Mon. Sep 24th, 2018

नव समाजवाद और नेपाल : अजयकुमार झा

इतना महान आन्दोलन के वाद माओवादी भटक गया,समाजवादी कांग्रेस खस वाद में अटक गया, साम्यवादी एमाले ब्राह्मण वाद में लटक गया, विशाल मधेसवादी आन्दोलन को जातिवाद गटक गया

ब्राह्मण देवो भवः को हम भुलाना नहीं चाहतें हैं । राजा राम, सम्राट कृष्ण जैसे हजारों कथाएँ जो हमें गुलामी के लिए अभिप्रेरित करता है, हम नित्य श्रवण कर अपने को उच्च कोटि के भक्त की श्रेणी में रखकर गौरवान्वित होतें हैं । दीनहीनता में गौरव दिखाई देता है

जातिवादी सोच वह सड़न है जो सहज ही मानवता को निगल जाती है

समाजवाद कैसा हो ? वी. पी. का समाजवाद ? मार्क्स का समाजवाद ? या लोहिया का समाजवाद ? पूँजीवादी समाजवाद या साम्यवादी समाजवाद ? तानाशाही क्रुर समाजवाद या सर्वजन हिताय सौम्य समाजवाद ? क्या इससे अलग शैली का नव समाजवाद नहीं हो सकता ? राष्ट्रवाद का स्वरूप क्या होना चाहिए ? बाम का अराजक राष्ट्रवाद या मधेसियों का सहज राष्ट्रवाद ? उग्रराष्ट्रवाद या सम्यक राष्ट्रवाद ? विध्वंसक राष्ट्रवाद या सृजनात्मक राष्ट्रवाद ? चुनावी राष्ट्रवाद या जमीनी राष्ट्रवाद? परम्परागत राष्ट्रवाद या आधुनिक राष्ट्रवाद ? संस्कारयुक्त राष्ट्रवाद या अन्धाकारयुक्त राष्ट्रवाद ?

खोखला राष्ट्रवाद या बुलंद राष्ट्रवाद ?
अब हमें नव समाजवाद के विशाल वृक्ष पर सर्वजनहिताय राष्ट्रवाद का फल लगाना होगा । भौतिक समृद्धि से संम्पन्न राष्ट्रवाद का फूल खिलाना होगा । वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरने वाला मानवता मूलक राष्ट्रवाद लाना होगा । जातीय क्षुद्रता से ऊपर और धार्मिक मतान्धता से मुक्त सर्वप्रिय,सर्वमान्य राष्ट्रवाद के सूत्र को खोजना होगा । एक ऐसा राष्ट्रवाद जिसमे हिमाली नाचते हुए दिखाई दे । किराती झूमते हुए नजर आवें । थारु मचलते हुए दिखे । खस शान्त और सृजनशील दिखें । और मधेसी मदमस्त नजर आवें । लेकिन यह तब संभव है, जब हम राष्ट्रीय शासन व्यवस्था में नव समाजवादी विचार को स्थान देंगे । उसके आधार पर देश को गतिशील करेंगे । प्रत्येक मानव अनमोल है । जीवन अद्वितीय है । इस दिव्य भाव से भावित होंगे ।
‘‘समाजवाद एक सामाजिक व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत जीवन के साधनो पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व होता है और पूरा समाज  आम जनकल्याण की वृद्धि करने के उद्देश्य से उनका विकास और प्रयोग करता है ।’’ समाजवाद मूलतः समाज से सम्बन्धित है और न्यायपूर्ण सृजनशील समाज की स्थापना के लिए प्रयत्नशील रहता है । समाजवाद शब्द मुख्य रूप से तीन अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है—
यह एक राजनीतिक सिद्धांत है । जो राष्ट्र के सभी अंगो और पक्षों के समग्रतम विकास को आधार मान के चलता है ।
