Mon. Sep 24th, 2018

संघीय सरकार और शैक्षिक गुणवत्ता :अजयकुमार झा

 

हिमालिनी, जून अंक 2018 । नेपाल में राजशाही, राणाशाही,पंचायती व्यवस्था और प्रजातंत्र के वाद माओवादी और मधेसवादियों के सैकड़ों वलिदानी के वाद (संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र) की स्थापना हुई । अब इसके पश्चात् जो सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य राष्ट्र के सम्मुख है वह है—शिक्षा । शिक्षा को ही किसी भी देश का मेरुदंड कहा जा सकता है । इसी आधारशिला पर उसकी उन्नति अवनति निर्भर रहती है । भावी पीढ़ी को जैसा और जो कुछ भी बनाना हो वैसी ही ढालने के लिए शैक्षिक पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति ही साँचे का काम करती है । वैसे नेपाल में अबतक पार्टी और सरकार ने अपने ढाचे में ही लोगो को ढालने का प्रयास किया है । नेपालित्व से किसी को कोई मतलब नहीं है । जिस देश से पैसा मिल जाय उसी का पाठ्यक्रम यहाँ लागू हो जाता है । शिक्षाविदों को वैदेशिक भ्रमण हो जाय बाकी देश और जनता जाय गर्त में क्या फरक पड़ता है ।
ओशो कहते हैं “जीवन मिलता नहीं है, निर्मित करना होता है । जन्म मिलता है, जीवन निर्मित करना होता है । इसीलिए मनुष्य को शिक्षा की जरूरत है । शिक्षा का एक ही अर्थ है कि हम जीवन जीने की कला सीख सकें” ।
अंग्रेजों की गुलामी की जड़ें भारत में गहरी जमाने का प्रयत्न करते हुए मैकाले महोदय ने शिक्षा का विधान ऐसा बनाया था जिससे उस साँचे में ढले हुए नवयुवक केवल नौकरी करने के ही लायक रहें । वे जानते थे कि शिक्षा पद्धति ही किसी समाज का मेरुदण्ड होता है । इस तथ्य को हमें भी भली भाँति समझ लेना है और नेपाल को गरिमामय बनाने के लिए शिक्षा सम्बन्धी सभी पहलुओं और समस्याओं पर समुचित रूप में ध्यान देना है ।
यों तो अंग्रेजों से विरासत में मिली हुई और युरोपियन देशों के सहयोग से संचालित वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अनेक त्रुटियाँ हैं परन्तु उसका एक दम परिवर्तन होना कठिन है । अतएव उसमें जो अधिक आवश्यक और सरल सुधार हों उनकी ओर वर्त्तमान सरकार को शीघ्र ध्यान देना चाहिए । कुछ ऐसे ही सुधारों की चर्चा मैं इस लेख के माध्यम से करने जा रहा हूँ ।
२१वीं शताब्दी की वैश्विक अर्थव्यवस्था ऐसे वातावरण में उन्नति कर सकती है जो रचनात्मकता एवं काल्पनिकता, विवेचनात्मक  सोच और समस्या के समाधान से संबंधित कौशल पर आधारित हो । अनुभवमूलक विश्लेषण शिक्षा और आर्थिक उन्नति के मध्य सुदृढ़ सकारात्मक संबंध होते हैं । वैज्ञानिक सोच उद्यमशीलता और प्रविधि शिक्षा की आधार शिला हो । सरकार जवावदेही पूर्वक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अंगीकार करे । नेपाल के उद्योगपति, प्राज्ञपुरुष, विदेश में चमक रहे नेपाल के विद्वान् , वैज्ञानिक और सितारों को अपने देश में शिक्षा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन,सम्मान, सम्पूर्ण सुरक्षा और सुविधाजनक माहौल तैयार किए बिना नेपाल को विकसित बनाने की कल्पना निराधार और जड़ता का द्योतक होगा ।
