Thu. May 23rd, 2019

हिन्दू धर्म का समागम स्थल – प्रयागराज : अनिरुद्ध जोशी

हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 |प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है । इस सप्तपुघरियों का पति कहा गया है जबकि उसके नजदीक काशी को उसकी सबसे प्रमुख पटरानी माना जाता है । पुराणों में कहा गया है कि अयोध्या, मथुरा, मायापुरी, काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारकापुरी, मोक्ष देने वाली हैं । इन्हें मोक्ष देने का अधिकार तीर्थराज प्रयाग ने ही दिया है ।

अनिरुद्ध जोशी
अनिरुद्ध जोशी

प्रयाग तीर्थों के नायक हैं, तीर्थों के राजा हैं और मोक्ष देने वाली सातों पुरियां उनकी रानियां हैं । इनमें पटरानी का गौरव काशी को प्राप्त है । काशी तीर्थराज को सबसे ज्यादा प्रिय है । प्रयाग ने उन्हें मुक्ति देने का अबाध और अनंत अधिकार सौंप रखा है । पुराणकाल में उनके लिए कहा है– मुक्तिदाने नियुक्ता । वे मुक्ति देने के लिए नियुक्त की गई हैं ।
महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय ऋषि धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है । जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना, इंद्रियों को वश में करके स्नान–ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है । इसी तरह शताध्यायी के संदर्भों में त्रिवेणी और प्रयाग– अनेक पौराणिक आख्यानों के अनुसार प्रयाग को तीर्थराज के रूप में महिमामण्डित किया गया है । तीर्थराज प्रयाग में सभी तीर्थों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले मठ और आश्रम हैं ।
गंगा–यमुना के बीच विभेद और समन्वय–भावना– जब प्रयाग में आकर भगीरथी (गंगा) यमुना में मिली तो गंगा से पुरातन नदी होकर भी यमुना ने गंगा को अर्ध्य प्रदान किया । तीनों स्थानों पर गंगा दुर्लभ– मायापुरी (हरिद्वार) भी प्रयाग की तरह शैव और वैष्णवों का संगम स्थल है । गौतमी गंगा– इन तीन तीर्थों का अंतरसंबंध गंगा की पुण्यगरिमा से प्रमाणित होता है ।
त्रिदेवों की पुण्यस्थली तीर्थराज प्रयाग को पुराणों में विष्णुप्रजापति और हरिहर क्षेत्र कहा गया है । सृष्टि रचना से पहले यहीं प्रजापिता ब्रह्मा ने दशाश्वमेध यज्ञ किया था । तीर्थराज प्रयाग की श्रेष्ठता के संबंध में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती हैं ।
एक कथा के अनुसार शेष भगवान के निर्देश से ब्रह्मा ने सभी तीर्थों की पुण्य गरिमा को तराजू पर तौला था । फिर इन सभी तीर्थों, सात समुद्रों सात महाद्वीपों को तराजू के एक पलड़े पर रखा गया । दूसरे पलड़े पर तीर्थराज प्रयाग को रखा गया तो बाकी तीर्थों वाला पलड़ा ध्रुवमण्डल को छूने लगा, लेकिन जिस पलड़े पर तीर्थराज प्रयाग थे, उसने धरती नहीं छोड़ी ।
इस पौराणिक उल्लेख के जरिये तीर्थराज प्रयाग की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास किया गया है । कहा गया है ब्रह्माण्ड से जगत की उत्पत्ति होती है, जगत से ब्रह्माण्ड की नहीं । इसी प्रकार प्रयाग से सारे तीर्थ उत्पन्न हुए हैं । किसी तीर्थ से प्रयाग का जन्म होना असम्भव है ।
एक अन्य कथा के अनुसार तीर्थराज की पहचान होने के बाद काशी विश्वनाथ स्वयं आकर प्रयाग में रहने लगे । उन्होंने महाविष्णु रूप भगवान वेणी माधव के दर्शन किए । वेणी माधव, अक्षयवट के पत्ते पर बालमुकुन्द रूप धारण कर अपनी महिमा का विस्तार करने के बारे में सोच रहे थे, तभी शूलपाणि शिव अक्षयवट की रक्षा करने को वहीं उपस्थित थे ।
