वाकु के प्रथम पुत्र ‘विकुक्षि’ थे तथा द्वितीय पुत्र ‘निमि’ थे ।
‘निमि’ बहुत ही कुशाग्र बुद्धि वाले दूरदर्शी पुरूष थे । उन्होंने मन ही मन सोचा कि जीवन क्षणभंगुर है । मृत्यु सनातन है । जो कीर्ति करेगा वह मरणोपरान्त भी समाज में जिंदा रहेगा । इस सिद्धान्त को मन में स्थिर कर उन्होंने दृढ़ संकल्प लिया कि कुछ ऐसी कीर्ति करूं कि मैं सार्वभौम बन जाऊं ।

 

मन में दृढ़ निश्चय कर ‘निमि’ ने अपने कुलगुरू ऋषि ‘वशिष्ठ’ से निवेदन किया कि–वह ईश्वर के सदृश्य सर्वत्र विराजमान रहे, ऐसा यज्ञ करा दें । वशिष्ठ ने ‘निमि’ से कहा कि मैं पूर्व में ही देवराज इन्द्र का यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया हूं । इन्द्र के यज्ञ की समाप्ति के उपरांत मैं आपका यज्ञ करा दूंगा । ‘निमि’ मौन हो गए । वशिष्ठ ‘निमि’ के मौन को स्वीकृति मानकर इन्द्र के यज्ञानुष्ठान हेतु चल दिए । ‘निमि’ के मन में आया कि–जीवन क्षणभंगुर है, क्या पता कल क्या हो जाय ? निमि के अंदर तीव्र इच्छा ने उसे व्याकुल कर दिया । अतएव ‘निमि’ अयोध्या से निकलकर व्याकुल मन में पूर्व दिशा की ओर चल पड़े । चलते–चलते ‘निमि’ मिथिला क्षेत्र आ गए । मिथिला क्षेत्र में गौतम ऋषि का आश्रम था । तथा उन दिनों यह क्षेत्र मिथिला, नहीं बल्कि गौतम का ‘तपोवन’ कहलाता था । इस ‘तपोवन’ का नाम ‘मिथिला’ बाद में पड़ा । ‘निमि’ गौतम ऋषि के तेज व तपस्या से काफी प्रभावित व आकर्षित हुए । निमि ने गौतम ऋषि से इसी तपोवन में यज्ञ–अनुष्ठान कराने का आग्रह किया । ताकि उस यज्ञ के फल से वे (निमि) सर्वत्र व्यापक हो जाएँ । इस उत्कृष्ट इच्छा को देखकर गौतम ऋषि ने निमि को यज्ञ कराने का वचन दिया ।

 

कुछ ही दिनों बाद गौतम ऋषि यज्ञ प्रारम्भ करने के उद्देश्य से याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, अगस्त्य, भारद्वाज आदि ऋषियों को आमंत्रित कर ‘निमि’ का दीर्घकालीन यज्ञ के अनुष्ठान का संकल्प करा कर यज्ञ प्रारम्भ किया ।
परन्तु यज्ञ की पूर्णाहुति होने से पहले ही इन्द्र का यज्ञ समाप्त कर ऋषि वशिष्ठ अयोध्या लौटे । कुलगुरू वशिष्ठ को जब इस बात की जानकारी हुई कि ‘निमि’ ने उनके लिए प्रतीक्षा नहीं की, तथा दूसरे ऋषियों के सहयोग से यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कर दिया है, तो इस अवज्ञा से क्रोधित हो, निमि के यज्ञस्थल पर क्रोधावश आ धमके । कुलगुरू पर अविश्वास के कारण ऋषि वशिष्ठ ने निमि को दण्डस्वरूप विदेह होने का श्राप दे दिया । इधर यज्ञ की समाप्ति नहीं हुई थी, और निमि प्राणहीन हो गए ।