यह एक राजनीतिक आंदोलन है । जो समय सापेक्ष विचार,राजनैतिक चिंतन,समसामयिक मानवीय आवश्यकता और आधुनिक वैज्ञानिक खोज तथा सांस्कृतिक विरासत को हृदयंगम करता है,स्वागत करता है ।
इसका प्रयोग एक विशेष प्रकार की समाजिक व आर्थिक व्यवस्था के  लिये किया जाता है । जो की तात्कालिक समस्या को समाधान करते हुए भावी (भौतिक,सामाजिक,धार्मिक,सांस्कृतिक,राजनैतिक,आर्थिक तथा व्यवहारिक) समस्याओँ का समाधान के साथ साथ व्यवस्थापन भी करता है । न की समाज के सम्पत्तिशालियों के संपत्ति हरण कर गरीबों  की श्रेणी में लाकर नपुंसक साम्यवादी समाजवाद को स्थापित करना है ।
चाहे माक्र्सवाद हो या साम्यवाद । व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध हारे हुए क्षुद्र मानसिकता का प्रमाण है ।  बल्कि एक–एक व्यक्ति को धनी बनाने के लिए प्रयास हो । संपत्ति कमाने के लिए हर उद्योग किया जाय । इतनी सम्पत्ति हो जाय कि धन और धनवान का मूल्य खो जाय तब जाके समाजवाद का मजा आएगा ।
राजनीति में जातीयता को आधार बनाना समाज और राष्ट्र के भविष्य के प्रति कुठाराघात है । जातीयता वह अन्धा उन्माद है जो न प्रतिभा देखता है न विकास । न भ्रष्टाचार को देखता है न ईमानदार को । न सृजनशीलता को देखता है न बिध्वन्शकारी को और परिणाम स्वरूप समाज बद से बदतर होता जाता है । जीवन स्तर नीचे गिरता जाता है । मानवता का अवमूल्यन होता जाता है । और अंत में एक दीनहीन समाज का निर्माण होता है । आज हम नेपाल के लोग इस राह पर गिरते जा रहे हैं ।
जातिवादी सोच वह सड़न है जो सहज ही मानवता को निगल जाती है । प्रमाण है भारत का बिहार राज्य, जिसे भारत की जनता घृणा से देखती हैं । आज भारत के यादव भी अपने को शर्मिंदगी महसूस करते हैं, लालू के कारण । अतः ऐसी किसी भी मतान्धता के पीछे चलने से पहले हजार बार सोचें की क्या आपका यह कदम सर्वजन हिताय है ? क्या इससे समाज में शान्ति और सुव्यवस्था कायम होने में मदद मिलेगी ? क्या इस में सार्वभौम विकास संभव है ? क्या जातीयता के नाम पर समाज को आतंक की भठ्ठी में झोंकना आनेवाले पीढि़यों के लिए उचित है ? क्या आप अगले जन्म में फिर से उसी जाति में जन्म लेनेवाले हैं ?
जातीयता का निर्मूलन आवश्यक
इस संसार में जीवन का मुल्य सर्वोपरि है । और सफल जीवन वह है जहां आनंद है, उत्सव है, उमंग है, सृजन है, प्रेम है, दान है, भरोसा है, आलिंगन है, भाईचारा है, माधुर्य है, साधना है, संन्यास है, संकल्प है, विकास है, सौन्दर्य है, नृत्य है, संगीत है और इस सबका जातीयता से कोई दूर तक का भी सम्बन्ध नहीं है । अतः  मानव मात्र के सुन्दर भविष्य के लिए एक संकल्प लें, जातीयता से ऊपर उठने का, विकास हेतु एक्यवद्धता का, सामजिक सौहार्दता का, राजनैतिक समझदारी का, नव समाजवाद का, सामूहिक सोच का, सर्वजन हिताय का, (बहुजन नहीं सर्वजन हिताय ही लक्ष्य हो)