पद्‌मपुराण के अनुसार भगवान वेणी माधव को शिव अत्यंत प्रिय हैं । वही शिव अवंतिका में महाकालेश्वर के रूप में विराजमान हैं, वहीं शिव कांची की पुण्य गरिमा के कारण हैं । उनका प्रयाग में निरन्तर निवास करना शैव और वैष्णव धर्म के समन्वय का प्रमाण है ।
प्रयागराज जहाँ त्रिवेणी है
गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, गोदावरी, कृष्णा, सिंधु, क्षिप्रा, ब्रह्मपुत्र आदि सभी नदियों के अपने–अपने संगम है । हिंदू धर्म के तीन देवता हैं शिव, विष्णु और ब्रह्मा और तीन देवियां हैं पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती । इसीलिए सभी जगह त्रिवेणी का महत्व और बढ़ जाता है । त्रिवेणी का अर्थ है वह स्थान जहां तीन नदियां आकर मिलती हों । जहां तीन नदियों का संगम होता हो । प्रयाग की गंगा नदी में एक स्थान ऐसा है जहां तीन नदियों का मिलन होता है ।
संगम और त्रिवेणी वस्तुतः एक ही स्थान है जहां गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम होता है । यह दुर्लभ संगम विश्व प्रसिद्ध है । गंगा, यमुना के बाद भारतीय संस्कृति में सरस्वती को महत्व अधिक मिला है । लेकिन सवाल यह उठता है कि यहां गंगा और यमुना तो स्पष्ट नजर आती है लेकिन सरस्वती नहीं, तो फिर यह कैसे त्रिवेणी संगम हुआ ?
दरअसल इसके पीछे एक कथा है । यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बड़े ही विस्तार से मिलती है । सरस्वती पूर्व काल में स्वर्णभूमि में बहा करती थी । स्वर्णभूमि का बाद में नाम स्वर्णराष्ट्र पडा । धीरे धीरे कालान्तर में यह सौराष्ट्र हो गया । किन्तु यह सौराष्ट्र प्राचीन काल में पुरा मारवाड़ भी अपने अन्दर समेटे हुए था । सरस्वती यहां पर बड़े ही से प्रेम बहती थी । नित्य इनकी पूजा और अर्चना होती थी । धीरे धीरे चूंकि इस प्रदेश के लोग यवनों के संपर्क में आकर यवन आचार विचार के मानने वाले होने लगे तो सरस्वती ब्रह्माजी से अनुमति लेकर मारवाड़ एवं सौराष्ट्र छोड़ कर प्रयाग में आकर वास करने लगी और तब से सरस्वती के वहां से चले आने के बाद वह पूरी भूमि ही मरू भूमि में परिवर्तित हो गयी जिसे आज राजस्थान के नाम जाना जाता है ।
ऋग्वेद में सरस्वती का अन्नवती तथा उदकवती के रूप में वर्णन आया है । महाभारत में सरस्वती नदी के प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती आदि कई नाम हैं । ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘यमुना के पूर्व’ और ‘सतलुज के पश्चिम’ में बहती हुई बताया गया है । ताण्डय और जैमिनीय ब्राह्मण में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सूखा हुआ बताया गया है ।
महाभारत में सरस्वती नदी के मरुस्थल में ‘विनाशन’ नामक जगह पर विलुप्त होने का वर्णन है । इसी नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था, कुरुक्षेत्र था, लेकिन आज वहां जलाशय है । महाभारत में भी सरस्वती का उल्लेख है कि बलराम ने द्वारका से मथुरा तक की यात्रा सरस्वती नदी से की थी और लड़ाई के बाद यादवों के पार्थिव अवशेषों को इसमें बहाया गया था यानी तब इस नदी से यात्राएं भी की जा सकती थीं ।
कैसे गंगा में मिली सरस्वती ?