इस घटना,से निमि के यज्ञ में शामिल सभी ऋषियों के समक्ष एक विचित्र समस्या आ खड़ी हुई । परन्तु यज्ञ के ऋत्विक ऋषि गौतम ने सभी ऋषियों से आग्रह किया कि हम लोग अपने–अपने तपबल से इस प्राणहीन ‘निमि’ के शरीर को मंथन करें । मंत्रोच्चारण एवं ऋषियों के तपबल के कारण मंथन से एक सुंदर राजकुमार बालक का आविर्भाव हुआ । मंथन से उत्पन्न होने के कारण उस राजकुमार का नाम ‘मिथि’ पड़ा । तथा ऋषियों ने इसी राजकुमार ‘मिथि’ से शेष यज्ञ का कार्य पूर्ण कराया ।
मंथन के द्वारा ‘मिथि’ राजकुमार अविर्भूत हुए तथा बाद में राजा के रूप में ‘मिथि’ ने जिस नगरी को बसाया, शासित किया, वही “मिथिला’’ कहलायी । इक्ष्वाकु वंशीय राजा ‘मिथि’ महान और प्रजावत्सल राजा थे जिन्होंने प्रजा को पुत्रवत समझकर, पालन किया । पुत्रवत् पालन करने के कारण प्रजा उन्हें ‘जनक’ (अर्थात पिता) कहने लगी । जब प्रजा उन्हें जनक संबोधित करने लगी, तभी से उनकी नगरी “जनकपुर’’ कहलाने लगी ।
बाद में कुछ वर्षों बाद ‘सिरध्वज’ जनक ने जब सोने की सीत से मिट्टी जोती तो उन्हें दिव्य संदूक में सीता मिलीं । इस तरह राजा जनक की पुत्री सीता कहलाईं ।
माता सीता का जन्म एक रहस्य है सीता के विषय में रामायण और अन्य ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार मिथिला के राजा जनक के राज में कई वर्षों से वर्षा नहीं हो रही थी इससे चिंतित होकर जनक ने जब ऋषियों से विचार किया तब ऋषियों ने सलाह दिया कि महाराज स्वयं हल चलाएं तो इन्द्र देव की कृपा हो सकती है ।
मान्यता है कि बिहार स्थित सीतामढ़ी का पुनौरा गांव वह स्थान है जहां राजा जनक ने हल चलाया था हल चलाते समय हल एक धातु से टकराकर अटक गया राजा जनक ने उस स्थान की खुदाई कराने का आदेश दिया । इस स्थान से एक कलश निकला जिसमें एक सुंदर सी कन्या थी राजा जनक निःसंतान थे इन्होंने कन्या को ईश्वर की कृपा मानकर पुत्री बना लिया हल का फल जिसे सीत कहते हैं उससे टकराने के कारण कलश से कन्या बाहर आयी थी इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया । इस घटना से ज्ञात होता है कि सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थी धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थी । इसलिए वास्तव में सीता के पिता कौन थे और कलश में सीता कैसे आयी यह एक जिज्ञासा का विषय है ।
इसका उल्लेख अलग–अलग भाषाओं में लिखे गये रामायण और कथाओं से प्राप्त होता है । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि,गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था । एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया ।
रावण ने कहा कि यह तेज विष है, इसे छुपाकर रख दो मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी एक दिन जब रावण बाहर गया था तब मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी । लोक लाज के डर से मंदोदरी अपनी पुत्री को कलश में रखकर उस स्थान पर छुपा गयी जहां से जनक ने उसे प्राप्त किया । इस कथा से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी जो रावण की मृत्यु की वजह बनी ।
