Sun. Nov 18th, 2018

नेपाल और गैर आवासीय नेपाली : श्यामानन्द सुमन

हिमलिनी, अंक अक्टूबर 2018 । किसी भी देश की आर्थिक कुटनीति एक बहुआयिमक क्रियाकलाप होता है । इसमें सरकारी निकायों के अलावा गैर सरकारी संस्थान÷संगठन, उद्योग–वाणिज्य समाज, सामाजिक–आर्थिक–सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ साथ उस देश के विकास में गैरआवासीय समाज का बहुत बडा योगदान होता हे । खास कर नेपाल के सन्दर्भ में देखा जाए तो गैर आवासीय समाज का महत्व और योगदान और भी बढ़ जाता है । वैसे गैर आवासीय नेपाली का कन्सेप्ट नेपाल के लिए बहुत नयां है । सच कहा जाए तो नेपाली युवा सन् १९९० के दशक से कन्सीडोरेबुल नम्बर में विदेश जाने लगे हैं । उससे पहले छिटफुट रुप से कुछ ही लोग व्यक्तिगत तवर में जा पाते थे । और वे भी अमरिका, वेलायत आदि विकसित देशों मे ज्यादातर उच्च अध्ययन के लिए जाते और वही नौकरी पाकर रह जाते । गैर आवासीय नेपाली के रुप में आम युवा १९९० के दशक से जाना शुरु किया– खासकर गल्फ कन्ट्रीज में । इस तरह का फेनोमेना आर्थिक ‘पुस एण्ड पुल’ के आधार पर होता है । गरीब देशों से लोग धनी देशों में रोजगारी के लिए जाते हैं । सबको मालूम है कि नेपाल एक अल्पविकसित राष्ट्र है और गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि से जूझ रहा है । भले ही अब समृद्ध नेपाल, सुखी नेपाली का नारा चल रहा है । पर पता नहीं कब तक यह सपना साकार होगा । फिलहाल नेपाली के लिए वैदेशिक रोजगारी एक आवश्यकता ही नहीं बल्कि एक बाध्यता हो गई ।
वैदेशिक रोजगारी
सन् १९९० के दशक में ‘कोल्ड वार’ की समाप्ति और आर्थिक उदारीकरण दुनियाभर में शुरु हुई । बहुत सारे देश आर्थिक मंदी से उभर कर विकास की तेज गति से आगे बढ़ने लगे । पर उन्हें मानव संशाधन की कमी महसूस हुई । इस वजह से सम्पन्न और नव धनाढ्य देशों ने गरीब देशों के युवाओं के लिए अपना द्वार खोल दिया । तत्कालीन समय में नेपाल की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब थी ओर उस पर से तत्कालीन माओवादी आन्दोलन ने देश को और जर्जर कर दिया । फलस्वरुप नेपाली युवाओं को वैदेशिक रोजगारी में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था । उस सिचुएसन में नेपाल के युवा भी काफी तादात में वैदेशिक रोजगारी में जाने लगे खासकर गल्फ कन्ट्रीज में । बाद में मलेसिया, कोरिया आदि देशों से डिमाण्ड आने लगा और नेपाली उस ओर भी अग्रसर होने लगे । सन् १९५० से पहले नेपालियों का भारत के अलावा अन्य देशों में रोजगारी के लिए जाना कठीन भी था । वह इस कारण कि उस समय नेपाल में राजशाही द्वारा संचालित पंचायती शासन व्यवस्था, एक तरह से डिक्टेरशीप थी । और उस समय सामान्य व्यक्ति, युवा के लिए पासपोर्ट लेना आसान काम नहीं था । पर जब १९९० में जनआनदोलन द्वारा पंचायत व्यवस्था का अन्त होकर प्रजातान्त्रिक व्यवस्था आया तो पासपोर्ट लेना आसान हो गया ओर उस समय विभिन्न देशों से रोजगारी के अवसर भी प्राप्त होने लगे । इस तरह वैदेशिक रोजागरुी में नेपाली युवा का तादात दिन प्रति दिन बढने लगा । अभी अनुमान लगाया जाता है कि सरकारी और्गनाइज्ड सेक्टर और व्यक्तिगत अर्गनाइज्ड सेक्टर मिलाकर करीब ५० लाख नेपाली विदेश में काम कर रहे हैं । और यह सेक्टर अर्थात् वैदेशिक रोजगारी देश की आर्थिक स्थिति का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पीलर बन गया है । नेपाल के जी.डी.पी. में यह सेक्टर ३० प्रतिशत से ज्यादा ही रेमिटेंस मार्फत राष्ट्र सेवा कर रहा है ।