वैदिक काल में एक और नदी दृषद्वती का वर्णन भी आता है । यह सरस्वती नदी की सहायक नदी थी । यह भी हरियाणा से होकर बहती थी । कालांतर में जब भीषण भूकंप आए और हरियाणा तथा राजस्थान की धरती के नीचे पहाड़ ऊपर उठे, तो नदियों के बहाव की दिशा बदल गई ।
एक और जहां सरस्वती लुप्त हो गई, वहीं दृषद्वती के बहाव की दिशा बदल गई । इस दृषद्वती को ही आज यमुना कहा जाता है । इसका इतिहास ४,००० वर्ष पूर्व माना जाता है । भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का आधा पानी यमुना (दृषद्वती) में गिर गया इसलिए यमुना में यमुना के साथ सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा । सिर्फ इसीलिए प्रयाग में ३ नदियों का संगम माना गया ।
धार्मिक उल्लेख ः महाभारत (शल्य पर्व) में सरस्वती नामक ७ नदियों का उल्लेख किया गया है । एक सरस्वती नदी यमुना के साथ बहती हुई गंगा से मिल जाती थी । ब्रजमंडल की अनुश्रुति के अनुसार एक सरस्वती नदी प्राचीन हरियाणा राज्य से ब्रज में आती थी और मथुरा के निकट अंबिका वन में बहकर गोकर्णेश्वर महादेव के समीपवर्ती उस स्थल पर यमुना नदी में मिलती थी जिसे ‘सरस्वती संगम घाट’ कहा जाता है । सरस्वती नदी और उसके समीप के अंबिका वन का उल्लेख पुराणों में हुआ है ।
उस सरस्वती नदी की प्राचीन धारा भी अब नियमित रूप से प्रवाहित नहीं होती है । उसके स्थान पर ‘सरस्वती’ नामक एक बरसाती नाला है, जो अंबिका वन के वर्तमान स्थल महाविद्या के जंगल में बहकर जाता हुआ यमुना से मिलता है । साथ ही सरस्वती कुंड भी है । यह नाला मंदिर, कुंड और घाट उस प्राचीन नदी की धारा की विद्यमान के प्रमाण हैं । इनसे ब्रज की परंपरा प्रागैतिहासिक कालीन स्वायंभुव मनु से जुड़ जाती है । मथुरा के स्वामी घाट का पुराना नाम संयमन घाट है ।
प्रयागराज में परिक्रमा का महत्व
तीर्थराज प्रयाग मण्डल पांच योजन, बीस कोस तक फैला हुआ है । गंगा,यमुना और संगम के छह से ज्यादा तट हैं । इन्हीं को आधार बनाकर प्रयाग की तीन वेदियों को अति पवित्र माना गया है, ये हैं अंतर्वेदी, मध्यवेदी और बहिर्वेदी ।
इन तीनों वेदियों में अनेक तीर्थ, उपतीर्थ, कुण्ड और आश्रम हैं । प्रयाग आने वाले तीर्थयात्रियों को त्रिवेणी संगम में स्नान करने के बाद तीर्थराज की पंचक्रोशी परिक्रमा करनी चाहिए । इस परिक्रमा के अनेक लाभ हैं । तीर्थराज के साथ ही सभी देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों के दर्शन का पुण्य फल इस परिक्रमा से मिलता है । तीर्थ क्षेत्र में स्थित सभी देवताओं, आश्रमों, मंदिरों, मठों, जलकुण्डों के दर्शन करने से ही तीर्थयात्रा का पूरा फल मिलता है ।
इस परिक्रमा में प्रयागराज के समस्त प्रमुख तीर्थों (द्वादश माधव सहित) के दर्शन के साथ–साथ तीनों अग्नि कुण्डों (झूंसी, अरैल, तथा प्रयागराज) की भी परिक्रमा हो जाती है ।
प्रयाग की पंचकोशी सीमा इस प्रकार है–
दुर्वासा पूर्व भागे निवसति, बदरी खण्ड नाथ प्रतीच्याम ।
पर्णाशा याम्यभागे धनददिशि तथा मण्डलश्च मुनीशः ।
पंचक्रोशे त्रिवेण्याम् परित इह सदा सन्ति सीमांत भागे ।
सुक्षेत्रं योजनानां शर्मित ममितो मुक्ति पदन्तत । ।
अर्थात पूर्व भाग में पांच कोस पर दुर्वासा मुनि (ककरा गांव में) निवास करते हैं । पश्चिम दिशा में पांच कोस पर बरखण्डी शिव निवास करते हैं । दक्षिण में पांच कोस पर पर्णाश मुनि (पनासा गांव के पास) रहते हैं और अक्षयवट से पांच कोस उत्तर मण्डलेश्वरनाथ (पण्डिला महादेव) विराजमान हैं । यही पंचकोशी की सीमा है ।
कैसे शुरू होती है परिक्रमा ?
