Tue. Dec 11th, 2018

नये नेपाल की परिकल्पना – श्यामानन्द सुमन

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,नेपाल के इतिहास के सबसे आधुनिक कालखण्ड में कुछ अप्रत्यासित घटनाएं÷परिघटनाएं घटी, जो नये नेपाल की आधारशिला के रूप में देखी जा सकती है । सन् १९९४ से २००६ तक चले नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी, माओवादी का १२ वर्षीय सशस्त्र जनयुद्ध (गृहयुद्ध) तथा आम जनता की २००६ की १९ दिनों के जनआन्दोलन भाग–२, २००७ के मधेशी, थारु तथा जनजातियों आदि के आन्दोलन और तत्पश्चात माओवादी तथा बहुदलवादी राजनीतिक पार्टियों के बीच हुए विस्तृत शान्ति सम्झौता तथा प्रथम संविधानसभा का शान्तिपूर्ण आमनिर्वाचन होना नेपाल के राजनीतिक आकाश में चमकते सितारे के रूप में और आम नेपालियों के इक्षित परिकल्पनाओं के रूप में परिलक्षित होने लगा । देश में विद्यमान वर्गीय, जातीय, क्षेत्रीय, लैंगिक समस्या और भेदभावपूर्ण व्यवहार के अन्त होने के आसार दिखाई देने लगे । कानूनी राज्य की अवधारणा और लोकतान्त्रिक मूल्य–मान्यता की प्रतिबद्धता की प्रतिज्ञा भी की गई ।

 

 

यह सारी कल्पनाएं रामराज्य से कम नहीं थी । इन्हीं कल्पनाओं के आधार पर करीब ढाई सौ साल से चली आ रही राजतन्त्र, जिसे सामन्तवादी व्यवस्था कहा गया, को समाप्त कर संघीय लोकतन्त्रिक गणतन्त्रात्मक नेपाल की स्थापना हुई । यह एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी नेपाल के लिए जिसे संविधानसभा के मार्फत उद्घोष किया गया । इस नये व्यवस्था से ही नेपाल के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूपान्तरण किया जाएगा, जहां हर प्रकार के शोषण, भेदभाव, असमानता, कठिनाइयां, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि का अन्त होकर देश में खुशहाली आएगी, इन्ही सदिक्षा और कल्पना के आधार पर संघीय नेपाल की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पुनर्संरचना की गई । पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था का अन्त कर संघीय, प्रदेशिक और स्थानीय सरकार की ३ तहों की सरकार बनाई गई । इससे नेपाल के हर गांव, हर शहर में सिंहदरबार का नारा लगा अर्थात् सिंहदरबार (काठमांडू) से जो शासन व्यवस्था अभी तक चल रही थी, उसे नेपाल के ७ प्रदेश और ७५३ स्थानीय तह यानि नगर और गांवपालिका के क्रियाशील शासन द्वारा हर गांव हर शहर शासित होगा । इस तरह देश में खुशहाली आने की परिकल्पना की गई ।

 

उपरोक्त परिकल्पनाओं को प्रथम बार तब झटका लगा, जब प्रथम संविधानसभा द्वारा नेपाल का संविधान ही नहीं बनाया जा सका । यह संविधानसभा जिसे ६०१ सदस्यीय जम्बो संविधानसभा कहा गया, सिर्फ २ सालों में नये संविधान को बनाने की व्यवस्था अन्तरिम संविधान में की गई थी, पर असंवैधानिक तरीका से बारबार अन्तरिम संविधान का संशोधन कर दो साल के समयसीमा को ४ साल तक बढ़ा कर भी संविधान नहीं बना सका । समयावधि और बढ़ाने की बात हुई तो नेपाल के न्यायपालिका को आगे आने पड़ा । सर्वोच्च अदालत ने संविधानसभा की