Mon. Dec 17th, 2018

महिला नेतृत्व अवसर और चुनौती : डा. सुषमा तिवारी द्विवेदी

राजनीति में महिला का नेतृत्व

परापुर्व काल से पुरुष प्रधान रहे, हमारे देश में नारियों के ऊँचे स्वर में अपने अधिकार और स्वतन्त्रता के लिए आवाज उठाते रहने के बावजूद, व्यवहारिक रूप में महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव और असामनता अभी भी विद्यमान है । आज के २१ वें शताब्दी में भी हम शिक्षा, सामाजिक चेतना, आधुनिकता के बावजूद लैंगिक विभेद महसूस कर सकते हैं और एक नारी का जीवन खÞुद को शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत घोषणा करने वाले परिवार में भी नियन्त्रण में रहकर ही बीत रहा है।
समाज और वहाँ के परिवेश अनुसार महिला हिंसा, बालविवाह, यौन हिंसा, दुव्र्यवहार, बलात्कार, डायन प्रथा, दहेज के नाम पर होने वाले अमानवीय व्यवहार आदि जैसे घटना आज भी देखने–सुनने और पढ़ने को मिलते हैं । इसके अतिरिक्त महिला स्वयं या परिवार के अन्य सदस्य द्वारा कभी बिक्री करने, कभी विभिन्न हिंसा और उत्पीड़न के घटनाक्रम को निरन्तर दोहराते हुए समाज में देख सकते हंै । ऐसी घटना मात्र पर्सा जिला में ही नहीं बल्कि जनसांख्यकीय सर्वेक्षण २०१६ के प्रतिवेदन अनुसार नेपाल में ३ नेपाली महिला में से १ महिला, हिंसा का शिकार रहती है ।
नेपाल में गणतन्त्र के स्थापना पश्चात सभी तराईवासी और खास करके मधेशी महिला, जनजाति, दलित तथा पिछड़ा समुदाय ने देश मे अपनी अवस्था में सुधार आने तथा अपने सम्मानित उपस्थिति पाने की बहुत बड़ी आशा और विश्वास रखा था, लेकिन देश में प्रतिनिधि सभा तथा स्थानीय स्तर में जनप्रतिनिधि आने के बाद भी मधेशी जनता ने और खास करके पर्सावासियों का सपना साकार होगा कि नही, इस दोधार में है । उसमें भी राजनीतिक नेतृत्व में प्रभावशाली और अर्थपूर्ण पहँुच नहीं होने पर महिला आज भी पुरुष अधिनस्थ रहने को बाध्य है । मधेश में हुए हरेक आन्दोलन में महिला अग्रपंक्ति में आकर एक सशक्त भूमिका में रही, इस तथ्य को कोई भी नकार नही सकता । इन महिलाओं ने विं.सं. २००७ साल से २०४६ और २०६२÷०६३ साल के आन्दोलन तथा उसके बाद हुए आन्दोलन में भी सक्रिय सहभागिता दिखाया था । लेकिन महिलाओं के सहभागिता का मुल्यांकन न किसी राजनीतिक पार्टी भीतर हुआ, न नेतृत्व करने की क्षमता वाली महिला को नेतृत्व स्तर तक पहुँचाया गया । जितने भी योग्य और सफल महिला थी, नेतृत्व स्तर पर अवसर नहीं दिया गया और अवसर पाए हुए को टिकने नहीं दिया गया । काम करने का वातावरण नहीं मिलने से, महिला को संविधान के संसद से स्थानीय निकाय तक, महिला को नेतृत्व स्तर में जगह सुनिश्चित करने के लिए, महिला को ३३ प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित किया गया था ।
नेपाल में विशेष करके हमारे पर्सा जिला में महिला को आर्थिक सामाजिक रूप से कमजोर तथा राजनीति में भी कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजुद, हिम्मत जुटाकर परिवार तथा समाज को चुनौती देते हुए, वि.सं. २०४६ साल के प्रजातन्त्र के पुर्नवहाली के बाद, वि.सं. २०६४ साल में हुए संविधान सभा के पहले और दूसरे निर्वाचन में ३३ प्रतिशत महिला का आना और विं.सं.२०७२ में संसद में ३३ प्रतिशत तथा स्थानीय निकाय के चुनाव में लगभग ४१ प्रतिशत महिला जनप्रतिनिधि का चुनना सभी नेपालवासी के लिए गर्वपूर्ण वातावरण का सृजना हो सकता है । तथ्यांक के दृष्टिकोण से भी महिला पुरुष से ८ लाख ज्यादा है और उनका योगदान समाज के विकास में पद और जिम्मेवारी वहन कर सकने तथा उनकी क्षमतावान तथा निर्णायक स्थान में सहभागिता अनिवार्य है ।
