Sat. Feb 23rd, 2019

विश्व हिंदी सम्मेलन, मॉरीशस विस्तृत रिपोर्ट : डा रघुवीर शर्मा

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हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा मॉरीशस सरकार के सहयोग से १८÷ २० अगस्त २०१८को मॉरीशस के विवेकानंद इंटरनेशनल कनवेंशन सेंटर, पायी में ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन संपन्न हुआ । १८ अगस्त को एक भव्य समारोह में मारीशस के माननीय प्रधानमंत्री श्री प्रवीण जगन्नाथ द्वारा सम्मेलन का उद्घाटन किया गया । भारत की माननीया विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की । इस अवसर पर भारत के विदेश राज्य मंत्री श्री वी के सिंह, गृह राज्य मंत्री श्री किरेनरिजिजू, मानव संसाधन राज्य मंत्री श्री एस पी सिंह, विदेश राज्य मंत्री श्री एमजे अकबर, गोवा की माननीया राज्यपाल श्रीमती मृदुलासिन्हा, पश्चिमी बंगाल के माननीय राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी तथा मारीशस गणराज्य के प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, पूर्व राष्ट्रपति एवं पूर्व प्रधानमंत्री इत्यादि भी उपस्थित थे । सर्वप्रथम दोनों देशों का राष्ट्र गान हुआ । तत्पश्चात दीप प्रज्वलन और उसके समानांतर केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत के अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों द्वारा वेद मंत्र पाठ हुआ । इस अवसर पर महात्मा गांधी संस्थान, मारीशस द्वारा हिंदी गान की प्रस्तुति की गयी । तत्पश्चात सम्मेलन लोगो (भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर तथा मारीशस का राष्ट्रीय पक्षी डोडो) पर एनिमेशन फिल्म की रोचक प्रस्तुति की गयी ।

रघुवीर शर्मा अताशे (हिंदी, सूचना एवं संस्कृति) भारतीय राजदूतावास, काठमांडू (नेपाल)

इसके बाद मारीशस की शिक्षा व मानव संसाधन, तृतीयक शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री माननीया श्रीमती लीला देवी दुकनलछुमन ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि आज जहाँ हम विश्व के सबसे बड़े सम्मेलन की शरूआत कर रहे हैं, तभी पूरी दुनिया श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की मृत्यु का शोक मना रही है । उनके जाने से भारत ने एक मार्गदर्शक और हिंदी ने एक सैनिक खो दिया । सबसे पहले आज मैं उनकी आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ और अपनी संवेदना प्रकट करती हूँ । उन्होंने कहा कि अगर वो यहां होते तो इस सम्मेलन को देखकर बहुत खुश होते और यही चाहते कि हम जिस उत्साह के साथ इसके आयोजन में लगे थे उसी उत्साह के साथ इसको पूरा करें । इसलिए आज जितने गंभीर भाव के साथ हम श्री वाजपेयी जी को विदा कर रहे हैं, उतने ही उत्साह के साथ मैं आप सभी हिंदी प्रेमियों, विद्वानों, लेखकों, संस्थाओं का स्वागत करती हूँ ।

