Sun. Sep 23rd, 2018

अग्नि परीक्षा से गुजरती कांग्रेस ! : लिलानाथ गौतम

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | कांग्रेस के अस्तित्व पर जो सवाल उठ रहा है, अब उस को गलत साबित करने का समय आ गया है, क्या इसके लिए कांग्रेस तैयार है ?
आज सत्ता राजनीति में नेपाली कांग्रेस इतिहास के सबसे कमजोर दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है । इतिहास को देखे तों पता चलता है कि कांग्रेस ही वह ‘किङमेकर’ है, जो सत्ता में किस को कब तक रखना है और किस को नहीं, तय किया करती थी । पर अब वैसी अवस्था नहीं है । हां, प्रतिपक्ष में तो कांग्रेस ही है, लेकिन उसको सबसे कमजोर और निरीह प्रतिपक्ष के रूप में विश्लेषण किया जा रहा है । अलोचना करनेवाले लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस एक निर्जीव प्रतिपक्ष हैं । लेकिन विगत कुछ दिनों से नेपाली कांग्रेस की सक्रियता अनुमान से कुछ ज्यादा ही दिखाई देने लगी है । इसके पीछे का राज क्या है ?
उल्लेखित प्रश्न का जबाब मिलने से पहले काँग्रेस का चुनाव में पराजय होने का मुख्य कारण क्या है ? इस प्रश्न का सही जबाब नेपाली कांग्रेस को मिलना चाहिए । लेकिन अभी तक कांग्रेस ने इसका सही जबाब नहीं दिया है । हां, जबाब तो है, लेकिन वह सच नहीं है । उक्त प्रश्न का सही जबाब के लिए ही नेपाली कांग्रेस ने लगभग एक महीने पहले हेटौडा में जिला सभापतियों को इकट्ठा किया । लेकिन उक्त आयोजन में भी बाम गठबंधन को ही चुनावी पराजय के लिए मुख्य कारण माना गया । लेकिन वास्तविकता यह नहीं है, सब कांग्रेसीजन जानते हैं । हां, चुनावी पराजय के पीछे बाम गठबंधन भी एक कारण है । लेकिन मूल नहीं, सहायक कारण है । इस बात को जानते हुए भी जिला सभापतियों ने वास्तविकता को स्वीकार नहीं किया । अनुमान किया जा रहा था कि चुनावी परिणाम की वास्तविक समीक्षा और भावी कार्यदिशा तय करने में जिला सभापतियों की उपस्थिति सक्षम हो जाएगी । लेकिन वास्तविकता अस्वीकार करने से ऐसा नहीं हो पाया ।
यह तो कांग्रेस की आन्तरिक अवस्था और राजनीतिक क्रियाकलाप है । कांग्रेस की दूसरी भूमिका संसद् में सशक्त प्रतिपक्ष होना है, जो कई दिनों से नहीं दिखाई दे रही थी । लेकिन कुछ दिनों से कांग्रेस केन्द्रीय संसद् (संघीय संसद) में कुछ ज्यादा ही सक्रिय नजर आ रही है । विशेषतः डॉ. गोविन्द केसी की अनसन और माइतीघर मण्डला में धर्ना निषेध संबंधी प्रसंग को लेकर नेपाली कांग्रेस संसद अवरुद्ध कर रही है । डॉ. गोविन्द केसी के अनशन के पीछे चिकित्सा शिक्षा विधेयक है, जो वर्षों से विवादित है । इसी विषय को लेकर डॉ. केसी बारबार अनशन पर बैठ रहे हैं ओर १५वीं बार वे कर्णाली स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान (जुम्ला) जा कर अनशन में बैठे हैं । चिकित्सा शिक्षा विधेयक ऐसा विधेयक है, जो हरदम सत्ता पक्ष के लिए सरदर्द का विषय बन रहा है । इसबार भी वही हो रहा है । ऐसी ही पृष्ठभूमि में सरकार ने पूर्व सरकार (शेरबहादुर देउवा) के नेतृत्व में किया गया कई नियुक्ति और बढ़ोत्तरी को भी खारिज किया गया है । यह भी कांग्रेस के लिए प्रतिपक्षी की भूमिका दिखाने के लिए एक मसला बन गया है । लेकिन कांग्रेस के पास वह नैतिक ताकत नहीं है, जिसके दम पर दो–तिहाई बहुमत से निर्मित वर्तमान सरकार को झुकाया जा सके । क्योंकि कांग्रेस आज जिस मुद्दा को समर्थन करते हुए संसद अवरुद्ध कर रही है, विगत में कांग्रेस भी उस मुद्दा के विरुद्ध में उतर आई थी । यहां तक कि कांग्रेसी नेताओं ने कहा था– डॉ. केसी विदेशी शक्ति से परिचालित शख्स है, जो नेपाल के स्वास्थ्य क्षेत्र में अराजकता लाना चाहते हैं ।