सन २०१६ में राजनीतिक तथा राष्ट्र के निर्णायक स्थान में महिला विषय में किए गए शोध ने, संसारभर के सदन में २२.८ प्रतिशत, एशिया में १९.२ प्रतिशत और नेपाल में ४१.१ प्रतिशत रहा । संसार भर की तुलना में नेपाल में महिला की संख्या उच्च रही है, तथा महिला राष्ट्रप्रमुख हुए, १० देश के भीतर पड़ता है । नेपाल का इतिहास देखना हो तो सन १९५८ में नेपाल की प्रथम महिला प्रतिनिधि सभा सदस्य द्वारिका देवी ठकुरानी हुई, उसके ४० वर्ष बाद नेपाली कांग्रेस के सरकार के समय शैलजा आचार्य देश की पहली उपप्रधानमन्त्री बनने में सफल हुई । सहभागिता के दृष्टिकोण से नेपाल में आज २०१७ के चुनाव में सांसद में ६ महिला प्रत्यक्ष की ओर तथा ११६३०÷४१ प्रतिशत ) महिला स्थानीय निकाय में जीतकर आई, जिसमे ४७ प्रतिशत दलित महिला का संख्या होना, ये साबित करता है कि राजनीति में महिला नेतृत्व की संख्या उल्लेखनीय रूप में बढ़ी है। लेकिन दुख की बात ये है कि वडा अध्यक्ष और नगरपालिका प्रमुख के रुप में मात्र २ प्रतिशत महिला जीत पाई। आज संघिय गणतान्त्रिक अवस्था में आने के बाद भी ये संख्या महिला को उच्चतम नेतृत्व वर्ग में नही पहुँचा पाया।
वि.सं. २०६४ में पहले संविधान सभा में जीते हुए ३० महिला मध्य ५ मधेशी महिला थी, जिसमे पर्सा से वर्तमान प्रदेश सभा सदस्य करिमा बेगम ने जीत दर्ज किया था, लेकिन स.सभा २ के चुनाव में कुल १० महिला जीत पाई, जिसमें मधेशी महिला ४ थी । अभी के प्रतिनिधि तथा स्थानीय निकाय के चुनाव में भी मधेशी महिला नेतृत्व तह में पहुंचने में सफल हुई है । आज पर्सा की महिला अवसर और चुनौती का सामना करने को तत्पर हैं । मात्र राजनिति में ही नही, अन्य क्षेत्र में भी महिला प्रमुख पद में रहकर अपना कार्य ईमान्दारीपुर्वक कर रही हैं । अभी नेपाल में कई प्रमुख पद पर महिलाए है और वे सक्षमता और सबलता के आधार पर अपना काम उर्जानिष्ठा के साथ कर रही है ।
महिला नेतृत्व असर तथा चुनौतीः
नेपाल में आरक्षण ने महिला सहभागिता बढ़ाया लेकिन सशक्तिकरण नही हुआ । आवाज बुलन्द हुई, लेकिन महिला को देखने के परम्परागत दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आया । जितनी भी योग्य और सफल होने के बाद भी महिला को नेतृत्व में टिकने नही देने के लिए, विभिन्न राजनितिक साजिश तथा महिला को काम करने की जिम्मेदारी नही देने के लिए महिला को आमंत्रित किए जगह पर, पुरूष खुद जाकर महिला को अयोग्य प्रमाणित करने का खेल स्थानीय तह में शुरु हुआ है । इस ओर राजनीतिक दल के महिला नेतृत्व, नागरिक समाज एवम वास्तविक जनप्रतिनिधि का ध्यान आकृष्ट होना चाहिए ।
नेपाल में लंबे संघर्ष के बाद, एक भी महिला का मुख्य मन्त्री नहीं होना, सुशिला कार्की प्रधान न्यायधिश के ऊपर महाअभियोग लगाना और अष्टलक्ष्मी शाक्य जैसे नेतृ को मुख्य मन्त्री नही बनाना समाज में महिला जनप्रतिनिधि के लिए कितनी बाधाओं का सामना करके आगे बढ़ने की चुनौती है, इससे स्पष्ट होता है ।
राज्य सत्ता और राजनीतिक दल को मुख्य नेतृत्व शक्ति माने तो कर्मचारीतन्त्र, न्यायपालिका, सेना, प्रहरी तथा राज्य के अन्य महकमे जैसे पत्रकार महासंघ, बार एशोसियसन, उधोग वाणिज्य संघ, गैसरकारी संस्था, बन उपभोक्ता, महासंघ आदि क्षेत्र में महिला की उपस्थिति क्रमशः बढ़ने के बावजूद नेतृत्व स्तर में पहुँच की अवस्था बहुत कमजोर है और इस ओर किसी के द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता ।
