Fri. Oct 19th, 2018

मेरी पत्रकारिता प्रजातन्त्र के लिए समर्पित रही : राजेश्वर नेपाली

Rajeshwar Nepali
राजेश्वर नेपाली

हिमालिनी अंक सितम्बर २०१८ | राजेश्वर नेपाली, पत्रकारिता क्षेत्र के लिए एक जानी–मानी हस्ती हैं, उनका जन्म वि.सं. २००२ साल भाद्र १९ गते तत्कालीन विन्धी गाविस वार्ड नं. १, बेलाग्राम (धनुषा) में हुआ था । उनके पिता स्व. रामदुलार साह और माता स्व. इन्द्रमणीदेवी साह हैं । पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीति से जुड़ी हुई थी । उनके पिता जी स्व. रामदुलाहर महात्मा गान्धी से मिले हुए लोगों में से थे, पिता जी की राजनीतिक संगत और चेतना का प्रभाव राजेश्वर जी में भी बचपन से ही पड़ने लगा । इसीलिए वह स्कूल जीवन से ही राजनीति, साहित्य तथा पत्रकारिता में सक्रिय रहने लगे । पत्रकारिता की औपचारिक यात्रा उन्होंने वि.सं. २०१८ साल से किया, जो आज तक निरन्तर जारी है । नेपाल तथा भारत के दर्जनों सञ्चार माध्यम से उनका नाम जुड़ा हुआ है, पत्रकारिता से सम्बन्धित दर्जनों पुरस्कार से वह सम्मानित हैं । हिमालिनी आज पत्रकारिता के मिसाल राजेश्वर नेपाली जी का ‘जीवन सन्दर्भ’ यहां प्रस्तुत कर रही है–
परिवारिक तथा राजनीतिक पृष्ठभूमि
नेपाल में हुए राजनीतिक परिवर्तन के लिए मेरे पिताजी का योगदान महत्वपूर्ण रहा । वि.सं. २००७ के क्रान्ति में वह अग्रगामी योद्धा थे । मैं भी २०१४ साल (१२ साल की उम्र) से ही भद्र अवज्ञा में सहभागी होकर राजनीतिक आन्दोलन में सहभागी होने लगा । वि.सं. २०१५ साल से औपचारिक रूप में ही नेपाली कांग्रेस से आवद्ध हो गया, उसी साल से मैंने साहित्य में भी कलम चलानी शुरु की । राजनीति, पत्रकारिता, साहित्य तथा विद्यार्थी जीवन एक साथ आगे बढ़ने लगा । मेरी औपचारिक शिक्षा एमए तक है, जो मैंने त्रिभुवन विश्वविद्यालय से किया ।
राजनीतिक परिवर्तन और क्रान्ति के लिए उस समय मुक्ति बाहनी नामक सेना गठन की गई थी, उनके लिए रसद–पानी की व्यवस्था हमारे ही घर–परिवार से हुआ करता था । विं.सं. १९९३ जेष्ठ २० गते काठमांडू में प्रजापरिषद् नामक एक राजनीतिक समूह गठन की गई थी, उससे एक साल पहले ही जनकपुरधाम में मेरे पिताजी सहित २२ लोगाें ने राणा शाही समाप्त के लिए खून से हस्ताक्षर किया था । अर्थात् मेरे पिताजी प्रजातन्त्र सेनानी रह चुके थे । २०१७ साल पौष १ गते जब राजा महेन्द्र ने संसद और संसदीय सरकार का विघटन किया, उसके बाद नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में प्रजातन्त्र पुनःस्थापना के लिए संघर्ष चलने लगा । मैं जन्मजात ही कांग्रेस का कार्यकर्ता था । प्रजातन्त्र समाप्त होने के बाद पार्टी प्रतिबन्धित हो गई, कांग्रेस के नेता या तो जेल में थे या तो निर्वासित जीवन जी रहे थे । निर्वासित नेताओं में से सरोज कोइराला ने एक दिन मुझे मिलने के लिए कहा । वि.