Sat. Nov 17th, 2018

न्यायालय का नृत्य : रणधीर चौधरी

न्यायालय मे विदेशियाें के निवेश के कारण ऐसी स्थिति सृजना हुई है यह कह कर अपना सफाई पेश करने मे भी नेपाल के ‘न्यायिक दलाल’ पीछे हटने का दुःस्साहस कर सकते हैं ।

रणधीर चौधरी, हिमालिनी मई अंक २०१८ | नेपाल के न्यायालय के इतिहास मे पिछले वर्ष को देखा जाय तो अवस्था धुमिल सी रही । परंतु औपचारिक न्याय प्रणाली मे विश्वास रखने बाले हम जैसे आम नागरिक के पास न्यायालय का विकल्प भी नही है । न्यायालय को साफ और चरित्रवान रखने हेतु हरसंभव प्रयास जारी रहता है । परंतु क्या न्यायालय की नैतिकता को साफ किया जा सकता है या नही, यह प्रश्न सदा सर्वदा अनुत्तरित ही रह जाता है ।
नेपाल के संविधान ने स्वतन्त्र न्यायालय की पवित्र परिकल्पना की है । और किसी समय मे नेपाल द्वारा अंगीकार किए गए न्याय परिषद द्वारा न्याधीश नियुक्त करने की व्यवस्था को सराहनीय और उदाहरणीय कह कर प्रचारित भी किया गया । परंतु व्यवस्था स्वंय कर भी क्या सकती है ? व्यवस्था के कार्यन्वयनकर्ता ही राजनीति की चौकठ पर माथा टेक दे तो कल्पना क्या की जा सकती है ? राजनीतिक स्वार्थ, नातावाद, कृपावाद और भ्रष्टाचार जैसी प्रकटित और अप्रकटित अवयवों को सर आँखो पर रख काम करने लगता है जब कार्यान्वयनकर्ता बिक जाय । और ऐसी अवस्था में परिणाम वही होता है जो नेपाल मे देखा जा रहा है । वैसे अवस्था भारत की भी कुछ अजीब ही है । कहने की जरूरत नही है कि कुछ ही महिनों पहले भारतीय न्यायिक इतिहास मे पहली बार भारतीय सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ न्यायमुर्ति ने सार्वजनिक रूप से ही भारतीय प्रधानन्यायाधीश के क्रियाकलाप को ले कर अपनी असन्तुष्टि प्रकट की थी । ऐसी अवस्था मे न्यायालय के प्रति अगर जनविश्वास को बचाए रखना है तो परम्परागत शैली से उपर उठ कर पृथक शैली और पद्घति को अभ्यास मे लाना जरुरी है । अगर स्वतन्त्र न्यायपालिका को जवाबदेह नही बनाया गया तो राज्य पुनरसंरचना का मूल मर्म भी पूरा नहीं हुवा न हम केवल इस पर प्रश्न खड़ा करने ने वंचित होंगे अपितु न्यायालय की गरिमा का स्तर स्खलन होने पर भी लोग बहानेबाजी कर सकते हैं जो की खेद जनक है । न्यायालय मे विदेशियाें के निवेश के कारण ऐसी स्थिति सृजना हुई है यह कह कर अपना सफाई पेश करने मे भी नेपाल के ‘न्यायिक दलाल’ पीछे हटने का दुःस्साहस कर सकते हैं ।
दूसरा जत्था है नेपाल मे जो कि न्यायालय मे कर्मचारीतन्त्र द्वारा राजनीतिकरण के कारण न्यायालय धारासायी होता जा रहा है यह कह कर अपना आधारहीन तर्क दे कर अपना पल्लु झाड़ने में लगे रहते हैं । अगर ऐसा ही है तो इसका समाधान क्या है और इसमे पहलकदमी कौन उठाने जा रहा है, कोई भी बोलने को तैयार नहीं ।
न्यायपालिका के प्रमुख खिलराज रेग्मी को कार्यपालिका प्रमुख बनाने वक्त खुशमिजाजी प्रकट करने वाले कथित स्वतन्त्र नागरिक समाज, एक निवर्तमान प्रधानन्याधीशद्वारा न्यायपलिका विरुद्घ विषवमन किए जाने पर कठोर मौन ग्रहण करते दिखते हंै । न्यायिक संरचना को न्यायिक प्रक्रिया से नही बल्कि किसी खास व्यक्ति द्वारा प्रसारित हल्ला के माध्यम से परिवर्तित करने का सपना देखने वाले नागरिक समाज का यह मानना कि केवल वही ईमानदार है और वो ही न्यायालय को सुधार सकते हैं । वास्तव में यह ऐसी सोच है जो न्यायालय को बर्बाद करने पर लगे हैं । नागरिक समाज की स्वेच्छाचारिता मे गंभीर प्रश्न खड़ा होना अस्वाभाविक नहीं है ।