नेपाल में न किसी पार्टी की अपनी मौलिक अवधारणा है, न किसी व्यक्ति की ठोस सोच और चरित्र है । इतना महान आन्दोलन के वाद माओवादी भटक गया,समाजवादी कांग्रेस खस वाद में अटक गया, साम्यवादी एमाले ब्राह्मण वाद में लटक गया, विशाल मधेसवादी आन्दोलन को जातिवाद गटक गया, अब यह समझ में नहीं आता है कि क्यों समग्र देश ही घटियापन का नमूना हो गया है । चोर, लुच्चे,गुंडा,अपराधी, दलाल,स्मगलर और आतंकवादी चरित्र के लोग ही नेपाल में सुरक्षित हैं । उनका ही भविष्य है । बाकी के विद्वान् सभ्य और सृजनशील लोगो के लिए यहाँ कोई स्थान शेष नहीं है गुलामी के सिवाय ।
प्रगतिशील और सम्यक राजनैतिक धार हो
जो लोकतंत्र के हत्यारे हैं कल वही पैसा और जाति के बल पर महान लोकतंत्रवादी हो जाता है । जो लड़ा कटा वह भीख माग रहा होता है । ऐसे में यहाँ न कोई सच्चा लोकतंत्रवादी है न समाजवादी न साम्यवादी । यह सारा सिद्धांत सिर्फ आरक्षण की सुविधा के लिए है । सता भोग के षडयंत्र के लिए है । अल्पमत के द्वारा बहुमत पर शासन के लिए है । (गुणतंत्र हमारा लक्ष्य हो )
राजावादी भक्तिभाव आज भी हममे विद्यमान है । ब्राह्मण देवो भवः को हम भुलाना नहीं चाहतें हैं । राजा राम, सम्राट कृष्ण जैसे हजारों कथाएँ जो हमें गुलामी के लिए अभिप्रेरित करता है, हम नित्य श्रवण कर अपने को उच्च कोटि के भक्त की श्रेणी में रखकर गौरवान्वित होतें हैं । दीनहीनता में गौरव दिखाई देता है । सेवक भाव में महानता नजर आता है । कमजोरी और नपुंसकता को संतोषं परम सुखं कह महिमामंडित करतें हैं । अकर्मण्यता और भिक्षाटन में बुद्धत्व नजर आता है । इस प्रकार हजारों वर्षों से हमारे भीतर प्रज्ञा का नहीं संतोष का भाव भरा गया है । जिसका परिणाम गरीबी, दरिद्रता और शारीरिक–मानसिक दुर्वलता है ।
लेकिन जिसे हम संतोष समझते हैं कि जीवन में जो कुछ है, दीनता है, दरिद्रता है, रोग है, बीमारी है उसमें ही संतुष्ट रह जाना है । ऐसा संतोष आत्मघाती हैं, सुसाईडल हैं । अतः जीवन के विकास के लिए चाहिए एक तीव्र असंतोष । जीवन की सब दिशाओं में विकास के लिए असंतोष के अतरिक्त कोई मार्ग नहीं । और जो देश संतोष की बातों में अपने को भुला लेगा । उस देश की यही स्थिति हो सकती है जो हमारे देश की हुई है । नहीं ! जीवन के विकास में जरूरत है एक जमीनी असंतोष की । एक अनिवार्य भौतिक विकास के अवधारणा की जरूरत हैं । एक वैज्ञानिक विचारधारा की जरुरत है । युवा मानसिकता की जरूरत है । प्रौढ़ तथा तर्कपूर्ण जीवन शैली की जरुरत है । सभी पुराने विचार,सिद्धांत,संस्कार और सम्प्रदायों के साथ विभेद और पक्षपात रहित कड़ा प्रतिवाद की आवश्यकता है । मानव मात्र के समृद्ध जीवन को केन्द्र में रखकर एक कदम आगे बढ़ने की जरुरत है ।( मानसिक और धार्मिक गुलामी से मुक्ति) और यह मत सोचे कि जीवन के विकास के लिए मैं जिस असंतोष की बात कर रहा हूँ, वह भीतर अशांति को जन्म देता है । नहीं,वास्तव में यही जीवन को भीतर संपन्नता और समृद्धि प्रदान करता है । सहजता और सृजनशीलता प्रदान करता है ।