मिथिला का महत्तव इस बात से भी है कि राम के परिवार से ही नहीं ,कृष्ण के परिवार से भी मिथिला का अभिन्न सम्बन्ध रहा है । विष्णुपुराण के अनुसार, स्यमन्तक मणि को लेकर कृष्ण एवं बलभद्र में विवाद हुआ था । यह मणि शतधन्वा के पास थी, जो मिथिला में ही एक वन में कृष्ण के चक्र से मारा गया था । बलभद्र ने कृष्ण को अर्थलोलुप मानते हुए कृष्ण से और द्वारका से सम्बन्ध तोड़ लिया । वे मिथिला चले गए । वहां विदेहराज जनक ने उनका बहुत सम्मान किया और वे विदेहनगर में ही रहने लगे । आखिर यह स्यमन्तक मणि क्या था जिसकी वजह से बलभद्र को द्वारका का त्याग करना पड़ा । इसके पीछे की कहानी कुछ इस तरह है ।
पुराण के अनुसार स्यमन्तक मणि सूर्य देव धारण करते थे । यह एक चमत्कारी मणि थी और जिसके पास रहती उस पर अनोखा प्रभाव दिखलाती थी । जैसे सज्जन के पास रहती तो उसका शुभ करती और किसी दुष्ट के पास रहने पर उसका अनिष्ट करती । सूर्य ने अपने भक्त, राजकुमार सत्राजित् से प्रसन्न हो कर वह मणि उसे दे दी, सत्राजित ने मणि अपने भाई, प्रसेन को दी, प्रसेन को एक सिंह ने मार डाला । उस सिंह को रीछों के राजा जाम्बवान ने मारा तो मणि उसे मिल गयी । चूंकि कृष्ण ने सत्राजित के समक्ष इस मणि की प्रशंसा की थी, अतः सन्देह यह हुआ कि उन्होंने उसे प्रसेन को मार कर चुरा लिया है । इस कलंक से मुक्त होने के लिए कृष्ण ने मणि की खोज में जंगलों की खÞाक छानी और जाम्बवान से युद्ध किया और उसे हरा कर स्यन्तक मणि वापस लेकर आए । इस घटना से सत्राजित अत्यन्त लज्जित हुआ और इस लज्जा और आत्मग्लानि से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से करवाया और इसी अवसर पर स्यन्तक मणि भी कृष्ण को अर्पित कर दिया ।
इसी पुराण के अनुसार दुर्योधन ने गदायुद्ध विदेह नगर में ही बलभद्र से इसी प्रवास के दौरान सीखा । तीन वर्षों के बाद उग्रसेन आदि यदुवंशियों के बहुत आग्रह करने पर और यह विश्वास दिलाने पर की कृष्ण ने स्यमन्तक मणि नहीं ली थी , बलभद्र द्वारका वापस गए । दरअसल, शतधन्वा ने यह मणि अक्रूर जी को दे दी थी ।
कहाँ तक था मिथिला क्षेत्र ?
वृहद्विष्णुपुराण के अनुसार पूर्व में कौशिकी नदी से लेकर पश्चिम में गण्डकी नदी तक और दक्षिण में गंगा नदी से लेकर उत्तर में हिमालय तक मिथिला का क्षेत्र विस्तार है । आज भी लगभग यही सीमा मिथिला की मानी जाती है, विशेषकर मैथिली भाषा के प्रचलन एवं प्रभाव के आधार पर यहक्षेत्र मिथिला कहलाता है ।
आज मैथिली भाषा का प्रचलन के आधार पर जो मिथिला का क्षेत्रविस्तार बनता है, उसमे मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, पुर्णियां, कटिहार किशनगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, खगडि़या, भागलपुर, चंपारण के कुछ हिस्से , बेगुसराय और नेपाल में भारत से सटे तराई के जिले–मोरंग, सप्तरी, महोत्तरी, जनकपुर, सर्लाही, रौतहट आदि शामिल है ।