अवधि को और बढ़ाने की बात में रोक लगाते हुए अभी तक दिए गए समयसीमा के अन्तरगत ही नये संविधान बनाने की बात कही । तब भी संविधान नहीं बन सका और संविधानसभा का अन्त हो गया । यहां यह बात उल्लेखनीय है कि संविधानसभा का गठन ही गलत ढंग से किया गया था, जहां संविधान बनाने के लिए सौ विद्वान÷राजनीतिक व्यक्ति ही काफी थे, वहां ६०१ व्यक्तियों का सभा बनाया गया । इसमें राजनीतिक नेताओं ने अपने सगे संबंधियों को स्थान दिया, जैसे अपने श्रीमती, बेटा–बेटी, बहु–जमाई, अपने पार्टी के कार्यकर्ता आदि आदि । इसमें तो संविधानविद् को स्थान मिलना चाहिए था, जो नहीं किया गया । दूसरी बात, करीब–करीब, सभी संविधानसभा सदस्यों को काफी आर्थिक आमदनी के साथ विदेश (अमेरिका, बेलायत, स्वीटजरल्याण्ड, रुस, अस्ट्रेलिया, जापान, फिलिपिन्स, थाइल्याण्ड, भारत, चीन सहित अन्य कई देश) भेजा गया, सिर्फ यह देखने के लिए की उन देशों में संघीय शासन व्यवस्था कैसे चलती है और उन्होंने संविधान कैसे बनाया । जब कि आज की दुनियां में इन्टरनेट से सारी जानकारियां अपने घर या अफिस में बैठे ही किया जा सकता है । वैसे भी नेपाल में अब संविधानशास्त्र में पीएचडी करनेवालों की कोई कमी नहीं है, वे आसानी से और बिना खर्चे के दुनियां के हर देश के संवैधानिक प्रक्रिया और कानूनी दायरा की जानकारियां उपलब्ध करा सकते थे । पर उन संवैधानिक विशेषज्ञों को शामिल ही नहीं किया गया । असल में राजनीतिज्ञों को अपना, अपने परिवार के सदस्यों को और पार्टी कार्यकर्ताओं को संविधानसभा सदस्य का ओहदा देकर तनखा और भत्ता का लाभ जो देना था । आखिर में विभिन्न पार्टियों के ५–१० वरिष्ठ नेता गण ही तो संविधान बनाए । संविधान के ड्राफ्ट को ‘ड्यू प्रोसेस’ में जाकर पूर्ण विचार विमर्श से नहीं बल्कि सभाध्यक्ष के मनमाानीपूर्ण ढंग से और टेबुल ठोककर ही नेपाल का नयां संविधान २०१५ दूसरे संविधानसभा के मार्फत पास कराया गया ।
एक तो प्रथम संविधान के अन्त होने में न्यायपालिका का हस्तक्षेप हुआ, वही दूसरी तरफ नये सरकार (मन्त्रिपरिषद्) बनाने में प्रजातान्त्रिक व्यवस्था की हत्या की गई । बहुदलीय पक्षधर नेतागण, सर्वोच्च अदालत के मुख्यन्यायाधीश को ही नये मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष बनाकर गैर राजनीतिक सरकार का गठन किया और मुख्यन्यायाधीश का ‘लियन’ भी सर्वोच्च अदालत में रखा । इसतरह कार्यपालिका और न्यायपालिका एक ही व्यक्ति के अधीन रहा । वैसे मुख्यन्यायाधीश काम में एक्टिभ नहीं थे, फिर भी विश्वप्रसिद्ध मन्टेस्क्यु के ‘सेप्रेसन ऑफ पावर’, जिसे प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का मानक माना जाता है, उसकी पूर्ण रूप से अवहेलना की गई और इसी मन्त्रिपरिषद् द्वारा दूसरे संविधानसभा का चुनाव हुआ और वि.