सं. २०१८ साल भाद्र महिना में मैं भारतीय सीमा से जुडे हुए शहर जयनगर पहुँच गया, जहाँ सरोज जी निर्वासित जीवन जी रहे थे । मिलने के बाद उन्होंने कहा–‘प्रजातन्त्र पुनःस्थापना के लिए अब नेपाली कांग्रेस सशस्त्र क्रान्ति करने जा रही है, आप जैसे लोगों का सहयोग चाहिए ।’ लेकिन उनकी बातपर मैं सहमत नहीं हो सका । मैंने कहा– ‘मेरे पिता जी गान्धी जी के सम्पर्क में रह चुके लोगों में से हैं, हम लोग गान्धीवादी हैं, अहिंसा पर विश्वास करते हैं, इसीलिए बम–फटाकी में नहीं जाएंगे ।’उस वक्त मैंने तो बम–बारुद से जुड़ने के लिए इन्कार किया, लेकिन वही काम पीछे दुर्गानन्द झा जी ने किया । मैंने उस समय सरोज जी से कहा था कि अब मैं कलम के द्वारा प्रजातन्त्र के लिए लडूंगा, प्रजातन्त्र के लिए ही आजीवन लिखता रहूंगा । ऐसी ही पृष्ठभूमि में वि.सं. २०१८ साल कार्तिक २६ गते से मेरी औपचारिक पत्रकारिता की यात्रा शुरु हो गई ।
पत्रकारिता और साहित्य
पत्रकारिता करते हुए इन्टरमीडियट लेभल (आईए) पास किया, उसके १० साल के बाद बीए किया और उसके १० साल के बाद एमए किया । बीए तक मेरा विषय राजनीतिक शास्त्र और इतिहास रहा । उस समय मास्टर क्लास जनकपुर में नहीं था । जब जनकपुर में मैथिली क्लास खुली तो तब मैंने मैथिली भाषा के जरिए मास्टर किया । लेकिन पत्रकारिता से मैं अलग नहीं हो पाया । हां, मैंने औपचारिक पत्रकारिता शुरु करने से पहले ही साहित्यिक यात्रा शुरु किया था । वि.सं. २०१५ साल से ही मैं कविता लिखने लगा था । उसीका परिणाम आज के दिन लगभग २ दर्जन मेरी पुस्तकें प्रकाशित है, जो नेपाली, हिन्दी और मैथिली भाषा में है ।
मेरे खयाल से भाषा किसी भी द्वेष के लिए नहीं है, भाषा एक दूसरे के बीच में सम्पर्क बढ़ाता है, उसी भावना के साथ मैं आगे बढ़ा । मेरी प्रकाशन भी उसी के हिसाब से हो रही है । आज मेरी सम्पादन में ‘लोकमत’ साप्ताहिक पत्रिका निकलती है, जो नेपाल से हिन्दी भाषा में निकलनेवाला एक मात्र साप्ताहिक है ।
सम्मान और पुरस्कार
लोकमत साप्ताहिक के लिए सर्वप्रथम वि.सं. २०४३ साल में परमानन्द ट्रस्ट की ओर से ‘परमानन्द पुरस्कार’ से मुझे सम्मानित किया गया । २०४४ साल के रामनवमी के दिन उक्त पुरस्कार मुझे दिया गया था । उस समय के लिए उक्त पुरस्कार जनकपुर अञ्चल का ही सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार था । जनमत संग्रह के बाद जनकपुर से प्रथम पत्रिका के रूप में लोकमत प्रकाशित की गई थी,उसी के लिए मुझे सम्मानित किया गया था, मेरे जीवन के लिए एक अविष्मरणीय क्षण है ।
उसके बाद तो सम्मान प्राप्त करना समान्य हो गया । आज मेरे पास साहित्य और पत्रकारिता के साथ संबंधित लगभग पाँच दर्जनों से अधिक सम्मानपत्र हैं । उसमें से भी नेपाल सरकार की ओर से प्राप्त ‘वरिष्ठ पत्रकार सम्मान’ और ‘प्रेस स्वतन्त्रता सेनानी’ सम्मान उल्लेखनीय है । जिसकी प्राप्ति से मुझे गौरवान्वित महसूस होता है ।
