Sun. Nov 18th, 2018

‘नेतृ’ जहाँ नेत्र नही मुहँ खुलता है : बिम्मी कालिंदी शर्मा

जिस देश में छोटी–छोटी बच्चियों का आए दिन बलात्कार होता है, जिनका वर्तमान और भविष्य उजड़ जाता है तब भी इस देश की महामहिम राष्ट्रपति महिलाओं के पक्ष में कड़े कानून बनाने के लिए संसद का कान उमेठ नहीं सकती?

हिमालिनी, अंक अक्टूबर 2018 ।  नेतृ का मतलब वह महिला या नारी जो समाज और देश का नेतृत्व कर सके । यह महिला या नारी सिनेमा की अभिनेत्री नहीं है । वह तो विवेक और नैतिकता का नेत्र जिन के हर हमेशा खुले हो वही सच्ची नेतृ है । पर अफसोस हमारे देश की नेत्रियों का नेत्र हमेशा बंद कपाट जैसा बंद ही रहता है । और जब खुलता है तो नेत्र नहीं मुँह । और वह भी खाने और चबर चबर बोल कर दूसरों को पकाने के लिए । क्योंकि इन्होने अपने नेत्रों में तो भ्रष्टाचार और अनैतिकता का गाढा काजल या सुरमा लगा रखा है । वैसे होंठ में भी इन के कमिशन का लिपिस्टिक जो लगा हुआ है ।

हालही में एक नेतृ ने कहा कि देश में बढते बलात्कार की घटना दो तिहाई के भारी मत से बनी हुई सरकार को गिराने या हटाने के लिए किया गया षडयंत्र है । सरकार को गिराने के लिए कोई बलात्कर जैसे घिनौने अपराध मे खुद को डालेगा ? हद है संकीर्ण सोच की । शशी श्रेष्ठ नाम की इस कम्यूनिष्ट नेतृ ने अपने दिमाग का ओछापन दिखा दिया कि देश में आए दिन बलात्कार की घटना इसी लिए हो रही है कि अपने नागरिको को सुरक्षा की प्रत्याभूति न दे पाने के कारण यह सरकार बदनाम हो जाए और धडाम से गिर जाए । हे भगवान यह सरकार है कि दूधमुँहा बच्चा जो चलते चलते गिर जाएगा ? जब यह गिरने लगेगी तो इस के दो तिहाई मत से सत्ता मे आए मंत्री और सांसद किस दिन काम आएँगे ?क्या यह सिर्फ कमिशन और भत्ताखाने के लिए ही सत्ता के गलियारे में गए हैं ?

नेत्री को तो समाज का वह नेत्र होना चाहिए जो अंधविश्वास को चीरे और समाज के दबे कुचले और राह भटके हुए लोगों का नेत्र बन कर राह दिखाए
नेकपा एमाले की एक और नेतृ है जो अनेरास्वियू की अध्यक्ष हैं, नाम हैं नवीना लामा । इन को भी अपनी जीत और पद दोनो पच नहीं रहा है । इसीलिए आगा पीछा सोचे बिना अनाप शनाप बोल रही है । नवीना लामा अपनी सांप जैसी लपलपाती हुई जिह्वा से विष जैसा वाक्य उगलती हुई कहती हैं की जनता के स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा के लिए लड़ रहे डा. गोविंद केसी को देश से निकाल देना चाहिए । क्योंकि डा. केसी के कारण नवीना की पार्टी के कुछ नमुदार नेता अपनी मेडिकल की दुकान नहीं चला पा रहे हैं इसीलिए । नवीना की ऐसी तीखी बोली सुन कर भी प्रत्युत्तर मे कुछ जवाब न देने वाली मीडिया या प्रतिप्रश्न कर के नवीना को घेरने के लिए कुछ न करना वास्तव में लज्जास्पद है । जिस देश की महिला नेत्री ऐसा सोच रखती है उस देश में बलात्कार बढेगा नहीं तो घटेगा क्या ?

