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नेपाल और भारत–चीन सम्बन्ध : उपेन्द्र झा

उपेन्द्र झा, हिमालिनी अंक जून २०१८ |चीन भारत का आधारभूत सम्बन्ध वैरभाव का ही रहा है । सन् १९५७ में तिब्बत पर चीन का अधिपत्य कायम होने तथा भारत के शरण में आये दलाई लामा का सम्मानजनक आतिथ्य स्वीकार करना चीन भारत की शत्रुता का मूल जड़ है । भारत को सन् १९६२ का अनावश्यक युद्ध इसी कारण झेलना पड़ा । शत्रुता का प्रादुर्भाव यहीं से हुआ और समय के अन्तराल में इसकी जड़ें गहराती चली गई । यह बात अलग है कि युद्ध के बाद चीन ने नरमपंथी धार अपनाया और विदेशी पूँजी को आकर्षित करने लगा । भारत के साथ नरम हुए चीन ने मित्रता का हाथ बढ़ाया । सम्बन्ध तो बना किन्तु मित्रता का भाव नही आया ।
विश्व का सबसे बडी जनसंख्या वाला देश चीन ने दशकों अथक मेहनत करके समृद्धि हासिल की है । आर्थिक सबलता हासिल कर यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अर्थतन्त्र का देश बना । साम्यवादी कट्टरपंथी विचार उदारवाद में परिणत तो हुआ किन्तु निरंकूश विचार में कोई परिवर्तन न आया । देश के बाहर या भीतर निरंकुशता की जड़ मजबूत ही बनी रही । आर्थिक सबलता की उत्कट चाह ने चीन को अपने प्रभूत्व का साम्राज्य कायम करने को प्रेरित किया है ।
अपने उत्पाद का ग्राहक खोजने संसार भर विचरण कर रहे चीन अरब राष्ट्र में अपना प्रभाव तो बढ़ाया ही है, उत्पाद बेचने का नया बाजार भी खोज कर चल रहा है । आर्थिक सहयोग के माध्यम से अविकसित छोटे छोटे देशों में अपने प्रभाव को फैलाने में सफल हो रहे चीन संसार भर को जोड़ने का नईं अवधारणा (ओबीओआर) संसार समक्ष प्रस्तुत किया है । एक तरफ विकास में नया आयाम आने की सम्भावना बताता है तो दूसरी तरफ उसके द्वारा छोड़ा गया घोड़ा जितना दूरी तय करेगा साम्राज्य का क्षेत्रफल भी उतना ही बढेÞगा । चीन का अपना प्रभाव बढ़ाने का यह अनोखा तरीका है । इस ओवीओआर सम्झौते को भारत ने बहिष्कार किया, किन्तु नेपाल, पाकिस्तान ने सम्झौता पर हस्ताक्षर कर चीन के साथ गहरा सम्बन्ध बना लिया है ।
हिमालय से दक्षिण हिन्द महासागर तक फैले समतल भूभाग पर भारत का प्रभाव सदियों से रहा है । दक्षिण एशिया (सार्क राष्ट्र) में भी बहुत छोटे देश अविकसित अवस्था में अपना अस्तित्व बनाये हुए है । भारत से अलग हुए पाकिस्तान जन्म काल से ही भारत का दुश्मन रहा है । किसी समय भारत से शत्रुता रखने वाला अमेरिका, भारत की शक्ति निस्तेज करने के उद्देश्य से पाकिस्तान को अपना विश्वास पात्र बना कर प्रयोग किया । इसी समय आधुनिक तकनीकि का सहयोग देकर अमेरिका ने पाकिस्तान को न्यूक्लियर हथियारों से लैस किया । लम्बे समय तक भारत के विभिन्न राज्यों में अशान्ति फैलाकर तोड़ने की कोशिशें कामयाव न होने पर अमेरिका नरम रवैया अपनाते हुए ओवामा काल में मित्रता का हाथ थाम लिया । भारत के साथ अमेरिका का मैत्री सम्बन्ध बढ़ जाने तथा  अमेरिका का दुश्मन ओसामा बीन लादेन पाकिस्तान में पाये जाने के कारण पाकिस्तान को शंका के घेरा में लेते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान का दामन छोड़ दिया । अमेरिका से छोड़े जाने पर चीन ने अपने फायदे के लिए पाकिस्तान से सम्बन्ध बढ़ाया ।