प्रश्न तो यह है कि जितने लोग अपने को जबरदस्ती संतोष में ढाप लेते हैं । संतोष के वस्त्र ओढ लेते हैं वे भीतर निरन्तर जलते रहते हैं और असंतुष्ट परेशान और अशांत रहते हैं । फैलता हुआ संतोष कभी भी सत्य नहीं हो सकता । ऊपर से आरोपित किए गए संतोष के भीतर असंतोष की आग जलती ही रहती है । असंतोष चाहिए बाहर, भीतर चाहिए संतोष हमने उल्टी हालत पैदा कर ली हैं । संतोष थोप लिया है ऊपर से और भीतर असंतोष है, जलन है । आक्रोश और हीनता की ग्रंथि है । स्वयं से पराजित अवस्था है । अतःहमारे भीतर तो चाहिए शांति, परिपूर्ण शांति एक स्थिरता और बाहर जीवन के इस चक्र पर चाहिए तीव्र गति । जब तक कोई समाज, कोई देश अपनी मंशा को इस भांति व्यवस्थित नहीं करता कि भीतर हो परम शांति और बाहर हो एक दिव्य असंतोष का चक्र, तब तक वह देश विकसित नहीं हो सकता । तब तक वह देश रोज रोज मरता चला जाएगा । दीनहीन होता चला जाएगा । जीवन काटों का फुलबारी बनता जाएगा । जहां महारास होना चाहिए वहाँ महाविनास दिखाई पड़ेगा ।
शान्ति और सृजनशीलता को सार्वभौम स्वीकृति हो
लेकिन हम आज तक इस विरोधी दिखने वाली चीज को समझने में समर्थ नहीं हो पाए । हम यह नहीं समझ सके कि शांत व्यक्ति भी जीवन की गति में जीवन को बदलने के लिए आगे हो सकता है । हम यह सोच ही नहीं पाए कि एक सन्यासी संसारी कैसे हो सकेगा ? हम यह भी नहीं समझ पाए कि एक परिपूर्ण शांत व्यक्ति भी युद्ध के क्षेत्र पर तलवार लेकर लड़ने को तैयार हो सकता है । हम कहेंगे जो शांत है वह लड़ने कैसे जाएगा ? हम अपनी गरिमापूर्ण इतिहास को गंभीरता से समझने का प्रयास नहीं कर सकें । जो कि हमारा गुरुकुल,आचार्य कुल कर्म प्रधान और वैज्ञानिक अनुसंधान का केंद्र था । सारे हाथ हथियार,औषधि, सिद्धांत वहाँ सृजन किए जाते थे ।
लेकिन यह दुर्भाग्य जिसे कृष्ण और सुदामा के जीवन चक्र से जोड़ दिया गया है कि ब्रह्म को पाने के लिए ब्राहमण बनना होगा और ब्राहमण को दरिद्र होना ही पड़ेगा तब जा के सुदामा को कृष्ण मिलेंगे । यही से प्रज्ञावान लोग सत्ता से पलायन कर दिए गए । अच्छे लोग समाज से दूर कर दिए गए या खुद ही होते चले गए । एक भ्रम एक दुश्चक्र पैदा किया गया की जिन्हें परमात्मा को पाना हो उन्हें समाज और राजनीति से दूर रहना चाहिए । जो ईमानदार, सृजनशील,सहृदयी लोग हैं उनके लिए राजनीति उचित नहीं है । उन्हें तो राजनेताओं का गुणगान करना चाहिए । भजन कीर्तन करना चाहिए । उन्हें मुक्ति का मार्ग ढूढ़ना चाहिए । अर्थात हर हाल में ऐसे लोगो को सत्ता से दूर रखा जाय । और हम जैसे लोग इस मनोवैज्ञानिक षडयंत्र को समझ नहीं पाए । और शुरु हो गई राम कथा । अगले पिछले जन्मों की कहानी । कर्मफल के चक्रव्यूह । कर्मवंधन के महाजाल । और फसते गए हम जैसे प्रज्ञावान साधक ।
संत और सभ्यों को समाज में वापसी