वर्तमान में देशभर प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक तह तक निजी शैक्षिक संस्थाएं करीब १० हजार की संख्या में सक्रीय हैं, वहीं उच्च माध्यमिक स्तर की निजी संस्थाएं १ हजार ५० हैं, जहाँ १२ लाख  से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं ।  निजी क्षेत्र का वार्षिक मुनापÞmा लगभग १५ अरब का है । परन्तु सरकार समय–समय पर निजी क्षेत्र को निरुत्साहित और ध्वस्त बनाने के लिए अनेक बहानों के साथ संशोधन में लगी रहती है । आज फिर वही स्थिति दिखाई दे रही है । नेपाल के किसी भी शिक्षाविद और सरकारी अधिकारी के पास नेपाल के दूरगामी विकास हेतु शैक्षिक उद्देश्य और सोच नहीं है । सब के सब व्यक्तिगत पÞmायदा और सामूहिक शोषण को ही शिक्षा का मूल उद्देश्य मानते हैं । जब लोकतंत्र में भी निजी पूँजी और निवेश सुरक्षित नहीं रहेगा तो क्या राजतन्त्र और माओतन्त्र में होगा ? दिवालिया मस्तिष्क के नेता अधिकारियों के कारण नेपाल शैक्षिक प्रयोगशाला बनता जा रहा है ।
कुछ महीनों पहले भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक उद्बोधन (मन की बात) में गुणवत्ता के महत्व पर इन शब्दों में जÞोर दिया थाः “अब तक सरकार का ध्यान देश भर में शिक्षा के प्रसार पर था किंतु अब वक्त आ गया है कि ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता पर दिया जाए । अब सरकार को स्कूलिंग की बजाय ज्ञान पर अधिक ध्यान देना चाहिए । देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता होगा । स्कूलिंग की बजाय ज्ञानार्जन पर ध्यान स्थानांतरित करने का अर्थ इनपुट से नतीजों पर ध्यान देना होगा ।
देश के सभी सरकारी  विद्यालयों को आईसीटी से लैस किया जा रहा है ताकि बच्चों को पढ़ाने में आईसीटी का लाभ लिया जा सके और उनमें सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी साक्षरता में भी सुधार किया जा सके । ई–पाठशाला विद्यालय शिक्षा और शिक्षक शिक्षा के सभी स्तरों पर सभी डिजिटल और डिजिटल योग्य संसाधनों को एक साथ एक मंच पर लाने में सहायक होनेवाला है । जो विद्यालय में शिक्षक की कमी को महसूस नहीं होने देगा ।
विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर को सुधारने के लिये केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारें नवीन व्यापक दृष्टिकोणों एवं रणनीतियों को बनाए । कुछ विशेष कार्यक्षेत्रों की बात करें तो अध्यापकों, कक्षा कक्ष में अपनाई जाने वाली कार्यविधियों, छात्रों में ज्ञान के मूल्यांकन एवं निर्धारण, विद्यालयी नवसंरचना, विद्यालयी प्रभावशीलता एवं सामाजिक सहभागिता से संबंधित मुद्दों पर विशेष समझदारी और पहल की आवश्यकता है ।
अध्यापक
जहां बच्चे विद्यालयी शिक्षा का केंद्र होते हैं, बच्चों में ज्ञानार्जन सुनिश्चित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका एक अध्यापक की होती है । शिक्षक द्वारा जब तक अपने कार्य के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई जाएगी तब तक सरकार और सारी मशीनरी सब बेकार है ।  शिक्षक समाज की सर्वाधिक संवदेनशील इकाई है । शिक्षक अपना काम ठीक तरह से नहीं करते, यह आरोप तो सर्वत्र लगाया जाता है । लेकिन यह विचार कोई नहीं करता कि उसे पढ़ाने क्यों नहीं दिया जाता ? आए दिन गैर शैक्षिक कार्यों में इस्तेमाल करता है प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक सोच को, शैक्षिक कार्यक्रमों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है । बच्चों को पढ़ाना सिखाना सरल नहीं होता और न ही बच्चे फाईल होते हैं । प्रशासनिक कार्यालय और अधिकारीगण शिक्षा और शिक्षकों की लगातार उपेक्षा करते हैं । उन्हें हजार तरह के काम में उलझाएँ रहते है । प्रधान शिक्षक का तो अब अर्थ ही हो चूका है नेता और पार्टी के कार्यकर्ता । जो जितना अयोग्य और चापलूस होगा । वो उतना ही सफल प्रधान अध्यापक होगा । इसी कारण स्कूली शिक्षा में अपेक्षित सुधार सम्भव नहीं हो पा रहा है ।
