Mon. Nov 19th, 2018

सपनों की सरकार या यथार्थ की सरकार : डॉ. श्वेता दीप्ति

सत्ता के सात महीनें कितनी सफल !

दो तिहाई बहुमत की शक्तिशाली सरकार, जिसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन सिर्फ जनता को महँगाई का त्रास देने और त्रसित करने में ही दिखाया है । आमदनी से अधिक कर देकर जीने के लिए आम जनता बाध्य है ।

हिमालिनी, अंक अक्तूबर २०१८ | सपनों की सरकार या यथार्थ की सरकार, आज नेपाली जनता यह सोचने पर विवश है । प्रधानमंत्री ओली अपने मातहत के कर्मचारियों से कहते हैं कि ऐसा परिणाममुखी काम करो जिसे जनता देख सके, महसूस करे और संतुष्ट हो, सच ही तो है जनता यही चाहती है । पर सवाल यह है कि क्या विगत के सात महीने में जनता ऐसा कुछ महसूस कर पाई है ? फाल्गुन ३ गते (१५ फरवरी)से वर्तमान सरकार कार्यरत है । बीते हुए सात महीने किसी भी सरकार की नीति और कार्यशैली को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है । परन्तु अगर विश्लेषण किया जाय तो विगत के सात महीने की सरकार की उपलब्धि सिर्फ और सिर्फ भाषण, विदेश यात्रा, मंत्री पद का विस्तार, सत्ता बचाने की कोशिश और इसके बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि मँहगाई की सर्वोच्च स्थिति रही । जिसने वर्तमान सरकार के प्रति आम जनता के मोह को भंग कर दिया है ।
आज रोम और नीरो की कहानी सायास याद आ रही है । वर्तमान परिस्थिति से यह कहानी बहुत अधिक साम्य भले ही ना रखती हो, पर दोनों में असंतोष की आग लगभग एक सी है जिसकी लपटें बढती जा रही हैं । सन् ६४ में रोम नगर में अत्यंत रहस्यमय ढंग से आग की लपटें भड़क उठीं जो छ दिनों तक धधकती रही । जिससे आधे से अधिक नगर जलकर खाक हो गए थे । जब यह आग धूधू कर के जल रही थी, तो नीरो एक स्थान पर खड़े होकर उसकी विनाशलीला देख रहा था और सारंगी बजा रहा था । यद्यपि कुछ लोगों का ख्याल है कि आग स्वयं नीरो ने लगवाई थी, पर ऐसा समझने के लिए वस्तुतः कोई आधार नहीं है । आग बुझ जाने के बाद नीरो ने नगर के पुनर्निमणि का कार्य आरंभ किया और अपने लिए ‘स्वर्ण मंदिर’ नामक एक भव्य प्रासाद बनवाया । असह्य करभार, शासन संबंधी बुराइयों तथा अनेक क्रुरताओं के कारण उसके विरुद्ध विद्रोह की भावना बढ़ती गई ।
माना जाता है कि जब रोम जल रहा था । तब लोगों का ध्यान बंटाने के लिए ‘नीरो’ ने अपने बाग में एक बड़ी पार्टी रखी थी । इसके लिए उसे रोशनी की जरुरत थी । चूंकि उस वक्त रोशनी का अभाव था, इसलिए सवाल था कि इसका इंतजाम कहां से किया जाये । पर ‘नीरो’ के पास इसका समाधान था । उसने रोम के कैदियों और गरीब लोगों को बाग के इर्द–गिर्द इकट्ठा किया और उन्हें जिंदा जला दिया । इधर रोम के कैदी और गरीब लोग जिंदा जल रहे थे और उधर इसके प्रकाश में नीरो की ‘शानदार पार्टी’ आगे बढ़ रही थी । हालांकि इस घटना के पुख्ता सबूत नहीं मिले, जो नीरो को गुनहगार साबित कर सके । तथापि विद्रोह की ज्वाला धधकी और अंततोगत्वा असमय नीरो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा ।
यहाँ उक्त घटना महज प्रतीकात्मक तौर पर रख रही हूँ । एक नजर जरा अपने चारो ओर डालिए तो शायद यह समझना आसान हो जाएगा कि इतिहास की उक्त घटना को यहाँ क्यों उल्लेखित किया गया है । हर ओर आग है—बेरोजगारी की, महँगाई की, यौन हिंसा की, असुरक्षा की यहाँ तक कि हम उनसे ही सुरक्षित नहीं हैं जिनपर सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है । बहुत चर्चा हुई निर्मला पंत प्रकरण की, हासिल क्या हुआ सिर्फ शून्य । चर्चा हुई सोना–तस्करी की, परिणाम क्या ? आरोपी रिहा खेल खत्म । चर्चा में सम्झना तेजाब कांड भी था और यहाँ भी सरकार की खामोशी का ठप्पा । हाँ सरकार बोलती तो है पर ये कि इन मामलों को सुलझाने में बारह वर्ष भी लग जाएँ तो चिन्ता मत कीजिए क्योंकि हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी चुस्त दुरुस्त है कि वो सदियों के बाद भी आरोपी को ढूँढ निकालेगी । किन्तु देखा जाय तो ये वही देश तो है, जहाँ सामुहिक नरसंहार (राजदरबार हत्याकाँड) पर न तो चर्चा की जाती है और न ही इसके लिए कहीं से कोई आवाज उठती है । देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हमारी राष्ट्रपति को ही जब उनके पति के हत्यारे का पता नहीं मिलता तो आम जनता की भला क्या औकात । खैर ये तो सामाजिक समस्या है, जो पहले भी होती रही है और आज भी निरन्तर जारी है, ये अलग बात है कि आज इसका ग्राफ पहले से अधिक बढ़ता जा रहा है ।
अब एक नजर वर्तमान राजनीति की ओर करें । दो तिहाई बहुमत की शक्तिशाली सरकार, जिसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन सिर्फ जनता को महँगाई का त्रास देने और त्रसित करने में ही दिखाया है । आमदनी से अधिक कर देकर जीने के लिए आम जनता बाध्य है । आम जनता का जीवन स्तर जहाँ नीचे खिसक रहा है, वहीं नेताओं के जीवन स्तर को देखा जाय तो वहाँ सुख समृद्धि और सुविधाओं की प्रचूरता दिखाई देती है । जबकि जनता अपने राजनेताओं में जो देखना चाहती है वो है, उनमें सिद्धान्तनिष्ठा और त्यागी चरित्र । कम्युनिष्ट विचारधाराओं पर टिकी सरकार और उन नेताओं में जनता माक्र्स, लेनिन और माओ की छवि देखना चाहती है । परन्तु इनकी जीवनशैली में सुख समृद्धि और सत्ता के प्रति जो पद लोलुपता है, वह जनता को निराश कर रही है । गरीब देश की जनता को विकास का सपना दिखाकर जो सरकार सत्ता में आई वो आज सिर्फ अपने ठाठबाट के विकास में लगी हुई है ।