जब नेपाल में आर्थिक कुटनीति की बातें आती भी तो गैर आवासीय नेपाली की सिर्फ चर्चा होती थी पर उसके योगदान या उसके भविष्य के रोल के विस्तृत विवरण की कोई खाका नहीं दिया जाता था । यह संगठित सेक्टर तब बना, जब सन् १९८५ में वैदेशिक रोजगारी संबंधी कानून का निर्माण हुआ पर जब १९९० में प्रजातन्त्र की स्थापना हुई, उसके बाद ही कुछ सब्सटान्सीयल नम्बर में युवा संगठित रुप से जाने लगे । यहां एक बात कह देना जरुरी समझता हूं । नेपाल का वर्तमान भौगोलिक सीमा वृटिश इण्डिया के समय में सन् १९१६ के सुगौली सन्धी के द्वारा कायम हुआ । उस संधी के मुताबिक नेपाली युवाओं को वृटिश सेना के रुप में (मर्सेनरी सोल्जर) काम करने के लिए कहा गया जो व्यवस्था आज तक कायम है । अंग्रेजो के भारत छोड़ने के बाद भी यह सिलसिला भारतीय सेना में गोरखा सैनिक के नाम से भर्ती होते है और उनका अलग रेजिमेन्ट रहता है । एक स्मरणीय घटना कहें या परिघटना,फोकलैण्ड आइलैण्ड के लिए जब बृटेन का झगडा अर्जेन्टिना के साथ चल रहा था, और भारत के कारगील में जब पाकिस्तान के साथ अक्कुपेशन के लिए लडाई चली तो गोरखाली सैनिकों का योगदान बृटेन और भारत के लिए क्रमशः अत्यन्त क्रुशियल और सरहानीय रहा । यहां यह उल्लेख करना इसीलिए आवश्यक है कि दो सौ साल से होने वाला यह वैदेशिक रोजगारी विशेष किस्म के संधी के अन्तर्गत हुआ और यह सिर्फ सेना संबंधी खास परपस के और विशेष राष्ट्र के लिए ही हुआ था । राष्ट्र के लिए ही हुआ था । और इसे आम रुप का वैदेशिक रोजगारी नहीं समझना चाहिए । इसका विस्तृत विवरण देना यहा. आवश्यक नहीं है । आम परिभाषा के अनुसार वैदेशिक रोजगारी का व्यवस्थित शुरुआत जैसा कि पहले कहा जा चुका है, १९९० के दशक से प्रारम्भ होता है ।
सन् २००० तक नेपालियों की संख्या वैदेशिक रोजगारी में काफी बढ़ गई थी । गल्फ देशों में खासकर और मलेसिया तथा कोरिया में हजारों की संख्या में डिमाण्ड आने लगा और एक–डेढ हजार नेपाली युवा प्रति दिन जाने लगें । युरोप, अमेरिका, जपान, अस्ट्रेलिया आदि अन्य विकसित देशों ने भी अपने अध्यागमन कानून में कुछ ढिलाई दी और नेपाली उन देशों में जाने लगे । यह यहां उल्लेखनीय है कि विकसित देशों में जानेवाले पढ़े–लिखे यानी स्कील्ड युवा होते थे जबकि गल्फ या यों कहें कि मिडलइस्ट तथा मलेसिया आदि देशों में जानेवाले ९०–९५ प्रतिशत युवा अनस्कील्ड, अशिक्षित तथा अल्पिशिक्षित युवा लेवर कैटगोरी में जाने लगे । यह ट्रेण्ड अभी भी जारी है । वे संगठित क्षेत्र यानी मैनपावर कम्पनियों और कुछ संख्या में व्यक्तिगत प्रयासों से भी जाते हें । इसमें पुरुष और महिला दोनों की संख्या बढ़ती जा रही है । कहा जाता है कि अब तक गैर आवासीय नेपालियों की संख्या ५० लाख के करीब पहुँच चुका है ।
एन.आर.एन का कन्सेप्ट