विद्यार्थी जीवन और संघर्ष
उस समय धनुषा और महोत्तरी एक ही जिला था । वि.सं. २०२१ साल जेष्ठ २१ गते की बात है, उस समय मैंने एसएलसी पास भी नहीं किया था । जनकपुर स्कुल में एक दुर्घटना कराई गई । उक्त स्थान प्रजातन्त्रवादियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल था । स्कूल में आन्दोलन चल रहा था, हडताल हो गई थी । प्रजातन्त्र समाप्त करने के उद्देश्य से परिचालित समूह ने पहली बार मधेशी–पहाड़ी विभाजित कर विद्रोह (दंगा) करवाया था । जिसमें खुकुरी प्रहार कर मधेश के ४ युवाओं को घायल किया गया । घटना में जो दोषी थे, उन लोगों के ऊपर किसी भी प्रकार की कारवाही नहीं की गई । उक्त समाचार मैंने पटना से छपने वाले ‘नेपाल सन्देश’ में दिया । समाचार छपने के बाद मुझे पुलिस हिरासत में लिया गया । उसके बाद तो हिरासत मे आना–जाना चलता ही रहा ।
वि.सं. २०३६ साल में प्रजातन्त्र और पंचायत के बीच जनमत संग्रह होने जा रहा था, आन्दोलन चल रहा था, उस आन्दोलन के क्रम में पत्रकारों की हैसियत से जेल जानेवाला व्यक्ति सिर्फ मैं ही एक हूं । बाद में २०४२ साल में भी मुझे जेल में रखा गया था । उस समय पत्रकारों की हैसियत से जेल जानेवाले और भी दो–तीन आदमी थे । उस समय की जेल यातना मेरे लिए सबसे पीड़ादायी रही । जेल में नारकीय जीवन जीना पड़ रहा था । पति–पत्नी एक साथ रहते वक्त नंगे भी रह सकते हैं, लेकिन एक साथ दिशा–पिसाब कोई भी नहीं करते । हमारे बीच तो कोई दूसरा विकल्प नहीं था । क्योंकि मुझे कोई दूसरे वकील के साथ एक ही हथकड़ी में रखा गया था । दिशा–पिसाब करते वक्त उस समय दोनों का हाथ आपस में प्रयोग करना पड़ता था । भोजन के समय में भी दोनों का हाथ प्रयोग करना पडता था । हम लोग दिन में हैं या रात में इसका पता भी नहीं चलता था । क्योंकि हम लोगों को इस तरह के अंधेरे कमरे में रखा गया था, जहां हम लोग को सूरज की रोशनी कब निकलेगी, कुछ भी पता नहीं चलता था, ऐसी दुर्गति हम लोगों की रही । यह मेरे जीवन का सबसे दुःखद क्षण है । उसके बाद भी मैंने पत्रकारिता नहीं छोड़ी, क्योंकि पत्रकारिता एक मिसन के लिए था । मिसन प्रजातन्त्र प्राप्ति के लिए था । हम चाहते थे– लोकतन्त्र स्थापित हो सके, शोषण–दमन का अन्त हो सके । जिस मुद्दा को लेकर उस वक्त हम लोगों ने आन्दोलन शुरु किया,उक्त आन्दोलन आज भी समाप्त नहीं हो रहा है । इसीलिए पत्रकारिता छोड़ नहीं पाए हैं ।