चीन भारत के साथ मित्रतापूर्ण वैरभाव का सम्बन्ध बनाये हुए है । दो कदम आगे और एक कदम पीछे की रणनीति के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे चीन विकास की बात करते हुए समर्थकों की भीड़ बढ़ा रहा है । निम्न आय वालों के मध्य अपना सामान उपलब्ध करवा कर उपभोक्ता को संगठित करने का अच्छा तरीका चीन ने अपनाया है । चीन का उत्पादन सस्ता है, पर टिकाऊ नहीं । किन्तु जरुरत की वस्तुओं के प्रयोग से निम्न आय वाले वञ्चित नहीं रहते । भारत के अधिकाँश उपभोक्ता चीन के उत्पाद पर निर्भर हो गया है । दूसरे देशों में भी अपने उत्पादन बेच कर उपभोक्ता को संगठित करने और विकास में चीन को साथ देने के प्रलोभन को कौन नहीं स्वीकारेगा । चीन के इस घुसपैठ को रोकने के लिये कुछ दिन पहले भारत ने चीन के उत्पादन का बहिष्कार किया ।
दक्षिण एशिया के देशों में अपना प्रभाव फैलाने के लिए पाकिस्तान का मित्र बनाना आवश्यक था । नेपाल सदियों से भारत के प्रभाव में रहा है । धार्मिक, सामाजिक, साँस्कृतिक, रीति रिवाज आदि समान रहने की वजह से भारत के साथ नेपाल का सम्बन्ध प्राकृतिक है । तीन तरफ से भारत की सीमा से जुड़ने के कारण नेपाल हमेशा भारत पर निर्भर रहा है । यह निर्भरता नेपाल के अपेक्षाकृत विकास को सम्बोधन करने में असफल रहने के कारण वैकल्पिक मार्ग की ओर नेपाल का झुकाव बढ़ता गया । परनिर्भरता के आनुपातिक जिम्मेवारी निर्वाह की भूमिका में भारत की उदासीनता नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं को जन्म दिया ऐसा नेपाली विश्लेषकों का मानना है ।
भारत को नजदीक से देखने के लिए चीन नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना जरुरी समझा । या यूँ कहिये कि नेपाल को भारत के प्रभाव से बाहर लाना चीन की रणनीति इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत के लिए नेपाल सरदर्द सा बन गया । हाल ही में नेपाल भ्रमण में आये भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से सम्बन्ध सुधारने के इच्छुक नेपाल के प्रधानमन्त्री ने सम्मान में जो सदाशयता दिखलायी वह प्रशंसनीय थी । कुछ वर्षों से भारत के साथ बिगड़े सम्बन्ध को अब जबकि स्थाई सरकार बनाने में ओली सफल हुई है, इसके सफल कार्यकाल के लिए इसे सुधारना आवश्यक समझा । भारत पर ६०% की परनिर्भरता झेल रहे नेपाल चीन के साथ सम्बन्ध बना लेने पर भी भारत के साथ सम्बन्ध की असन्तुलनता में अधिक दिन नहीं चल सकता । भारत के साथ सम्बन्ध बनाना नेपाल की बाध्यता है और इसी कारण नेपाल के प्रधानमन्त्री ने बड़ी गर्मजोशी के साथ भारतीय प्रधानमन्त्री का सत्कार किया । आदर सत्कार में द्विपक्षीय भावना का प्रदर्शन तो दिखा किन्तु यह चीरकाल तक कायम रहने की सम्भावना कम ही दिखाई पड़ रही है । चीन के अतिशय प्रभाव में डूबे नेपाल की सरकार अपने देश के भीतर चीन भारत की कड़ी प्रतिस्र्धा को किस कदर सन्तुलन बना पाती है, इसी बात पर नेपाल भारत सम्बन्ध की प्रगाढ़ता आधारित है । चीन जिस अनुपात में नेपाल को गिरफ्त में लिया है, वहाँ से चीन पीछे नहीं आगे जाने की सोच में है ।