तत्पश्चात भारत की माननीया विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने सम्मेलन प्रस्तावना देते हुए अपने वक्तव्य में कहा – इस मंच पर खडेÞ–खडेÞ मेरे मन में दो भाव एक साथ उभर रहे हैं । पहला भाव शोक का है क्योंकि इस सम्मेलन पर अटल जी के निधन की छाया है । और, दूसरा भाव उस संतोष का भी है कि इस सम्मेलन के बहाने आज समूचे विश्व के प्रतिनिधि अटल जी को श्रद्धांजलि देने के लिए सभागार में उपस्थित हैं । हमने उद्घाटन सत्र के तुरंत बाद अटल जी के लिए श्रद्धांजलि सत्र रखा है जिसमें भारत और मारीशस के अलावा अन्य देशों से आए हुए प्रतिनिधियों के लिए श्रद्धांजलि देने का अवसर होगा । उन्होंने कहा विश्व हिंदी सम्मेलन की यात्रा ४३ वर्ष पुरानी है । १९७५ में पहला सम्मेलन भारत में नागपुर में हुआ था । उसके बाद १९८३ में और २०१५ में भी भारत में सम्मेलन हुआ । इसी तरह मारीशस में भी १९७६ में और १९९३ में दो सम्मेलन पहले हो चुके हैं और २०१८ में तीसरा सम्मेलन मारीशस में हो रहा है । बीच के छ सम्मेलन – दो गिरमिटिया देशों (टोबेगो और सूरीनाम) में और बाकी के तीन सम्मेलन ( एक अमेरिका में, एक ब्रिटेन में और एक साउथ अफ्रीका में हुए ।
उन्होंने कहा कि अगर भाषा लुप्त होने लगती है तो संस्कृति भी प्रभावित होती है । मुझे खुशी है कि आज भी गिरमिटिया देशों में संस्कृति का गौरव कायम है । इस बार के हमारे आठों सत्र संस्कृति के निमित्त हैं । पहले सत्र होते थे, चर्चाएँ होती थी, अनुशंसाएँ होती थी लेकिन उसके बाद उस पर कोई अनुवर्ती कार्रवाई नहीं होती थी । तो हमने तय किया कि इन तमाम अनुशंसाओं को मात्र छ्ह महीने के अंदर संकलित करके हम प्रकाशित करेंगे क्योंकि मैंने देखा था कि जब तीन वर्ष बाद अगला सम्मेलन आता था तब अनुशंसाएँ प्रकाशित होती थीं । मैं इतना जरूर कहना चाहूंगी कि जो काम हमें सौंपा गया था, १९७५ से दो अनुशंसाएँ हर विश्व हिन्दी सम्मेलन कर रहा था–

१) विश्व हिन्दी सचिवालय का अपना भवन होना चाहिए और सुचारु रूप से कार्य करना चाहिए ।
२) संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को अधिकृत भाषा बनाया जाए ।

आज मुझे खुशी है आपको यह बताते हुए कि विश्व हिन्दी सचिवालय का भवन केवल पूरा ही नहीं हुआ है बल्कि भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथकोविंद जी ने यहाँ आकार स्वयं उसका लोकार्पण किया है और वह बहुत सुचारु रूप से काम कर रहा है, क्योंकि स्थायी अधिकारी वहाँ नियुक्त कर दिए गए हैं । जहां तक संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को अधिकृत भाषा बनाने का संबंध है, कुछ बाधाएँ उसमें हैं क्योंकि एक तिहाई बहुमत चाहिए । वो जुटाना हमारे लिए बिलकुल मुश्किल नहीं है । १२९ देशों का समर्थन चाहिए । अगर हम १७७ देशों का समर्थन अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए जुटा सकते हैं तो उससे ज्यादा ही हिन्दी के लिए जुटा सकते हैं । लेकिन कठिनाई केवल यह है कि उस पर आने वाला व्यय उन तमाम देशों को देना होगा जो समर्थन देंगे । यहाँ कठिनाई आ जाती है । यदि संयुक्त राष्ट्र यह नियम बना दे कि जो देश अपनी भाषा को अधिकृत करना चाहता है पूरा व्यय वो वहाँ करेगा तो हम कल हिन्दी को अधिकृत भाषा बनवा देंगे । मैंने तो संसद मेँ कहा था कि ४० करोड़ नहीं ४०० करोड़ खर्च होगा तो हम देने को तैयार हैं, हिन्दी को अधिकृत भाषा बनाने के लिए ।

इसके बाद मारीशस के प्रधानमंत्री श्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ ने उद्घाटन संबोधन दिया तथा एक डाक टिकट और ११वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मारिका तथा कुछ अन्य पत्रिकाओं का विमोचन किया । भारत के माननीय विदेश मंत्री श्री वी.के. सिंह द्वारा आभार ज्ञापन के साथ उद्घाटन सत्र का समापन हुआ ।