राजनीतिक दल में भी महिला पार्टी सभापति हुए पार्टी लगभग शून्य ही है । उसी प्रकार कोई महिला प्रमुख होकर चलाए संस्था का कद्र नहीं करना, उनके कार्यक्रम में सहभागी नहीं होना, उन्हें काम करने का अवसर नहीं देना, उन्हें किसी कार्यक्रम में सम्मानजनक और मर्यादानुकूल स्थान नही देना, जैसी हरकत हमलोग आए दिन देखते ही हैं ।
अगर पर्सा जिला की अवस्था देखी जाए तो जीतकर आए उपमेयर तथा गाँवपालिका के उपप्रमुख को मेयर तथा प्रमुख अर्थात पुरुष साथी के साथ मिलकर समझदारी में काम करने का वातावरण नही होने की बात वहीं के जनप्रतिनिधियों ने स्वीकार किया है । हमारे प्रदेश नं. २ के मुख्यमन्त्री ने कहा कि “महिला की समृद्धि के बिना प्रदेश और मुल्क किसी भी हालत में विकास के राह में आगे नहीं बढ़ सकते ।” सभी जगह महिलामैत्री कार्यक्रम की घोषणा करने के बावजूद पर्सा से जीते हुए जनप्रतिनिधि का कहना है कि “किसी भी विकास क्रियाकलाप कार्यक्रम में महिला जनप्रतिनिधि को ज्यादा बोलने नहीं दिया जाता, काम की जिम्मेदारी देने के बजाए मजÞाक उड़ाया जाता है । यहाँ तक कि उनके मातहत के कर्मचारी भी उनकी बातें को गंभीरता नहीं देते ।”
वीरगंज महानगरपालिका के मेयर, एक जिम्मेदार व्यक्तित्व का ये कहना कि “महिला के आगे नहीं बढ़ने का कारण चापलूसी नहीं करना है, साथ ही न्यायिक समिति में महिला प्रमुख होने के कारण सौ मुद्दा में सात मुद्दा का निर्णय हो पाया है ।” एक वडा अध्यक्ष ने आक्षेप लगाते हुए कहा कि “महिला जनप्रतिनिधि से मिलने पर महिला विकास में कितना रकम रखा गया है, इसकी भी जानकारी नहीं होती है ।” इस तरह महिला के प्रति पुर्वाग्रही सोच में कैसे आगे बढ़ा जा सकता है ?
महिला जनप्रतिनिधि को बैठने के लिए कक्ष की व्यवस्था तक नही होता । महिला में क्षमता होते हुए भी नेतृत्व नही कर पाना और जीत के आए २ महिला वडा अध्यक्ष में भी शिक्षा की कमी तथा क्षमता विकास का अवसर न पाने के कारण वीरगंज महानगरपालिका जैसे जगह पर महिला की ऐसी अवस्था, समग्र पर्सा के महिला के लिए प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है । क्योंकि कार्यपालिका में ५ महिला ३ पुरुष तथा न्यायपालिका में ३ महिला होते हुए महिला के विकास कार्यक्रम में कुल ५ से १० प्रतिशत बजट रखना और उस पैसा का आधा तो नगरपालिका के सदस्य के हाथ मे जाता है फिर कितना बजट आवश्यक जगह पर पहँुचेगा और आने वाले दिन में महिला का कितना उत्थान होगा ये भी वीरगंजवासी के लिए एक चुनौती है ।
महिला के विकास के लिए केन्द्रीय सरकार तथा मुख्यमन्त्री का ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान में करोड़ौ रुपया निकलने के बाद भी वीरगंज महानगरपालिका ने काम करने वाले संस्था या महिला द्वारा संचालित संस्था को दरकिनार करके अपने नजदीकी आदमी तथा पैसा के खेलचाल में सीमित कार्यक्रम में महिला का विकास कागज में सीमित होते हुए दिख रहा है ।