अगर नेपाली कम्युनिष्ट के इतिहास को देखा जाय, तो उनका जीवन सादा और उच्च विचारों वाला था । उन्हीं विशेषताओं को याद कर के शायद जनता ने नेकपा को बहुमत देकर जिताया था । परन्तु आज ओली सरकार अनुदार, असहिष्णु और आडम्बर वाली हो गई है । दो तिहाई बहुमत के मद की वजह से ही शायद सर्वोच्च न्यायालय में अपना प्रभाव स्थापित किया जा रहा है । डराने धमकाने की जो प्रवृत्ति जनयुद्ध के समय थी आज वह भी यत्र–तत्र उसी शैली में दिखाई दे रही है । प्रेस स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जाना, स्वस्थ आलोचना को भी विद्रोह की श्रेणी में रखना और आलोचकों का मानमर्दन करना इतना ही नहीं मौलिक अधिकारों पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है । अब जनता अपना विरोध या असंतोष भी नहीं व्यक्त कर पा रही है । उनके लिए जगह निर्धारित किए जा रहे हैं । विरोध करने वालों को सरेआम गिरफ्तार किया जा रहा है, पुलिस कस्टडी में उन पर अत्याचार हो रहा है उन्हें यातनाएँ दी जा रही हैं, उन्हें मौत बाँटी जा रही है और इन सबके पश्चात् उन्हें देशद्रोही का दर्जा देकर सरकार खुद को बरी कर रही है । यह है आज का सच ।

सरकार की एक और उद्घोषणा थी देश से यातायात के क्षेत्र में व्याप्त सिंडीकेट को हटाना किन्तु यहाँ भी सरकार असफल रही, जिसका ताजा नमूना है त्योहार से पहले सिन्डीकेटधारियों के साथ समझौता करना और भाडेÞ में अनपेक्षित वृद्धि करना । गृहमंत्री का दावा था कि कामचोर और गैरजिम्मेवार ठेकेदारों पर कार्यवाही की जाएगी । पर वर्षों से काठमान्डौवासी धूल फाँकने पर मजबूर हैं । सड़क निर्माण की कछुआ गति से जनता पहले भी परेशान थी और आज भी है जिसके विरोध में जनता को सड़कों पर उतरना पड़ रहा है । मेलम्ची का पानी अब तक रास्ते में ही है । मँहगाई की मार से रसोई रुला रही है । हर घर से युवा आज भी विदेश जाने पर बाध्य हैं । देश का हर क्षेत्र असंतोष से गुजर रहा है । परन्तु इन सबसे परे सरकार की निश्चिंतता देखते बनती है ।

