Sat. Mar 23rd, 2019

नेपाल और भारत का साहित्यिक और सांस्कृतिक अन्तर–सम्बन्ध : सनत रेग्मी

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नेपाल और भारत राजनीतिक और भौगोलिक रूप से बटे हुए हैंं, परन्तु इनकी सांस्कृतिक जड़ें एक हैंं । नेपाली और हिन्दी दो देशों की भाषाएँ हैं । परन्तु थोडेÞ से व्याकरणिक प्रयोगों और अर्थ भेद के अलावा दोनो भाषाएँ एक जैसी हैं । दोनो की लिपि देवानागरी लिपि है । दोनो का विकास प्राकृत भाषा से हुआ है । तमाम भारतीय भाषाएँ प्राकृत से विकसित हुई हैंं । हिन्दी भाषा, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी, मैथिली और उत्तर भारत की विकसित भाषाआें के मिश्रण से बना है । खड़ी बोली ने इन भाषाआें के साहित्य को अपनाकर हिन्दी भाषा के रूप में अपना विकास किया है । ऐतिहासिक विकास दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दी शौरसेनी प्राकृत से जुड़ी हुई मिलती है । उत्तर और मध्य भारत की विविध बोलियों को समेटते हुए खड़ी बोली का विकास हुआ और उनके साहित्य को अपनाते हुए हिन्दी भाषा का विकास हुवा । हिन्दी का प्राचीन साहित्य, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी और मैथिली साहित्य से भरा हुआ है ।

नेपाली भाषा का विकास भी इस्वी सं.५०० तक के प्राकृत (महाराष्ट्री, मागधी, अर्थमागधी, शौरसेनी और पैशाची) से रूपान्तरित होते हुए, भारत मे गढ़बाली कुमाउनी और नेपाल में नेपाली भाषा के रूप में विकसित हुई । प्राकृत, पैशाची, दरद, खस भाषा के रूप में जानी जाती हैंं । इन से मिलती जुलती होने के कारण, कुमाउ, गढ़वाल और नेपाल की पश्चिमी नेपाल की भाषिकाएँ खसकुरा कहलाती थी । इन्हीं कारणों से नेपाल के भोट वर्मेली भाषिकाओं को बोलनेवाले लोग नेपाली को खसकुरा भी कहते हैं ।
नेपाल में १०४ जीवित भाषाएँ हैं । इस पर अभी अध्ययन अनुसन्धान जारी हैं । मै इसपर न जाकर सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि नेपाल और भारत का तीन स्तर पर अन्तर्सम्बन्ध है पर मैं यहाँ सिर्फ दो सम्बन्धों की चर्चा करुँगा ।

सांस्कृतिक अन्तसम्बन्धः
(क) नेपाल और भारत की संस्कृति का मूल एक है, हम आर्याे की उसी शाखा से सम्बन्धित हैं, जो इण्डो आर्यन आर्य हैं, हमारी मूल सांस्कृतिक ग्रन्थ वेद है । वेद उपनिषद और पुराण, हमारी साझा धरोहर हैं । हमारे देश की खास संस्कृति की परम्परा भी अफगानीस्तान, भारत, कश्मीर, कुमाउ, गढ़वाल होते हुए, कर्णाली प्रदेश मे स्थायी रूप से बस गई है । नेपाल के ब्राह्मणों का मूल, कश्मीर कुमाउँ और गढवाल होते हुए नेपाल में आए परन्तु जब बाद में मुगल आक्रमण से आक्रान्त होकर जो ब्राह्मण दूसरी खेप में आए उनके और पहले खेप के खस ब्राह्मणों मे कुछ भिन्नता थी । इसी कारण खस ब्राह्मणों ने अपने को भारत के विभिन्न प्रदेश से आए हुए ब्राह्मणों का पूर्वज स्वीकार कर लिया और नेपाल का ब्राह्मण वर्ण एक हो गए । परन्तु उनका सांस्कृतिक आधार वैयत्तिक आचार आहार विहार सब खस संस्कृति से प्रभावित है ।