सुधार हेतु उपाय
स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए हमें स्कूलों के बारे में अपनी परम्परागत राय को बदलना होगा । बच्चे अपने शिक्षकों से सतत् जुड़े रहना चाहते हैं, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। अतः स्कूलों को कार्यालयीन कामकाज से वास्तव में मुक्त कर प्रभावी शिक्षण संस्थान बनाया जाना चाहिए । आज हम विद्यालयों को मात्र इमारतों और कक्षाओं के रूप में ही नहीं देख सकतें । एक स्कूल में मूल शिक्षण स्थितियों के साथ–साथ इसमें बिजली की व्यवस्था, कार्यात्मक प्रयोगशाला और पठन स्थल, विज्ञान प्रयोगशालाएं, कम्पयूटर प्रयोगशालाएं, वाईफाई की व्यवस्था, शौचालय तथा इनडोर आउटडोर खेलकूद मैदान और सम्पूर्ण खेल सामग्री की व्यवस्था । साथ ही प्रधानाध्यापक से वार्षिक शैक्षिक प्रस्ताव (प्रोपोजल) के अनुसार अध्यापन और अध्यापक की मूल्यांकन होनी चाहिए । प्रधानाध्यापक का एक निश्चित समयावधि होनी चाहिए, इसपर खरा न उतरने पर अवमूल्यन कर दूसरे शिक्षक से प्रस्ताव लेकर आगे बढ़ाना चाहिए ।
शिक्षक–छात्र अनुपात ठीक हो
शैक्षणिक सुधार में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है ।  पाठयपुस्तकों और पाठयक्रम के अनुरूप प्रभावी शिक्षण, शिक्षकों की योग्यता, सक्रियता और पढ़ाने के कौशल पर निर्भर है । एक शिक्षक, एक साथ कितनी कक्षाओं के कितने बच्चों को भली भाँति पढ़ा सकेगा, इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है । आदर्श रूप में एक शिक्षक अधिकतम २० बच्चों को ही ठीक प्रकार पढ़ा सकता है । वह भी तब, जब वे भी एक समान स्तर के हों । अभी व्यवस्था यह है कि एक शिक्षक ४० बच्चों को (और वे भी अलग अलग स्तरों के हैं) तो कैसे पढ़ाएगा ? अनेक स्कूलों में तो ७०–८० से भी अधिक बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है । ऐसे में शिक्षक मात्र बच्चों को घेरकर ही रख पाते हैं पढ़ाई तो सम्भव ही नहीं । शिक्षक बच्चों को पढ़ा भी पाएँ, इस हेतु शिक्षक छात्र अनुपात को व्यवहारिक बनाना होगा ।
आदर्श शिक्षक
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा दे कौन रहा है ? उसके व्यक्तित्व का विकास होना बेहद महत्वपूर्ण है । उन्हें शिक्षण  की आधुनिक तरकीब और युक्तियों के साथ साथ व्यक्तित्व निर्माण की कला भी सीखने की जरूरत है । कोई भी शिक्षक एक खिला हुआ इंसान होना चाहिए, साथ ही वह अपेक्षाकृत अधिक खुशमिजाज, प्रेम करने वाला, करुणावान और चेतनशील भी होना चाहिए । यह एक ऐसी चीज है, जिस पर हर इंसान को खुद ही काम करना पड़ता है । शिक्षा में आध्यात्मिकता और योग को लाने के पीछे वजह यही है कि किसी चीज के बारे में जानने की इच्छा रखना और आध्यात्मिक होना, दोनों ही साथ–साथ चलते हैं। आप एक आध्यात्मिक जिज्ञासु होते हैं, न कि एक आध्यात्मिक मतानुयायी । इसी तरह से वैज्ञानिक भी जिज्ञासु हैं । इसलिए एक शिक्षक का जिज्ञासु होना महत्वपूर्ण है । आध्यात्मिक प्रक्रिया का जो सार है, वह शिक्षा के क्षेत्र की आवश्यकता