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अर्थतंत्र को कमजोर करता वैदेशिक ऋण – मुक्ति अर्याल

Mukti Aryal
मुक्ति अर्याल

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ |प्रधानमन्त्री केपी ओली द्वारा चीन भ्रमण के साथ ही बहुचर्चित ‘केरुङ काठमाडौं रेलमार्ग’ आयोजना पर चर्चा और बहस शुरु हो चुकी है । आयोजना के पक्षधर का मानना है कि रेलमार्ग से देश में समृद्धि का द्वार खुलेगा और अर्थ व्यवस्था में कायापलट होगा । यह पक्ष किसी भी हालत में आयोजना पूरी करने के पक्ष में है चाहे यह अनुदान राशि से सम्भव हो या ऋृण (वैदेशिक) से हो ।
दूसरा पक्ष उनका है जो यह मानते हैं कि इससे भौगोलिक जोखिम के साथ ही यह समस्या भी है कि इतनी बडी परियोजना हम संचालन औ व्यवस्थापन कर भी पाएँगे या नहीं । साथ ही वैदेशिक ऋृण से यह परियोजना संचालन करना कितना आवश्यक और उपयुक्त है । पक्ष और विपक्ष की ये बातें संचार माध्यम और सामाजिक संजाल में छायी हुई है । रेल आर्थिक विकास का अति आवश्यक पूर्वाधार है इसमें कोई शक नहीं है इसके लिए एक मत हो सकता है किन्तु वैदेशिक ऋृण में मत एक नहीं हो सकता ।
वैदेशिक ऋण आर्थिक और राजनीतिक हिसाब से जोखिमपूर्ण, विवादित और जटिल समस्या का विषय है । वैदेशिक ऋण तभी लिया जाना चाहिए जब लाभ प्रत्यक्ष दिखता हो अगर ऐसा नहीं है तो वैदेशिक ऋृण लेने से बचना चाहिए । यहाँ सतर्कता की आवश्यकता है । वैदेशिक ऋृण किसी भी देश को दो मुख्य खतरे के साथ जोडता है । पहला, वैदेशिक ऋण विदेशी मुद्रा में लिया जाता है । इस कारण विदेशी मुद्रा से ऋृण का साँवा और ब्याज बढकर बहुत बड़ा आर्थिक संकट आ सकता है । साथ ही हर एक वर्ष साँवा और ब्याज के रूप में विदेशी मुद्रा का बड़ा भाग विदेश पलायन होने से विकास कार्य में कमी आती है ।
रेल आयोजना के पक्षधर का वैदेशिक ऋण के विषय में यह कहना कि वैदेशिक ऋण समृद्धि का द्वार है, एक गलत और भ्रामक प्रचार है । वैदेशिक ऋण के विषय में यह अनावश्यक, अति प्रचार और गलत सोच प्रायोजित भी हो सकती है । यह प्रयोजन ऋण देने की चाहत रखने वाले मित्रराष्ट्र द्वारा हो सकता है । जिनका अभिष्ट नेपाल में परियोजना सफल करने से अधिक असफल होने में और ऋण देकर ऐसी विषम परिस्थिति सृजना करने की हो सकती है जिससे राजनीतिक और आर्थिक नियन्त्रण हासिल कर सकें ।
रेल आयोजना के पक्षधर वैदेशिक ऋण को वैदेशिक निवेश कह कर प्रचार कर रहे हैं जो सही नहीं है । वैदेशिक निवेश ठीक है क्योंकि इसमें कम जोखिम होता है, किन्तु वैदेशिक ऋण ठीक नहीं है, इससे जहाँ तक हो बचना चाहिए । रेल के विविध पक्ष के विषय में बहस करना इस आलेख का विषय नहीं है बल्कि वैदेशिक ऋृण कितना सही और गलत है, या कितना आवश्यक और अनावश्यक है, या वैदेशिक ऋृण लेकर बड़ा परियोजना संचालन करना कितना उपयुक्त या अनुपयुक्त है ? यह चर्चा करना है ।
वैदेशिक ऋण क्या है ?
विदेशी राष्ट्र, बैंक या संघ संस्था क साथ विदेशी मुद्रा में लिया गया ऋण और आयात करने पर विदेशी मुद्रा में चुकाए गए बाँकी रकम के योग को वैदेशिक ऋण कहते हैं । वैदेशिक ऋण तब लिया जाता है जब देश का आन्तरिक ऋृण या स्रोत से परियोजना में पूँजी पर्याप्त नहीं होती है ।
दूसरा, यदि परियोजना राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय महत्व का है और यह देश का आर्थिक हिसाब से कायापलट कर सकता है अर्थात, परियोजना से प्रशस्त आमदनी हो सकती है, ऋण का साँवा और ब्याज स्वयं अर्जन कर चुका सकते हैं तो वैदेशिक ऋृण लिया जा सकता है । दूसरी अवस्था, देश औद्योगिक विकास में आगे बढ रहा हो और प्रगति कर रहा हो । अभी की अवस्था में वैदेशिक ऋृण कितनी आवश्यक और जायज है यह प्रश्न चुनौती के रूप में हमारे सामने है ।
कितना वैदेशिक ऋण ?