इसीलिए कांग्रेस की आज ‘अग्नि परीक्षा’ है । इसके लिए सबसे पहले कांग्रेस को अपनी गलतियों का अहसास होना चाहिए । आज डॉ. केसी जुम्ला में अनशनरत हैं । उनका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बिगडता जा रहा है । दूसरी ओर काठमांडू स्थित वीर अस्पताल में गंगामाया अधिकारी भी अनशन में बैठी है, जो अपने पुत्र कृष्णप्रसाद अधिकारी के हत्यारों के लिए कारवाही चाहती है । डॉ. केसी हाें अथवा गंगामाया, दोनों को न्याय मिलनी चाहिए । इसमें कांग्रेस सकारात्मक दिखाई दे रही है । लेकिन डॉ. केसी और गंगामाया दोनों पहली बार अनशन पर नहीं बैठ रहे हैं । विगत में भी वे लोग कई बार अनशन पर बैठ चुके हैं । यहां तक कि गंगामाया के पति नन्दप्रसाद अधिकारी ने तो अनशन के क्रम में ही दम तोड़ दिया । अर्थात् कांग्रेस नेतृत्व में सरकार रहते वक्त भी डॉ. केसी और गंगामाया अनशन पर बैठे थे । उन लोगों की मांग कल जो थी, आज भी वही है । लेकिन उस वक्त कांग्रेस ने उन लोगों की मांग के प्रति अनदेखा किया, सच यही है । अब उस गलती को महसूस कर जनता के सामने माफी मांगने का समय आ गया है, जिससे कांग्रेस को नैतिकबल मिल सकता है । अगर कांग्रेस नैतिकता की राजनीति के प्रति विश्वास करती है तो सबसे पहले विगत की गलतियों को स्मरण कर माफी मांगनी होगी । उसके बाद सरकारी रवैया के विरुद्ध आन्दोलन ।
मानवीय दृष्टिकोण से डॉ. केसी और गंगामाया की माँग बिल्कुल जायज है । डॉ. केसी की माँंग २ करोÞड नेपालीजन के स्वास्थ्य–जीवन से जुड़ी हुई है तो गंगामाया की मांग न्याय की मौलिक हक से । लेकिन दोनों मांग के प्रति सरकार सकारात्मक नहीं है । इसके पीछे पार्टी निकट व्यवसायी और राजनीतिक नेता–कार्यर्ताओं की स्वार्थ है । लगता है कि उन लोगों के ही नियन्त्रण में सरकार है, जो बिल्कुल जायज नहीं है । संसदीय राजनीति में सरकारी लापरवाही को रोकना और जनता को सचेत कराना, प्रमुख प्रतिपक्षी दलों की जिम्मेदारी है । कांग्रेस के सामने उस जिम्मेदारी को प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत करने का वक्त आ गया है । इसीलिए तो कहा गया है कि तत्कालीन परिवेश में नेपाली कांग्रेस के लिए यह एक ‘अग्नि परीक्षा’ है ।
सिर्पm डॉ. केसी और गंगामाया को ही न्याय दिलाने की बात नहीं है । नागरिकों की अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता को कुण्ठित करने की मंशा से सरकार द्वारा जारी निषेधाज्ञा आदेश (माइतीघर मण्डला) को भी तोड़ना है । इसके लिए प्रमुख प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है । उसके बाद ही स्वास्थ्य क्षेत्र मेडिकल माफिया के हाथों में जाने के लिए रोका जा सकता है और गंगामाया को भी इन्साफ दिलाया जा सकता है । अगर कांग्रेस सिर्फ अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए ही उल्लेखित मुद्दा उठा रही है तो जनता विश्वास करनेवाली नहीं है । क्योंकि कांग्रेस का विगत, जनता भलिभाँति जानती है । आगामी दिनों में कांग्रेस ‘राजनीतिक खेती’ के लिए नाटक करती है या जिम्मेदार प्रतिपक्षी की भूमिका में रहती है, यह देखना है ।