नेपाल में खस आर्याे ने भारतीय आर्याे के मूल ग्रन्थ वेद, उपनिषद, स्मृतियो को अपना लिया है और हमारे सारे तीर्थ साझा हैं । चाहे केदार नाथ हो या नेपाल के डोलेश्वर महादेव, मुक्तिनाथ, काशी विश्वनाथ हो या पशुपतिनाथ सभी हमारे साझा आराध्य देव हैं । नदी तीर्थ, सभी तो एक हैं । भौगोलिक या राजनीतिक रूप से भले ही हम दो राष्ट्र हैं । परन्तु सांस्कृतिक रूप से हमारे अन्तर्सम्बन्ध इतने दृढ हैं कि कोई हमें अलग नही कर सकता हैं ।
नेपाल का दक्षिणी तराई क्षेत्र और सीमांत भारतीय क्षेत्र में तो रोटी–बेटी का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ हैं । नेपाल और भारत के बीच का यह वैवाहिक सम्बन्ध अत्यन्त जटिल हैं । साथ ही अटूट भी ।
साहित्यिक अन्तरसम्बन्ध
इन्ही अन्तर्सम्बन्धों के बीच हम नेपाल और भारतीय साहित्यकार साहित्य रचना मे संलग्न हैं । जिस समय भारत में हिन्दी का विकास हो रहा था, नेपाल में, मैथिली, अवधी, और भोजपुरी का मिश्रित स्वरूप का नेपाली भाषा का विकास शुरु हो चुका था । उसे नेपाल मे सधुक्कडी भाषा कहा जाता था । विशेषतः नाथ पन्थी, जोसमनि सन्त परम्परा के कवियों का सम्पूर्ण भजन एवं नेपाल के राजाओं द्वारा लिखित कविताओं में उसका स्वरूप मिलता है । खस भाषा में उर्दु फारसी और तत्कालीन भारत में बहु प्रचलित भाषाआें को अपनाते हुए खस भाषा विकसित हुई । फिर नेपाली भाषा विकसित हुई । हिन्दी भाषा के आधुनिक स्वरूप की प्रारम्भिक अवस्था में नेपाली पूर्ण विकसित भाषा हो चुकी थी । अध्यात्म रामायण के आधार मे कवि भानुभक्त आचार्य ने भानु भक्त रामायण लिखकर नेपाली भाषा का पूर्ण प्रचार कर दिया था ।
भानु भक्त युग में नेपाली साहित्य के साथ–साथ नेपाल में मैथिली, भोजपुरी, और अवधी मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा भी लोकप्रिय था विशेष कर धार्मिक भजन और उनके विचारो में सधुक्कड़ी का प्रचार था ।
नेपाल के जंगबहादुर राणा के उदय के बाद से ही, एकतन्त्री तानाशाही में अभिव्यक्ति के माध्यम में, नियन्त्रण, शिक्षा क्षेत्र में नियन्त्रण, आदि कारण से कुछ शिक्षा प्रेमी शिक्षा प्राप्ति हेतु बनारस जाने लगे । बनारस नेपाली शिक्षा और साहित्य का केन्द्रविन्दु बना, नेपाल के मध्यकालीन साहित्य के एक हस्ती युवा कवि मोतीराम भट्ट ने बनारस में रहकर आदि कवि भानभुक्त के रामायण की खोज की, और वहीं से प्रकाशन प्रारम्भ किया, उनका हिन्दी कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ निकट सम्बन्ध था । विशेषकर भारत जीवन प्रेस और उसका प्रकाशन भारत जीवन पत्रिका में वह लिखा करते थे । भारतेन्दु जी के प्रेरणा से ही उन्होंने भारत जीवन प्रेस से गोरखा भारत जीवन पत्रिका(नेपाली) प्रकाशित किया था । मोतीराम भट्ट के समय से ही बनारस नेपाली भाषा साहित्य का प्रमुख केन्द्र रहा । मावधी, चन्द्र, चन्द्रिका और उदय जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन वहीं से हुए । बनारस के प्रकाशकाें द्वारा नेपाल के प्राथमिक और मध्यकालीन साहित्यकाराें की कृतियाँ प्रकाशित होकर नेपाल भेजी जाती रही । नेपाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला ने मुंसी प्रेमचन्द राय, कृष्ण दास और आचार्य शान्ति प्रिय दुवेदी जी की प्रेरणा से ही हिन्दी मे कहानियाँ लिखना शुरु किया । उनकी रचनाएँ हंस बीणा और विशाल भारत मे छपी हैं । बाद मे सूर्य विक्रम ज्ञवाली की प्रेरणा से उन्हाेंने नेपाली मे लिखना शुरु किया । उन की ही प्रेरणा से हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार फणिश्वरनाथ रेणु ने नेपाली और हिन्दी मे लिखना शुरु किया । उनकी नेपाली की कुछ रचनाआें को उन्होंने हिन्दी मे प्रकाशित किया । श्री रेणु कोइराला निवास में रहकर ही साहित्य साधना मे लगे रहे । उनका और वि.पी.कोइराला के अनुज तारिणी प्रसाद कोइराला मे लेखन की प्रतिस्पर्धा रहती थी ।
