Thu. Sep 20th, 2018

#पर्यटन हिमश्रृंखलाओंं से सुशोभित सुंदर देश–नेपाल

विगत अंकों में मैने नेपाल के विभिन्न दर्शनीय पर्यटन स्थलों की चर्चा की, जिसे पढ़ने का समय पाठकों को प्राप्त होने की आशा की जाती है । विभिन्न अँचलों की उफान खाती नदियाँ, हरे–भरे वन्य क्षेत्रों, बर्फीले पहाड़ों, वास्तु शिल्प, काष्ठ कला और मूर्ति कला की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करते चित्ताकर्षक भवन एवं मठ–मंदिरों से सजा हुआ नेपाल एक ऐसा मनोरम देश है, जो विभिन्न वर्ग के पर्यटकों को सदैव आकर्षित करता है । कई बार मेरे मन में यह ख्याल आता रहा कि बर्फीले पहाड़ों के कष्टसाध्य शीत प्रदेशों में ऐसा क्या आकर्षण है कि लोग अपने बहुमूल्य जीवन, समय और धन को खतरे में डालकर वहाँ जाते रहते हैं । पर जब मुझे एक सामान्य तीर्थयात्री के रूप में निकटवर्ती नुवाकोट, दोलखा और सुदूरवर्ती मुस्तांग जिले में अवस्थित मुक्तिनाथ की यात्रा में जाते हुए हिमश्रृंखलाओंं को निकट से दोपहर की धूप में चमकते, सूर्यास्त के अवसर पर चाँदनी की तरह चमकते और उगते सूरज की रोशनी में सुुनहरे रूप को पाते देखा तब इससे आकषित होकर मैं निर्निमेष दृष्टि से उनकी सुंदरता को निहारने को विवश हुआ और यह समझने में मुझे देर भी नही लगी कि क्यों पर्यटक विशेषतः प्रकृतिप्रेमी एवं पर्वतारोहीजन पर्वतों की चुनौती को स्वीकार करते हुए वहाँ जाते रहते है ।
हिमालय को विभिन्न देवी–देवताओं का निवास–स्थल माना जाता है । इसी हिमालय की दुर्दम श्रृंखलाएँ एवं शिखरें विश्व भर के साहसी युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध पर्वतारोहियों को अपनी ओर आकर्षित करते हुए ललकारती हैं कि आओ भाईयों और बहनों, यहाँ भी अपने साहस और शौर्य का परिचय दो और पर्वतारोहण के इतिहास में विजयी पर्वतारोही के रूप में अपना नाम अतिरिक्त रूप से दर्ज कराने का गौरव प्राप्त करो । शायद इसी ललकार का यह परिणाम है कि २९ मई सन् १९५३ तक अविजित मानी जाने वाली सर्वोच्च माउण्ट एवरेष्ट की हिमशिखरें आज विश्व भर के पर्वतारोहियों के लिए पर्वतारोहरण का एक सुगम स्थल बन गया और विश्व भर के पुरुष ही नही बच्छेन्द्री पाल से लेकर विश्व भर की अनेक महिलाओं ने भी माउण्ट एवरेष्ट के सफल पर्वतारोही के रूप में अपना नाम दर्ज कराने में सफलता प्राप्त कीं । इतना ही नही, प्रथम सफलता से उत्साहित होने वाले पर्वतारोहियों ने तो कई बार माउण्ट एवरेष्ट की शिखरों को पुनः चूमने और पर्वतारोहण के इतिहास में एक कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है । मझुे अपने सेवाकाल में माउण्ट एवरेष्ट पर सफल आरोहण कर लौटे भारत के कई पर्वतारोहियों से मिलकर भेटवार्ता रेकॉर्ड करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । ऐसा ही अवसर मुझे काठमांडू मे भी ८२ वर्षीय एक वृद्ध पर्वतारोही शैलेन्द्र कुमार उपाध्याय से मिलने पर प्राप्त हुआ जो अपनी वृद्धावस्था को नजरअंदाज करते हुए माउण्ट एवरेष्ट पर आरोहण करने की तैयारी में जुटे थे । जब मैने उनसे पूछा कि इस उम्र में क्यों यह जोखिम उठा रहे हैं तो कहने लगे– ‘देखो भाईृ, मृत्यु तो अवश्यंभावी है, सफल हुआ तो एक कीर्तिमान बन जायगी, अन्यथा भगवान शिव का क्रीड़ास्थल मानी जाने वाली हिमालय की गोद में प्राण त्यागने का सौभाग्य तो प्राप्त होगा ।’ यह बात इस तथ्य को प्रकट करती हैं कि पर्वतारोही इस बात से अवगत रहते हैं कि हिमशिखरों के आह्वान को स्वीकार करने का अर्थ है अपने जीवन को दाव में लगाना ।