तत्पश्चात भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी को श्रद्धंजलि दी गयी जिसमें विभिन्न देशों के लगभग २५ विद्वानों ने श्री वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि दी और हिंदी के विकास में संयुक्त राष्ट्र संघ में उनके पहले हिन्दी भाषण को याद करते हुए हिन्दी कविता में उनके योगदान तथा उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों को याद किया ।
तीन दिन तक चले इस सम्मेलन में कुल आठ सत्र हुए, जिनमें विश्व के अलग–अलग भागों से आए हिन्दी के विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए । प्रथम सत्र का विषय था ‘भाषा और लोक संस्कृति का अंतःसंबंध‘ । इस सत्र में इस बात पर चर्चा हुई कि किस तरह लोक संस्कृति और हिंदी भाषा का संबंध है । चर्चा के दौरान लोक संस्कृति और लोक संस्कार के साथ–साथ चलने पर बल दिया गया । इस सत्र में चर्चा के बाद निम्नलिखित अनुशंसाएं हुईं–

१. एक सांस्कृतिक अवधग्राम की स्थापना की जाए क्योंकि राम चरित मानस यहां का प्राण है ।
२. भारत और प्रवासी देशों को सम्मिलित कर लोककथाओं तथा लोकगीतों का प्रकाशन किया जाए ।
३. विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में लोक जीवन तथा लोक संस्कृति का समावेश किया जाए ।
३. लोक जीवन और लोक साहित्य पर शोध परियोजनाओं में वरीयता एवं उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए ।
४. लोक भाषा के लिएकार्यरत संस्थाओं द्वारालोक साहित्य एवं लोक संगीत, लोक जीवन के संवर्धन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर कार्य योजनाएं बनाई जाएं ।

द्वितीय सत्र का विषय था ‘प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी तथा भारतीय भाषाओं का विकास’ । इस सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं –

१. हिंदी शिक्षा को समाज के प्रत्येक स्तर पर लागू किया जाए ।
२. यूनिकोडस्क्रिप्टसर्चेबल किया जाए ।
३. बैंकिंग सेक्टर में यूनिकोड का प्रचार–प्रसार किया जाए ।
४. बीमा, अंग्रेजी में प्राप्त आईटी सॉल्यूशन को हिंदी में किया जाए ।
५. सभी निजी एवं सरकारी ऑनलाइन सेवाएं हिंदी में उपलब्ध की जाएं ।
६. भारतीय भाषाओं के प्रचार–प्रसार हेतु सभी वेबसाइट द्विभाषी (अंग्रेजीऔरहिंदी) स्वरूप में किए जाएं ।
७. यूनिकोड का मानकीकरण किया जाए ।

तृतीय सत्र का विषय था ‘हिंदी शिक्षण में भारतीय संस्कृति’ । इस सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं –

१. हिंदी के विदेशी विद्यार्थियों को आरंभ में भारतीय संस्कृति का व्यवहारिक ज्ञान दिया जाना चाहिए ।
२. भाषा शिक्षण में गीत, नाटक और फिल्मों का उपयोग किया जाए ।
३. अध्यापकों के लिए भाषा शिक्षण के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए ।
४. बच्चों की कविताओं के माध्यम से भी संस्कृति का ज्ञान कराना चाहिए ।

चतुर्थ सत्र का विषय था ‘हिंदी साहित्य में संस्कृति चिंतन’ । इस सत्र की अनुशंसाएं निम्नवत हैं–

१. साहित्य और संकृति के संबंध को मजबूत बनाया जाए ।
२. नयी पीढ़ी को सांस्कृतिकदृष्टि से जागरूक बनाया जाए ।
३. भारतीय संस्कृति पर हो रहे विपरीत प्रभावों पर रोक लगाने का उपक्रम किया जाए ।
४. प्रौद्योगिकी का उपयोग कर संस्कृति की वैज्ञानिक व्याख्या को प्रोत्साहन दिया जाए ।

