Sat. Sep 22nd, 2018

सावन का महीना : त्योहारों का महीना

हिमालिनी डेस्क
सावन का महीना आते ही मौसम का रंग और रूप बदल जाता है और साथ ही मन में एक उत्साह और उमंग भी घर कर जाता है । सावन के साथ शिव और शिव के साथ सावन का जो सम्बन्ध है वह अकाट्य है या फिर यह कहें कि दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं । आखिर क्यों पसंद है शिव को सावन ?
सावन का महीना जिसमें भगवान शंकर की कृपा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है । यूं तो भगवान शंकर की पूजा के लिए सोमवार का दिन पुराणों में निर्धारित किया गया है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है । पर सावन के महीने की तो विशेष मान्यता है ।
सावन की मान्यता
ऐसी मान्यता है कि प्रबोधनी एकादशी (सावन के प्रारंभ) से सृष्टि के पालन कर्ता भगवान विष्णु सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने दिव्य भवन पाताललोक में विश्राम करने के लिए निकल जाते हैं और अपना सारा कार्यभार महादेव को सौंप देते हैं । भगवान शिव पार्वती के साथ पृथ्वी लोक पर विराजमान रहकर पृथ्वी वासियों के दुःख–दर्द को समझते हैं एवं उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं, इसलिए सावन का महीना खास होता है ।
शिव को सावन ही क्यों प्रिय है ?
महादेव को श्रावण मास वर्ष का सबसे प्रिय महीना लगता है क्योंकि श्रावण मास में सबसे अधिक वर्षा होने के आसार रहते हैं, जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करता है । भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांएं चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है । हिन्दू कैलेण्डर में महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गयें हैं । जैसे वर्ष का पहला माह चैत्र होता है, जो चित्रा नक्षत्र के आधार पर पड़ा है, उसी प्रकार श्रावण महीना श्रवण नक्षत्र के आधार पर रखा गया है । श्रवण नक्षत्र का स्वामी चन्द्र होता है । चन्द्र भगवान भोलेनाथ के मस्तक पर विराज मान है। जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, तब सावन महीना प्रारम्भ होता है । सूर्य गर्म है एवं चन्द्र ठण्डक प्रदान करता है, इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिश होती है । जिसके फलस्वरूप लोक कल्याण के लिए विष को ग्रहण करने वाले देवों के देव महादेव को ठण्डक व सुकून मिलता है । शायद यही कारण है कि शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है ।
क्या कहती है पौराणिक कहावत
पुराणों और धर्मग्रंथों को उठा कर देखें तो भोले बाबा की पूजा के लिए सावन के महीने की महिमा का अत्याधिक महत्व है । इस महीने में में ही पार्वती ने शिव की घोर तपस्या की थी और शिव ने उन्हें दर्शन भी इसी माह में दिए थे । तब से भक्तों का विश्वास है कि इस महीने में शिवजी की तपस्या और पूजा पाठ से शिवजी जल्द प्रसन्न होते हैं और जीवन सफल बनाते हैं ।
सावन का दूसरा महत्त्वपूर्ण त्योहार है रक्षाबन्धन
बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है, प्यार के दो तार से संसार बाँधा है… सुमन कल्याणपुर द्वारा गाया गया यह गाना रक्षाबंधन का बेहद चर्चित गाना है । भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बाँधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है । रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है । वह भी तब जब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुआत मात्र हुई थी ।
रक्षाबंधन पर्व पर जहाँ बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बाँधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूरदराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार रहता है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजे । उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है, क्योंकि मुँहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परंपरा भी काफी पुरानी है । असल में रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं । भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है । इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्योहार की शुरुआत की उत्पत्ति लगभग ६ हजार साल पहले बताई गई है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं ।
इतिहास के पन्नों से…
रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ हैं । मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था । रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं । उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी । तब हुमायूँ ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था । दूसरा उदाहरण अलेक्जेंडर व पुरू के बीच का माना जाता है । कहा जाता है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ । इससे अलेक्जेंडर की पत्नी काफी तनाव में आ गईं थीं ।
उसने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था । सो, उन्होंने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी । तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी । क्योंकि भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था । इतिहास का एक अन्य उदाहरण कृष्ण व द्रोपदी को माना जाता है । कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था । युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था । इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया ।
तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था । वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी । और तभी से यह परम्परा आज तक अनवरत रूप से जारी है ।
हरियाली तीज
तीज का त्यौहार नेपाल और भारत के कोने–कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है । यह त्यौहार नेपाल के तराई और भारत के उत्तरी क्षेत्र में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है । सावन का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुनाने लगता है समस्त सृष्टि सावन के अद्भुत सौंदर्य में भिगी हुई सी नजÞर आती है । सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज के रूप में मनाया जाता है । यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है । यह त्यौहार मुख्यत ः स्त्रियों का त्यौहार माना जाता है ।
हाथों में रची मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती इस न्यनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वतः ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है, इस अवसर पर स्त्रियाँ गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और नाचती हैं । इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं ।
इस समय वर्ष अपने चरम पर होती है प्रकृति में हर तरफ हरियाली की चादर सी बिछी होती है और शायद इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहा जाता है । सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं । इसे हरियाली तीज के नाम से भी जानते हैं । इस समय प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित हो जाता है जगह–जगह झूले पड़ते हैं और स्त्रियों के समूह गीत गा–गाकर झूला झूलते हैं ।
तीज का पौराणिक महत्त्व
सावन की तीज का पौराणिक महत्व भी है । इस पर एक धार्मिक किवदंती प्रचलित है जिसके अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए इस व्रत का पालन करती हैं और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें भगवान शिव वरदान स्वरुप प्राप्त होते हैं । मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन देवी पार्वती ने सौ वर्षों की तपस्या साधना पश्चात भगवान शिव को पाया था । इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माँ पार्वती का पूजन करती हैं ।
तीज पूजा एवं व्रत
अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिये स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं । इस दिन उपवास कर भगवान शंकर पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर षोडशोपचार पूजन किया जाता है जो रात्रि भर चलता है । सुंदर वस्त्र धारण किये जाते है तथा कदली स्तम्भों से घर को सजाया जाता है । इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है. इस व्रत को करने वालि स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है.
तीज का लोक जीवन पर प्रभाव
तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है. आसमान काले मेघों से आच्छ्दित हो जाता है और वर्षा की बौछर पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है । ऐसे में लोक जीवन में हरियाली तीज या कजली तीज महोत्सव बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है । तीज पर मेहंदी लगाने और झूले झूलने का विशेष महत्त्व रहा है । तीज के समय नवयुवतियाँ हाथों में मेंहदी रचाती हैं तथा लोक गीतों को गाते हुए झूले झूलती हैं । तीज के दिन खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत की कड़ों या बरामदे में कड़ों में झूले लगाए जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं ।
इस अवसर पर विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर नव विवाहिता लड़की को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है विवाहिता स्त्रियों को उनके ससुराल पक्ष की ओर से सिंधारा भिजवाया जाता है जिसमें वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई इत्यादि सामान भेजा जाता है । आज के समय में तीज का स्वरुप विकृत होता जा रहा है । महिलाएँ श्रद्धा और पूजा की जगह दिखावे को ज्यादा अपनाने लगी हैं । गहनों और साडि़यों की प्रतिस्पद्र्धा अधिक होती है । संस्कृति और परम्परा की सुरक्षा के लिए इन सभी आडम्बरों से बचना आवश्यक है ।

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