जैसे–जैसे विदेश में नेपालियों की संखया बढ़ी, वैसे अनेक तरह के समस्या भी उत्पन्न होने लगे । सारे समस्याओं को हल करना सरकार के लिए भी मुश्कील हो रहा था । साथ ही वैदेशिक रोजागरी में गए नेपालियों के व्यवहारिक ज्ञान, दक्षता, विदेशषज्ञता तथा उनके आर्थिक रिसोर्सेज का उपयोग नेपाल के लिए कैसे किया जा, इन सब बातों में विभिन्न विकसित राष्ट्रों में रह रहे नेपालियों ने सोचना शुरु किया । आपसी विचार–विमर्श में उन लोगों ने प्रवासी नेपालियों का कोई मंच या संगठन की आवश्यकता महसुस करने लगे । संसार भर से इन बातों का नेपालियों के बीच सम्पर्क हुआ और एक संगठित संस्था का निर्माण हुआ । सन् २००६ अक्टोबर ११ के दिन काठमांडू में एन.आरंएन. एसोसियशन की स्थापना हुई । संसार भर के नेपालियों के प्रतिनिधि काठमांडू आए और नेपाल सरकार की उपस्थिति में इस संगठन का निर्माण हुआ । तब से यह संगठन नेपाल और नेपालियों के हकहित में काम करने लगा । इस गैर आवासीय नेपाली संगठन (एनआरएन) के तत्वधान में अन्य राष्ट्रों में जहां काफी संख्या में नेपाली हैं, वहा भी नेशनल कोऑर्डिनेशन काउन्सील की स्थापना हुई और अब इसकी संख्या भी करबि ७० तक पहुँच गई है । इस संगठन के मुख्य रुप से निम्न उद्देश्य गिनाए जा सकते हैं–

१. विदेश में रह रहे नेपालियों के हकहित का ख्याल रखना और उसे संरक्षण देना ।
२. संसार भर के नेपालियों को एक साथ जोडना ओर उसके प्रतिनिधित्व को एक संयुक्त प्लेटफाम पर लाना । तथा उनके बीच पारस्परिक सहयोग तथा सद्भाव की अभिवृद्धि करना ।
३. नेपाल के आर्थिक–सामाजिक विकास में विदेश में रह रहे नेपालिायै. के ज्ञान, सीप, प्रविधि तथा आर्थिक एवं अन्य संशासधनों को मोबीलाइज करना ।
४. नेपाली संस्कृति और नेपालीपन को संसार भर प्रवद्र्धन कर नेपाल के टुरिज्म उद्योग में सहयोग पहुँचाना ।
५. नेपाल के विकास के लिए विदेश से फाइनासियल डाइरेक्ट इन्भेष्टमेन्ट (एफ.डी.आई) लाने में कैटेलिस्ट का रोल अदा करना ।
गैर आवासीय नेपाली के महत्व और उसके योगदान को ध्यान में रखते हुए नेपाल सरकार ने सन् २००७ में एक ऐन और २००९ में एक नियमवली का निर्माण किया जो विश्व भर में रह रहे नेपालियों के नेटवर्किग को संगठित रुप से संचालित करता है । इसी ऐन नियम के द्वारा गैर आवासीय नेपाली को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार सार्क राष्ट्र के अलवा जो नेपाली कम से कम दो वर्ष अन्य राष्ट्र में रहता है, उसे गैर आवासीय नेपाली कहा जाता है । इसमें भी दो कैटेगोरी के प्रवासी नेपालियों का प्रावधान किया गया है । एक वे नेपाली, जो नेपाली नागरिकता के साथ विदेश में रहते हैं, और दूसरे वे जो विदेश की नागरिकता लेकर रहते हैं । नेपाली कानुन के हिसाब से जो विदेश की नागरिकता लेते है, उनका नेपाली नागरिकता स्वतः खत्म हो जाता है । इसतरह उन्हें नेपाली मूल के व्यक्ति (पर्सन अ‘फ नेपलिज ओरिजीन) कहा जाता है । दोनों क्याटोगोरी के प्रवासी व्यक्तियों का परिचयपत्र अलग–अलग किस्म का होता है । दोनों के परिचयपत्र के समय–सीमा में भी फरक होता है । नेपाली मूल के विदेशी नागरिक को १० वर्ष तक का और नेपाली नागरिक को २ वर्षा अवधिवाला परिचयपत्र दिया जाता है । और दोनों रिनुएबुल होता है । एक बात और कि नेपाल सरकार के काम के सिलसिले में विदेश में रह रहे कर्मचारी और अध्ययन के सिलसिल में रहे रहे विद्यार्थी को गैर आवासीय नेपाली नहीं कहा जा सकता है । किसी पेशा, व्यवसाय और रोजगारी में रह रहे नेपाली ही इस कैटेगोरी में आ सकते हैं । और पहले ही कहा जा चुका है कि सार्क राष्ट्रों में रह रहे नेपाली भी गैर आवासीय नेपाली नहीं हो सकते हैं । इस आधार को जानते हुए दुनियां भर से आए हुए गैर आवासीय नेपालियों ने गैर आवासीय नेपाली संगठन को वि.