मिथिला का धार्मिक महत्त्व
मिथिलांचल धार्मिक भूमि है जहाँ बहुत से लोक देवीदेवताओं की गाथाएं प्रचलित हैं । जिनमें से कुछ काव्यात्मक रूप में उपलब्ध हैं कुछ मौखिक तो कुछ लिखित कहानी के रूप में । कुछ लोक देवी देवता के नाम इस प्रकार हैं लवहरी, कुसहरी, रैयारान्पाल, नैका, बंजारा, लोंरिक, राजा सल्हेश और मीरा सुलतान आदि । लोग आज भी रात–रात भर इनकी प्रशस्ति की गाथा गाते हुए जागरण करते हैं और समूंह बना कर सुनते हैं । इतना ही नहीं एक मंच बना कर इनके काव्य के आधार पर नाटक भी खेलते हैं ।
इनमें सबसे लोकप्रिय देवता राजा सल्हेश हैं । राजा सल्हेश के जीवन के प्रसंग मिथिला के गांवों में एवं शहरों में भी सुनने को मिलते हैं । राजा सल्हेश दुसाध जाति के थे । वे बहुत ही वीर एवं कल्याणकारी राजा थे । उनका व्यक्तित्व इतना महान था कि मिथिलांचल के लोग उनसे प्रभावित होकर उन्हें देवता के रूप में मानने लगे । मिथिला में सभी गाँवों एवं शहरों में जहां खासकर दुसाध जाति के लोग रहते हैं अलग से एक सार्वजनिक स्थान पर राजा सल्हेश एवं उनके दरवारियों की मूर्ति स्थापित करते हैं जिसे सल्हेश स्थान कहा जाता है । सल्हेश स्थान दुसाध सहित अन्य जातियों के लोगों की आस्था का केंद्र है । मिथिला में बहुत लोग अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप मनौती इन्ही लोक देवों के नाम पर करते हैं ।
अन्य महत्वपूर्ण देवी देवताओं में केवट जाति के भीम केवट, केवल महाराज, गांगो देवी अमर सिंह, दुलरा दयाल सिंह, जय सिंह,एवं रैया–रनपाल ,दुसाधों के राजा सल्हेश, सांसिया महाराज, सोनाई महाराज, खेदन महाराज, सरूप महाराज, चमार जाति के लालवान, डोम जाति के, श्याम सिंह डोम, छेछन महाराज,तेली जाति के बिहुला, हलवाई जाति के गनिनाथ–गोविन्द कारिख पंजियार एवं फेकूराम, मुसहर जाति के दीना–भदरी, नाई के बेनीराम , यादव जाति के लोंरिक कृष्णराम तथा कारू खिरहरी आदि ऐसे कुलदेवी और कुलदेवता हैं जिनके पीड़ी, एवं गहवर को सभी जाति एवं वर्ण के लोग श्रद्धा से नमन करते हैं ।
ये सभी देवी देवता अन्याय के खिलाफ लड़ने के प्रतीक हैं और साथ ही अपनी–अपनी जातियों में प्रभुत्व के लिए लड़ते भी हैं । सभी लोकदेव स्त्री जाति के प्रति बहुत ही आदर स्नेह रखते थे ये स्त्री जाति के जानवरों की हत्या भी नहीं करते थे । अधिकतर लोक गाथाओं के अनुसार इनकी मृत्यु किसी मायावी बाघिन के द्वारा होती है जिसे डायन मारने के लिए भेजती है । मरने के बाद इनकी आत्मा किसी भगता (झाड़–फूंक करनेवाला वाला) में प्रवेश कर जाती है । उसके बाद लोगों की कल्याण कार्य में लग जाता है । जब इनकी मृत्यु हो जाती है तब लोग इनका गहबर बना कर पूजा करने लगते हैं ।