नेपाल के आधुनिक काल के पहले कथाकार गुरु प्रसाद मैनाली, मुन्सी प्रेमचन्द से बहुत हद तक प्रभावित थे, उनकी प्रसिद्ध कथा ‘नासो’ प्रेमचन्द की ‘सौत’ से प्रभावित कहानी है । नेपाली कवियो के सिरमौर लेखनाथ पौडेल जी हिन्दी के मैथिली शरण गुप्त और अयोध्या सिंह हरिऔध से प्रभावित थे । नेपाल के महाकवि देवकोटा के बारे मे राहुल सांकृत्यायन का कहना था एक देवकोटा में प्रसाद पन्त और निराला समाये हुए हैं । नेपाल के अधिकांश साहित्यकारों की शिक्षा दीक्षा बनारस, पटना, लखनउ और कलकत्ता मे हुई । इस लिए उन सभी ने लेखन की प्रेरणा हिन्दी साहित्यकारो से ही पाई । सभी ने एक आध रचना हिन्दी मे लिखी हैं । हिन्दी नेपाली साहित्यकारों का अध्ययन का विषय रहा है । इस लिए नेपाली और हिन्दी साहित्य अत्यन्त निकट है । मै स्वयं प्रारम्भ मे हिन्दी में ही लिखता था । भीमनिधि तिवारी जी की प्रेरणा से मंैने नेपाली में लिखन शुरु किया । लखनऊ के निकट रहने के कारण मैं जब भी लखनऊ जाता था तब अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, और यसपाल जी से मिला करता था । भगवती बाबु और नागर जी का आर्शिवाद मिलता रहा मैं नेपाली में लिखता रहा । नेपाल और भारत के साहित्यकारों में निकट सम्बन्ध थे । केदारमान व्यथित भारत मे बहुचर्चित व्यक्तित्व थे । शिव मंगल सिंह सुमन उतने ही नेपाली साहित्य जगत मे सुपरिचित थे । वे नेपाली भाषा बोलते और समझते भी थे । नेपाल की नेपाली और भारतीय साहित्यकारों को नेपाल मे कभी भी दो देशो के साहित्यकाराें के रूप में नहीं देखा गया । भारतीय साहित्यकार इन्द्र बहादुर राई नेपाल में नेपाली साहित्य के सिरमौर माने जाते थे, नेपाली साहित्य के चर्चित आन्दोलन तेश्रो आयाम (तिसरा आयाम) की शुरुवात दार्जलिङ्ग मे ही हुई थी । लेखनाथ, सम, देवकोटा को भारतीय नेपाली लेखकाें ने दूसरे देश का नही माना । नेपाल के दर्णीधर, सूर्य विक्रम ज्ञवाली, भारतीय सु.ध.पा. की त्रयी में दार्जलिङ्ग मे सम्मानित रहे हैं ।
हिन्दी के फणीश्वरनाथ रेणु ने नेपाल को अपनी मौसी कहा है । अज्ञेय नेपाल से जय जनक जानकी साहित्यिक यात्रा निकालते थे । इस तरह हम देखते हैं कि नेपाल और भारत के बीच साहित्यिक अन्तर्सम्बन्धो की मजबुत कड़ी है । हम चाहते हैं नेपाल भारत के इस अन्तर्सम्बन्ध को इतना मजबूत और व्यापक किया जाय की प्रत्येक नेपाली भारतीय साहित्यों का ज्ञाता हो । और प्रत्येक भारतीय नेपाल साहित्य को जान और समझ सके । जो साहित्यिक आयोजन तथा नेपाल और भारत के साहित्यकारो के प्रयास से ही यह सम्भव होगा । हमें अब यह अच्छी तरह समझना होगा कि नेपाल के हिन्दी साहित्य और भारत के हिन्दी साहित्य में विशेष अन्तर है । इस तरह नेपाल के नेपाली साहित्य और भारतीय नेपाली साहित्य मे भी विशेष अन्तर है । नेपाल मे अवधी, भोजपुरी, मैथिली, और थारु भाषाओं मे साहित्य लिखा जा रहा है । जो भारतीय भू भाग में बसे इस भाषा भाषियों से अपना सम्बन्ध जोडना चाहते हैं । इस के लिए हमें नेपाल और भारत के साहित्य और उसके अन्तर्सम्बन्धो को गहराई से समझना होगा । यह तभी सम्भव हो पायेगा जब हम इसे राजनैतिक सम्बन्ध और आँच से परे रखकर सांस्कृतिक सम्बन्धो की ताजी हवा मे साँस लेने दें ।

Sanat Regmi
सनत रेग्मी, नेपालगंज, (नेपाल)

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