जिस समय में मैंने पत्रकारिता शुरु की, उस समय हर कोई पत्रकार राजनीतिक आस्था से जुडे हुए होते थे । लेकिन हमारे एक ही उद्देश्य रहता था– समाज चेतनाशील हो सके । कहा जाता है कि आज की पत्रकारिता व्यावसाहिक होती जा रही है । लेकिन मुझे ऐसा नहीं लग रहा है, क्योंकि व्यवसायिक पत्रकारिता के नाम में आज पीत–पत्रकारिता ज्यादा हो रही है । व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए कई पत्रकार जो–कुछ करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं । मुझे लगता है कि नेपाल में इतने सारे पत्र–पत्रिका, रेडियो, टेलिभिजन, एफएम हो गया है, जिनके बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो रही है, इसके पीछे यह भी एक कारण है ।
मेरा यह प्रयास
पत्रकारिता में सुधार के लिए मैंने अपनी ओर से हरसम्भव प्रयास किया । हमारे समय में पत्रकार संघ था, जो आज महासंघ बन गया है, उस में मैं केन्द्रीय सदस्य था । उस समय मैने प्रस्ताव किया था कि हम लोग आम जनता के लिए काम करें । उस समय में अगर कोई लेख तथा समाचार के विरुद्ध राज्य की ओर से कारवाही होती थी तो पत्रिका के सम्पादक, प्रकाशक, लेखक तथा मुद्रक सभी के ऊपर कारवाही की जाती थी । प्रकाशित समाचार तथा विचारों के कारण ही पत्रिका को बन्द करवाया जाता था, जो हमारे लिए मान्य नहीं था । कुछ साथियों के साथ मिल कर हम लोगों ने ऐसी व्यवस्था का विरोध किया । मैं खुद भी इससे पीडि़त हो रहा था । मेरी अखबार ‘लोकमत’ सप्ताहिक को ४० साल में प्रतिबन्ध किया था । उसका एक मात्र कारण था–अखबार में प्रजातन्त्र के पक्ष में वकालत करना । जिसके चलते मुझे अढाई साल तक सर्वोच्च अदालत में केस लड़ना पड़ा । ढाई साल के बाद लोकमत पुन प्रकाशन होने लगा । उसके बाद भी हमारी आन्दोलन जारी रहा । ०४६ साल में प्रजातन्त्र पुनःस्थापना होने के बाद ०४७ साल में प्रेस काउन्सिल को पुनर्गठन की गई । उसमें मैं भी सलाहकार के रूप में था । मदनमणि दीक्षित, मनिराज उपाध्याय, चन्द्रलाल झा, होमनाथ दहाल, पन्नालाल गुप्त, गोविन्द वियोगी लगायत ८ लोग उसमें थे । प्रेस कानून तथा प्रेस काउन्सिल का कानून हम लोगों ने खुद बनाया । २०४८ साल में सरकार की ओर से उसको स्वीकृति प्रदान की गई । वि.सं. २०४७ साल में जो संविधान जारी किया, हमारे मांग के अनुसार ही उसमें लिखा गया कि अब कोई भी पत्र–पत्रिका को बन्द नहीं किया जाएगा और उसका रजिष्ट्रेशन खारीज नहीं किया जाएगा । प्रेस कानुन में यह भभी लिखा गया है कि एक ही विषयों के लिए प्रकाशक, सम्पादक, लेखक तथा मुद्रण वाले को जिस तरह कारवाही की जा रही है, उस तरह की कारवाही नहीं होगी । जो मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा उपलब्धि भी है ।
अगर पत्रकार नहीं होते तो…
अगर मैं पत्रकारिता क्षेत्र से आवद्ध नहीं होता था तो मैं अवश्य ही साहित्यकार रहता । लेकिन पत्रकारिता में सारा जीवन बिताने के बाद भी जब जेब देखता हूं अथवा बैंक बैलेन्स की बात होती है तो कुछ खिन्नता महसूस होती है । जब मैंने मास्टर डिग्री किया, उसके बाद अगर मैंने प्रोफेसरी काम किया होता तो शायद मेरी ऐसी अवस्था नहीं रहती थी । पत्रकारिता का २५ साल पूरा होने के बाद एक समय विचार भी आया था– ‘पत्रकारिता बहुत कर चुका हूँ, अब छोड़ कर क्यों प्रोफेसर नहीं बन जाऊँ !’ लेकिन फिर मुझे लगा– पत्रकारिता छोड़ने की चीज नहीं है, इस धर्म का पालन करना चाहिए, मैं छोड़ नहीं सका ।