सं. २०७२ आश्विन ३ गते को संविधान जारी किया गया । इस संविधान के जारी होते ही ‘प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः’ हुई । अर्थात् जहां एक ओर काठमांडू और पहाड़ी समुदाय ने दीपावली मनाई, वही दूसरी ओर मधेश और मधेशी समुदाय ने ‘ब्याल्कआउट’ कर काला दिवस मनाया । मतलब आधी जनसंख्या ने दीपावली मनाया और आधी ने जनसंख्या ने काला दिवस । मधेशियों का कहना था कि यह संविधान मधेश और मधेशियों के प्रति संवेदनशील नहीं रहा और उनकी भावनाओं और आकाक्षांओं का सम्मान नहीं कर सका । अतः इस संविधान का पुनर्लेखन या संशोधन कर सम्पूर्ण देशवासी का समर्थन लेना चाहिए, जिससे मधेशी समुदाय भी संविधान का अपनत्व ग्रहण कर सके । अब तो हर साल संविधान दिवस पर एक ओर दीपावली और दूसरी ओर काला दिवस मनाया जाता है । जो भी हो इसी संविधान के अन्तर्गत तीनों तह (जैसा की संविधान में प्रावधान है) का निर्वाचन और तीनों तह में सरकार का गठन होकर संविधान कार्यान्वयन में आ चुका है । प्रधानमन्त्री सहित सत्तापक्ष के नेतागण जबतब संविधान संशोधन की बातें करते हैं, पर संशोधन की प्रक्रिया से उदासीन रहते हैं ।
यद्यपि ‘सब में समानता और सब को समान अवसर’ संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपाल का नारा है, पर यह अभी तक जनता के सपना के रूप में ही स्थापित है । सरकार के सभी अंगों में समानुपातिक सहभागिता का जो प्रावधान संविधान में किया गया है, उसका भी कार्यान्वयन आंशिक रूप में मात्र किया जा रहा है । लोकतान्त्रिक समाज की जो परिकल्पनाएं होती है, जैसे कानून का शासन, पूर्ण मानवअधिकार, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, निर्वाध प्रेस स्वतन्त्रता, राज्य सत्ता में सेप्रेसन ऑफ पावर और चेक एण्ड व्यालेन्स, जनता के जानमाल की सुरक्षा की ग्यारेन्टी, सब को समान अवसर आदि अभी तक एक चुनौती बनी हुई है ।
राज्य सत्ता के पुराने राजतन्त्रतात्मक और एकल संगठनिक व्यवस्था का अन्त हो चुका है और अब तीन तहों के नये ढांचे में सरकार की काम, कारवाही हो रही है, पर संघीय राजनीतिक व्यवस्था का जो मूलमन्त्र ‘सेल्फ रुल एण्ड सेयर्ड रुल’ होता है, उसमें कटौती कर ही दी गई, केन्द्रीय सरकार को अभी भी सभी अधिकारों से लैस रखा गया है, जबकि राज्य सरकारों को एक निरीह प्राणी के रूप में स्थापित किया गया है । अर्थात् मूल विषयों में राज्यों को केन्द्रीय कानून के अन्तर्गत ही काम करना होगा, ऐसा ही प्रावधान नये संविधान में अधिकारों के बंटवारे में किया गया है । हां, स्थानीय अर्थात् नगर और गांवपालिका के अधिकारों में पहले की वनिस्पत कुछ इजाफा हुआ है । साथ ही राज्य और स्थानीय तहों के भौगोलिक सीमांकन भी अवैज्ञानिक और मनोमानी ढंग से किया गया है । यह सीमांकन न भौगोलिक फीचर में बांध कर किया गया है, न कि जनसंख्यात्मक और न ही एथनिसिटी के आधार पर । यह तो कुछ गिनेचुने राजनीतिक नेताओं के अपने कन्सटीच्युएन्सी के आधार पर डिमार्केसन किया गया है ताकि वे अपने–अपने प्रभुत्ववाले स्थानों से चुनाव जीतकर सांसद् और मन्त्री बन सके । इसे राजनीतिक भाषा में ‘जेरीमैन्डरिङ’ कहा जाता है । इसे नेपाल के सभी बुद्धिजीवी जानते हैं । राज्यों की भौगोलिक सीमा इसतरह स्थापित किया ताकि केन्द्रीय और राज्यों की सत्ता में अमुक पार्टी और अमुक नेता ही पदासीन हो सकें ।
