Fri. Dec 14th, 2018

स्वायत्तता का अभ्यास या उपहास ? रणधीर चौधरी

हिमालिनी, अंक सितम्बर 2018 । नेपाल के संबिधान निर्माता चाहते न चाहते हुए भी संबिधान मे संघीयता शब्द को जगह दे चुके हैं । अगर कोइ अकल्पनीय घटना न हो तो संघीयता बिरोधी ताकतों की बाध्यता है कि इस ब्यवस्था को वे आगे ले कर जाएंगे ही । इसी परिदृश्य मे आज यक्ष बहस का बिषय यह बना हुआ है कि संघीयता को सुदृढ किया जाय या केन्द्रीय शक्ति को ? प्रदेश २ के अलावा छः प्रदेश में नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी के ही मुख्यमन्त्री हैं और उन्हें भी पंगु बना आगे बढ़ना असाधारण चुनौती को बुलाने जैसा है काठमाण्डु के लिए । यद्यपि केन्द्रीयकृत शासन व्यवस्था मे अपना भविष्य सुनिश्चित देखने बालो की तरफ से केन्द्र वर्सेस प्रदेश की खींचातानी कुछ लम्बे समय तक चलते रहने की सम्भावना है ।
परंतु इस आलेख मे चर्चा का विषय यह है कि, चुनाव पश्चात सात प्रदेश मध्य केवल एक प्रदेश मे मधेशी मुख्यमन्त्री बन पाया अर्थात प्रदेश २ सरकार के उन्माद, उससे सिर्जित उम्मीद तथा उसके परिणितियोंं को टटोलना है । मधेशवादी दलो ने अकसर आम आन्दोलनकारी मधेशी के भावनाओ से खेलता रहा फिर भी पिछले चुनाव में मधेशी जनता ने मधेशवादी दलों को अच्छी खासी सीट पर विजय करवा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी की । और यह भी उस परिस्थिति में हुआ जिस वक्त देश अन्धराष्ट्रवाद के तले वा गठबन्धन ने नेपाली कांग्रेस को लगभग बहिष्कृत अवस्था में ही धकेलने में सफल रहा । प्रदेश २ में ठीक उसी तरह मधेशवादियों को अपार मत दे कर दूसरे पार्टियों को नीचे ला दिया । परंतु आज प्रदेश २ भी केन्द्र को सलामी ठोकने से परहेज नही रख पा रहे हैं । प्रदेश २ के मुख्यमन्त्री तथा सरकार मे रहे नेतृत्व राजनीतिक उन्माद में घिरे से नजर आ रहे हैं ।
मुख्यमन्त्री का अपना दल केन्द्रीय सरकार का हिस्सा होने के बावजूद भी मुख्यमन्त्री ने प्रधानमन्त्री को चुनौतीपूर्ण पत्र लिखा था , केन्द्रियमन्त्री और विदेशी प्रधानमन्त्री की उपस्थिति मे संविधान बिभेदकारी है कहने का साहस जुटाया था और आम मधेशी में वाहवाही भी लूटने में सफल रहे थे । यह जानते हुए भी कि नागरिकता से सम्बन्धित सारा कानूनी अधिकार संघीय सरकार को दिया गया है फिर भी प्रमुख जिला अधिकारियों को नागरिकता वितरण के लिए उर्दी जारी किया गया था । यह और इस के अलावा कुछ और भी कदम जो की राजनीतिक चालवाजी मधेशी जनता के बीच उनकी भावनाओं को प्रतिबिम्बित करने वाली आवाज बोल कर अपनी क्रान्तिकारी भूमिका बनाए रखने का एक प्रयास था , यह समझना लोगों के लिए आसान नही है ।
ये सब होने के बाबजूद भी प्रदेश २ सरकार और उनकी सलाहमण्डल यह समझ नहीं पायी कि सिर्फ आकांक्षा जगा कर ही जनभावना की परिपुर्ति करना असम्भव होता है । अपितु जब आकांक्षा ऊँचाई पर पहुँच जाय और उसको सम्बोधन करने मे नेतृत्व असक्षम होता है तो जनभावना का बिस्फोटन होने से कोई नही रोक सकता । तत्कालीन नेकपा माओवादी ने खुद जगाइ हुई जनभावना की पुर्ति न कर पाने पर आज पार्टी ही विलय हो चुका है । मधेशवादी दल अपने ही एजेण्डा पर कायम नहीं रह पाने के कारण समग्र मधेश एक प्रदेश का नारा सिर्फ प्रदेश २ मे ही सिमट चुका है ।
अब फिर चर्चा की जाय प्रदेश २ सरकार के बारे में । उपर उल्लेख किए गए अनुसार, प्रादेशिक स्वायत्तता स्थापित करने के सवाल में शायद सभी प्रदेश की नेतृत्वदायी संलग्नता होगी । परंतु जब–जब प्रदेश २ की सरकार ने अपना मँुह खोला है तब–तब नेपाल की राजनीति तरंगित हुई है । परंतु हरेक तरंग इकठ्ठा हो कर एकबार प्रदेश २ के सरकार को ही अपने चपेटे मे लेने मे सफल होता दिखाई दिया है ।