परिक्रमा सर्वप्रथम त्रिवेणी संगम में स्नान–ध्यान से प्रारम्भ होती होती है । यहाँ तीनों वेणियों का ध्यान करने के साथ ही संगम में विलुप्त श्री आदि वेणी माधव का ध्यान करना चाहिए । प्रयाग आने वाले तीर्थ यात्री परिक्रमा के लिए सबसे पहले त्रिवेणी में स्नान, पूजन करते हैं, पंचक्रोशी परिक्रमा इसके बाद शुरू होती है । श्रद्धालु को त्रिवेणी स्नान के बाद अकबरी किले में स्थित पवित्र अक्षयवट का दर्शन–पूजन करना चाहिए ।
अक्षयवट के साथ ही अनेक देवता और ऋषि विराजमान हैं । इनकी मूतिर्यों का पूजन–अर्चन कर यात्री को यमुना के किनारे का रास्ता पकड़ना चाहिए । इस रास्ते पर यमुना के किनारे घृत कुल्या, मधु कुल्या, निरंजन तीर्थ, आदित्य तीर्थ, ऋण मोचन तीर्थ, रामतीर्थ, पापमोचन तीर्थ, सरस्वती कुण्ड, गो–घट्टन तीर्थ और कामेश्वर तीर्थ जाना चाहिए ।
कामेश्वर तीर्थ में मनकामेश्वर महादेव विराजमान हैं । इनके दर्शन–पूजन करने से श्रद्धालु की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं । ये सभी तीर्थ यमुना के किनारे स्थित हैं । अकबरी किले की दक्षिणी दीवार से लगी हुई पगडण्डी के रास्ते पैदल जाने पर इन तीर्थों के दर्शन हो सकते हैं । किला घाट से नाव के जरिये इन तीर्थों की परिक्रमा करना आसान है । इन तीर्थों में ज्यादातर का सही स्थान सुनिश्चित नहीं है । पुराणों में इनकी स्थिति का वर्णन है, इसलिए श्रद्धालु तीर्थ यात्री इनका स्मरण करते हुए मनकामेश्वरनाथ मंदिर तक जाते हैं ।
मनकामेश्वर मंदिर से सड़क के रास्ते तक्षकेश्वर शिव मंदिर तक पैदल या सवारी से यात्रा की जा सकती है । हजारों साल से श्रद्धालु तीर्थयात्री पैदल ही इन तीर्थों के दर्शन करते हैं । तक्षकेश्वर शिव की पूजा करने और तक्षक कुण्ड में स्नान करने की महिमा पुराणों में कही गई है । तक्षक कुण्ड में स्नान करने से भक्तों को विष बाधा से मुक्ति मिलती है । तक्षकेश्वर शिव का पूजन करने से धन लाभ होता है ।
तक्षक कुण्ड यमुना के जल में है । प्रयाग के दरियाबाद मोहल्ले में यह कुण्ड है और इसके पास ही तक्षकेश्वर शिव मंदिर है । तक्षक कुण्ड से आगे कालिया हृद, चक्र तीर्थ और सिंधु सागर तीर्थ है, हृद उस जल भाग को कहते हैं, जहां बहुत ज्यादा गहराई होती है । कहते हैं कालिया नाग इसी जल में रहता है और तीर्थराज प्रयाग की अर्चना करता है ।
यात्रा में ध्यान रखने योग्य छह बातें ः
सर्वप्रथम यह कि परिक्रमा दक्षिणावर्त होनी चाहिए ।
जिस दिशा में जहां जाकर तीर्थों के कथन का अन्त कर दिया हो, उसे ही निश्चित सीमा मानी जानी चाहिए ।
उपरोक्त बताए गए तीनों अग्नि स्वरूप, प्रयाग, अलर्कपुरी, अरैल (तथा प्रतिष्ठानपुरी) झूंसी की परिक्रमा हो जानी चाहिए ।
तटों का कोई प्रधान तीर्थ न छूटना चाहिए ।
प्रयागराज के अष्टनायक जैसे त्रिवेणी, माधव, सोम, भरद्वाज, वासुकी, अक्षयवट, शेष और प्रयाग ये परिक्रमा में शामिल होना चाहिए ।
प्रजापति क्षेत्र की जो सीमा निर्धारित है उससे आगे न जाएं ।
मत्स्य पुराण अनुसार प्रयागराज तीर्थों की परिक्रमा में मनुष्य जितने पग श्रद्धाभाव से चलता है उतने अश्वमेध यज्ञों के फल उसे प्राप्त होते हैं ।
१३ अखाड़ों में से दो शैवपंथ का श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी– दारागंज और उदासीन पंथ का श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा– कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयागराज में ही है । इसके अलावा यहां अन्य सभी अखाड़ों और मठों का प्रतिनिधित्व करने वाले मठ एवं आश्रम भी है ।