हाँ, आर्थिक दृष्टिकोण से मेरी पत्रकारिता यात्रा सफल नहीं रहा । सायद प्रोफेसर ही बना जाता था तो आज रिटायर्ड जीवन जीने के लिए कुछ हाथ लग जाता था । मैंने जिस समय पत्रकारिता शुरु किया, उसके बाद पत्रकारिता में आनेवाले मेरे मित्र गोपाल सिवाकोटी हैं, उनके साथ भी मैंने काम किया है । आज उन्होंने पीएचडी किया है, डाक्टर भी हो गए हैं और प्रोफेसर से भी रिटायर्ड हो गए हैं । आज घर बैठे–बैठे ३५–४० हजार हाथ लग जाता है । लेकिन मैं ! उपचार के लिए २० हजार लेकर काठमांडू आया था, लेकिन ३० हजार खर्च हो गया । बांकी १० हजार साथियों से मांगना पड़ा । अर्थात् मेरे लिए तो १० हजार रुपया का भी कोई ठिकाना नहीं है । ऐसी अवस्था आते वक्त कभी–कभार सोचने लगता हूं– अगर पत्रकारिता नहीं किया होता तो… ! लेकिन यह भी सोचता हूं कि आर्थिक स्थिति को सुधार करने के लिए मैंने पत्रकारिता नहीं किया था । उस समय मेरे लिए प्रजातन्त्र की लडाई ही सबसे महत्वपूर्ण रही । इसीलिए ज्यादा पश्चताप भी नहीं है ।
मैं तीन भाषा में साहित्य रचना कर रहा हूं– नेपाली, हिन्दी और मैथिली में । सम्पूर्ण नेपाल को जोड़ने के लिए हिन्दी की संवैधानिक मान्यता आवश्यक है, इस बात को लेकर भी मैंने संघर्ष किया । पिछले ५२ साल से मेरे ही नेतृत्व में नेपाल में ‘नेपाल राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन’ हो रहा है । प्रथम सम्मेलन जनकपुरधाम में हुआ था, आज तक १७ सम्मेलन हो चुका है । दो सौ हिन्दी साहित्यकारों को सम्मानित भी कर चुका हूँ । और एक पुरस्कार भी हमने बनाया है, जो ‘राजर्षी जनक प्रतिभा पुरस्कार’ के नाम में है, जिस की राशि ५५ हजार ५ सौ ५५ है । नेपाल में हिन्दी के लिए काम करनेवालों को सम्मानित और पुरस्कृत करनेवालों के लिए यह एक बडा पुरस्कार है ।
एक घटना यह भी
सामान्यतः जानबूझ कर मैं एक भी गलती नहीं करता हूं । हाँ, सच्चाई की राह पर चलते वक्त मेरे द्वारा जो कुछ हुआ, उसको देकर कभी–कभार मन में कुछ तर्क–वितर्क आ जाती है । वि.सं. ०४२ साल वैशाख महीना की बात है, एक एसपी थे । उन्होंने एक कार्यक्रम के बीच एक डाक्टर को पीट दिया । उक्त कार्यक्रम में राजपरिवार से एक सदस्य भी शामिल थे, शायद वह हेलन शाह थी । शाह रेडक्रस की केन्द्रीय अध्यक्ष थी । उनके सम्मान में ही कार्यक्रम आयोजित था । कार्यक्रम में उन्होंने जिला का हालचाल पुछा ।