देश का पूूर्वी भाग हो या पश्चिमी, या उत्तरी क्षेत्र, सभी बर्फीली पहाडों से भरा है । काठमांडू स्वयं में एक उपत्यका है जो चारों ओर से हरे–भरे पहाड़ों और वन्य क्षेत्रों से घिरा है । काठमांडू के निकट उत्तर की दिशा में अवस्थित रसुवा, नुवाकोट और सिंधुपालचोक जिले को अपनी सुंदरता से निखारने में लाङ्गटांग, लिरुङ और हिमालचुली जैसे कई पर्वत शिखरों, जो ७,२४३ मीटर से लेकर ७,८६४मीटर तक ऊँची हैं, की भूमिका को शिरोपर करना पड़ता है । फलस्वरुप काठमांडू की यात्रा में आने वाले कई प्रकृतिप्रेमी के लिए, जो पर्वतीय क्षेत्र की पदयात्रा करना पसंद करते हैं, यह क्षेत्र विशेष रूप से आकर्षण के केंद्र हैं, जहाँ उन्हें पर्वतीय सुंदरता को निकट से निहारने के अतिरिक्त चीता और कस्तूरी हिरण के अलावा कई वन्य जंतुओं और पंक्षियों का अवलोकन करने का अवसर भी प्राप्त होता है ।
पर्वतीय क्षेत्र में पदयात्रा की चर्चा करते हुए मुझे देश के मध्य भाग में अवस्थित अन्नपूर्ण पर्वत को निकट से निहारने के लिए निर्मित पदयात्रा मार्ग (९तचभपपष्लन चयगतभक० की याद आती है । अन्नपूर्ण पर्वत के आधार शिविर पास का निर्धारित पदमार्ग विश्व के सबसे समुन्नत पदमार्गों में से एक माना जाता है । १,०७०मीटर की ऊँचाई से लेकर ४,१५० मीटर तक की ऊँचाई में फैले इस पदमार्ग को ‘पृथ्वी पर स्वर्ग’ की संज्ञा दी गयी है । इस पदमार्ग का चयन प्रायः अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक ही किया करते ह,ैं क्योंकि इसकी पूरी यात्रा करने में ७ से १२ दिन लग जाते हैं । इस यात्रा का प्रथम प्रारंभ बिंदु ९कतबचतष्लन उयष्लत० पर्यटकीय नगरी पोखरा है जो स्वयं में अन्नपूर्ण पर्वत और माछापुच्छ्रे की सुुंदरता से आलोकित रहता है । पर्यटकीय नगरी होने के कारण यहाँ हर क्षेत्र से आने वाले पर्यटकों के लिए यातायात की उपयुक्त व्यवस्था होने के अतिरिक्त ठहरने के लिए आधुनिकतम होटलों से लेकर लॉज तक की सुविधा उपलब्ध है । होटल न होने वाले इलाके में होम स्टे की सुविधा है । पदयात्रियों को ठहरने के लिए भी पदमार्ग के विभिन्न स्थलों पर लॉज की व्यवस्था की गयी है ।
नेपाल की यात्रा में आने वाला हर पर्यटक को देश का पूर्वी भाग हो या पश्चिमी, दक्षिणी हो या उत्तरी भाग, हिमाच्छादित पर्वृतों के मनोहर दृश्य को निहारने का अवसर प्राप्त हो ही जाता है । देश के दक्षिणी भाग हिमशिखरों से वंचित होने पर भी वहाँ के चुरे पर्वत की हरियाली, वहाँ से बहती स्वच्छ और शीतल हवा, कोशी टप्पू वन्य जंतु आरक्ष, पर्सा वन्य जंतु आरक्ष, बाँके राष्ट्रीय उद्यान, बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान और शुक्लाफाँटा वन्य जंतु आरक्ष, इन स्थलों के हरे–भरे क्षेत्र, वन्य जंतु और दूर से दिखायी देने वाली विभिन्न हिमशिखरें पर्यटकों के उल्लास में कोई कमी नही होने देते ।
माउण्ट एवरेष्ट, मकालू, गौरीशंकर, अन्नपूर्ण, धौलागिरी, निलगिरी, मनास्लू, गणेश हिमाल और लाङ्गटांग जैसे पर्वत और हिमश्रृंखलाओं से सुशोभित नेपाल किसी समय में यदि हिमालय अधिराज्य के नाम से विश्व प्रसिद्ध था तो यह यथार्थता पर आधारित था और इस यथार्थता का बोध नेपाल की यात्रा में आनेवाला हर पर्यटक को होता है जैसे कि मुझे हुआ । क्रमश ..

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