ऐसी लोकदेवी एवं लोकदेवताओं की कहानियाँ आज भी सम्पूर्ण मिथिलांचल में बहुत ही लोकप्रिय है । इन लोक गाथाओं का महत्व उन पुरातात्विक खंडहरों उसके अवशेषों से बहुत ही ऊपर है जिनसे सारांश अर्थात निष्कर्ष अनुमान के आधार पर ही ज्यादा निकाले जातें हैं । अक्सर यह देखा जाता है कि अंधविश्वास के नाम पर लोग अपनी रीतियों को, उन परम्पराओं को भूल जाते हैं । लेकिन इन गाथाओं की सांस्कृतिक महत्वों का जब हम समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं की ये लोक गाथाएँ मानव जीवन को सामाजिक एकता का एक सही सन्देश देता हैं । ये सब लोक जीवन का स्तम्भ हंै, एक रीढ़ है जिसे विज्ञान से तुलना करना मुर्खता है ।

मिथिला का सांस्कृतिक महत्तव
विद्यापति के युग से ठीक पहले मिथिला में कर्नाटवंश का शासन था । इसके संस्थापक मूलतः कर्नाटक के निवासी थे और ये बंगाल से होते हुए मिथिला में आये । इनके साथ दक्षिण के सांस्कृतिक तत्व भी मिथिला में आये और अध्ययन करने पर तत्कालीन कला साहित्य पर उसकी छाप भी देखी जा सकती है । विद्यापति के लेखन से संकेत मिलता है कि नाटक का मंचन मध्यकाल में कर्नातों के प्रभाव से ही मिथिला में शुरू हुआ और आरंभिक रंगकर्मी भी मिथिला में दक्षिण से ही आये । विद्द्वानों की मान्यता है कि मैथिली अपभ्रंश से पृथक स्वरूप भी कर्नाटकों के समय से ही निश्चित हुआ । विद्यापति की भाषा इसीलिए संस्कृत भी है, अवहट्ट भी, और मैथिली भी ।
वर्ष १०९७ ई.–१०९८ ई. में तिरहुत में कर्नाट राज्य का उदय हुआ जब एक महान शासक नान्यदेव की क्षत्रछाया में कर्नाटो ने सिमरॉवगढ़ को अपनी राजधानी बनायी । यह काल मिथिला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है क्योकि इस काल में स्थिरता और प्रगति हुई । नान्यदेव बंगाल के शासको से निरंतर युद्ध में भी अपने राज्य को सुरक्षित रख पाये । अंधराठाढ़ी व उसके आसपास के गांवों से सेन, पाल, कर्नाट वंश के साथ–साथ बौद्ध विहार के भी सबूत प्राप्त होते हैं ।
कर्नाट वंश ने मिथिला को एक और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत दी पंजी व्यवस्था के रूप में । इसको व्यवस्थित और अद्यतन रखने वाले पंजियार या पंजीकार कहलाते हैं । दरअसल यह मिथिला के ब्राह्मणों एवं कायस्थों की वंश परंपरा का लिखित प्रमाणिक दस्तावेज है । इस व्यवस्था ने मध्यकाल से लेकर अब तक की विकास परंपरा के कई महत्वपूर्ण विवादास्पद सन्दर्भों को स्पष्ट करने में महती भूमिका निभाई है । कहते हैं कि मिथिला के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री हरिनाथ मिश्र , जिन्होंने अमृतसार नामक महत्वपूर्ण स्मृतिग्रन्थ लिखा, का विवाह अपनी पितृवंश परंपरा में ही अज्ञानतावश हो गया । भारतीय हिन्दू संस्कार पद्धति में एक मूल–गोत्र में विवाह पाप सामान है । इस तरह की परस्थितियों से बचने के लिए ही कर्नाट वंशीय राजा हरिसिंह देव ने पंजी व्यवस्था शुरू करबायी । जिसका पालन आज भी किया जाता है ।
