Sat. Nov 17th, 2018

निखारिये अपने व्यक्तित्व को : रविन्द्र झा ‘शंकर’

किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तित्व से होती है । प्रभावशाली व्यक्तित्व वालों की ही समाज तथा संस्थाआें में प्रतिष्ठा होती है । यदि आप चाहते हैं कि आपका व्यक्तित्व विशाल, आकर्षक, सरल, शान्त एवं प्रभावशाली हो तो निम्न सात बातों पर विशेष ध्यान देना होगा–
१. आचरण निष्कपट रखें– व्यक्तित्व विकास के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने जीवन में आचरण को निष्कपट रखना । फूलों में जो स्थान सुगन्ध का है, फूलों में जो स्थान मिठास का है, भोजन में जो स्थान स्वाद का है, ठीक वही स्थान जीवन में आचरण का है । अपने आचरण को ऐसा बनाये कि जहां भी जाएं आप का आदर–सत्कार हो, आप का गुण–गाण हो, वहाँ से चल देने पर आप का सम्मान हो ।
२. सदगुणों का अपनायें– भड़कीले अथवा कीमती कपड़े पहनने से कभी व्यक्तित्व आकर्षक नहीं होता है । अधिक आभूषणो के श्रृंगार करने से भी व्यक्तित्व नहीं निखरता, निखरता है केवल चरित्र से । चरित्र को उसके गुण ही सजाते, संवारते है । गुण ही व्यक्ति को महान् बनाकर समाज एवं राष्ट्र में प्रतिष्ठित करते है । गुणहीन व्यक्ति आदर के पात्र नहीं होते है । जबकि गुणवान व्यक्ति सर्वत्र आदर और यश के पात्र होते हैं । व्यक्ति के सात्विक गुण ही उसके व्यक्तित्व की कसौटी होते है, क्योंकि सात्विक गुण ही व्यक्ति की वाणी में विनम्रता, व्यवहार में सरलता ओर विचारों में शुचिता लाते हैं । संस्कृति में एक सुक्ति है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को न तो केयर (बाजूबन्द), न चन्द्रमा के समान उज्जवल हार, न स्नान, न उबरने, न फूल और न सजाये हुए बाल ही सुशोभित कर सकते है ? वह यदि संस्कार सम्पन्न वाणी धारण करे तो एक मात्र वही उसकी शोभा बढ़ा सकती है, इसके अतिरिक्त औ्रर जितने आभूषण है, वो तो नष्ट हो जाते है, सच्चा भुषण तो वाणी ही है–
केयूरा न विभुषयन्ति पुरुष हारा न चन्द्रोज्ज्वला
स्नानं विलेपन न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयनो खलु भूषणानि सततं वाग्भुषणं भूषणमं ।।
३. आत्म विश्वासी बनें– आत्मविश्वास होता है, वह कठिन से कठिन परिस्थिति में घबराता नहीं है । जिसने आत्मविश्वास खो दिया, मानो उसने सर्वस्व खो दिया । आत्मविश्वास की शक्ति से ही व्यक्तित्व निखरता है । आत्म विश्वासी व्यक्ति के मुखमण्डल की आभा कभी मलीन नहीं होती है, अपितु चेहरा कान्तियुक्त रहता है ।
४. समय का आकलन करें– मनुष्य के जीवन में समय सबसे मूल्यवान है । समय की गति, स्वभाव और प्रवृति को जो व्यक्ति पहचान कर कार्य करता है, उसको ही सफलता मिलती है । जो व्यक्ति समय पर उचित निर्णय नहीं ले सकते है ? उनकी बाद में असफलता निश्चित होती है । समय का सदुपयोग करनेवाले व्यक्ति ही ऊँचाई के शिखर पर पहुँचते हैं । आज हर मनुष्य स्वयं से अधिक दूसरों के बारे में सोचता है, किसी दूसरे के बारे में सो कर अपना अमूल्य समय नहीं गंवाना चाहिए । अपने कार्य को निर्धारित समय में पूर्ण करनेवाले व्यक्ति ही प्रतिष्ठित होती है ।