कोई भी देश कितना वैदेशिक ऋृण ले सकता है यह निर्णय उस देश की वैदेशिक मुद्र आमदनी, सरकारी आमदनी और साँवा तथा बयाज मुद्रा चुकाने की क्षमता पर निर्भर करता है । इस सम्बन्ध में अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आधार सबसे अधिक उपयुक्त और व्यवहारिक है । इसके अनुसार किी भी देश का कुल वैदेशिक ऋणउस देश के निर्यात से १५० प्रतिशत कम होना चाहिए । या, सरकार की कुल आमदनी से २५० प्रतिशत कम होना चाहिए ।
अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आधार विश्वभर में मान्य और ज्यादा प्रयोग में है । पर यह हर वक्त लागू हो यह भी आवश्यक नहीं है । इससे पहले ऋण लेने की पहली शर्त है ऋृण को चुकाने के लिए खुद का मजबूत आधार । अगर ऐसा नहीं होता है तो भविष्य में देश परियोजनाओं को संभालने की स्थिति में नहीं रहेगा । इसका दीर्घकालीन असर सही नहीं होगा ।
वैदेशिक ऋण के लाभ और हानि
वैदेशिक ऋण का लाभ बड़े निवेश के लिए आवश्यक पूँजी उपलबध होना है । यह वित्तीय कारोबार में देश को विश्व के साथ जोडता है और बृहत अर्थशास्त्रीय नीति और पद्धति का विकास करने में मदद करता है ।विदेशी राष्ट्र के अनुभव को देखने पर वैदेशिक ऋण के कई हानि नजर आते हैं । विदेशी मुद्रा के विनिमय दर के परिवर्तन से साँवा और ब्याज बढ़ने का खतरा सबसे अधिक रहता है । साथ ही साँवा और ब्याज वार्षिक रूप में भुगतान करने पर देश की संकलित वैदेशिक मुद्रा और कोष को बड़ा भाग विदेश चला जाता है । और ऋण लेने पर बड़े परिमाण में पुँजी देश के भीतर आती है । इससे मूल्य वृद्धिदर इतना बढ़ता है कि जिसे सम्भालना कठिन हो जाता है और इसका असर अथीतंत्र पर पड़ता है ।
वैदेशिक ऋण की समस्या
अर्थतन्त्र के स्थायित्व और आर्थिक कार्य सम्पादन निर्देशित करने के लिए आन्तरिक स्रोत और वैदेशिक ऋण महत्वपूर्ण भूमिका खेलता है । बहुत से विकासोन्मुख देश वैदेशिक ऋण से त्रस्त हैं । ये देश आर्थिक विकास के लिए ऋण लेते हैं लेकिन बाद में उसी ऋृण से इतना दबज ाते हैं कि उठना मुश्किल हो जाता है । विकास की जगह उनका अर्थतंत्र और भी कमजोर होता चला जाता है ।
सन् ६० के दशक में अफ्रिकी देशों में स्थायित्व और विकास था । जब विकास बढाने के लिए इन देशों ने अन्धाधुन्ध वैदेशिक ऋण लिया, तब आर्थिक रूप में और भी पिछड़ते चले गए । अमेरिका का अनुभव भी इससे अलग नहीं है । ऐसा होने का कारण यह था कि अण के नकारात्मक प्रभाव को ये देश पूर्वानुमान नहीं कर पाए थे । जिसका परिणम ऐसा हुआ कि ये इस संकट से बाहर नहीं निकल पाए । इसलिए ऋण लेने से पहले इन बातों का खयाल करना आवशयक है ।
अति उदार और आत्मविश्वासी होकर किसी भी तरह आर्थिक विकास हासिल करने की सोच ऋण लेने का कारण बनता है जिसकी वजह से बड़ी समस्या सामने आ जाताी है साथ ही ऋणदाता भी सम्भावित समस्या का आकलन नहीं करते हैं और ऋण देते हैं । उदाहरण के लिए श्रीलंका का ह्याम्बनटोटा बन्दरगाह को ले सकते हैं । यहाँ ऋणदाता चीन और ऋणी श्रीलंका दोनों इस वजह से समस्या का सामना कर रहे हैं ।
गलत जगह पर निवेश करने से अगर प्रतिफल सही नहीं मिला तो ऋण तो क्या ब्याज चुकाना भी कठिन हो जाता है । स्वदेशी मुद्रा का विदेशी मुद्रा के साथ विनिमय दर कम होने पर साँवा और ब्याज रकम बढ़ा है । अन्तरराष्ट्रीय बाजार में वस्तु का मूल्य कम होने पर निर्यात से होने वाली आमदनी घटने े समस्या आती है । सन् १९८२ में मेक्सिको में यही समस्या उत्पन्न हुई थी ।
बाहर के राष्ट्र में विवाद और आर्थिक मन्दी होने पर स्वदेशी वस्तु की माँग घटती जाती है जिससे कुल गार्हस्थ्य उत्पादन भी घट सकता है । वैदेशिक ऋण बढने से नकारात्मक प्रभाव बढता जाता है । ऋण के दलदल में फँसे देश की विश्वसनीयता भी घटती चली जाती है ।
वैदेशिक ऋण किससे लिया जाय ?