इसी संदर्भ में पटेर्वासुगौली गा.पा.की उपप्रमुख ममता महतो से बात करने पर कहा कि “वहाँ भी मात्र १० प्रतिशत बजट महिला के नाम पर छोड़ा गया है । वहाँ के पुरुष मेयर तथा वडाअध्यक्ष से खÞास सहयोग नहीं मिला । महिला उपप्रमुख तथा नेतृत्व करने की पुर्ण क्षमता होने के बाद भी समय–समय पर नीचा दिखाना, बात नही मानना, वेवास्ता करना आदि व्यवहार होते रहता है । उसी प्रकार न्यायिक समिति में निर्णय करने का काम समिति करता है, लेकिन कार्यन्वयन मेयर द्वारा होने के कारण महिला का निर्णय सहज रूप में नहीं लिया जाता है ।”
नेपाल में ५७ प्रतिशत और तराई के पुरुष में ७० प्रतिशत, नेपाल के ७५ प्रतिशत साक्षरता, मधेश में महिला के साक्षरता ५२ प्रतिशत सबसे कम है । राजनीति में महिला की सक्रियता को सांस्कृतिक रूप में पसंद नहीं करने के कारण महिला को सक्रिय देखना नहीं चाहते । सक्रिय महिला में से कम को टिकट मिलता है, जिससे कुछेक ही जीत हासिल कर पाती हंै । जीते हुए में भी काम करने का वातावरण और सहयोग न रहने के कारण महिलाएं नेतृत्व वर्ग में कम पहुँचती है ।
सुझाव तथा निष्कर्षः
खÞुद महिला जन प्रतिनिधि को अपनी क्षमता विकास करने की जरूरत है । अब प्रतिनिधित्व में मग्न होने के बजाय, खÞुद पाए जिÞम्मेदारी को काम में रुपांतरण करके नतीजÞा दिखाने का समय आया है । महिला को पद और पहुंच में जाने के बाद अपने कार्यक्षेत्र में विकास के मॉडल की योजना अपने पक्ष में आगे लेकर, अपने इच्छाशक्ति, आत्मबल, काम करने की भावना, जिÞम्मेदारी तथा कर्तव्य निर्वाह करने के लिए तैयार होना पड़ेगा ।
आज उपाध्यक्ष में चुनकर आने वाले कल प्रमुख बनने की क्षमता खÞुद में विकास करना होगा । जिला और गांव स्तर तक महिला संगठन बनाना पड़ेगा । शताब्दियों से ओझल में रहे ५० प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या को विकास के मूलधार में लाने और राज्य के विभिन्न तह में पहुँच, सक्रियता के साथ दिलाने के लिए परमपरावादी पितृसत्तात्मक सोच में परिवर्तन करना आवश्यक है । महिला की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार में विकास होने के साथ साथ खÞुद में आत्मविश्वास, दृढ ईच्छा शक्ति तथा क्षमता के विकास होना जरूरी दिखता है ।
निष्कर्ष ः
हमारे समुदाय में जीतकर आए उपप्रमुख अपनी क्षमता का बेहतर प्रदर्शन करें ये हमलोगों के लिए गर्व का विषय होगा । इस परिवेश में घर की जिम्मेदारी तथा अपने कर्मस्थल की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर हरेक प्रकार की बाधा अवरोध का सामना करके उदारण बनना होगा । नेपाली महिला में इस समय आशा की किरण जगी है और विश्वास हुआ है कि मौका मिले तो महिला भी स्थानीय तह का नेतृत्व निष्ठा के साथ कर सकती है, लेकिन उसके लिए समाज का साथ और खास करके पुरुष का भी साथ चाहिए, क्योंकि पुरुष की सोच, महिला नेतृत्व में भी अपने अनुकूल निर्णय लेने का दबाव बनाता है, और जब महिला अपनी बुद्धिमता और क्षमता से काम करना शुरू करेगी तब अनेक षडयन्त्र करके असफल करने की कोशिश करेंगे । इसलिए महिला की लड़ाई में पुरुष का सहयोग, सहभागिता, अनिवार्य है और उसके लिए सर्वप्रथम पुरुष महिला को समान अस्तित्व और भूमिका को भावनात्मक रूप में घर से बाहर तक स्वीकार करने की जरूरत है और आने वाले दिन में हमारे परिवार की बहू बेटी मात्र राजनीति में ही नहीं संस्थाओं के सि.ई.ओ, सरकारी कार्यालय प्रमुख सि.डी.ओ, मेडिकल सुप्रिटेन्डेन्ट, क्याम्पस प्रमुख, प्रधानाध्यापक, दल की सभापति, तथा हरेक क्षेत्र के नेतृत्व तह में आए, इसी विश्वास के साथ, हाथ से हाथ मिलाते हुए आगे बढ़ने की जरूरत है ।

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