Thu. Apr 25th, 2019

हमें गुलाब जैसा खिलने दो, मौन तुम्हारे चरणों में ः प्रेमाशाह

प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमा शाह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर

प्रेमा शाह Prema Shah
प्रेमा शाह

प्रेमा शाह नेपाली साहित्य की प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध साहित्यकार के रूप में सदैव स्मरणीय एवं प्रशंसनीय योगदान के लिए अमर हैं । इन्होंने नेपाल के साहित्य जगत में कवयित्री और कहानीकार के रूप में अमूल्य योगदान प्रदान किया है । गत साल इनका असामायिक निधन संयुक्तराज्य अमेरिका में हो गया, जहां ये अपनी सुपुत्री अभिनेत्री जल शाह के साथ पिछले एक दशक से रह रही थी । इनकी प्रथम कहानी संग्रह ‘पहेंलो गुलाफ’ (पीला गुलाब) सर्वाधिक चर्चित रचना नेपाली कहानी साहित्य में रही है । इनकी कुछ एक कविताएं भी काफी चर्चित रही हैं । कम लिखकर बहुत सारी प्रशंसा प्राप्त करनेवाली ये प्रथम साहित्यकार हैं । इन्होंने नेपाली, हिन्दी और नेवारी भाषा में सामानान्तर रूप से लिखकर प्रेमा शाह की कुछ एक मौलिक हिन्दी कविताएं, जो स्वर्णयुग साप्ताहिक और नई धारा मासिक, हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं ।
निराला परिवार पटना से प्रकाशित ‘नेपाल–भारतीय’ में भी इनकी कविताएं प्रकाशित पाई जाती है । निराला परिषद् पटना के निमन्त्रण पर कविवर केदारमान व्यथित के नेतृत्व में गए शिष्टमंडल में भी इन्हें शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । अब प्रस्तुत है इनकी हिन्दी भाषा में रचित कुछ कविताएं–

मैं नमन करुं तुझे
नंदन करुं ! दुर्गा विजया । शक्ति । रात रूपा ।
ओ औरत, तेरी अभ्यर्थना करुं
तुझे (तु) अर्पण इन हाथों की चुडि़यां
मन की महकती बगिया
तन की गंध
हर चितवन,
बलिदान करुं तेरी वेदी में
खड्ग की धारा में
ये दोनों स्तन
ले, गिरा दूं
कर पात्र में
युगान्तर के बोझ
विनय, प्रणय, मैथुन
सम्बन्धों के हर पाप
आज चढ़ा दूं
इस उत्सव पर
हथेलियों में उगाती आ रही
जी के अंकुर
पीले युग के पीछे अहसास
संदिग्धता के आभास ।

इन्हें हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त था । इन्होंने नेपाली की प्रसिद्ध कवयित्री और कहानीकार तथा उपन्यासकार पारिजात की एक कविता का हिन्दी में अनुवाद किया है, जिसकी कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है–

पशरूत्व का झुरमुट बिहान
परिभाषित न कर सका बुद्ध
नैराश्य की चरम सीमा
कच्चा बुद्धत्व
नाजुक जीवन दर्शन
परिवार अनन्त दुःख का कारण
आज क्या परिवार ?

अपना–अपना अस्तित्व बोझ का कारण है
अपना–अपना ही अस्तित्व अनन्त दुर्गति का कारण है, (नई धाराः मार्च १९६८ ईं. पृष्ठ १–३) प्रेमा शाह को हिन्दी भाषा पर इतना अधिकार है कि इन्होंने विश्व कवि, रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कृति ‘चित्रागंदा’ का भी नेपाली में अनुवाद किया है, जो अभी अप्रकाशित है ।
प्रेमा शाह ने एक और अच्छी और लम्बी कविता लिखी है, जो इस प्रकार है–