५. दूसरों के प्रति स्नेह व सहानुभूति रखे– दूसरों के प्रति आप के हृदय में स्नेह और सहानुभूति होनी चाहिए । जब आप किसी को प्यार देंगे तो दूसरा भी आप पर प्यार लुटायेगा । दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करे । याद रखे कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है । दूसरों में जो भी अच्छा गुण है, उनकी इमानदारी के साथ दिल खोलकर प्रशंसा करे । झूठी प्रशंसा कदापि न करे । यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें । किसी की निन्दा करके आप को कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता, उलटे आप उसकी नजरों में गिर सकते हैं । अपने स्वभाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करे, दूसरों को सच्ची मुसकान प्रदान करे । प्रत्येक व्यक्ति अपनी कीर्ति, प्रशंसा अत्यधिक चाहता है, यदि आप दूसरों की कीर्ति बढ़ायेंगे । दूसरों. के महत्व को स्वीकारे तथा उनकी भावनाओं का आदर करें । दूसरों के द्वारा किए छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें । जिसके जीवन में न सन्तोष है, न शान्ति, वह जीवन भी क्या जीवन है ? दूसरा उन्नति कर रहा है तो उससे प्रेरणा लेकर उन्नति करना चाहिए । दूसरे ने उन्नति कैसे की, इसका विश्लेषण करना चाहिए तथा उससे शिक्षा लेनी चाहिए ।
६. अपनी गलती स्वीकार करें– वही व्यक्ति अत्यधिक लोकप्रिय प्रशंसनीय होता है ? जो अपनी गलती को स्वीकार करता है । यदि आप से कोई भूल हुई है तो उसे तुरंत स्वीकार करें । आप हर सप्ताह अपनी प्रगति का मूल्यांकन करे, स्वयं ही मालूम करे कि अपने कब, कौन सी गलती की और भविष्य में उसे न करने का संकल्प करें ।
७. कुव्यसनों एवं दुष्प्रवृत्तियों को त्यागें– वही व्यक्ति महान होता है, जिस में कोई कुव्यसन या कुप्रवृत्ति नहीं होती है । कुव्यसनों से शारीरिक दुर्बलता आती है और शारीरिक दुर्बल व्यक्ति सदा रोगी तथा आलसी रहता है । अच्छे व्यक्तिवाले कभी नशीली वस्तुओं जैसे धुम्रपान, जर्दा, गुटका, मद्यपान, मादक पदार्थ आदि का उपयोग नहीं करते । मद्यपान और धुम्रपान जैसे नशीली वस्तुओं का उपयोग आजकल फैशन हो गया है और इसमें अपनी श्रेष्ठता, सभ्यता, समझना महान मुर्खता है । जो व्यक्ति इनसे दूर रहता है, वह ही सदा स्वस्थ रह सकता है तथा स्वस्थ व्यक्ति ही  प्रगति करता है ।
जरा सोचिये, जिस व्यक्ति ने नशीले वस्तुओं को अपना रखा हो, दुष्प्रवृत्तियों, जुआ आदि का शिकार हो चुका हो, उस का व्यक्तित्व कैसे निखर सकता है ? मादक द्रव्यों का सेवन करने के लिए जो प्रेरित करता है, वे मित्र नहीं परम शत्रु है । भगवान ने हमे मूल्यवान जीवन और अनमोल शरीर इसलिए नहीं दिया कि हम जानबूझकर उसे मृत्यु के हवाले कर दे । यदि आप अपना व्यक्तित्व आदर्श, अनुकरणीय एवं महान् बनाना चाहते हैं तो कभी गलत राह नहीं अपनाये, सदा सही मार्ग पर चलकर ही आप महान् व्यक्तित्व के अधिकारी हो सकते हैं ।
व्यक्तित्व धन सन धन नहीं
सरे न गले न होत पुराना ।

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