है, क्योंकि एक शिक्षार्थी को सक्रिय रूप से जिज्ञासु होना ही पड़ेगा । चाहे वह भौतिक शास्त्र हो, रसायन शास्त्र हो, जीव विज्ञान हो या आध्यात्मिकता – मूल रूप से सबमें यही महत्वपूर्ण होता है – जीवन के किसी खास पहलू से जुड़े सत्य की तलाश । शिक्षा का मतलब है सत्य की तलाश – बेशक परम सत्य की तलाश न सही, जो वस्तु फिलहाल सामने मौजूद हो, उसी के सत्य की तलाश सही । विद्यार्थी स्वाभाविक तौर पर जिज्ञासु होते हैं । आध्यात्मिक प्रक्रिया से विद्यार्थियों में अनुशासन लाने का काम करना चाहिए, ताकि वे किसी चीज पर विश्वास न करें लेकिन इसी के साथ वे किसी के प्रति अभद्रता व असम्मान की भावना भी न रखें ।
प्रशिक्षण, शिक्षण और परीक्षण
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार करने की जरूरत है । कक्षागत शिक्षण कौशलों को या तो नकार दिया जाता है या उन्हें परिस्थितिजन्य मान लिया जाता है । अच्छे प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण का दायित्व कर्तव्यनिष्ठ, योग्य और क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाना चाहिए । शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने, शिक्षण में वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक पद्धतियाँ विकसित करने सहित परीक्षण (मूल्यांकन) की व्यापक प्रविधियाँ तय कर उन्हें व्यवहारिक स्वरूप में लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि हर प्रदेश में एक “शैक्षिक मंच एवं स्त्रोत केन्द्र’’ विकसित किया जाए ।
शिक्षकों का मनोबल कैसे बढेÞ
समूची दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों में प्राथमिक स्तरों के शिक्षकों को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है । जबकि हमारे यहाँ उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है । साथ ही ऐसी शिक्षा नीति बनाई जाती है जिसमें उनका मनोबल सदैव ऊँचा बना रहे । जब तक अनुभव जन्य ज्ञान, और कौशलों को महत्व नहीं दिया जाएगा तब तक “बालकेन्द्रित शिक्षण’’ की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है । बाल केन्द्रित शिक्षण के लिए कार्यरत शिक्षकों की दक्षता और मनोबल बढ़ाए जाने की आवश्यकता है । यह आवश्यक है कि शिक्षकों को उनके व्यक्तित्व विकास की प्रक्रियाओं सहित ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों में भेजा जाए जहाँ उन्हें अपने अन्दर झाँकने ,कुछ बेहतर कर गुजरने की प्रेरणा मिल सके । इस प्रशिक्षण उपरान्त उन्हें कार्यरत स्थलों पर “आन द जाब सपोर्ट’’ के रूप में ऐसे सहयोगी दिए जाएँ जो उनकी वास्तविक मदद करें ।
शैक्षिक उद्देश्य
स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए  हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा । शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरीररोजगार पाने का साधन नहीं है । शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है । शिक्षा प्रत्येक बच्चे को श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रवृत्त करे, तभी वह सार्थक सिद्ध हो सकती है । कहा भी गया है “सा विद्या या विमुक्तये’’। अभी पढ़े लिखे और गैर पढ़े लिखे व्यक्ति के आचरण और चरित्र में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता । उल्टे पढ़ लिख लेने के बाद तो व्यक्ति श्रम से जी चुराने लगता है और अनेक प्रकार के दुराचरणों में लिप्त हो जाता है । यह स्थिति एक तरह से हमारी वर्तमान शैक्षिक पद्धति की असफलता सिद्ध करती है । अतः यह जरूरी है कि शिक्षा के उद्देश्यों को सामयिक रूप से परिभाषित कर पुनरीक्षित किया जाए ।