यह दो नेतृ तो बस प्रतिनिधि है वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की सोच और हैसियत का । बाकी और दलों की महिला और संसद मे अपना जलवा बिखेरने वाली महिलाओं की भी कमोवेश यही सोच है । जिस देश की राष्ट्रपति महिला है और देश में आए दिन महिलाओं पर अत्याचार होते है फिर भी उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगता । जिस देश में छोटी–छोटी बच्चियों का आए दिन बलात्कार होता है, जिनका वर्तमान और भविष्य उजड़ जाता है तब भी इस देश की महामहिम राष्ट्रपति महिलाओं के पक्ष में कड़े कानून बनाने के लिए संसद का कान उमेठ नहीं सकती । उन्हें तो बस अपनी रेशमी साड़ी और मोतियों की माला को पहनने और उनको सम्भालने से ही फुर्सत नहीं है । क्या इसीलिए उनको राष्ट्रपति बनाया गया है कि गोद में दुबकी हुई बच्चियों का भी बलात्कार हो ? ३३ प्रतिशत महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व जरुरी है । चाहे वह समानुपातिक से आए या प्रत्यक्ष चुनाव जीत कर । चाहे जैसे आए या संसद में जाएं पर महिलाओं के मुद्धे पर उन्होंने कितना मुँह खोला और आईएनजिओ के डॉलर से अपना मुँह कितना सील कर रखा यह प्रश्न महत्वपूर्ण है । इस से पहले की जो प्रतिनिधि सभा में स्पीकर थी उनको ठीक से बोलना और सदन के क्रियाकलापों के बारे में सही तरीके से जानकारी देना भी नहीं आता था । महिला प्रधानन्यायाधीश भी बनी पर वह भी महिलाओं के मुद्धे से सरोकार रखने से ज्यादा दूसरों पर आरोप लगाने और गालियों की बौछार में ही अपना ज्यादा समय खर्च करती थी । इन महिलाओं को लगता होगा कि जो महिला पीडि़त हैं वही बोले और अपने लिए न्याय तलाशे । इस देश में अपने लिए न्याय की भीख माँगना या तलाशना भूसे के ढेर से सूई ढूँढने जैसा ही है । जिस को जो काम सौंपा गया है वह इंसान वह काम नहीं करेगा बस दूसरों के काम में ताकाझांकी करना या मीनमेख निकालना ही इन को आता है । इस में महिला राष्ट्रपति या प्रधानन्यायाधीश भी अपवाद नहीं है । आखिर में वह भी इसी मिट्टी की उपज हैं ।

नेत्री को तो समाज का वह नेत्र होना चाहिए जो अंधविश्वास को चीरे और समाज के दबे कुचले और राह भटके हुए लोगों का नेत्र बन कर राह दिखाए । पर हमारे देश की नेत्रियां तो बस बेईमानी की साड़ी पहन कर, होठ में कमीशन की गाढ़ी लिपिस्टिक लगा कर अविवेक की सैडिल खटखटाती हुई संसद में ऐसे जाती हंै जैसे की वह किसी चलचित्र की अभिनेत्री हों । अभिनेत्रियों की अपने पसीने की कमाई होती है वह चाहे जितना फैशन और मेकअप करे कोई शिकायत नहीं कर सकता । पर देश की मान और शान मानी जाने वाली संसद की गरिमा को बढ़ाने वाली नेत्रियां जनता की खून, पसीने की गाढ़ी कमाई से दिए गए टैक्स के पैसे जो देश के विकास के लिए खर्च होने चाहिए इन के विनास के लिए खर्च हो रहे हंै । ऐसा नहीं कि पुरुष सांसद दूध के धुले हुए हंै । वह तो और कीचड़ से सने हुए हैं । पर महिलाओं को महिलाओं के पक्ष में उन के न्याय और समानता के लिए तो बोलना चाहिए ।

सारे देश में निर्मला पंत का बलात्कार और उस की हत्या के विरोध मे नारे लगे, प्रदर्शन हुए । सभी तबके के लोगों ने इस अमानवीय हत्या और अत्याचार के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की । पर देश की महिला सांसद और विभिन्न राजनीतिक दल की नेत्रियां कान में तेल डाल कर सोती रही । किसी नेत्री ने भी निर्मला पंत के पक्ष में और उस पर हुए अत्याचार के विरोध में न नारे लगाने वालों का साथ दिया न शोक ही जताया । उनको तो संसद में बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए कड़े कानून बनाने के लिए और विधेयक पास करवाने के लिए सरकार से उलझना चाहिए, सरकार को दबाव देना चाहिए । पर नहीं वह तो मूकदर्शक ही बनी रही । हद तो यह है कि संविधान में महिलाओं को दूसरे या दोयम दर्जे का नागरिक बनाने और नागरिकता में महिलाओं के प्रतिविभेद होने पर भी वह खामोश हैं, कुछ नहीं बोलती । सच में यह नेतृ तो है पर मिट्टी की जिस में कोई जान या संवेदना नहीं है । जो संसद में मूर्तिमान हो कर बैठी है बस सत्ता और भत्ता डकारने के लिए ।

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