अब बात करें आर्थिक नीति और योजनाओं की, क्या यहाँ सरकार सफल है ? अगर सरसरी निगाह से देखा जाय तो कोई खास नीति या उपलब्धि यहाँ भी नजर नहीं आ रही है । विगत सरकार ने जो किया उससे अलग तरीके से अगर वर्तमान सरकार काम नहीं करती है, तो उद्योग और सेवा क्षेत्र की वृद्धिदर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बढने की सम्भावना नगण्य है । कार्यक्षेत्र में कोई खास तीव्रता दिखाई नहीं दे रही है । राष्ट्रीय गौरव वाली योजनाओं की प्रगति, मासिक खर्च की निर्धारित गति और प्रारूप, उच्च ब्याजदर और निजी क्षेत्र की शिथिलता देखकर आर्थिक वृद्धि दर की लक्ष्य की पूर्ति चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है । जबकि सरकार की चुनौती यह है कि उसे अपने वादे के अनुसार उद्योग और सेवा क्षेत्र की वृद्धि पिछले वर्ष की अपेक्षा बढाना है । क्योंकि अगर देखा जाय तो पिछले वर्ष चुनाव आदि के कारण जो खर्च थे इस वर्ष नहीं है । इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सरकार बजट कार्यान्वयन की ओर ध्यान दे । निजी क्षेत्रों में किस तरह निवेश का माहोल बने, भूकम्प पश्चात् का पुनर्निर्माण, पर्यटन क्षेत्र को बढ़ाना तथा पर्यटकों को आकर्षित करने की नीति बनाना और सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सुशासन लाना ये सभी ऐसी जरुरतें हैं जिन पर यथाशीघ्र सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है । पिछले वर्ष से अधिक अगर आर्थिक वृद्धि होती है तो उसका सकारात्मक प्रभाव निवेश, रोजगार,पर्यटक तथा प्रतिव्यक्ति की आय में स्पष्ट परिलक्षित होगा ।
किन्तु सामान्य तौर पर जो नजर आ रहा है, वो यह है कि अर्थमंत्रालय और सरकार के काम का अगर हम मूल्यांकन करें, तो हम देखते हैं कि वो लक्ष्य से अधिक राजस्व वसूली पर केन्द्रित है, अर्थात् लक्ष्य की पूर्ति के लिए आर्थिक वृद्धि का भार योजनाओं से पूरा करने की अपेक्षा जनता की जेब पर अधिक टिकी हुई है । प्रान्तीय तथा स्थानीय सरकार के साथ तालमेल की कमी भी स्पष्ट तौर से दिख रही है । संघीयता की पूर्ण संरचना से देश अभी भी अनभिज्ञ ही है । केन्द्र द्वारा अधिकार का हस्तांतरण नहीं किए जाने के कारण भी कार्य और योजनाओं के कार्यान्वयन में शिथिलता आ रही है । कहीं कोई विकास कार्य में गति नहीं है । अर्थात् जनता को यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी है ।
अब दूसरा पक्ष यह कि वर्तमान सरकार की उम्र कितनी लम्बी है ? ये दीर्घायु है या अल्पायु ? सुगबुगाहट बता रही है कि राजनीति का जोड़–तोड़ वाला सबसे प्रिय खेल जारी है । कौन किससे मिलेगा और कौन किससे दामन छुड़ाने का मन बना रहा है, यह सब बस कुछ दिनों में ही जनता देखने वाली है । दो तिहाई के मद में सरकार अपने ही साथियों को हाशिए पर लाने में संकोच नहीं कर रही और ऐसे में बस एक मौका मिलना चाहिए और मोहरा किसी और के कब्जे में । राजनीति और शतरंज में कुछ खास अन्तर नहीं है, क्योंकि शह और मात इन दोनों में महत्तवपूर्ण स्थान रखता है ।
खैर, इन सबके बावजूद सच तो यह है कि अंधेरा कितना ही गहरा क्यों न हो, उसे दूर करने के लिए सूरज की एक किरण काफी होती है । जिस तरह से हर रात के बाद सुबह को आना ही होता है, वैसे ही हर ‘नीरो’ को अपनी ज्यादतियों की कीमत चुकानी ही पड़ती है

लेखक, डा. श्वेता दीप्ति

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