पांचवें सत्र का विषय था ‘फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण’ । इस सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं–

१. फिल्मों के माध्यम से संस्कृति के संरक्षण के लिए चर्चा परिचर्चा का आयोजन किया जाना चाहिए ।
२. ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए फिल्मकारों को फिल्म निर्माण में मदद की जानी चाहिए ।
३. सिनेमा में प्रतिपादित सामाजिक सोच का दिशा निर्धारण करने के प्रयास किए जाने चाहिए ।
४. वेबसीरीज में आ रही विषयवस्तु पर नियंत्रण रखे जाने की जरूरत है ।
५. कलात्मक फिल्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ।

६. हिंदी भाषा के प्रचार–प्रसार के लिए देवनागरी लिपि ही स्वीकार की जाए ।

छठे सत्र का विषय था ‘संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति’ । इस सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं–

१. नव माध्यम को ‘सोशल मीडिया’ के स्थान पर नया हिंदी नाम दिया जाए ।
२. भारतीय जनमाध्यमों को विदेशों, विशेष रूप से प्रवासी भारतीय बहुल क्षेत्रों के जनमाध्यमों से प्रसारण सामग्री की प्राप्ति तथा आदान–प्रदान हेतु कार्ययोजना तैयार की जाए ।
३. भारत में किसी उपयुक्त स्थान पर भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी हिंदी पत्रकारिता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए । श्री बाजपेयी द्वारा समय–समय पर पत्रकारिता और पत्रकारों के विषय में व्यक्त विचारों तथा उनके संपादकीय अग्रलेखों का संकलन तथा प्रकाशन किया जाए ।
४. भारतीय तथा विदेशी पत्रकारों, संपादकों के लिए भारतीय संस्कृति के परिचय एवं लेखन प्रशिक्षण के सावधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किए जाएं ।
५. मीडिया तथा जनसंचारशिक्षण में ‘भारतीय संस्कृति’ विषय को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए ।
६. भारत के संचार माध्यमों यथा (समाचार पत्र–पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजÞन तथा फिल्मों में) इंडिया के स्थान पर भारत शब्द के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाए ।
७. पत्रकारिता एवं संपादन के क्षेत्र में भारत के शीर्ष जन नेताओं तथा राजनेताओं के अवदान पर शोध कार्य किया जाए ।
८. महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर पत्रकारिता एवं जन संचार सहित अन्य विषयों के अध्यापकों के लिए सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी के बढ़ते प्रयोग और उपयोग की दृष्टि से प्रशिक्षण तथा अभिमुखीकरण कार्यक्रम चलाए जाएँ ।
९. क्षेत्रीय स्तर पर संस्कृति का मूल्यपरक संवर्धन एवं उनके विषय में जागरूकता के लिए सामुदायिक रेडियो के संचार का विस्तार किया जाए । इस हेतु सामूहिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना प्रक्रिया को सरल बनाया जाए ।
१०. ‘व्हाट्सएप’ जैसे नवाचारी डिजिटल प्लेटरफार्मों का सांस्कृतिक पत्रिका के रूप में उपयोग किया जाए ।
११. भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों पर आधारित प्रकाशन एवं प्रसारण मीडिया अंतर्वस्तुलेख समाचार, फीचर आदि तैयार कर विभिन्न देशों के मीडिया संस्थानों को उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाएं ।

सातवें सत्र का विषय था ‘प्रवासी संसार– भाषा और संस्कृति’ । जिसमें चर्चा हुई कि प्रवासी देशों में भाषा संस्कृति पहचान की सबसे सशक्त माध्यम होती है । बड़े यत्न से सहेजी गयी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए युवा लोगों में भाषा और संस्कृति को अपनाना आवश्यक है । इसके लिए युवा प्रवासी मंचों की स्थापना की जाए । इस सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं–