सं. २०७० कार्तिक ३ के दिन परराष्ट्र मन्त्रालय में दर्ता करा चुके हैं । इस तरह परराष्ट्र मन्त्रालय के रेकर्ड के अनुसार वि.सं. २०६६ से अब तक नेपाली मूल के विदेशी नागरिक ४१८ लोगों ने और विदेश में रह रहे नेपाली नागरिकतावाले ५६ लोगों ने अपना परिचयपत्र परराष्ट्र मन्त्रालय से बनवाया है । साथ ही विदेश स्थित नियोगों से परिचयपत्र लेनेवाले लोगों का रेकर्ड के अनुसार विदेशी नागरिकता वाले जममा ४२३ और नेपाली नागरिकतावाले जमा ४५ मात्र ने परिचयपत्र लिया है । उपरोक्त ४२३ संख्या में ज्यादा युएसए २०३ है । और इसीतरह युके ३८, अस्ट्रेलिया ३३, जर्मनी १८, हङकङ १५, दक्षिण कोरिया १४ और इसीतरह घटते क्रम में कई देशों के नियोगों से परिचयपत्र लिया है । साथ ही नेपाली नागरिकता वालों ने सबसे ज्यादा जापान ९, युएई ६, सिंगापुर ३, कतार ३, हङकङ ३, ताइवान २, अन्य स्थानों से १–१ मिलाकर जमा ४५ ने अपना परिचयपत्र लिया है ।
उपरोक्त आंकडों को देखने से पता चलता है कि संसार भर करीब ५० लाख गैरआवासीय नेपाली होने के बावजूद, परराष्ट्र मन्त्रालय और नियोगों से विदेशी और नेपाली नागरिकतावाला सिर्फ ९४२ अर्थात् १ हजार से भी कम अपना परिचयपत्र लिया है । इसके लिए अन्य बातों के अलवा गैर आवासीय नेपाली के रुप में रहनेवालों में ९०–९५ प्रतिशत लोग अशिक्षित वा कम शिक्षित लेबर क्याटगोरी में होना है । इसमें से ज्यादातर लोगों को एनआरएन के बारे में न जानकारी होगी और न उन्हें मतलव ही रहता होगा । जो उच्च शिक्षा प्राप्त और जिनकी कमाई उच्च दर्जे की होगी, उन्ही को इन्ट्रेस्ट रहता होगा । दूसरी बात, खासकर विदेश स्थित कुटनीतिक नियोगों के क्रियाकलाप और परिचयपत्र संबंधी जानकारी और वितरण की व्यवस्थापर भी कुछ हद तक निर्भर करता है । तीसरी बात, लेबर क्याटोगोरी के लोग जो दो–चार साल में लौट कर नेपाली आनेवाले होते हैं, वे इस बारे में अपना सोच नहीं बना पाते होंगे ? पर विकसित देशों में रहनेवाले अधिक शिक्षित और अधिक कमाईवाले हैं, उनमें भी रजिष्टर होने में खास उत्साह नहीं दिखता है । शायद नेपाल के अ‘फिसियल चैनल में भी इस को इतना महत्व नहीं दिया जाता है । जितना होना चाहिए । एसिया के कई मुल्कों में तो गैर आवासीय नागरिकों के हकहित की रक्षा और उसके परिचालन÷प्रबंधन के लिए अलग मन्त्रालय और अलग मन्त्री भी होते हैं । पर नेपाल में परराष्ट्र मन्त्रालय के अन्तर्गत एक महाशाखा के अन्दर एक छोटा–सा नाम देकर एनआरएन का संचालन होता है ।
सुविधा तथा सहुलियत