खासकर प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली को प्रदेश २ के मुख्यमन्त्री ने आमन्त्रित कर प्रदेशसभा मे सम्बोधन करने का मौका देना खेदजनक । इसके कारण प्रदेश २ के सरकार की कार्यशैली (मोडसअप्रण्डी) पर प्रश्नचिन्ह लग गया है । प्रदेश की ‘राजनीतिक नैतिकता’ और भी ज्यादा संकट मे दिखाई दे रही है । वैसे तो प्रधानमन्त्री ओली मे भी दो तिहाई बाली सरकार के प्रधानमन्त्री होने का दम्भ है ही । इसलिए तो संविधान मे व्यवस्था न होने के बाबजुद भी प्रदेशसभा मे आ कर प्रवचन देना उचित समझ बैठै । इस अभियान से कैसी परंपरा वा कहे तो नजीर स्थापित करना चाहते है शायद पशुपतिनाथ को भी पता न हो ।
परंतु भीतरी बात पता करने पर यह तथ्य बाहर आ रहा है की मुख्यमन्त्री ने नही बल्कि मधेशवादी दल के दोनों मुखिया ने प्रधानमन्त्री को प्रदेशसभा मे चरण रखने की अनुकूलता प्रदान करबायी थी । इससे पता चलता है कि महन्थ ठाकुर और उपेन्द्र यादव दोनों को यह विश्वास है कि उनके स्वार्थो को संतुष्ट ओली ही करबा सकते है इसी लिए भी शायद घिनौनी मौनता साधे बैठे हैं ।
हालाँकि आरोप जो भी हो और जिस पर भी लगाया जाय परंतु इस असंबैधानिक घटना की जिम्मेदारी उठाने का नैतिक दायित्व प्रदेश सरकार पर ही आता है । ऐसी परिस्थिति में अपने पार्टी का ह्विप मानना मुख्यमन्त्री की निरीहता को दर्शाता है । और इन प्रतिकुलताआें के बीच मुख्यमन्त्री का यह कहना कि प्रादेशिक स्वायत्ता के लिए वो लड़ने को तैयार हंै, यह बात हास्यास्पद ही लगती है । और मुख्यमन्त्री के स्वकीय सचिव भी केद्रीय अध्यक्ष की तरफ से परिवर्तन करने की अवस्था रहने के कारण मुख्यमन्त्री पद की गरिमा ही मुश्किल में दिख रही है ।
सैद्धान्तिक पक्ष में अनभिज्ञ प्रदेश २ सरकार प्रधानमन्त्री का सम्बोधन प्रदेश सभा मे क्यों करवाया इसका ठोस जवाब अभी तक नही आ पाया है । अपितु विगत में मलेठ घटना जैसी डरावनी घटना के उपर प्रधानमन्त्री की गैरजिम्मेवार अभिव्यक्ति को भी प्रदेश सभा के भीतर रहे मधेशवादी दल चुपचाप सुनती रही । संबिधान मे कोई विभेद नहीं है यह भी ओली ने बखूबी रखा और मधेश के नायक कहलाने वाले नेतागन मूकदर्शक बन बैठे रहे । समृद्धि का लंबा भाषण देने बाले प्रधानमन्त्री की तरफ से एकबार भी यह सुनने को नहीं मिला कि प्रदेश सरकार को स्वायत्तता और स्वाभिमान बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है और मुख्यमन्त्री और मन्त्री लोग उसी ‘कन्सेसन सो’ मे ताली ठोकने पर बाध्य नजर आए । आश्चर्यजनक रूप में प्रदेश सभा २ में प्रधानमन्त्री का सम्बोधन राजपा के तीन सांसदो ने बहिष्कार करके अपनी नैतिकता दिखायी थी ।
प्रश्न उठने लगा है कि क्या अब मुख्यमन्त्री संविधान को विभेदकारी कहने की हिम्मत दिखा पाएंगे ? और क्या मुख्यमन्त्री के कहने और न कहने से इस सच्चाई को धुमिल किया जा सकता है कि यह संविधान नश्लीय है और मधेशियो के सीने पर गोली ठोक कर लगाया गया है ।
प्रादेशिक स्वायत्तता के लिए प्रदेश सरकार से लड़ने की हिम्मत अब बाकी है या केन्द्रीय नेतृत्व के सामने सर झुका कर रहने की बाध्यता है प्रदेश सरकार को ? गौरतलव है की अभ्यास ही एक ऐसी चीज है जो यश और अपयश वा उपहास के पात्र बनने और बनाने में मदद करेगी ।

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