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कांग्रेस के सड़क आन्दोलन का प्रभाव : लीलानाथ गौतम

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ |
राजनीति में एक गलत मानसिकता है– अगर सत्ता से बाहर रहना है तो सरकार का हरदम विरोध करते रहना चाहिए । नियोजित गलत मानसिकता और कुण्ठित मनोभाव से गुजरनेवाले राजनीतिक नेताओं को मानना है कि सरकार के हर कदम का विरोध करना ही प्रतिपक्षी दलों का ‘धर्म’ है । इसीलिए जब डा. गोविन्द केसी ने अपना १५वां अनशन २७ दिनों के बाद खतम किया तो उसके बाद भी नेपाली कांग्रेस ने अपना आन्दोलन नहीं रोका । लेकिन आज कांग्रेस मुद्दा विहीन दिखाई दे रही है और सरकार पर सर्वसत्तावादी होने का आरोप लगाते हुए सड़क संघर्ष में उतर आयी है । कांग्रेस की तरह ही राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी (प्रजातान्त्रिक) भी सड़क संघर्ष में उतर आया है । दोनों पार्टी का कहना है कि सरकार अधिनायकवाद तथा सर्वसत्तावाद की ओर उन्मुख हो रहा है, विधि का शासन लागू नहीं हो रहा है और महंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है ।
सत्ता के ऊपर उल्लेखित आरोप सच है या गलत ? सही उत्तर के लिए इसका कोई मापदण्ड नहीं है । यहां एक प्रश्न का जवाब आवश्यक है– सत्ताधारी को लक्षित कर प्रतिपक्षी दलों की ओर से इस तरह का आरोप कब नहीं रहा ? आधुनिक राजनीतिक कालखण्ड में आज तक कोई भी ऐसी सरकार नहीं बनी है, जिनके ऊपर प्रतिपक्षी दलों की ओर से ऐसे आरोप नहीं लगे हों । अर्थात् प्रतिपक्षी दलों की ओर से सत्ताधारियों को इस तरह का आरोप लगाना हमारे यहां राजनीतिक संस्कार बन चुका है । चाहे कांग्रेस ही सरकार में क्यों न हो ! यहां कांग्रेस नेताओं को अपने ही कार्यकाल विगत की ओर झांकना होगा, जहां ‘कांग्रेसी सर्वसत्तावाद’ के नाम में दो महीने तक प्रतिपक्षी दलों ने संसद् अवरुद्ध किया था और सशक्त सड़क संघर्ष भी । अब इस तरह की गलत मानसिकता लेकर सरकार के हर काम कारवाही को अवरुद्ध करना प्रतिपक्षी दलों का ‘धर्म’ नहीं होना चाहिए ।
यहां डा. गोविन्द केसी, उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे और विकसित घटना क्रम के बारे में चर्चा करना सान्दर्भिक है । डा. केसी द्वारा उठाए गए मुद्दे को सम्बोधन करने के लिए सत्ताधारी पार्टी सकारात्मक नहीं रही । उसके विरुद्ध सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, नागरिक समाज भी सरकार के विरुद्ध उतर आया और डा. केसी का साथ दिया । कई जगहों में तो सड़क संघर्ष में उतर आने सर्वसाधारण लोगों को कांग्रेस ने ही नेतृत्व प्रदान किया । अन्ततः सरकार अपने गलत निर्णय को सही करने के लिए बाध्य हो गयी । लेकिन उसके बाद परिस्थिति सामान्य है, तब भी नेपाली कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष में उतर आने के लिए आह्वान कर रही है । जो समय सान्दर्भिक नहीं दिखाई देता है ।
हां, सरकार के पिछले क्रियाकलाप के बारे में आम जनता सन्तुष्ट नहीं है । चुनाव के बाद जब केपी शर्मा ओली सत्तारोहण कर रहे थे, उस वक्त जनता ने सरकार तथा प्रधानमन्त्री ओली से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा की थी । लेकिन नेताओं की कथनी और करनी में तालमेल न होने के कारण आम जनता जल्द ही निराश होने लगी है । यहां कांग्रेसीजन को एक बात समझ में आनी चाहिए कि आम जनता आज भी उस हद तक निराश नहीं हुए है, जहां सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष में उतर आना चाहिए । कांग्रेस नेतृत्व में गलत सोच होने के कारण ही आन्दोलन जारी है । लेकिन कांग्रेसी नेताओं के कहने पर आंख मूँद कर जनता सड़क में उतर आनेवाली नहीं हैं ।
नेपाली कांग्रेस द्वारा अगस्त प्रथम हफ्ता देशव्यापी आयोजित विरोधसभा को देखने से ही पता चलता है कि जनता सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष में तत्काल उतर आने की मनःस्थिति में नहीं हैं । लेकिन वही जनता कुछ दिन पहले डा. केसी के पक्ष में सड़क में उतर आई थी । उस वक्त कांग्रेस भी सड़क में ही होने के कारण कांग्रेस नेतृत्व ने ठान लिया कि जनता कांग्रेस के पक्ष में है । लेकिन इस तरह की मानसिकता गलत है । हां, कांग्रेस की ओर से सड़क और सदन दोनों जगह आन्दोलन होने के कारण ही डा. केसी और चिकित्सा शिक्षा विधेयक के सन्दर्भ में सरकार पीछे हटने के लिए बाध्य हो गयी थी । लेकिन आज कांग्रेस अकेले ही सड़क में है, जनता अपनी जगह वापस हो चुकी है । ऐसी अवस्था में सड़क संघर्ष का कोई भी औचित्य नहीं है ।