एक दिन शाम की बात है, उस दिन सवा ७ बजे बाजार में डकैती की घटना हुई थी । उस डाक्टर ने उसी घटना को उल्लेख करते हुए हेलन शाह को कहा कि यहाँ पर शान्ति–सुरक्षा की दुर्गति है । डाक्टर की बात सुन कर एसपी आक्रोसित हो गए, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उन्होंने डाक्टर की पिटाई की । वही समाचार जब मैंने काठमांडू के अखबार में प्रकाशित किया, जिसके चलते मुझे हिरासत में रखा गया और बहुत दुर्गति के साथ रखा गया ।
डाक्टर दरबार के समर्थक ही थे । मैं प्रजातन्त्रवादी, डाक्टर दरबारवादी ! समाचार न लिखने से भी हो जाता, लेकिन मैंने लिखा । उस समय दरबार समर्थक ही एक पत्रकार थे, उन्होंने मुझ टुस्की मारने के लिए पूछा–राजेश्वर जी,आपने वह समाचार भेजा ? मैंने कहा– मैने तो नहीं भेजा । लेकिन मैंने तीसरे दिन उक्त समाचार काठमांडू भेज दिया । आज पत्रकारिता में ‘मोरल’ की बात होती है । लेकिन अपने अनुकूलता के लिए समाचार लिखा जाता है । उस समय में मैंने सोचा कि पिटाई खानेवाले डाक्टर का विचार जो भी हो, वह जिसको भी समर्थन करे, लेकिन समाचार बनना चाहिए । हां, डाक्टर जैसे सम्मानित व्यक्ति को सार्वजनिक जगह पर पीटा गया था । मैंने सोचा कि समाचार को रोकना नहीं चाहिए । उन दिनों मेरी अखबार को बन्द करवा दिया गया था । तब भी उक्त समाचार छप गया । उसके बाद बमकाण्ड हुआ था, मैं जनकपुर का रहनेवाला था, जिससे मुझे कोई भी लेना–देना नहीं था, लेकिन मेरी गिरफ्तारी की गई । इसके लिए मुझे कोई भी पश्चताप नहीं है । क्योंकि सत्य पर रहते हुए राजा हरिशचन्द्र को एक डोम का नौकर बनना पड़ा था । मैंने सोचा कि सच्चाई लिखने से अगर मुझे जेल ही जाना पडे,तो भी ठीक है ।
आज की अवस्था
मुझे तो लगता है कि आज भी मिसन पत्रकारिता की आवश्यकता है । देश के बहुसंख्यक लोग– आदिवासी, जनजाति, दलित, मधेशी आज भी अधिकार से बंचित हैं । उन लोगों को बाइपास कर कुछ खास वर्ग के लोग ही हरदम सत्ता पर हाबी हैं,जो राणा के समय में भी थे, राजा के समय में भी वही थे । आज पार्टी के नाम पर भी वहीं लोग सत्ता में हाबी हैं,चाहे वह कांग्रेस हो या कम्युनिष्ट, हर जगह एक ही जाति के लोगों का बोलवाला है, जो किसी भी देश के लिए अच्छी बातें नहीं है । और इस बात के विरुद्ध जो आवाज उठनी चाहिए, जो जनजागरण आनी चाहिए, उस की ओर हमारी पत्रकारिता काम नहीं कर रही है, हमारी पत्रकारिता कामयाव नहीं हो पा रही है । जिसके चलते देश में स्थिरता नहीं है ।
आज गणतान्त्रिक शासककाल के १० साल पूरे हो चुके हैं, देश में नयां संविधान भी आ चुका है । राष्ट्रपति, उप–राष्ट्रपति सभी निर्वाचित है, संसद चल रहा है । फिर उसके बाद भी देश स्थिरता की अवस्था में नहीं है । क्यों ? सब व्यक्तिगत तथा पार्टीगत स्वार्थ के लिए ही सीमित समुदाय के लिए राजनीति करते हैं । देश और समस्त जनता के लिए राजनीति करनेवाले राजनीतिक पार्टी और नेता हमारे यहाँ नहीं हैं, तो विकास कैसे हो पाएगा ? इसीलिए खाली भाषणबाजी से इस देश का विकास सम्भव नहीं है ।
