Wed. Nov 14th, 2018

भारत–नेपाल संबंधों में महिलाओं का स्तर : डॉ. गीता कोछड़ जायसवाल

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | पीएम ओली ने प्रधान मंत्री के रूप में अपने अंतिम कार्यकाल के दौरान कई मुद्दों में उथल–पुथल पैदा की थी, और अब जबकि वह कम्युनिस्ट नेता के सामूहिक प्रतिनिधि के रूप में सत्ता में आए हैं तब नेपाल में कई ज्वलंत मुद्दे उभर कर बाहर आ गए हैं । इनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं २०१५ के संविधान के खिलाफ मधेसी लोगों का विरोध । अन्य प्रावधानों की कड़ी आलोचना के अलावा, दृढ़ विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा संविधान में महिलाओं के अधिकारों और समानता का है, जिसने मधेसी महिलाओं की स्थिति को नीचे गिराकर नेपाली समाज को उप–वर्ग में कर दिया है और उन्हें समाज में ‘अन्य’ वर्ग के रूप में रखा गया है ।
अन्य’ की धारणा
एक अमेरिकी समाजशास्त्री और सामाजिक मनोविज्ञान के संस्थापक जार्ज हर्बर्ट मीड (न्भयचनभ ज्भचदभत ःभबम) ने ‘स्वयं’ की धारणा पर विचार–विमर्श प्रस्तुत किया है । उनके अनुसार, ‘स्वयं’ का आकार अपनी क्षमता के अनुसार सामाजिक होने में आधारित है । उन्होंने यह भी कहा है कि समझौता, असहमति, और अन्य लोगों के साथ वार्ता के माध्यम से ‘पहचानें’ उत्पन्न की जाती हैं, जहां हम इन व्यवहारों के बारे में बातचीत और आत्म–प्रतिबिंब के आधार पर अपने व्यवहार और हमारी स्वयं की छवि को समायोजित करते हैं । समाज में इस बातचीत और अस्तित्व के माध्यम से पुरुष और महिला दोनों अपनी दुनिया का निर्माण करते हैं ।
नेपाल के संदर्भ में इस विचार विमर्श को स्थापित करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि महिलाओं को नेपाली समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में एक अपर्याप्त और असहाय वर्ग के रूप में स्वयं को प्रतिबिंबित करने के लिए तैयार किया जाता है । हालांकि, नेपाल में कई इस धारा का विरोध यह कहकर करेंगे की विभिन्न समुदायों में महिलाओं की स्थिति और किसी विशेष समुदाय में महिलाओं का उत्पीड़न नेपाल की विभिन्नता को दर्शाता है, लेकिन अहम मुद्दा यह है कि नेपाल में महिलाओं की संस्थागत भूमिका और स्थिति क्या है ?
नई समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के मुताबिक, राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों में ५० प्रतिशत महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य है और उसी संख्या को चयन प्रक्रिया में जीती गई कुल सीटों में बनाए रखना चाहिए, लेकिन व्यावहारिक रूप में जाति, समुदाय और क्षेत्र के आधार पर महिलाओं का संरचनात्मक पक्षपात और बहिष्कार होता है । क्योंकि संविधान सभा में अन्य वर्गों का कुल प्रतिनिधित्व असमान है, इसलिए इन वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं की वास्तविक संख्या भी बहुत कम है । इसके अलावा, पार्टी की केवल एक सीट जीतने के मामले में किसी भी लिंग को स्थापित करने के प्रावधान के चलते महिलाओं का असली प्रतिनिधित्व ५० प्रतिशत दर से काफÞी नीचे हैं ।
यह सामाजिक पदानुक्रम की वजह से है जहां महिलाओं को परिवार प्रणाली में ‘अन्य’ या ‘बाहरी’ के रूप में देखा जाता है और समाज उन्हें नर–वर्चस्व वाली सामाजिक संरचना में सबसे निचले स्तर पर देखता है । भारत–नेपाल संबंधों के संदर्भ में इस विचार के पंखों का विस्तार करें तो इस बहिष्कार की पहचान करना आसान है क्योंकि कई भारतीय महिलाएं नेपाली पुरुषों से विवाहित बंधनों से जुड़ी है, परंतु नेपाली समुदायों की मुख्य धारा की आवाज के रूप में उन्हें समेकित नहीं किया गया है ।
भारत–नेपाल संबंधों में महिलाएं