आज भी मधुबनी के सौराठ गाँव की मेले में इसी व्यवस्था के तहत मैथिल ब्राह्मणों एवं कर्ण कायस्थों का विवाह निश्चित किया जाता है, जिसे सिद्धांत कहते हैं । सौराठ में ही विद्यापति के वंशज रहते हैं । सौराठ के अलावा मिथिलांचल के परतापुर, सझुआर, भकाराइन, बनमाम, महिषी, बरुआरी, शुक्रसेना, पÞmतेहपुर, खम्हार, काला बलुआ और ससौला में भी इस तरह की सभा का आयोजन होता रहा है, पर सबसे प्रसिद्ध सभा सौराठ का ही है ।

मिथिला और देवघाट का ऐतिहासिक सम्बन्ध
मिथिला संस्कृति का विस्तार और प्रभाव तथा सम्बन्ध देवघाट (त्रिवेणी धाम) तक देखा जाता है । नेपाल के अत्यन्त महत्तवपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है त्रिवेणी धाम । जिसे हरिहरक्षेत्र भी कहा जाता है । इस स्थान में स्वर्णभद्रा, पूर्णभद्रा और नारायणी का संगम है इसलिए इसे त्रिवेणी कहा जाता है । इन नदियों को सोना, पञ्चा और नारायणी नदी भी कहा जाता है । त्रिवेणी का यह क्षेत्र त्रिकुट पर्वत के बीच भाग में अवस्थित है । इन पर्वतों में से एक को स्वर्णस्वरुप, दूसरे को ताम्रस्वरुप और तीसरे को लौह स्वरुप माना जाता है । इसलिए इन नदियों के नाम भी इसी के अनुसार स्वर्णभद्रा, पूर्णभद्रा और कृष्ण गण्डकी कहा जाता है । इसका प्रभाव यहाँ की मिट्टी और पानी में भी देखा जाता है । इस पर्वत के सन्दर्भ को लेकर इस इस क्षेत्र को त्रिवेणी की संज्ञा दी गई है । इस स्थान का महत्तव इसलिए भी अधिक है क्योंकि यही वह क्षेत्र है जहाँ शालग्राम पाया जाता है । आदिकवि बाल्मीकि का पवित्र आध्यात्मिक धाम यहाँ अवस्थित है जो यह दर्शाता है कि मिथिला का सम्बन्ध त्रिवेणी धाम से भी है । गज और ग्राह के युद्ध में गजराज का उद्धार भगवान विष्णु ने किया था वह दिव्य गजेन्द्रमोक्ष धाम भी यहाँ अवस्थित है । सभी वाधाओं से मुक्त करने वाले शालिग्राम का यह क्षेत्र है इसलिए इस क्षेत्र को मुक्तिक्षेत्र भी कहा जाता है । मुक्तिनाथ भगवान् विष्णु का सिर और दामोदर कुण्ड को चरणारविन्द सिद्धाश्रम हरिहर क्षेत्र माना जाता है ।
बाल्मीकि आश्रम इस हरिहर÷त्रिवेणी क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण स्थल है । यह आश्रम त्रिवेणी से लगभग ४ किलोमीटर पूर्व दक्षिण की ओर भारत की सीमा के नजदीक चितवन जिला में है । यहाँ आदिकवि बाल्मीकि आश्रम का खण्डहर है । माना जाता है कि यहीं बाल्मीकि ने आद्यकाव्य रामायण की रचना की थी, सीता को दूसरा वनवास यही मिला, यहीं लव और कुश का जन्म तथा शिक्षादीक्षा हुई । यहाँ बाल्मीकि आश्रम के अवशेष के रूप में बाल्मीकि आश्रम का खण्डहर, सीता का पाताल प्रवेश की जगह, लव और कुश द्वारा रामचन्द्र के घोड़े को बाँधने के लिए प्रयोग किया गया विशाल स्तम्भ, प्राचीन मूर्ति, हवनकुण्ड, कुआँ यहाँ पाया जाता है ।
