Tue. Sep 25th, 2018

वृद्ध माता–पिता की सेवा

अपने परिवार के परम आदरणीय एवं पूजनीय वृद्ध माता–पिता की सेवा से बढ़ कर और कोई सेवा नहीं है । माता–पिता ने हमें जन्म दिया है । उन्होंने स्वयं अत्यन्त कष्ट सहकर भी प्रसन्न चित्त से हमारा पालन–पोषण किया है, हमें बड़ा किया है । अच्छे संस्कार देकर एवं अच्छी शिक्षा दिला कर हमें इस योग्य बनाया है कि हम अपना भला–बुरा स्वयम् सोच सके । उन्होंने हमें जीवन जीने की कला सिखलायी है ताकि हम जीवन पथ पर सबके साथ सद्व्यवहार करते हुए, सब का भला करते हुए सुगमता से आगे बढ़ते रहे । उन्होंने हमारे लिए इस जीवन में जो कुछ किया है, उस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते हैं । यदि हम अपने तन, मन एवं धन के द्वारा उन्हें सदैव सुख, पहँुचाते रहे और यदि वे पूर्ण रूप से प्रसन्न हो जाय तो हमारा ऋण माफ कर सकते हैं । यही एक तरीका है, जिसके द्वारा हम उनसे उऋण हो सकते है, अन्य कोई भी तरीका नहीं है ।
अतः हमें अपने माता–पिता की सेवा तन, मन एवं धन के द्वारा करनी चाहिए । उनके मनोनुकूल सब कार्य करके उनका मन प्रसन्न हो जाय, ऐसी प्राणप्रण से चेष्टा करनी चाहिए । उनकी आज्ञा पालन करने में अत्यन्त तत्परता रखनी चाहिए । हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बचपन में उन्होंने हमारी सभी मांगों को सहर्ष पूरा किया है । हमने जो मांगा, वह तत्क्षण पाया था । इसलिए हमें भी उचित–अनुचित विचार किए बिना सदैव उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए । हमारा यह कर्तव्य है कि हम अपने माता–पिता के हृदय में जरा भी ठेस नहीं पहुँचाये । उनके मन की रुचि को ध्यान में रखते हुए उनका मन प्रसन्न रखना चाहिए । ऐसा करने से हमे जीवन भर उनके द्वारा हृदय से शुभाशीष प्राप्त होता रहेगा । माता–पिता जब तक स्वस्थ रहते हैं, अपने सब कार्य स्वयं करते रहते हैं, वे हमसे कुछ भी आशा नहीं रखते हैं । प्रौढ़ावस्था आने के बाद धीरे–धीरे जब वे वृद्धावस्था में प्रवेश करते है, तभी वे हमसे कुछ आशा रखते हैं । हमे उस समय अपना फर्ज निमाने में शतप्रतिशत खरा उतरना होगा ।
कहा भी गया है कि बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है । वृद्ध माता–पिता में भी अक्सर बाल–सुलभ आदतें आ जाती हैं । हमे यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि बचपन में हमने जो कुछ किया था, वृद्धावस्था में हमारे माता–पिता कर सकते हैं । बालक अपने बालमन में कुछ भी हठ करके मांग सकता है और हमारे माता–पिता ने उस समय हमारी सभी मांगों को तुरंत ही पूर्ण किया था, जीवन में सबसे कठिन कार्य है, किसी व्यक्ति के मनोनुकूल कार्य करना और हमारी शैशवास्था में हमारे माता–पिता ने हमेशा ऐसा किया था । अब जब हमारे पुजनीय एवं परम आदरणीय माता–पिता ने वृद्धावस्था प्राप्त कर ली है, तब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम पूर्णतः उनके मन के अनुकूल कार्य करें ।
हमे उनकी तन, मन एवं धन से सेवा करने के लिए प्रस्तुत होना चाहिए । वे यदि अस्वस्थ हो जाये तो उनकी अहर्निश देखभाल करनी चाहिए । उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, यह सावधानी रखना चाहिए, इनके मन में जो भी बात आये, उसे भरसक पूरा करने का प्रयत्न करना चाहिए । उनकी इच्छा यदि कहीं तीर्थस्थल में जाने की है तो उनके स्वास्थ्य का खयाल रखते हुए अगर सम्भव है तो जरुर ले जाना चाहिए । उनकी अगर दान–पुण्य करने की इच्छा हो तो अपनी सामथ्र्यनुसार करवा देना चाहिए ।
महाकवि संत तुलसी दास जी रामचरित्र मानस में आया है–
माता–पिता गुरु और प्रभु के बानी ।
विनहि विचार करिअ सुभ जानी ।।
माता–पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझ कर करना चाहिए । उनकी आज्ञा पालन करने से हमारा सदैव मंगल ही होगा । अतः विचार किए बिना उनकी आज्ञा अनुसार कार्य करना चाहिए ।
वृद्ध माता–पिताजी प्रसन्नचित होकर सेवा करने से जीवन में हमें सर्वस्व प्राप्त हो जाता है । आयु, विद्या, यश एवं बल्कि वृद्धि हो जाती है, कारण वे प्रसन्न होकर हृदय से आशिर्वाद देते हैं ।
माता–पिता के महत्व के बारे में उल्लेख शिव पुरान में इस प्रकार मिलता है–
पित्रोशय पुजन कृत्वा प्रकान्ति चकरोति चः ।
तस्य वै पृथिवीन्यफल भववित निश्चितम् ।।
अपहाय गृहों यो वै पितरो तीर्थामाव्रजेत ।
तस्य पांव तथा प्रोक्त हनने च तयोर्यथा ।।
पुत्रस्य च महतीर्थ पित्रोश्चरणपङ्कजम् ।
अन्यतीर्थ तु द्वरे वै गत्वा सम्प्राण्येते पुन ।।
इदं सन्निहित तीर्थ सुलभ धर्मसाधनम् ।
पुगस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थ गहे सुशोभनम् ।
(शिवपुराण रुद्रसंहिता कुमारखण्ड ११।३९–४२)
अर्थात् जो पुत्र माता–पिता की पुजा करके उनकी प्रदक्षिण करता है ? उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है । जो माता–पिता को घर छोड़कर तीर्थ यात्रा के लिए जाता है, वह उनके मनके विपरित कार्य करने से पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता–पिता के चरणसरोज ही महान् तीर्थ है, अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होता है, परन्तु धर्म का साधना भूत वह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है । पत्रु के लिए माता–पिता और स्त्री के लिए पति सुन्दर रूप तीर्थ घर में ही विद्यमान है । (सेवा ही धर्म है ।)

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