Fri. Sep 21st, 2018

बनता वही कबीर

-डॉ. अरुण

जिसने झेले दुःख जीवन में,
जिसने सह ली पीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!

दुःख अपना लेता है जिसको,
कालजयी वह बन जाता है !
अंधियारों से जो भी जूझा,
नया सबेरा वो लाता है !!

कर्म–मन्त्र से खींची जाती,
जग में नई लकीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!

सेवा–अमृत जो चख लेता,
ईश्वर को पा लेता है !
सारे जग की पीड़ा लेकर,
सब को खुशियां देता है !!

धनवानों से ऊँचा होता,
बिरला कोई पÞmकÞीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!

देह–देह से भिन्न भले हो,
आत्मरूप तो सब होते हैं !
जिनकी पीड़ा हर लेते हम,
वही चैन से सोते हैं !!

मानव(जन्म अगर पाया है,
छोडो एक नजÞीर !
वही बनी है मीरा जग में,
बनता वही कबीर !!

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