१. डायस्पोरा देशों में भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु प्राथमिकता के साथ प्रयास किए जाएं ।
२. प्रवासी भारतीयों के बीच युवा पीढ़ी की जरूरतों के अनुरूप हिन्दी के प्रचार–प्रसार की योजना बनाई जाए तथा उसे क्रियान्वित किया जाए ।
३. हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण में प्रवासी दृष्टिकोण को अपनाया जाए । भारतवंशी छात्रों के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम विकसित किया जाए ।
४. क्रियोल में सृजित हो रहे साहित्य को हिंदी में अनूदित किया जाए ।
५. भारतीय संस्कृति और भाषा को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए गैर सरकारी परंतु प्रामाणिक प्रयासों को वित्तीय सहायता दी जाए ।
६. प्रवासी भारतीय युवा पीढ़ी को भारत कोकर्मभूमि बनाने के लिए प्रेरित तथा प्रोत्साहित किया जाए ।
७. प्रवासी रचनाओं का फ्रांसीसी, डच, अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाए ।
८. दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में हिंदी शिक्षण में संलग्न लोगों को विभिन्न प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए ।
९. हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण हेतु ऑनलाइन प्लेटफार्म तैयार किया जाए ।
१०. विश्व हिंदी सचिवालय की उप शाखाएं प्रशांत, कैरेबियाई एवं यूरोपीय देशों में खोली जाएं ।
११. फिजी में हिंदी को राजभाषा का गौरव प्राप्त है अतः अगला विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी में आयोजित किया जाए ।
१२. गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर सांस्कृतिक ग्राम की स्थापना की जाए ।

आठवें सत्र का विषय था ‘हिंदी बाल साहित्य और भारतीय संस्कृति’ । इस सत्र में चर्चा का केंद्र था कि बालकों में बाल साहित्य के माध्यम से शाश्वत मूल्यों का विकास किया जाना चहिए । आज का बच्चा परी कथाओं को आज के परिवेश में समझना चाहता है । बच्चों को आज क्या देना है यह हम सबको समझना होगा । सत्र की अनुशंसाएं इस प्रकार हैं–

१. मारीशस के बाल साहित्य के प्रकाशन की व्यवस्था की जाए ।
२. साहित्यिक पत्र–पत्रिकाओं में बाल साहित्य का एक कालम अनिवार्यतः रखा जाना चाहिए ।
३. प्रतिवर्ष बाल साहित्य पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठीकी जाए ।
४. बाल साहित्य का वार्षिक आकलन किया जाए ।
५. हिंदी बाल साहित्य का तथ्यात्मक इतिहास लिखा जाए ।
६. बाल साहित्य अकादमी की स्थापना की जाए ।
७. गर्भवती महिलाओं में अच्छे संस्कार डालने के लिए बाल साहित्य विषयक पुस्तकें एवं कार्यशाला होनी चाहिए ।
८. बाल साहित्य में ‘युगधर्म’ और ‘राष्ट्रधर्म’ पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ।
९. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के लिए बाल साहित्य विषयक उन्मुखीकरण पाठ्यक्रम एवं पुनश्चर्या पाठ्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ।
१०. विभिन्न देशों में शिक्षकों का आदान–प्रदान किया जाए ।