और वर्तमान अवस्था में जहाँ कार्यपालिका और न्यायपालिका जब राष्ट्रवाद को मजबूत करने में लगा हो और सामान्य नागरिक की तरफ से मौलिक प्रश्न करने पर न्यायपलिका मे विदेशी हस्तक्षेप बढ़ने के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है तो ऐसी बेतुके तर्क को कैसे आम जन विश्वास करे ?
आम पीडि़त का मुद्दा वर्षों तक अदालत मे उलझा रहना, कई सारे मुद्दे में तुरन्त सुनवाई होना, अदालत में कौन सा मुद्दा किस न्यायाधीश के बेन्च में रखा जायगा और उसी के आधार पर फैसला के बारे में अनुमान लगा लेना अवश्य ही नेपाली न्यायालय में चिन्ता का विषय है । राजनीति बँटवारा के आधार पर न्यायाधीश नियुक्ति और न्यायाधीश का परवरिश करना ही यह चिन्ता जनक विषय का प्रमुख डरावना कारक है । तो ऐसे मे भला आम आदमी न्याय प्राप्ति के लिए कहा जाए ?
देश संघीयता मे चले जाने के वावजूद भी नेपाली न्यायालय को संघीयता को छू भी नहीं पाना न्यायालय के द्वारा ही संविधान को विरोध करना है, यह आम समझ सा लगने लगा है । इतना ही नही न्यायिक नियुक्ति के वक्त समावेशी समानुपातिक सिद्घान्त का दिन दहाडेÞ मजाक उड़ाने का छूट भी ही न्यायालय को । जबकि न्यायधीश नियुक्ति का पहला और सर्वमान्य आयाम योग्यता होनी चाहिए । परंतु यह योग्यता कौन, कैसै और क्यों यह यक्ष प्रश्न का जवाब कौन देगा ? शैक्षिक योग्यता, कार्यदक्षता, कार्यानुभव अवधि और अन्य मानक जो योग्यता निर्धारण करता हो ऐसे प्रश्नों का जवाब कैसे दिया जाय ? इसका निरुपण न करने पर विगत में न केवल न्यायाधीश नियुक्ति विवादित हुआ अपितु अमुक पार्टी का न्यायाधीश कह कर अमुक न्यायाधीश के गरिमा के साथ खिलवाड़ किया गया, सार्वजनिक रूप में ।
देश संघीयता मे प्रवेश कर जाने के बाद भी न्यायिक नियुक्ति व्यवस्था का भी संघीयकरण होना चाहिए या नही । ऐसे गहन बिषय पर छलफल प्रारम्भ न होना न्यायिक जवाबदेही के गलियाराें का यह भी नई विकृति के रूप मे चित्रित होता दिख रहा है ।
न्यायपरिष्द मे पुनर्संरचना की आवश्यकता पर बहुत सारे विज्ञ ने कलम चलायी है और वकालत भी काफी हुई है इस विषय पर । तसर्थ, सर्वोच्च अदालत का न्यायाधिक नियुक्ति का आधार, प्रक्रिया और पद्घति को पुनर्मूल्यांकन करने का वक्त अगर वास्तव में आ गया है तो अब लोगों का ध्यान इधर केन्द्रित होना समय की माँग है । उच्च अदालत का न्यायाधीश नियुक्ति का आधार, प्रक्रिया और पद्घति में प्रदेश सरकार को भी किसी प्रकार से अधिकार सम्पन्न बनाए जाएगा या नही ? जनउत्तरदायी शासन पद्घति जैसै अमूर्त और महत्वपूर्ण विषय के ऊपर बहस करना और जनउत्तरदायी न्यायिक पद्घति के ऊपर बहस करने की आवश्यकता न देख पाना “बौद्घिहस्तमैथुन” के अलावा कुछ नही । इसी सन्दर्भ मे, न्यायाधीश नियुक्ति, सरुवा बढुवा को समेत जनउत्तरदायी, जवावदेही, स्वतन्त्र और सक्षम बनाने की आवश्यकता है ।

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