यहां एक बात उल्लेखनीय है कि प्रथम संविधानसभा (व्यवस्थापिका संसद्) के समय में ही देश भर उन सांसदों को प्रत्येक जिला में भेजकर एक सर्वेक्षण कराया गया था कि आम जनता की चाहना क्या है, और देश की शासन व्यवस्था को किस कदर देखना चाहती है । इस सर्वेक्षण में अन्य स्थानीय बातों के अलावा राष्ट्रीय सन्दर्भ में मुख्य रूप से कुछ बातें उभरकर आई थी कि देश की शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री का सभी जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन हो और नेपाल एक हिन्दू राज्य के रूप में कायम हो । पर वे दोनों–तीनों बातें नहीं हो सकी इस संविधान में । सांसदों की बेईमानी और राजनीतिक दलों की विदेशी प्रभाव से यह संभव नहीं हो सका । उक्त देशव्यापी सर्वेक्षण का दस्तावेज संसद् सचिवालय के अभिलेखालय में अभी भी सुरक्षित होने का अनुमान लगाया जा सकता है । सांसदों का एक और बेईमानी उजागर होता है– सभी पार्टियों के नेतागण और सांसद् यह भाषण देते थकते नहीं थे कि प्रथम संविधानसभा में सांसदों के बीच जितनी सहमति (करीब ८०–९० प्रतिशत) हो चुकी थी, उसी को आधार मानकर दूसरी संविधानसभा द्वारा निर्णय और अग्रिम कारवाही की जाएगी । पर वहां भी बेईमानी हुई, खासकर राज्यों के सीमा संबंध में । प्रथम संविधानसभा के सीमांकन संबंधी समिति और आयोग द्वारा दिए गए अलग–अलग विशेषज्ञों के सलाह÷सिफारिश को पूर्ण रूप से नकार कर सीमांकन किया गया, जो अभी तक राज्य–राज्य के बीच और राज्य और केन्द्र के बीच झगड़ा का एक मुद्दा बना हुआ है । और पता नहीं, आग की यह चिंगारी भीतर ही भीतर कब तक सुलगती रहेगी ।
एक वास्तविकता यह है कि नेपाल का संविधान २०१५ कार्यान्वयन में आ चुका है और ३ तह की सरकार भी बन चुकी है । भले ही तीनों तहों में पूर्ण सामंजस्य नहीं है और विकास के कामों में भी समन्वय की कमी है । एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जनता की आकांक्षाओं के अनुसार काम करने की प्रतिज्ञा और विगत के अघोषित भारतीय ब्लाकेट के समय भारत के विरुद्ध अडान लेने की वजह से संसदीय निर्वाचन में एमाले नं. १ बनकर उभर । माओवादी पार्टी भी एमाले के छत्रछांया में ही चुनाव लड़ा और नेपाली कांग्रेस के बाद तीसरे नम्बर पर आया । बाद में माओवादी के साथ मिलकर एमाले ने एक नयां पार्टी का गठन किया, जिसका नाम ‘नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा)’ रखा गया । इस तरह अभी नेकपा के सरकार करीब दो तिहाई बहुमत लिए हुए देश का सरसंचालक बना हुआ है । लोगों खासकर विद्वानों का तार्किक मत है कि अभी की सरकार दो तिहाई के दम्भ से देश में शासन व्यवस्था अपनाए हुए है और प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों की एक नहीं सुनते । साधारणतः देखने में भी आ रहा है कि नेकपा ने जिस प्रकार ‘गुडगभर्नेन्स’ के नारा के आधार पर जीतकर आया और सरकार का गठन किया, वही से गुडगभर्नेन्स में ह«ास आना शुरु हुआ । नये संविधान बनने के बाद देश के संघीय शासन व्यवस्था की पुनर्संरचना कैसे