उपरोक्त सत्रों की अध्यक्षता÷सह अध्यक्षता क्रमशः श्रीमती मृदुलासिन्हा माननीय राज्यपाल गोवा व मारीशस की डॉ. सरिता बंधु, श्री किरण रिजिजू माननीय गृह राज्य मंत्री भारत सरकार व मारीशस के श्री प्रह्लाद रामशरण, डॉ. विमलेश कांति वर्मा – भारत एवं मारीशस के डॉ. उदय नारायण गंगू, डॉ. राजरानीगोबिन ( मारीशस एवं भारत के डॉ. हरीश नवल, श्री प्रसून जोशी –भारत एवं मारीशस के डॉ. शशि दुखन, सत्यदेवटेंगर– मारीशस एवं भारत के प्रो. राम मोहन पाठक, डॉ. कमल किशोर गोयनका – भारत एवं मारीशस के गुलशन सुखलाल, श्री कृष्ण कुमार अस्थाना – भारत एवं मारीशस की डॉ. अलका धनपत जैसे दिग्गजों ने की ।
इस सम्मेलन में भारत से डॉ. जोरमआनिया ताना, श्री प्रसून जोशी, प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, डॉ. श्रीमती ऋता शरूक्ल, प्रो. चमन लाल गुप्त, श्री श्रीधर पराडकर, श्री तम्जनसोबा आओ, डॉ. सुभाष सी. कश्यप, डॉ. सी. भास्कर राव, डॉ. के. सी. अजय कुमार तथा डॉ. अजय कुमार पटनायक को मौके पर ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से सम्मानित किया गया तथा अपरिहार्य कारणों से समारोह में उपस्थित न हो सकने वाले श्री बशीरअहमदमयूख, प्रो. धर्मपालसैनी, श्री ब्रजकिशोर शर्मा, प्रो. रमेश चंद्र शाह तथा श्रीमती मालती जोशी को बाद में सम्मानित किए जाने का निर्णय लिया गया । इस सम्मेलन में विदेशों से प्रो. जावेदखोलोव (ताजाकिस्तान), डॉ. राम प्रसाद परसराम(त्रिनिदाद और टोबैगो), डॉ. इनेसफार्नेल (जर्मनी), डॉ. अन्ना चेल्नोकोवा (रूस), डॉ. गलीनारूसोवासोकोलोवा (बुल्गारिया), डॉ. उदय नारायण गंगू (मारीशस), श्री हनुमान दुबेगिरधारी (मारीशस), श्री केसनबधू (मारीशस), सुश्री उन गू ली (दक्षिण कोरिया), श्री गोपाल ठाकुर (नेपाल), सुश्री सिलेगामाचानरब(मंगोलिया), श्री नेमानीबैनीवालू (फिजी), श्री ब्रेसिलनगोडाविथान (श्री लंका) तथा श्रीमती सुनीता नारायण (न्यूजीलैंड) को मौके पर ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से सम्मानित किया गया तथा अपरिहार्य कारणों से समारोह में उपस्थित न हो सकने वाले प्रो.अलीसनबूच(संयुक्त राज्य अमेरिका), प्रो. काजुहिकोमचीदा (जापान), डॉ. रत्नाकर नराले (कनाडा) तथा श्री ई मादेधर्मयश इंडोनेशिया कोबाद में सम्मानित किए जाने का निर्णय लिया गया । हिंदी सेवी संस्थाओं की श्रेणी में भारत से सीडैकपुणे को सम्मानित किया गया जबकि विदेशों से तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फारेनस्टडीज, हिंदी प्रचारिणी सभा मारीशस तथा आर्यसभा मारीशस को सम्मानित किया गया । दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, भारत के प्रतिनिधि के समारोह में अपरिहार्य कारणों से उपस्थिन नहीं हो पाने के कारण इस संस्था को बाद में सम्मानित किए जाने का निर्णय लिया गया ।
११वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का समापन २० अगस्त २०१८ को अभिमन्यु अनत सभागार में हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में मारीशस गणराज्य के माननीय कार्यवाहक राष्ट्रपति महामहिम श्री परमसिवम पिल्लै वायापुरी उपस्थित थे । उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी की वैश्विक लोकप्रियता के आधार पर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने की मांग की । इस प्रकार कुल मिलाकर यह सम्मेलन विचार मंथन से परिपूर्ण और बहुत ही सार्थक रहा ।

रघुवीर शर्मा
अताशे (हिंदी, सूचना एवं संस्कृति)
भारतीय राजदूतावास, काठमांडू (नेपाल)

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