ऐतिहासिक दृष्टि के अनुसार प्राचीन ब्राह्मण काल में यह भूभाग कौशल राज्य के अन्तर्गत था जो बाद में पौराणिक काल में यहाँ का प्राचीन सदानिरा जिसे अभी नारायणी के नाम से जाना जाता है वह नदी कौशल और विदेह की सीमा से बहने लगी जिसके कारण यह क्षेत्र विदेह या मिथिला राज्य में मिल गया । बाद में ऐतिहासिक काल में यह विदेह वा मिथिला राज्य तिरभुक्ति वा तिरहुत राज्य के नाम से जाना गया । ग्यारहवीं शताब्दी में तिरहुत राज्य की राजधानी सिम्रौनगढ हो गई ।
चितवन, नवलपरासी और तनहुँ जिला की सीमा से आबद्ध त्रिशूली और कालीगण्डकी का संगमस्थल देवघाट का अस्तित्व त्रेतायुग से है । इस क्षेत्र को नैमिश्यारण्य की पूर्वी सीमा और गण्डक पूर्व के बृहदारण्य के पश्चिम का संगमस्थल भी कहते हैं । इस पवित्र हरिहर क्षेत्र की सीमा दक्षिण में नवलपरासी के त्रिवेणी वाल्मीकि आश्रम देवघाट से उत्तर में अत्रि ऋषि का आश्रम त्रिशूली (धर्मधारा का) मुहान, पश्चिम की ओर से मारिचिवंशी ऋषि का आश्रम यशोधारा (बूढी गण्डकी) का मुहान, नारदवंशी ऋषियों की तपस्थली दरौंदी (विश्वधारा)का मुहान, पुलश्य ऋषि का आश्रम मादी (माद्री) अर्थात् रत्नधारा का मुहान अन्नपूर्ण २ का ग्लोहोमर क्षेत्र, पुल्ह ऋषि की तपस्थली सुवर्ण श्वेत गण्डकी का मुहान माछापुच्छ«े अन्नपूर्ण ४ का क्षेत्र और धौलागिरी श्रृंखला का दामोदरकुण्ड (कृष्ण गण्डकी का उद्गम स्थल नगीच का क्षेत्र) है । सप्तगण्डकी के जलाधार क्षेत्र को हरिहर क्षेत्र को पूर्व पश्चिमी सीमामानने का वर्णन वराह आदि पुराणों में पाया जाता है ।
देवघाट का प्राचीन नाम देवाटवी है यह वाराहपुराण सोमेश्वर, मुक्ति क्षेत्र त्रिवेणी महात्म्य श्लोक १६५ में वर्णित है । वह स्थान जहाँ देवता (आर्यजन, देवगण, ऋषिगण) घूमने जाते हैं उस स्थान को देवाटवी कहा जाता है । जो बाद में देवघाट कहलाया । गण्डकी नदी की उत्पत्ति, मुक्तिनाथ क्षेत्र, शालिग्राम आदि का वर्णन स्कन्दपुराण हिमवत्खण्ड में विस्तार में वर्णित है ।
आज से करीब २८०० वर्ष पहले लिखे गए शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ (१।४।१।१०–१९) के अनुसार विदेह में यव नामक आर्य राजा अथवा सेनापति वैश्वानर अग्नि के साथ अपने पुरोहित ऋषि हरगुण (गौतम)के मार्गदर्शन में कौशल (वर्तमान में सीतापुर गौंडा) और काशी देशों के स्थापित राज्य उत्तर (तराई क्षेत्र)से पूर्व की ओर सदानी के (सप्तगण्डकी, नारायणी) नदी तक पहुँचे थे । जहाँ उन्होंने विदेह (मिथिला) राज्य की स्थापना की । भारतीय वैज्ञानिकों (ईसरो, भामा परमाणु शोधकेन्द्र आदि)के खोज के आधार पर इस कालखण्ड को आज से करीब ४ हजार से ४२ सौ वर्ष पहले का मान सकते हैं । देवघाट के नजदीक में उत्तर में ऋषि रहुगण का आश्रम है, जिसे स्थानीयों के द्वारा राजा रहगुण का मंदिर कहा जाता है । देवघाट केन्द्र की स्थापना इसी कालखण्ड में हुआ है जो श्रीरामचन्द्र के राज्यकाल आज से करीब ३५०० वर्ष पहले ही प्रख्यात हो चुका था ।