शिक्षार्थी की पृष्ठभूमि
हर विद्यार्थी की प्रतिभा को उसकी पृष्ठभूमि और जिन हालातों में और माहौल में उसने समय बिताया है, ये चीजें भी शिक्षा में प्रभाव डालती है, दुर्भाग्यवश शिक्षा के क्षेत्र में इन चीजों पर ध्यान नहीं दिया गया । इसका एक मुख्य कारण रहा कि शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा संचालित होता है । जो की गैर जिम्मेबार अधिकारियों के द्वारा निर्देशित प्रायोजित होता है । इन्हें अधिकतम सुविधा उपलब्ध होने के वावजूद निजी विद्यालय और विश्वविद्यालय के व्यवस्थापक के सामने ये वौने ही सावित हो रहे हैं । अतः अब सरकार का काम सिर्फ आवश्यक नीतियां बनाने का होना चाहिए, उनको अमली जामा पहनाने का नहीं । इससे काम नहीं बनेगा । जब कोई भी संस्था इस क्षेत्र में काम करने के लिए इच्छुक नहीं थी तो मूलभूत शिक्षा उपलब्ध कराने का काम सरकार द्वारा किया गया । यह बेहद महत्वपूर्ण है । लेकिन आज कई उद्यमी और बिजनेसमैन शिक्षा के क्षेत्र में आने के इच्छुक हैं । आज शहरी आबादी में ज्यादातर दंपत्ति तीन से पांच बच्चों की बजाय एक या दो बच्चे पर आ गए हैं । इसका मतलब है कि अब उनके हाथ में पहले के बजाय खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा है । जो की वो लोग निजी विद्यालय के शुल्क हेतु सक्षम है । अतः विशेष निर्देशन और प्रतिवद्धता के साथ निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देना समय सापेक्ष होगा । वैसे भी सरकारी विद्यालय से हजार गुणा अधिक परिणाम निजी विद्यालय का अबतक होता आया है । सरकार के अरवों लगानी उसके सामने धूल चाट रही है ।
अभिभावकत्व
फिलहाल बहुत सारे माता–पिता यह सोचते हैं कि एक बार उन्होंने अगर अपने बच्चों को स्कूल भेज दिया तो उनका कर्तव्य पूरा हो गया । यह सोच बदलनी चाहिए । अगर अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति आपकी ही कोई प्रतिबद्धता नहीं होगी तो फिर शिक्षकों को समर्पित क्यों होना चाहिए ? देश में यह नियम बन जाना चाहिए कि हर मां–बाप को अपने बच्चे के स्कूल में साल में कम से कम तीन बार जरूर जाना चाहिए और कम से कम एक दिन स्कूल में जरूर बिताना चाहिए । उनको इस बात की जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि स्कूल में किस तरह की शिक्षा दी जा रही है, कैसे यह शिक्षा दी जा रही है और उनके बच्चे क्या कर रहे हैं ? हमें बच्चों की शिक्षा में उनके माता(पिता की भागीदारी की एक संस्कृति तैयार करनी चाहिए ।
आज सभी शिक्षकों का प्रशिक्षण पूरी तरह से संभव है । तकनीक के चलते आज हम वो सब करने में सक्षम हैं, जो अब से पहले किसी पीढ़ी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । अब समय आ गया है कि सत्य को मुख्यधारा बनाई जाए । जो चीज मुझे अनुभव की परम अवस्था में प्राप्त होती है, वह है मेरे अस्तित्व की सच्चाई । अगर आप और दूसरे लोग अपने अस्तित्व की सच्चाई को जान लेंगे, और अगर आप अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होंगे तो फिर आप जो भी करेंगे, वह एक शक्तिशाली प्रक्रिया बन जाएगी । आज हमारे पास ऐसे कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण मौजदू हैं, जिनसे साबित होता है कि अगर आप एक खुशनुमा माहौल में होते हैं तो आपका शरीर व दिमाग सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम करता है । अगर आप एक भी पल बिना उत्तेजना, चिड़चिड़ाहट, चिंता, बैचेनी या गुस्से के रहते हैं, अगर आप सहज रूप से खुश रहते हैं, तो कहा जाता है कि बुद्धि का इस्तेमाल करने की आपकी क्षमता एक ही दिन में सौ फीसदी बढ़ सकती है ।
अगर आप इस देश की पांरपरिक शिक्षा प्रणाली की ओर मुड़कर देखें तो माता–पिता या अभिभावक अपने बच्चों को एक ऐसे शिक्षक या आचार्य या गुरु को सौंप दिया करते थे, जिसे वह न सिर्फ एक ज्ञानी इंसान के तौर देखते थे, बल्कि एक सिद्ध या कहें विकसित प्राणी के रूप में भी देखते थे । वे जानते थे कि अगर उनके बच्चे ऐसे इंसान के हाथों में हैं तो वे स्वाभाविक रूप से खिल उठेंगे ।
बच्चों में उत्साह और जोश कुछ ऐसा होता है कि आपको उन्हें संभालने के लिए दस लोगों की ऊर्जा की जरूरत होती है । खासकर एक शिक्षक के तौर पर जब आपको सौ बच्चे संभालने हों तो आपको सुपर ऊर्जा की जरूरत होती है । इसके लिए आपको योग की जरूरत है ।
शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शैक्षणिक लोगों, शिक्षकों व दूसरे लोगों के लिए हम वैचारिक रूपांतरण के शब्द कुसुुम भेंट कर रहे हैं । स्वीकार कर कृतार्थ करें ।

(१) पाठशाला में प्रवेश करते समय बालक की आयु छ वर्ष से कम न हो, क्योंकि इससे छोटी आयु में शिक्षा का दबाव पड़ने से बालक के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता ।
(२) पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक तकनीक और व्यावहारिक जीवन संबन्धी जानकारियों को स्थान अवश्य दिया जाय, जिससे विद्यार्थी को स्वास्थ्य, यात्रा, शिष्टाचार, उद्योग, व्यापार, कंप्यूटर, विज्ञान, गणित, भाषा तथा राजकीय नियमों की आवश्यक जानकारी हो जाय ।
(३) परीक्षा में उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण होना वार्षिक परीक्षाओं पर निर्भर न रहे । वरन् विद्यार्थी के कक्षागत प्रस्तुति,सक्रियता तथा सृजनशीलता की दैनिक, साप्ताहिक और मासिक प्रगति के विवरण के आधार पर उसे उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाय । अर्थात निरंतर मूल्यांकन ही निर्णायक मूल्यांकन हो ।
(४) प्राइवेट परीक्षाओं  में किसी प्रकार की अड़चन न हो । जिससे अन्य कार्य करते रहकर भी शिक्षा में उन्नति करने की हर किसी को सुविधा रहे ।
(५) सब प्रान्तों के पाठ्यक्रम में एक आधारभूत समानता रहे । जिससे एक प्रान्त के विद्यार्थी को दूसरे प्रान्त में जाने पर दाखिला सम्बन्धी कोई अड़चन न हो ।
(६) पाठ्यक्रम में पुस्तकों का भारी बोझ न रहे । वरन् थोड़ी किन्तु उपयोगी पुस्तकें ही रखी जावें । राष्ट्रभाषा, अंतर्राष्ट्रीय भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक शिक्षा, कंप्यूटर । बस इतना ही ।
(७) किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ (तमाखू, बीड़ी, पान, शराव, गाँजा, भाँग, सिगरेट) इत्यादि सेवन करने वाले शिक्षक तथा कर्मचारी पर कड़ी कार्यवाही की जाय ।
(८) छात्रों और अध्यापकों की आदतें वेशभूषा तथा अनुशासन प्रियता पर कड़ाई से ध्यान दिया जाय । उच्छृंखलता को शिक्षा के क्षेत्र से बहिष्कृत किया जाय । सफाई, सादगी, सदाचार, शिक्षाचार और सेवा भाव को पुरस्कृत एवं प्रशंसित किया जाय ।