कांग्रेस किस तरह ‘राजनीतिक खेती’ के लिए नाटक करती है, यह आज भी हम लोग देख रहे हैं । जैसे कि वर्तमान सरकार को कांग्रेस नेता ‘अधिनायकवाद’ की संज्ञा देते हैं । पिछली बार ओली सरकार ने देउवा सरकार द्वारा नियुक्त कुछ संस्था के पदाधिकारियों को बर्खास्त किया । उसको विरोध करते हुए नेपाली कांग्रेस ने एक विज्ञप्ति भी प्रकाशित किया । विज्ञप्ति प्रकाशित करते वक्त पार्टी प्रवक्ता विश्वप्रकाश शर्मा ने कहा कि वर्तमान सरकार ‘कानूनी राज्य’ की धज्जियां उड़ा रही है और प्रधानमन्त्री ओली ‘अधिनायकवादी’ बनते जा रहे हैं । उक्त कथन कहने से पहले कांग्रेसी जनों की दिमाग में इस बात का खयाल नहीं आया कि, जब कांग्रेस सत्ता में थी, उस वक्त भी इसतरह ही ‘कानुनी राज्य’ की धज्जियां उड़ रही थी । क्योंकि तत्कालीन प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा और उक्त मन्त्रिमण्डल में शामिल कई मन्त्रियों ने निर्वाचन आचार संहिता के विपरित कई ऐसे नियुक्ति और बढ़ोत्तरी किये, जो तत्काल के लिए बिल्कुल आवश्यक नहीं था । उक्त कार्य भी एक ‘अधिनायकवादी’ शासकों की तरह ही था । देउवा सरकार द्वारा की गई उसी कार्य को करेक्सन करने के नाम में ओली सरकार ने आज सब को बर्खास्त किया तो कांग्रेस नेताओं को ‘कानुनी राज्य’ की याद आ रही है । नैतिक दृष्टिकोण से जो बिल्कुल अपेक्षाकृत नहीं है । आज के बाद भी कांग्रेस इस तरह के ही ‘राजनीतिक खेती’ के लिए सक्रिय रहती है तो देश में सुशासन के लिए नहीं, कुशासन और अराजकता के लिए प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी, जो जनअपेक्षित नहीं है ।
इसीलिए तो कहा गया है कि सबसे पहले कांग्रेस को अपनी गलतियों को महसूस करना चाहिए और नैतिकता का ख्याल भी । नहीं तो वही सच होनेवाला है, जो सत्ताधारी दल और सत्तासीन मन्त्री गण कह रहे हैं । सत्ताधारी दल विशेषतः प्रधानमन्त्री ओली का मानना है कि अब नेपाली कांग्रेस का कोई भी औचित्य नहीं है । प्रधानमन्त्री ओली ने उक्त कथन कई बार सार्वजनिक समारोह में कहा है । अब नेपाली कांग्रेस को अपनी नैतिक ताकतों के साथ उक्त कथन को गलत प्रमाणित करने का समय आ गया है । सिर्फ सत्ताधारियों की आलोचना करने से कुछ भी होनेवाला नहीं । राजनीति में शक्ति अर्जन करना है तो नैतिक बल भी चाहिए ।
इतना ही नहीं, कांग्रेस के सामने दूसरी चुनौती भी है– पार्टी को मजबूत बनाना । इसके लिए भी नैतिकबल की आवश्यकता है, जो अब तक कांग्रेस ने अर्जन नहीं किया । जिला सभापतियों की हेटौडा समारोह से उक्त अपेक्षा की जा रही थी । लेकिन नहीं हो पाया । उक्त समारोह आन्तरिक गुटों में ही सिमटकर रह गया । सब लोग अपने गलतियों को छिपाने के लिए ही लग गए । अपेक्षा की जा रही थी– उक्त आयोजन पार्टी को पुनर्जीवन देने के लिए नेतृत्व को बाध्य करेगी । लेकिन जिला सभापति स्वयम् गुट में सीमित होने के कारण अपेक्षा सिर्फ कल्पनाओं में सिमटकर रह गयी । चुनावी पराजय के लिए मूल कारण भी कांग्रेस में व्याप्त गुट, आन्तरिक धोखाधडी और नयी पीढी को अवसर से वंचित रखना था । जो जानते हुए भी उक्त आयोजन में यह बात किसी ने नहीं उठाया । अब कांग्रेस के भीतर पार्टी महासमिति बैठक की चर्चा भी है । कांग्रेस जनों की अपेक्षा है कि महासमिति बैठक कांग्रेस खुद को दिशा निर्देश कर सके । उस समय तक के लिए इतना ही काफी है ।

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