सिर्फ ६ महीना से ही केपीशर्मा ओली सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और सरकार दो तिहाई बहुमत में है । ऐसी अवस्था में सामान्य मुद्दा, सड़क संघर्ष और आन्दोलन से सत्ता समीकरण में कुछ भी अदल–बदल होनेवाला नहीं है । सरकार की लोकप्रियता जनता में समाप्त हो रही है, लेकिन जनता सड़क संघर्ष की मनःस्थिति में भी नहीं हैं । ऐसी पृष्ठभूमि में नेपाली कांग्रेस जिस तरह सत्ता के विरुद्ध मोर्चाबन्दी करने के लिए अन्य राजनीतिक दलों से आग्रह कर रही है, नेपाली कांग्रेस के लिए यह शोभनीय नहीं है । कांग्रेस की राजनीतिक पृष्ठभूमि प्रजातान्त्रिक है । कम्युनिष्टों की तरह अराजक और हिंसात्मक नहीं है । प्रजातान्त्रिक मूल्य, मान्यता और संस्कार को स्थापित करना उसकी जिम्मेदारी है, हरदम सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष करना नहीं है । हां, राजनीति सत्ता प्राप्ति के लिए ही होती है, लेकिन उसके लिए मजबूत पृष्ठभूमि आवश्यक है । पृष्ठभूमि निर्माण होने से पहले ही सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष में उतर आना कांग्रेस की हताश मनःस्थिति है । पार्टी के भीतर व्याप्त गुट और राजनीतिक असन्तुष्टि को दरकिनार करने के लिए सरकार के विरुद्ध कुछ ‘नारे’ बनाकर सड़क संघर्ष में उतर आने से आन्दोलन सफल होनेवाला नहीं है ।
पिछली बार सर्वोच्च अदालत के प्रस्तावित प्रधानन्यायाधीश दीपकराज जोशी को लेकर भी नेपाली कांग्रेस ने सड़क संघर्ष को तीव्र बनाने का संकेत दिया । कांग्रेसी नेताओं को कहना था कि किसी भी हालत में अगला प्रधानन्यायाधीश जोशी को ही होना चाहिए । कुछ नेताओं ने तो यह भी कहा कि अगर जोशी को प्रधानन्यायाधीश नहीं बनाया जाता तो प्रधानमन्त्री ओली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा । उन लोगों का मानना था कि इस तरह का वातावरण निर्माण करने में नेपाली कांग्रेस सफल रहेगी । लेकिन जब जोशी का शैक्षिक प्रमाणपत्र स–प्रमाण विवाद में आया तो कांग्रेस को अपना मुंह कुछ हद तक बन्द करना पड़ा । इस तरह के छोटे–मोटे मुद्दे को लेकर जब सड़क संघर्ष किया जाता है तो जनता की ओर से समर्थन मिलनेवाला नहीं है, किसी भी पार्टी के नेतृत्व में हो, इस तरह का आन्दोलन अब सफल होनेवाला नहीं है ।
कांग्रेस नेताओं को लगता होगा कि चुनाव के बाद निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को कुछ न कुछ तो रोजगार मिलनी चाहिए । अगर कार्यकर्ताओं को रोजगार देने के लिए ही नेतृत्व ने सरकार के विरुद्ध सड़क संघर्ष का आह्वान किया है तो वह शतप्रतिशत गलत है । क्योंकि इस वक्त कांग्रेस को सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करने की जरुरत नहीं है, उसके बदले पार्टी को आन्तरिक रूप में मजबूत बनाना है । जब संगठन में मजबूती आएगी, तब ही जनता के बीच पार्टी का सम्बन्ध प्रभावकारी रह सकता है । जब पार्टी जनता के बीच में मजबूत रहेगी तो पार्टी नेतृत्व में होनेवाला आन्दोलन भी सशक्त हो सकता है । आन्तरिक रूप में घायल दो–चार दर्जन कार्यकर्ता को सड़क में उतारने से आन्दोलन सफल होनेवाला नहीं है ।हर राजनीतिक पार्टियों को समझ में आना चाहिए कि आज की जनता सिर्फ पार्टी नेताओं से कहने पर विश्वास करेगी, यह नहीं है । नेताओं का भाषण और पार्टी निर्देशित बुद्धिजीवी द्वारा अखबारों में लिखित लेख के भ्रम में भी पड़नेवाले नहीं है । स्वतन्त्र जनता और विश्लेषकों को सामाजिक सञ्जाल में अपना विचार व्यक्त करने से रोकनेवाला कोई भी नहीं है, जहाँ जनता की पहुँच सहज है । इसीलिए आज नेताओं का भाषण नहीं, सामाजिक संजाल का विचार प्रभावकारी होता जा रहा है । ऐसी अवस्था में आम जनता की मानसिकता को मूल्यांकन किए बिना ही आन्दोलन घोषणा करना बिल्कुल सही नहीं है ।
मौसम के दृष्टिकोण से भी आन्दोलन करने का समय नहीं है । बारिश और खेती का समय है, सामान्यतः इस वक्त लोग व्यस्त रहते हैं । जो फुर्सत में हैं, वह भी बारिश के कारण बाहर नहीं आ पाते हैं । ऐसी अवस्था में आन्दोलन घोषणा करना आत्मघाती साबित हो सकता है । हां, अगर सत्ता की ओर से नागरिक को प्राप्त कर्तव्य सहित का स्वतन्त्रता और अधिकारों के ऊपर हस्तक्षेप किया जाता है तो उस का विरोध होना स्वाभाविक बनता है । लेकिन ‘प्रतिपक्षी दलों का धर्म सत्ताधारियों का विरोध करना ही है’ ऐसी मानसिकता को लेकर आन्दोलन घोषणा किया जाता है तो आन्दोलन सफल होनेवाला नहीं है ।

 

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