अपने अपने राजनीतिक और आर्थिक लाभ के कारण चीन और भारत नेपाल में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश में हैं । इसके लिए वो प्रशस्त ऋण देने को तैयार हैं । नेपाल इन देशों से ऋण लेकर इन्हीं से अगरपरियोजना काम करवाता है तो यह स्थिति खतरनाक साबित हो सकती है । हम इन देशों से सम्बन्ध नहीं बिगाड़ सकते हैं इसलिए इनसे ऋण लेना सही नहीं है ।
विश्व बैंक, एसियन डेभलपमेन्ट बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, बैंक फर इन्टरनेसनल सेटलमेन्ट, अन्तर्राष्ट्रिय फाइनान्स कर्पोरेसन जैसी संस्था के साथ ऋण तुलानात्मक रूप में छूट लेना या माफ कराना सहज है । किसी भी देश का सरकारी या निजी संस्था यह छूट नहीं देती है जैसे श्रीलंका के साथ यह नहीं हो पाया । यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या अन्तर्राष्ट्रिय संस्था प्रस्तावित ’केरुङ काठमाडौं रेलमार्ग’ परियोजना में ऋण देने के लिए सहमत हैं ? ये संस्था तभी सहमत होते हैं जब वो यह देखते हैं कि परियोजना स्वयं की आमदानी से ऋण चुकाने की साम्थ्र्य रखते हैं । इनसे ऋण लेना सही हो सकता है ।
अन्य देश का अनुभव
विकासोन्मुख देश द्वारा लिए ऋण का सफल इतिहास नहीं है । ऋण लेने के बाद प्रायः इन देशों में वित्तीय समस्या आने का तथ्य है । ८० के दशक में ल्याटिन अमेरिकी देशों में ऋण एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई थी । ६० और ७० के दशक में ब्राजिल, अर्जेन्टिना और मेक्सिको औद्योगिकीकरण के पूर्वाधार में निवेश के लिए बहुत ऋण लिया था । पर इनका भी हश्र कुछ अच्छा नहीं हुआ ।
९० के दशक में मेक्सिको, थाइल्यान्ड, फिलिपिन्स, दक्षिण कोरिया, हङकङ, सिंगापुर, ताइवान जैसे पूर्वी एसिया के देश, रसिया, ब्राजिल और अर्जेन्टिना में फिर यह समस्या आई । अफ्रिकी राष्ट्रों के अपने अनुभव और पीड़ा हैं । वैदेशिक अण में फँसे देशों के ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे सीख लेने की आवश्यकता है ।
निष्कर्ष
ऋण एक आवश्यक, किन्तु दुष्कर व्यवस्था है । वैदेशिक ऋण और भी कष्टकर है । तुलानात्मक रूप में आन्तरिक ऋण अधि सरल और खतरामुक्त है । आन्तरिक हो या वैदेशिक, ऋण को पूर्ण रूप में नकारा नहीं जा सकता है । किन्तु वैदेशिक ऋण से यथा सम्भव दूर रहना ही श्रेस्कर है ।
वैदेशिक ऋण आन्तरिक अर्थ व्यवस्था का हरेक पक्ष प्रभावित करता है । हमारे जैसे अति कमजोर अर्थतन्त्र और अत्यन्त कम विकसित देश का अन्धाधुन्ध ’वैदेशिक ऋण’ लेना सीधे देश के अर्थतन्त्र को धरासायी बनाने जैसा है क्योंकि हमारे पास वैदेशिक ऋण को सही प्रयोग करने की न तो क्षमता है और न ही कुशलता ।
मित्रराष्ट्रों के अनुदान सहयोग में चलने वाले आयोजना को नहीं चला पाने का इतिहास हमारे पास है । ऐसी अवस्था में वैदेशिक ऋण लेकर बड़े आयोजना का सफलतापूर्वक सम्पन्न कैसे हो सकता है ? यह विकासके प्रति की नकारात्मकता नहीं बल्कि वैदेशिक ऋण के प्रति की सतर्कता है, संभावित समस्या का पूर्वानुमान है । इसलिए वैदेशिक ऋण सुनने और देखने के जैसा सहज नहीं है ।
साभारः सेतो पाटी से
(नेपाली से अनूदित)

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