गैर आवासीय नेपाली के लिए नेपाल सरकार ने कुछ सुविधा तथा सहुलियत की व्यवस्था ऐन–कानुन द्वारा ही किया है । विदेश में आर्जन किए हुए पुँजी को नेपाल ला सकता है और उससे प्राप्त लाभ को भी अपने आवश्यकता अनुसार विदेशी मुद्रा में फिर्ता ले जा सकता है । साथ ही नेपाल के किसी भी परिवर्त मुद्रा में किसी भी बैंक में खाता खोल सकता है । कानुन में उद्धृत सिलिंग के हिसाब से अचल सम्पत्ति भी खरीद कर सकता है । जैसे, काठमांडू में दो रोपनी, तराई के नगरपालिका में ८ कठ्ठा, अन्य नगरपालिका में ४ रोपनी, तराई के गांवपालिका में १ बिघा और अन्य क्षेत्र में १० रोपनी जमीन और साथ ही मकान खरीद कर सकता है । इसके अलवा लगानी के परिभाषा के अन्तर्गत कानुन में उद्धृत उद्योग की स्थापना, कोई खास शिषेशता, फर्मुला प्रक्रिया, पेटेन्ट, ट्रेडमार्क या प्राविधिक शीप और ज्ञान का हस्तान्तरण और प्राविधिक सल्लाहकार एवं व्यवस्थापन सेवा का प्रावधान भी है ।
समस्या तथा सम्भावना
अगर समस्टिगत रुप से देखा जाए तो गैर आवसीय नेपाली के आर्थिक उपलब्धी देश की आर्थिक अवस्था को सुधारने में काफी मद्दत करता है । देश की गरीब न्यूनीकरण में सरकार के भागीदारी और सहयोगी का काम करता है । इस लेख में पहले ही उल्लेख किया जा चुका है कि जीडिपी में वैदेशिक रोजगारी से आए रेमिटैन्स का योगदान करीब एक तिहाई रहा है । फिर भी रेमिटैन्स के व्यवस्थापन को सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता । जिस परिमाण में रेमिटैन्स देश में आता है, उसके रेसियों में देश विकास के कामों में उन रकमों को नहीं लगाया जाता है । ज्यादातर खर्च अनुत्पादक कामों और घरायसी कन्जुमर प्रोडक्स में होता है । जैसे खानापीना, जमीन खरीदना, मकान बनाना और उसकी मर्मत और सजावट, कर्जे की अदाएगी, कुछ बैंक में रखना और थोड़ा व्यापार और पार्टी प्यैलेस में लगाना । वैसे माइक्रो लेभल में देखा जाए तो व्यक्ति विशेष के लिए उपरोक्त खर्च सेफ साइड में होगा । पर अगर राष्ट्र के म्याक्रो इकोनोभिक दृष्टिकोण से उस खर्च को अनुत्पादक सम्पत्ति कहा जाएगा । जिसका राष्ट्र के असली आमदनी में नहीं जोड़ा जा सकता है । वह इसलिए भी कि ज्यादा तर प्रोडक्स विदेश से आयात हुए होते हैं और रेमिट्यान्स से प्राप्त रकम का ज्यादा तर हिस्सा फिर लौटकर विदेश ही चला जाता है । यह फेनोमेना नेपाल जैसे अति कम विकसित राष्ट्र के लिए आम बाद होती है । व्यक्तियों और परिवारों के प्रिफरेन्स के सारे प्रोडक्स नेपाल में ही नहीं बनते हैं, उसे विदेशों से आयात किया जाता है । अतः नेपाल के लिए यह जरुरी है कि एक ऐसा स्ट्रेटेजिक म्यानेजमेन्ट पॉलिसी बनाए, जिससे रेमिटैन्स को प्रोडक्टिभ सेक्टर में लगाया जाए । इसमें कृषि, म्यानुफैक्चरिङ, इन्फ्राइस्क्चर, ऊर्जा आदि सेक्टर आता है ।
देश की आर्थिक स्थिति के अध्ययन करनेवालों का कहना है कि रेमिट्यान्स से जो रकम देश में आता है, उसका १० प्रतिशत से भी कम बचत होता है, जो प्रोडक्टिभ सेक्टर में लगाया जा सके । यह तथ्यांक एसिया के अन्य देशों के तुलना में बहुत ही कम है । इसका मुख्य कारण अधिकतर नेपाली जो वैदेशिक रोजगारी में जाते हैं, वे लेबर क्याटोगोरी में होते हैं, उनका आमदनी भी कम होता है । उसके साथ ही उनके व्यक्तिगत और परिवारिक खर्चे के मार्जिनल प्रोपेनसिटी अधिक होती है । बहुत थोड़ा ही बचत रकम उत्पादनमुलक सेक्टर में लगा पाते हैं । यह स्थिति या घटना मल्टि–डाइमेशनल है । सिर्फ वैदेशिक रोजगारी में गए व्यक्तियों के हाथ में ही सब नहीं है । इस फेनोमेना से संबंधित अन्य सभी स्टेकहोल्डर के कोअर्डिनेटेड प्रयास को बढ़ावा देखकर स्थिति में सुधार हो सकता है । सबसे पहले सरकारी नीतिगत प्रयास अर्थात् उचित और सम्यक नियम–कानुन का होना