विवाह एक मजबूत कारक है जो समुदायों और लोगों, विशेष रूप से नेपाल के तराई क्षेत्र को भारत से बांधता है । लेकिन, अगर हम राष्ट्रों के इतिहास को देखते हैं और साम्राज्यों के विस्तार पर विचार करते हैं, तो समुदायों ने युद्ध से बचने के लिए और शांति बनाए रखने के लिए विवाह बंधन का सहारा लिया है । कई बार, एक समुदाय के लोगों ने शक्तिशाली राजाओं के क्रोध में समर्थन और संरक्षण को पाने के लिए अपनी बेटियों का त्याग किया है । इसलिए, ‘विवाह’ को राष्ट्रीय हित में कूटनीति के रणनीतिक साधन के रूप में उपयोग किया गया है । भारत–नेपाल संबंधों में लगातार इन सीमा–पार विवाह और समुदायों की निकटता के कारण को ‘रोटी–बेटी’ संबंधों के रूप में पहचाना गया है ।
महत्वपूर्ण मुद्दा नए संविधान में शामिल तर्कहीन और असमान प्रावधान है जो भारतीय (या सभी विदेशी) महिलाओं को समान नागरिकता अधिकारों से वंचित करते है । भले ही जमीन की वास्तविकता इस तथ्य से प्रभावित है कि सीमा पार विवाह अत्यधिक है, लेकिन न तो दोहरी नागरिकता के अधिकार मौजूद हैं और न ही प्राकृतिककरण द्वारा नागरिकता स्वीकार की जाती है, जो महिलाओं को सबसे कमजोर स्थिति में डाल देती है । प्रावधान नेपाली महिलाओं के लिए अधिक भेदभावपूर्ण हैं क्योंकि यदि पति एक विदेशी है (जो संभवतः भारतीय है) तो नेपाल में १५ साल तक इंतजार के बाद ही नागरिकता पा सकता है और उनके बच्चे को नागरिकता नहीं मिल सकती । इसलिए, संविधान में असमानता को संस्थागत बनाया गया है और नेपाली पुरुषों को नेपाली महिलाओं पर नियंत्रण रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ।
मानव तस्करी–एक विनाशक
खुली सीमा सभी प्रकार की आपराधिक गतिविधियों का केंद्र रहा है । हालांकि, सबसे बुरी समस्या मानव तस्करी की है । दशकों से, दिल्ली नेपाल से भेजी और परिवहन की गई युवा लड़कियों का एक केंद्र रहा है, जहाँ उन्हें पैसे के लिए बेच दिया जाता है । कुछ गैर–सरकारी संगठनों की रिपोर्टों के मुताबिक, प्रत्येक वर्ष १२,००० से १५,००० लड़कियां सीमा पर नेपाल से तस्करी की जाती हैं और उन्हें भारत में बेचा जाता है ।
पिछले कुछ सालों से, दिल्ली लड़कियों के लिए पारगमन के केंद्र में परिवर्तित कर दिया गया है जहाँ से खाड़ी और अन्य देशों में तस्करी कर के लड़कियाँ भेजी जा रही है । हाल ही की एक रिपोर्ट में, १६ नेपाली लड़कियों को कुवैत और दुबई में तस्करी करने के रास्ते पर दिल्ली में बचाया गया । यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट बताती है कि उनमें से ज्यादातर स्वेच्छा से आयी है और वह चाहती है कि उन्हें खाड़ी के स्थलों पर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए । यह नेपाल में गरीबी और पिछड़ेपन की दशा को दिखाता है जहां परिवार अपनी बेटियों को खÞुद के बेहतर जीवन जीने की लालसा के लिए भेजने और बेचने के इच्छुक हैं । यह नेपाल के कई गरीब और पिछड़े गांवों में नौकरी, विवाह, या शिक्षा के लिए एक व्यवसाय बन गया है ।
इसके साथ साथ नेपाल में भारतीय महिलाओं के प्रति व्यवहार का मुद्दा है । यह एक ज्ञात तथ्य है कि कई नेपाली पुरुष भारतीय महिलाओं को विवाह के लिए पसंद करते हैं क्योंकि वह दहेज में भारी रकम ला सकती हैं और नेपाल में उस व्यक्ति के प्रमुख अधिकार के प्रति संवेदनशील रहेगी, क्योंकि नेपाल के प्रावधान भारतीय महिलाओं को समान नागरिकता अधिकार प्राप्त करने की अनुमति नहीं देते हैं । यह प्रावधान नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर निहित है जो भारत को नेपाल की संप्रभुता और नियंत्रण के लिए खतरा मानते है । इसलिए, नेपाल में महिलाएं ‘असमान’ स्थित, श्रेष्ठता और राष्ट्रीय गौरव की विषय बन गई हैं और कूटनीति में ‘रोटी–बेटी’ का बहाना किया जाता है । महिलाओं को भारत के संबंध में लाभ और रुचि के साधन के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन उन्हें नेपाल में ‘अन्य’ श्रेणी के रूप में रखा गया है जो संबंधों में समानता के लिए संरचनात्मक रूप से समाहित नहीं हैं ।

(डा.गीता कोछड़ जायसवाल चीन में संघाई फुतान विश्वविद्यालय में अस्थाई प्रोफेसर हैं, और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर है ।)
प्रस्तुतिः सीपु तिवारी

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