हो, इस संबंध में कई समिति और आयोग बने । इसी सिलसिले में एक प्रशासकीय सुधार आयोग भी बना, जिसका काम, देश के विभिन्न तहों में गुडगभर्नेन्स के लिए प्रशासकीय संगठन कैसे हो, इस संबंध में सलाह देना था, इस आयोग ने केन्द्रीय सरकार के लिए सिर्फ १५ मन्त्रालय रखने का बिस्तृत सुझाव दिया, पर नेपाल में ऐसा सकारात्मक सुझाव कहां लागू हो सकता था ? यहां से तो सिर्फ राजतन्त्र चला गया, पर सामन्तवाद का जड़ कहें या रेमनेन्ट, वह तो अभी भी बांकी ही है । दो तिहाई की सरकार को, उक्त आयोग का सुझाव रास न आया और बहुत सारे प्रस्तावित मन्त्रालयों को तोड़फोड़ कर २१–२२ मन्त्रालय बना दिया गया । यह स्मरणीय रहे कि नेपाल में लक्षित पद के लिए व्यक्ति का चुनाव नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति विशेष के लिए पद को क्रियट किया जाता है । अपने संगे–संबंधियों, इष्टमित्रों, भाइभारदार आदि के लिए मन्त्रालयों का विभाजन किया गया । गुडगर्भनेन्स का सबसे पहले धक्का तो यही लगा । जब कि कहा जा सकता था कि आयोग के सिफारिश के आधार पर मन्त्रालयों को नहीं बढ़ाया जा सकता है । पर होना तो कुछ और ही था । संविधान संशोधन की बात आती है तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी नेतागण गला फाडकर चिल्लाते हैं– संविधान कोई पत्थर में कुदा हुआ रामायण, कुरान और बाइबल नहीं है, संशोधन हो सकता है । पर पहल नहीं करते हैं ।
कुछ ही पहले की बात है– पब्लिक यातायात से लेकर सागसब्जी तक के सिन्डिकेट तोड़ने की बात सरकार ने कहीं । पर यह बात जहां की तहां ही है । संबंधित अधिकारियों और मन्त्रियों का अनुगमन कार्यक्रम तो किसी दूसरे ही ‘परपस’ के लिए होता है, ऐसा सुनने में आता है । देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और पब्लिक सर्भिस के डेलिभरी में व्याप्त भ्रष्टाचार की बातें सभी करते हैं, पर वह कम होने का नाम नहीं लेता । अब तो लोगबाग यह कहने से नहीं कतराते कि देश में भ्रष्टाचार का राजनीतिकरण या राजनीति में भ्रष्टाचारीकरण अर्थात् वे संस्थागत रूप से जड़ गाड़ दिया है । देश में सरकारी सुरक्षा निकायों पर से आम जनता का विश्वास उठ रहा है । देश में बलात्कार, हत्या (जैसे कि निर्मला पन्त की बलात्कार और हत्या प्रकरण), लूटपाट, फेक करेन्सी या अन्य जघन्य अपराध कन्ट्रोल नहीं हो पा रहा है । यहां तक कि सर्वोच्च अदालत द्वारा मानव हत्या के अपराध में सर्वस्व सहित जन्मकैद के अपराधी को आम माफी देकर छोड़ दिया जाता है और जनता द्वारा अत्यधिक वोट से जीते हुए सांसद् को (जिसे अपराधी साबित नहीं किया जा सका है) सांसद् होने का शपथ भी नहीं दिलाया जाता है । वही कई लोग हजारों हजार जनता को मार कर, जिसके विरुद्ध रेडकर्नर नोटिस भी था, वैसे व्यक्ति भी सत्ताधारी बनते हैं । क्या इसे ही गुड गभर्नेन्स कहते है ? आज देश में मेरिटोक्रेसी पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है । आप कितने योग्य हैं ? यह नहीं देखा जाता । बल्कि आप किस बड़े नेता से जुड़े हुए हैं, वही उनकी योग्यता