(९) बालकों का सामान्य ज्ञान और सृजनात्मकता बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक वैज्ञानिक साधन उपस्थित किए जायं । इसके लिये एक अध्यापक एवं घंटी स्वतंत्र रूप से भी रखा जाना चाहिए ।
(१०) अध्यापक की आयु ३० वर्ष से कम न हो । शिक्षकों से उनके स्वास्थ्य के अनुसार ६०–६५ की आयु तक शिक्षण का काम लिया जाय ।
(११) अध्यापकों को वेतन इतना दिया जाय कि वे आर्थिक चिन्ताओं से दुःखी न रहकर शान्त चित्त से शिक्षण कार्य में मन लगा सकें । उनके स्थान परिवर्तन किसी अनिवार्य कारण से ही हों, अन्यथा उन्हें अपनी सुविधा के एक स्थान पर जम कर काम करने दिया जाय ।
(१२) स्कूलों पर उत्तम निरीक्षण की सुव्यवस्था रहे । शिक्षा की प्रगति पर उच्च अधिकारी कड़े निरीक्षण की व्यवस्था रखें, जिससे कहीं ढील पोल न चलने पावें ।
(१३) अनिवार्य छात्रावास और प्राविधिक शिक्षा का निशुल्क व्यवस्था किया जाय । शिक्षक को अनिवार्य रूपेण छात्रावास में रहना होगा साथ ही प्रत्येक शिक्षक के अधीन में ४० बच्चें रहेंगे जिसका सम्पूर्ण दायित्व शिक्षक का होगा । आर्थिक और भौतिक सुविधा सरकार करेगी ।
(१४) प्रत्येक स्कूल में ईश्वर प्रार्थना और ध्यान के उपरान्त ही शिक्षा कार्य प्रारम्भ किया जाय । प्रार्थनाओं में कर्तव्य पालन, सदाचार एवं लोक कल्याण की बुद्धि देने की प्रार्थनाओं को प्रधानता दी जानी चाहिए ।
(१५) डिजिटल और स्मार्ट शिक्षण कक्ष तथा लैपटाप और प्रोजेक्टर का समुचित व्यवस्था किया जाय।
(१६) सरकारी धन उच्च शिक्षा पर अधिक व्यय होने की अपेक्षा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को स्मार्ट बनाने पर अधिक व्यय होना चाहिए ।
(१७) स्कूलों में औद्योगिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो ।
(१८) विद्यार्थी के शिक्षण अवस्था का पूर्णतः जिम्मेवारी शिक्षक का हो। और यही मूल्यांकन शिक्षक के लिए पदोन्नति का आधार बने ।
(१९) अशिक्षित प्रौढ़ स्त्री पुरुषों के लिए भी उनकी सुविधा के समय का ध्यान रखते हुए पाठशालाएँ खोली जायं और उनका पाठ्यक्रम उनकी स्थिति के अनुकूल रख शिक्षित किया जाय ।
(२०) स्कूलों का वातावरण प्राचीन गुरु कुलों जैसा सात्विक तथा आधुनिक गुरु कुलों जैसा वैज्ञानिक बनाने का प्रयत्न किया जाय जिसकी अच्छी छाप पड़ने से बालक बड़े होने पर राष्ट्र के सुयोग्य एवं प्रतिष्ठित नागरिक सिद्ध हो सकें ।
(२१) देश के किसी भी क्षेत्र के कर्मचारी, शिक्षक और अन्य की नौकरी स्थाई नहीं होनी चाहिए । उसके कार्य दक्षता और कार्यकुशलता और लगनशीलता ही उसके नौकरी का भविष्य होना चाहिए ।
(२२) देश के प्रशासनिक और शैक्षिक अवस्था को इस बुरी तरह वर्वाद करने के पीछे वही स्थाई नौकरी का दंभ है । अतः स्थाई नहीं, समझौता हो ।
(२३) देश के सभी मन्त्रियों,अधिकारियों, प्रशासकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सन्तान अनिवार्य रूपेण सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ें ।
यह सुझाव ऐसे हैं जो साधारण होते हुए भी अपना विशेष महत्व रखते हैं । सरकार को, शिक्षा विभाग को, विद्वानों को एवं प्रत्येक अभिभावक कोे इन सुझावों एवं सुधारों पर मनोयोग पूर्वक विचार करना चाहिए ।

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