‘बुद्ध ऐ शान्त तुम्हारे
चरणों में
कुहासा ऊपर उठता है

एक चिडि़या गाती हुई ऊपर नीलिमा में विलीन हो जाती है
हिखण्ड सी
चिर स्वप्न हमारा खण्डित हो जाता है,
व्यर्थ, विखर जाता है इधर–उधर
कर्मों और चिन्ताओं से परे
ठिठुरती हुई सुबह के कोलाहल से दूर
जीवन और विवेक की लालिया पर जाती है तथागत
तुम्हारे
आशीषों से
और क्या चाहिए हमें ?
ए मुक्त ! हमें मुक्त कर दो, ठिठुरती हुई सुबह की सर्दी से
खोल दो ये जंजीरे आलोकमय !
अंधकार की
जीवन की प्यालियां भर दो, भर दो ज्योर्तिमय,
तुम्हारी दीप्ति से,
कुहासा ऊपर उठता है
देखों हमें गुलाब जैसे खिलने दो ।
मौन तुम्हारे चरणों में ।’

प्रेमा शाह की तीन हिन्दी कविताएं शीर्षक नेपाल संदेश २२ अप्रैल १९६८ में प्रकाशित हैं । यहां प्रस्तुत है एक कविता जो वासन्ती परिवेश में लिखी गई है–

‘प्रत्येक पेड़ के ऊपर
फिर बसन्त टिक गया ।
मेरी उमर
आइना देखती है
मुसकाती है
एक फूल तोड़कर मैं उस पर टोक देती हूं
लज्जानंनत
वह आइना परस देता है
व्यंग्य
मैं भाग जाती हूं खिड़की की ओर
फूलों भरी शाखा यहां तक झुक जाती है
मेरी उमर
कातर हो जाती है
अंजाने
मैं बसार देती हूं
फूल
अनवरत झड़ते जाते हैं
अंजलि के ऊपर
ऊपर
अंजलि के नीचे
नीचे
मैं ढूंढ़ लेती हूं
फूलों के ऊपर तैर रही होती है
फलों के नीचे दवी हुई होती है ।

उत्तर बिहार ११ मार्च १९६८ में सुश्री प्रेमा शाह के बारे में एक टिप्पणी लिखी गई है, जो इस प्रकार है–

‘सुश्री प्रेमा शाह को भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी से भी अनन्य प्रेम है, जिसके बसीभूत होकर आपने प्रस्तुत रचना मूल रूप में हिन्दी में की है, इस रचना के साथ सुश्री शाह का हम हिन्दी जगत में सादर स्वागत करते हैं और उनके द्वारा नेपाली साहित्य के साथ वहीं हिन्दी को भी वृद्धि होने की कामना करते है ।

डॉ. कमला सांस्कृत्यायन द्वारा संपादित प्रतिवेशी एशियाई साहित्यः नेपाली साहित्य खण्ड में भी इनकी एक हिन्दी कविता संकलित है, जिसका शीर्षक हैं ‘एक अभिव्यक्ति’ । प्रस्तुत है इस कविता की कुछ एक पंक्तियां–

‘दो–तीन मिली हुुई
नीली–काली–महीन रेखाएं
अधिक भारी लगती हैं हमें ।
बनता इसी प्रकार ही तो
कैन्भास की पृष्ठभूमि में ये निखरे हुए
ये लाखों रंग
जब तक नहीं सूखते
मन में डर लगता है, कहीं मिट न जायें
हाय ! अस्तित्व !
इसी प्रकार तो तुम को बनाए रखना होगा ।
हम स्वतन्त्र हैं
फिर भी हम कैदी हैं
बसन्त के हर एक झोंक में स्वर चढ़ा–चढ़ाकर
चिडि़यां घर के खुले मैदान में चिल्ला कर इधर–उधर कुदने को मिल जाए तो भी
पंख करे हुए
रंग–विरंग पंक्षी हैं हम अपने भीतर ही कैद है

प्रस्तुतिः रामदयाल राकेश
सन्दर्भ ग्रंथ सूची
१. कमला सांकृत्ययनः प्रतिवेशी एशियाई साहित्यः नेपाली साहितयः पृष्ठ २३२–२३३
२. रामदयाल रामेशः नेपाल के हिन्दी लेखकः प्रत्य प्रकाशनः वाराणासीः प्र.सं. २००३

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