भारतवर्ष में वर्तमान में ७ अखाड़े एवं ५२ मढि़या हैं । प्रमुख अखाड़ों के नाम हैं ः निर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, अग्नि तथा आनन्द । जो ५२ मढि़यां हैं उनके नाम किसी पराक्रमी नेता, सन्त या प्रसिद्ध स्थान के नाम पर रखे गए हैं । ये मढि़या दावों के अधीन आती है । एक अखाड़े में ८ दावे होते हैं, जिनको गिरी एवं पुरी दावों के रूप में बांटा गया है । पर्वत एवं सागर को लेकर गिरि दावे हैं, जिनमें २७ मढि़यां हैं । भारती, सरस्वती, तीर्थ, आश्रम, वन एवं अरण्य को लेकर पुरी दावे भी ४ हैं, जिनके अधीन २५ मढि़यां हैं । रामदत्ती ऋद्धिनाथी, चारमढ़ी, दस मढ़ी, वैकुण्ठी, सहजावत, दरियाव तथा भारती ये डदावों के नाम हैं । उक्त सभी का प्रयागराज कुंभ में प्रतिनिधित्व रहता है ।
इसी तरह सभी संप्रदायों की धर्मशाला और मंदिर कुंभ नगरी प्रयागराज में स्थित है । यहां सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले मठ एवं आश्रम भी हैं । सभी तीर्थों की पुण्यधारा तीर्थराज प्रयाग के संगम की ओर बढ़ने लगती है । संगम और समन्वय ही हमारी संस्कृति का मूल स्वर है । यही समन्वय प्रयाग को तीर्थराज का गौरव देता है ।
इन मठों और आश्रमों में अनेक तीर्थों और क्षेत्रों से श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में आते हैं । इन यात्रियों को प्रयाग में कर्मकाण्ड, पूजा–अर्चना, तर्पण, श्राद्ध, मुण्डन, वेणी दान वगैरह कराने के लिए अलग तीर्थ पुरोहित और कर्मकाण्डी विद्वान हैं । ये तीर्थयात्री अपने ही मठों और आश्रमों के जरिये अपने खास तीर्थ पुरोहितों की देखरेख में स्नान दान और पूजन–अर्चन करते हैं । इन विविध मत पंथों और संप्रदायों के एक मात्र आराध्य देवता तीर्थराज प्रयाग हैं, लेकिन इनकी पूजा पद्धति अलग–अलग है ।
इन विविध संप्रदायों और मत पंथों के अपने शास्त्र वचन और ग्रंथ हैं । इन ग्रंथों का मूल स्वर तीर्थराज प्रयाग की महिमा का बखान करना है । शैव और वैष्णव संप्रदायों के अनेक मत पंथ हैं । शंकराचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, चैतन्य महाप्रभु, उदासीन संप्रदाय के आदि गुरु श्रीचन्द्राचार्य ने अपने दार्शनिक विवेचन के अनुसार अद्वैत ब्रह्म का निरूपण किया है ।
अनेक तीर्थों में इन आचार्यों ने अपने मठ मंदिर और आश्रम स्थापित किए थे । इन आश्रमों और मठों के सभी आचार्य तीर्थराज प्रयाग में महाकुंभ के दौरान इकट्‌ठे होते हैं । वे अपनी श्रद्धा और अपने विश्वास के अनुसार तीर्थराज प्रयाग का पूजन करते हैं । गंगा–यमुना और गुप्त सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर इन मत पंथों के कर्मकाण्ड, इनकी पूजा पद्धति, इनके भजन–कीर्तन, प्रवचन और सत्संग को देखकर यकीन हो जाता है कि भारत के सभी तीर्थों में अंतरसंबंध है ।
प्रयागराज जहाँ लगता है महाकुम्भ
कुम्भ मेले का आयोजन चार नगरों में होता है ः हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन । चारों नगरों के आने वाले कुंभ की स्थिति विशेष होती है । एक ओर जहां नासिक और उज्जैन के कुंभ को आमतौर पर सिंहस्थ कहा जाता है तो अन्य नगरों में कुंभ, अर्द्धकुम्भ महाकुंभ का आयोजन होता है ।
कुंभ क्या है ? ः कुंभ का अर्थ होता है घड़ा या कलश । प्रत्येक तीन वर्ष में उज्जैन को छोड़कर अन्य स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है ।
अर्धकुंभ क्या है ? ः अर्ध का अर्थ है आधा । हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है ।