का आधार होता है । जनता की अपेक्षा एक होती है, पर वास्तविकता में कुछ और ही । नेताओं में न उत्तरदायित्व का बोध दिखता है, और न काम–कर्तव्य में एकान्टिविलिटी । देश का प्लानिङ प्रोसेस भी लोपसाइडेट ही कहा जा सकता है । विकास के कामों के लिए सांसदों को करोड़ो का रकम देना भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है । कानूनी राज्य का तो नामों–निशान नहीं दिखता । आम जनता को न्याय और अपराधी को सजाय दिया जाना एक रेटोरिक बन चुका है । खाद्य पदार्थ में अखाद्यवास्तुओं का मिलावट और डेट एक्स्पायर सामानों का तो बाजारों में बिगबिगी ही है । वह भी उँचे दामों पर ।
देश की अर्थ व्यवस्था रेमिट्यान्स पर ही टिकी है, जो वार्षिक आय में करीब एक तिहाई का सहयोग देती है । अगर रेमिट्यान्स का हिसाब न किया जाए तो नेपाल एक फेल्डस्टेट के कगार पर दिखता है । ‘समृद्ध नेपाल सुखी नेपाली’ का नारा नेताओं के भाषण में सीमित हो चुका है । अतः नेताओं का देश विकास का अभिभारा लिए हुए मन्त्रियों, कर्मचारियों को भाषणों और उद्घाटनों को देश के भौतिक–सामाजिक विकास के कामों में अग्रसर होना चाहिए । कृषि संबंधी प्रचुर सम्भावनाएं होते हुए भी विदेश से अरबों–खरबों का खाद्यान्न सामाग्री आयात होता है, निकासी के लिए हमारे यहां प्रोडक्टस् ही नहीं है । उद्योग–धन्दा भी आधोगति में है । हमारे युवा, जो श्रम अपने देश विकास में लगाते, उन्हें अधिक से अधिक संख्या में बाहर जानेवाला ही नीति–नियम दिखता है । दुःख की बात है कि नेपाल संसार के पर्यटक के लिए इतने बड़े सम्भावनाओं का देश है । फिर भी पर्यटकों को आकर्षित नहीं कर पाते हैं, आदि इत्यादि ।
मैं यह नहीं कहता कि संविधान बनने के बाद कुछ सकारात्मक काम हुआ ही नहीं, कुछ हुए होंगे । पर भाषणों से होनेवाले विकास के सौद्धान्तिक बातों को जमीन पर हकीकत में उतरते देखना चाहता हूँ । जनता की आकांक्षा अनेक है, तो उसे वास्तविकता में परिणत करने की सम्भावनाएं भी बहुत है । सिर्फ सत्ता में जमें हुए नेताओं की असली प्रतिबद्धता और उससे पूरा करने की असली मंशा भी चाहिए । उपरोक्त सभी बातों को मध्यनजर रखते हुए यह आवश्यक है कि सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि हम सभी नेपालियों को भी राष्ट्रीय आकांक्षाओं और सपनों को साकार करने के लिए अग्रसर होना चाहिए और समन्वयात्मक ढंग से सहयोग करना चाहिए । सरकार, राजनीतिक पार्टी, नागरिक समाज, मीडिया, निजी क्षेत्र और कहें तो आम जनता को खुद ही आगे आकर आवश्यक पहल करनी चाहिए । पर अपने आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हमें सहासिक और बोल्ड कदम उठाना चाहिए । हमारी दृष्टि व्यवहारिक ज्ञान पर आधारित देशबासियों के समग्र हित, स्थायी शान्ति एवं सम्पूर्ण विकास के लिए होना चाहिए । हमें व्यक्तिगत स्वार्थ को छोड़कर राष्ट्र के वृहत इन्ट्रेस्ट में कार्य करना चाहिए । तभी हम नेपाल को एक लोकतान्त्रिक, इन्क्लुसिभ और समृद्ध राष्ट्र बना सकेंगे ।

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