यह भाव हमारी मानसिकता में इतना घनघोर रूप धारण किए हुए है कि आज भी हम यही मानते है कि एक आदमी गरीब इसलिए है कि वह अपने पिछले जन्मों के बुरे कर्मों का फल भोग रहा है । उसने बुरे कर्म किए हैं इसलिए गरीब है और एक आदमी इसलिए अमीर है क्योंकि उसने अच्छे कर्म किए हैं । इस व्याख्या ने भारतीय उप महाद्वीप के सारे मुल्को के विकास के परिवर्तन के ढांचे को बदलने की सारी संभावना समाप्त कर दी । गरीब ने यह मान लिया की वह इसलिए गरीब है क्योंकि उसने पाप किए । अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि उसने पुण्य किए । तब फिर समाज की व्यवस्था को बदलने का कोई उपाय न रहा । क्योंकि गरीबी अमीरी को हमने समाज की व्यवस्था से अलग कर के व्यक्ति के कर्मों की अनुज व्यवस्था से जोड़ दिया है ।
कर्म बंधन और पूर्वजन्म से मुक्ति
अब एक आदमी गरीब है परन्तु इमानदार है । रोगी है परन्तु सृजनशील है । दुखी है परन्तु निर्लोभी है । कमजोर है परन्तु दयालु है सेवक है । तो इसे अगला जन्म अच्छा होने का ढाढस दिया जाय ताकि वह अपना अधिकार न खोज सके । मित्रों यही है ब्राहमणवाद, जिसका सुक्ष्म अनुयायी आजतक के सभी वाद के संचालक हैं । प्रमाण चीन के वर्त्तमान राष्ट्रपति शीजिनपिंग है ।
यह षडयंत्र इतना कारगर साबित हुआ कि आजतक दरिद्रों ने कोई क्रांति नहीं किया । जब तक कर्म फल के इस भ्रांति भावना से हम बंधे हुए हैं । तब तक हम अपनी राजनैतिक और सामाजिक ढांचे को नहीं बदल सकतें और नहीं नव समाजवाद की नीव डाल सकते हैं । क्योंकि (समाजवाद का मौलिक अर्थ ही है—जीवन का समग्रतम स्वीकार, प्राणिमात्र के संरक्षण और विकास ।
हमारी आजतक की शिक्षा ने प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत दृष्टि देने का काम किया है । हम सामूहिक समाजिक दृष्टिकोण को विकसित नहीं कर पाएं । एक सामूहिक जीवन को सोचने की भावना हममें विकसित नहीं हो सकी । हमने कहा एक एक आदमी के अपने–अपने कर्म फल हैं, अपना–अपना जीवन है अपनी यात्रा है । दूसरे से कोई संबंध नहीं दूसरे से कुछ लेना देना नहीं ।
यहीं पर हम मौलिक समाजवाद से चुक गए और हमने व्यक्तिवाद को अनजाने में स्वीकार कर लिया । जो आज अभिशाप सिद्ध हो रहा है ।
सामूहिक दृष्टि और सहकार्य का भाव
एक तो हम यह कहते हैं कि जो भी श्रेष्ठ, जो भी सत्य, जो भी सुंदर है । वह हमें उपलब्ध  हो ही चुका है इसलिए नए होने की अब कोई जरूरत नहीं । लेकिन जिस देश को यह खयाल हो कि विकास हो ही चुका है । वहां अब विकास के लिए परिवर्तन की कोई गुंजाईश नहीं है । हमें परिवर्तन न करना पड़े । इस बात के लिए हम यह मान कर बैठ गए हैं कि हमने सब पा लिया है । विज्ञान के द्वारा बनाए भवन में बैठकर विज्ञान को कोसते हुए गौरव महसूस करना,विज्ञान के सृजना(दूरदर्शन,हवाईजहाज,कंप्यूटर आदि लाखों वस्तुओं को उपयोग करते हुए भी विज्ञान को ही गालियाँ देना हारे हुए क्षुद्र मानसिकता का प्रमाण नहीं तो और क्या है ?