राजा पुरुषोत्तम श्रीराम के समय से ही देवघाट ऋषिमुनियों को आकर्षित करता रहा है । तपस्या के लिए हिमालय की उच्च चोटियों से आवर्त यह क्षेत्र हमेशा से ऋषि के लिए उपयुक्त रहा है जहाँ उन्होंने सिद्धता प्राप्त की है । श्रीरामचन्द्र और उनके भाइयों की शिक्षादीक्षा भी इसी क्षेत्र में होने की जनश्रुति है । सीता का गुफा आज भी यहाँ अवस्थित है । इस तथ्य की पुष्टि वशिष्ठ ऋषि के गुफा से होती है । अयोध्या के रघुवंशी और मिथिला के जनक साम्राज्य के क्षीण होने के बाद भी क्रमशः महाभारत युद्धकाल आज से करीब ३ हजार वर्ष के बाद भी देवघाट का महत्तव सर्वसिद्ध है ।
हाल में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के जनकपुरधाम की और मुक्तिनाथ धाम की यात्रा ने इस स्थान को एकबार फिर से विश्व के सामने प्रसिद्धि दिलाई है । नेपाल के ये धार्मिक स्थल पर्यटकीय दृष्टिकोण से भी अत्यन्त महत्तवपूर्ण हैं जिससे नेपाल की समृद्धि का रास्ता खुल सकता है । भारतीय प्धानमंत्री ने अपनी यात्रा के दौरान रामायण सर्किट की बात कही है जिसे भारत के अयोध्या से होते हुए जनकपुर धाम से लेकर देवघाट(गण्डकी क्षेत्र) मुक्तिनाथ तक जोड़ जा सकता है । क्योंकि यह सभी स्थान त्रेतायुग और मिथिला संस्कृति से आबद्ध है । इस दिशा में नेपाल सरकार को यथाशीघ्र ध्यान देने की भी जरुरत है क्योंकि इससे देश के विकास की सम्भावनाएँ भी जुड़ी हुई हैं ।

सहयोगी आलेख एवं पुस्तक
वैदिक युगको धार्मिक पर्यटन स्थल देवघाटः शिवराज श्रेष्ठ मल्ल, खनाल, मोहनप्रसाद (२०५५), पश्चिम नेपालका मूर्ति र स्थापत्य, काठमाडौँ, नेपाल र एसियाली अनुसन्धान केन्द्र । गिरी, गितु (२०५९), लुम्बिनी अञ्चलका सांस्कृतिक पर्यटकीय स्थलहरू, भैरहवा, लुम्बिनी युवा ग्रामीण विकास समाज । ज्ञवाली, हिमलाल (२०७१ चैत्र ०७२ बैसाख), नजिकबाट नवलपरासी, लाली गुराँस, वर्ष, ३६, अङ्कः ५ पृ. ११५—११९ । पाण्डे, नारायणप्रसाद (२०६५), श्री त्रिवेणी धाम एक परिचय, नवलपरासी सन्देश, वर्ष , अङ्कः १, पृ. ४८—४९ । बाबा, मुक्तिनाथ (?), अमोघ सङ्कल्प, काठमाडौँ अखण्डज्योतिबाबा स्वामीश्रीजी च्यारिटेबल ट्र्स्ट । भट्टराई, इन्द्रप्रसाद (२०६९), गण्डकी शालग्राम महात्म्य (दो. सं.), नवलपरासी लक्ष्मीदेवी भट्टराई । योगी, नरहरिनाथ (२०७१), हिमवत् खण्ड (द्वि. संस्क.), काठमाडौं नई प्रकाशन । विकीपीडिया, गुगल आलेख ।

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