पूर्णकुंभ क्या है ? ः प्रत्येक १२ वर्ष में पूर्णकुंभ का आयोजन होता है । जैसे मान लो कि उज्जैन में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा । उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा । इसी तरह जब हरिद्वार, नासिक या प्रयागराज में १२ वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होगा तो उसे पूर्णकुंभ कहेंगे । हिंदू पंचांग के अनुसार देवताओं के बारह दिन अर्थात मनुष्यों के बारह वर्ष माने गए हैं इसीलिए पूर्णकुंभ का आयोजन भी प्रत्येक बारह वर्ष में ही होता है ।
महाकुंभ क्या है ?
मान्यता के अनुसार प्रयागराज में प्रत्येक १४४ वर्षों में महाकुंभ का आयोजन होता है । १४४ कैसे ? १२ का गुणा १२ में करें तो १४४ आता है । दरअसल, कुंभ भी बारह होते हैं जिनमें से चार का आयोजन धरती पर होता है शेष आठ का देवलोक में होता है । इसी मान्यता के अनुसार प्रत्येक १४४ वर्ष बाद प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन होता है जिसका महत्व अन्य कुम्भों की अपेक्षा और बढ़ जाता है । सन् २०२१३ में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन हुआ था क्योंकि उस वर्ष पूरे १४४ वर्ष पूर्ण हुए थे । संभवतः अब अगला महाकुंभ १३८ वर्ष बाद आएगा ।
सिंहस्थ क्या है ? ः सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है । सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है । यह योग प्रत्येक १२ वर्ष पश्चात ही आता है । इसी तरह का योग नासिक में भी होता है अतः वहां भी सिंहस्थ का आयोजन होता है । दरअसल, उज्जैन में १२ वर्षों के बाद ही सिंहस्थ का आयोजन होता है । इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक १२ वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है । यह मेला उज्जैन को छोड़कर बाकी के तीन नगरों में क्रमवार तीन तीन वर्षों में ही आयोजित होता है । वर्तमान में प्रयागराज में अर्ध कुंभ चल रहा है ।
४ जगह कुम्भ का पर्व ः
१. हरिद्वार में कुम्भ ः कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है । हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है ।
२. प्रयागराज में कुम्भ ः मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है । एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है ।
३. नासिक में कुम्भ ः सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है । अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुम्भ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है । इस कुंभ को सिंहस्थ इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें सिंह राशि में बृहस्पति का प्रवेश होता है ।
४. उज्जैन में कुम्भ ः सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है । इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्ष दायक कुम्भ उज्जैन में आयोजित होता है । इस कुंभ को सिंहस्थ इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें सिंह राशि में बृहस्पति का प्रवेश होता है ।
पौराणिक ग्रंथों जैसे नारदीय पुराण (२÷६६÷४४), शिव पुराण (१÷१२÷२२÷–२३) एवं वाराह पुराण–१÷७१÷४७÷४८) और ब्रह्मा पुराण आदि में भी कुम्भ एवं अर्ध कुम्भ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है । कुम्भ पर्व हर ३ साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है । हरिद्वार के बाद कुम्भ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है । प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुम्भ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुम्भ पर्व के बीच में ३ सालों का अंतर होता है ।

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