हीनता ग्रंथि से मुक्ति
याद रहे, नए को स्वीकार करना, पुराने की मृत्यु है । जबकि पुराने में एक सुरक्षा एक भरोसा एक अनुभव दिखाई देता है । जो मनुष्य के लिए आस्था का केंद्र बन जाता है । यही आस्था उसके लिए गुलामी का स्वर्ण जंजीर बन जाता है । जिससे मोह के कारण मुक्त होना कठिन हो जाता है । अतः नए को स्वीकार कर अतीत और परंपरा से चले आ रहे प्रणाली में हम वैज्ञानिक सुधार लाकर जीवन को स्वस्थ और समृद्ध बना सकते हैं ।
हम मजे से आज भी इस भ्रम में रह सकते थे कि हम विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं । लेकिन आधुनिक विश्वव्यापीकरण ने हमारे इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया । आज गाँव के लोग वाशिंगटन के जीवन शैली और नीतियों से भलीभाँति परिचित हैं । यही एक कारण है की राजतन्त्र,तानाशाह और एकलौती शासन व्यवस्था अब विश्व से तिथिवाह्य होते जा रहे है । रूस से साम्यवाद ध्वस्त हो गया । चीन को पूजीवाद का शरण लेना पड़ा । नेपाल का तथाकथित साम्यवादी कब पूजीवाद में बदल गए पता भी नहीं चला ।
नए की स्वीकृत और स्वागत
तो अब इन आधी अधूरी सिद्धांतों के प्रयोगशाला के रूप में रहने से तो कहीं अच्छा है कि हम पूजीवाद को वैज्ञानिक रूप दें । उसपर राज्य का अधिकतम सुक्ष्म निगरानी हो । राज्य पँुजीपतियों को संवैधानिक और व्यवहारिक रूप से आश्वस्त कराए कि तुम्हारी पँुजी यहाँ पूर्णतः सुरक्षित है । तुम पूर्णतः सुरक्षित हो । तुम्हारी सुरक्षा का पूर्ण दायित्व हम लेते हैं । उद्योग के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं सरकार उपलब्ध कराएगी । विदेशी तथा स्वदेशी उद्योग पति और व्यापारियों को नेपाल में पूँजी लगाने के लिए उत्साहित करना होगा । निजी क्षेत्र को उस के सुरक्षित भविष्य के लिए आश्वासन और नेपाली जनता के सुन्दर भविष्य के लिए नौकरी देने के लिए आवश्यक कानून के तहत समझौता करना होगा । तब कहीं जा के देश में आर्थिक क्रान्ति सफल होगा । देश समृद्धि के आसमान को छू सकेगा ।
नेपाल में कम्यूनिजम या भौतिकवाद रेव्यूलेशन नहीं हुआ है, ये सभी रिएक्शन है, प्रतिक्रिया है । नेपाल में शुद्ध रूप में न मार्क्सवादी क्रांति हुई है न माओवादी क्रान्ति ही, ये सारी की सारी प्रतिक्रियाएँ हैं । यह नेपाल के पांच हजार साल की दुःखद कहानी का विरोध है और अगर आज हमारे  बच्चे मंदिर जाने से इनकार कर रहे हैं । तो ध्यान रखना बच्चे जिम्मेदार नहीं हैं, हम ही जिम्मेदार हैं ।
अगर हमारे बच्चे गीता को फेक रहे हैं । तो उसका कारण है, क्योंकि भूखे पेट गीता का ज्ञान, सुख नहीं देता  सिर्फ दुःख देता है । हमने जो हालत पैदा की हैं, वह हालत प्रतिक्रिया में ले जाने वाली है । खतरा बहुत है और बड़े से बड़ा खतरा यह है कि हमने धर्म और अध्यात्म के नाम पर दुःख झेल लिए, कही अब हमें भौतिकवाद के दुःख न झेलने पड़ें ।
प्रतिक्रिया नहीं सहज बुद्धिमत्ता हो
जिस प्रकार सांस्कृतिक अत्याचार, जातीय भेदभाव, धार्मिक कट्टरता इन सभी तत्वों ने मानवीय मूल्यों को नकारा है, गिराया है, जीवन को नकारा है, वर्तमान को अस्वीकार किया है, अतीत के लकीर के पÞmकÞीर रहे हैं, अब विज्ञान इन नवयुवकों को आधुनिकता का पाठ सिखा रहा है । जो इन युवकों को सभी पुराने सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रतिक्रिया हेतु अभिप्रेरित करेगा, जो दूसरी गलती होगी । यह क्रम अगर ऐसे ही चलता रहा तो हम कोल्हू के बैल की तरह चलेंगे तो बहुत लेकिन पहुचेंगे कहीं नहीं ।

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