भारत के साथ सम्बन्ध सुधारने का प्रधानमन्त्री ओली के प्रयास को राष्ट्रवादी शक्ति ने “आत्म समर्पण” की संज्ञा दी है । जिस शक्ति के बल पर के.पी.शर्मा ओली इतने मजबूत दिखाई दिए, वही शक्ति आज भारत के साथ सम्बन्ध बनाने के प्रयास को अनुचित ठहरा कर आलोचना कर रही है । प्रधानमन्त्री के.पी.शर्मा ओली भारत के साथ पूर्वरत कड़ा रवैया क्यों नहीं दिखलाये । नेपाल के विरुद्ध नाकाबन्दी लगाकर भारत ने जो गलती की, उस के साथ नेपाल का झुकना ओली की सबसे बड़ी गलती है, यही आरोप लगाकर राष्ट्रवादी शक्ति ओली की आलोचना करने में लगी है ।
चीन की सीमा पर नेपाल के पूरब से पश्चिम नेपाल के १५ जिला को विकास के द्वारा आत्मनिर्भर बनाने के लिए ३ वर्ष पहले एस.डी.पी. प्रोग्राम अन्तर्गत चीन ने लिया था । सरकार को भी मजबूती प्रदान कर अपने प्रभाव के गिरफ्त में रखा ही है । अब बारी है मधेश में अपने प्रभाव को फैलाने का । चीन की यही रणनीति अभी नेपाल में चल रही है ।
नेपाल को रेलमार्ग से जोड़ने के लिए मोदी ने जो प्रतिबद्धता दिखलायी, चीन  पहले ही सम्भाव्यता अध्ययन कर केरुङ्ग–काठमाण्डौं–पोखरा–लुम्बिनी रेलमार्ग के लिए काम शुरु करने की प्रारम्भिक टोली नेपाल भेज चुका है । निकट भविष्य में ही नेपाल के प्रधानमन्त्री का चीन भ्रमण होने की सम्भावना है । नेपाल में विकास कार्य के लिए भारत के सहयोग की प्रतिस्पर्धा में अव्वल दिखाने के उद्देश्य से चीन नेपाल में सहयोग की राशि निर्धारण करता है । सहयोग के माध्यम से नेपाल को भावनात्मक रूप से सन्निकट रखने की चीन की कोशिश हमेशा जारी है ।
नेपाल में वैदेशिक लगानी की प्रतिबद्धता में चीन का हिस्सा ९० प्रतिशत है । ९२ उद्योग में चीन की  लगानी ४३ अर्ब है । नेपाल के विकास सहयोग में सबसे बडा हिस्सा प्राप्त करने वाला चीन का आरोप है कि भारत नेपाल मे चीनियाँ निवेश में अवरोध पहुँचा रहा है । कान्तिपुर के अन्तर्वार्ता में प्रध्यापक हू सिसेङ्ग ने यह कहा है । चीनियाँ राज्य परिषद अन्तर्गत प्रख्यात “थींक टैंक” के रूप में रहे सीआईसीआईआर के निर्देशक प्राध्यापक हू सिसेङ दक्षिण एशिया के विज्ञ के रूप में जाने जाते हैं । इनके अनुसार चीन का भारत के प्रति कड़ा रवैया स्पष्ट दिखाई पडता है । इसके विपरित हपेई विश्व विद्यालय अन्तर्गत “नेपाल अध्ययन केन्द्र के निर्देशक चाङ सुपिन ने कहा – “नेपाल को भारत विरुद्ध चाइना कार्ड और चीन के विरुद्ध भारत कार्ड इस्तेमाल नहीं करना चाहिये । दोनो देश से फायदा लेने में ही नेपाल की बुद्धिमानी है । इस कदर देखा जाय तो चीन की रणनीति “दो कदम आगे और एक कदम पीछे” अद्भुत है ।
अविकसित देश के नाते नेपाल पराश्रित है । सर्वोच्च शिखर सगरमाथा तथा नेपाल की अनुपम प्राकृतिक छटा के आकर्षणों ने इस देश को सारे संसार का पर्यटकीय स्थल बना दिया है । १२ महीने यहाँ सैलानियों का आना जाना लगा रहता है । इसी क्रम में शक्ति केन्द्रों ने भी यहाँ पड़ाव डाल दिया है । अपने अपने प्रभाव में नेपाल को लेने की यहाँ होड़बाजी ही चली जिसके कारण यहाँ की राजनीति भी प्रभावित होती रही है । आज जबकि चीन समर्थक यहाँ की मजबूत सरकार अस्तित्व में आई है तो लोकतान्त्रिक शक्तिकेन्द्र की आँख की किरकिरी बन गई है । समय देखें क्या दिखाता है ।

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