मैं यहां एक उदाहरण देता हूँ– भूकंप के तीन साल पूरे हो गए । अभी तक भूकंप पीडि़तों का घर नहीं बन पाया है । लेकिन उसके बदले भूकंप के बहाने दर्जनों नेता तथा कर्मचारी मालामाल हो गए हैं । हमारे यहां कर्मचारीतन्त्र तथा अवसरशाही का इतना बोलवाला है कि जो सिंहदरबार के भीतर रहते हैं । वही लोग भूकंप अथवा अन्य किसी भी बहाने खरब से ज्यादा रुपयां खर्च कर विदेश भ्रमण करते हैं । अरे बाबा ! विदेश भ्रमण में खर्च करने के बदले १० लाख, २० लाख, २५ लाख रुपयां भूकंप पीडि़त परिवार को दिया होता तो शायद आज सबका घर बन जाता था । ऐसी हकीकत सिर्फ पहाड़ में ही नहीं, तराई–मधेश में भी है । पहाड़ के भूकंप पीडित के नामों में हो, या मधेश के बाढ़ पीडितों के नामों में, ऐसा ही होता आ रहा है ।
माओवादी जनयुद्ध के नाम में १० साल में देश में जो बर्बादी हुई, उससे कई ज्यादा क्षति आज हो रही है । वि.सं. २०६३ के बाद तो देश में गणतन्त्र आया, जो आज १२ साल हो चुका है, लेकिन जो परिवर्तन आम जनता के बीच होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है । यह सब राजनीति में नैतिकता का ह«ास होने के कारण हो रहा है ।आज हरेक पार्टी के बीच में तस्करों का बोलवाला है, जब राजनीतिक पार्टी तथा नेता ही तस्करों से प्रभावित होकर काम करते हैं तो देश कैसे बनेगा ?
अन्त में
देश सब का है, सभी को मिलकर देश को बनाना है । नेपाल में रहनेवाले चाहे वह पूरब के हो वा पश्चिम के, उत्तर के हो वा दक्षिण के सभी के लिए देश समान है, लेकिन यहां तो कुछ व्यक्ति देश को अपनी ही पैत्रिक सम्पत्ति मानते हैं । मेरे कहने का मतलब है कि जब तक नेपाल में रहनेवाले सभी नेपाली साथ मिलकर नहीं चलेंगे, तब तक विकास सम्भव नहीं है । इसीलिए जो सत्ता में बैठे हैं, उन लोगों को यह बात समझ में आनी चाहिए । क्योंकि हर व्यक्ति सत्ता में जा नहीं सकते, सत्ता में रहनेवालों को चाहिए की बाहर रहनेवालों की भी सुने । समाज में जो भी शोषित, पीडि़त हैं, उनको कैसे उठाया जा सकता है, इस में विचार करना चाहिए ।
आज समावेशी लोकतन्त्र की बात हो रही है, लेकिन उसका कार्यान्वयन नहीं हो रहा है । अर्थात् समावेशी का मतलब पति–पत्नी संसद् में जाकर मौज करना नहीं है । दलित, उत्पीडि़त, आदिवासी, जनजाति जैसे लोगों को राज्य में समान सहभागिता के लिए समावेशी की बात की गई थी । नेपाल में १२५ अथवा १०३ जाति के लोगों की बात होती हैं, उसमें से बहुत ऐसे जाति के लोग हैं, जो आज तक कोई भी एमपी नहीं बने हैं, मिनिस्टर बनने की बात तो बहुत दूर की है । लेकिन हमारे नेता, जो पहले से ही सत्ताधारी है,वह अपने ही पत्नी को सांसद् और मन्त्री बनाते हैं और समावेशिता की बात करते हैं । देश की बर्बादी के पीछे ऐसे ही लोगों का हाथ है ।
प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

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