आवश्यक है । साथ ही फाइनाइसियल इस्टिच्युशनल, सामाजिक आर्थिक संस्था, नागरिक समाज और यहां तक कि व्यक्तिगत रुप से सामाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी इस मामले में इनीसिएटिभ लेना चाहिए । सभी सरोकारवाला पक्ष को मिलकर बचत और उत्पादनमुलक कार्यों में लगानी करने के फाइदे को प्रशारित करना चाहिए । इसी तरह सरकार को भी चाहिए कि उच्च आमदनी प्राप्त करने के लिए खासकर गैर आवासीय नेपाली के लिए रेमिट्यान्स बण्ड्स, मुचुवल फण्ड्स आदि का उचित व्यवस्थापन करें । वल्र्ड बैंक के एक अध्ययन के अनुसार एफ.डि.आई. के तुलना में रेमिट्यान्स अच्छा विकल्प माना जा सकता है । बसर्ते कि उत्पादनमुलक क्षेत्र में लगाया जाए । यह वैदेशिक मुद्रा संचय को बढ़ाता है । और आयात–निर्यात सन्तुलन को सुधारता है । साथ ही देश के गरीबी को कम करते हुए आम जनता के जीवन की गुणस्तर में वृद्धि करती है ।
जो भी हो, नेपाल के सन्दर्भ में एन.आर.एन. के लगानी को सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता । कई किस्म के सम्भावनाओं के होते हुए भी लगानी की मात्रा बहुत कम दिखता है । इसका सबसे बड़ा कारण है, सरकार और सरकारी नीतियों में विश्वास नहीं होना । राजनीतिक अस्थिरता और कामदारों का युनियनबाजी, दीर्घकालीन लगानी को अनुत्साहित करते हैं । दूसरा कारण, प्राविधिक रुप से शिक्षित, मानव संशाधन की भी कमी है । साथ ही सरकारी ढिलासुस्ती और सरकार द्वारा बारम्बार प्रचार के बावजूद एकद्वारा प्र्रणाली का नहीं होना भी लगानी करनेवालों को निरुत्साहित करते हैं । भौतिक संरचनात्मक विकास की कमी और कमिसन का खेल ‘भ्रष्टाचार’ भी इसमें शामील किया जा सकता है । दोहोरो कर प्रणाली भी एक अलग आयाम है । उपरोक्त वर्णित समस्याओं के चलते एन.आर.एन. के लगानी को आवश्यक मात्रा में ले आना एक टेढी खीर साबित हो रहा है । हांलाकि अभी एक पंचवर्षीय स्थायी सरकार आई है, ऊर्जा में भी सुधार हुआ है, सरकारी नीति–नियमों को रिभ्यु किया जा रहा है । पर यह सारी बातें, अभी सौद्धान्तिक है । निकट भविष्य में और सुदूर भविष्य में इन सब बातों का कार्यान्वयन कैसे होता है, यह देखना अभी बांकी है । सरकार ने एक लगानी बोर्ड की स्थापना की है । पर यह भी हाथि के दिखाने की दांत ही साबित हुआ है । आवश्यकता है– एन.आर.एन. के मनोवैज्ञानिक सन्तोष की जिससे प्रभावित होकर रियल टर्म में उनका अधिकतम लगानी नेपाल के सामाजिक, आर्थिक रुपान्तरण के काम आ सके ।
आर्थिक योगदान
पिछले कुछ सालों से प्रवासी नेपालियों का आर्थिक योगदान प्राप्त हो रहा है । पर यह अत्यन्त न्यून है । वह भी ज्यादा तर सामाजिक क्रियाकलाप में आता है । जैसे प्राकृतिक विपदा के समय का योगदान हाल में सिरहा और ललितपुर में हस्पिटल, पशुपति में क्रियापुत्री भवन, अभिभावक विहीन बच्चों के लिए अवास गृह आदि में योगदान हुआ है । वैसे यह सब काम व्यक्तिगत रुप से हुआ है और सभी का एकत्रित आंकडा नहीं आ रहा है । विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब दो अरब रुपयों की प्रतिबद्धता प्राप्त हुई है । पर वास्तविक रुप कितने रकम आए हैं, या आएंगे, इसका पता नहीं चल पा रहा है । एक सकारात्मक पक्ष यह है कि एनआरएन के तत्वाधान में कंपनी ऐन के अन्तर्गत आर्थिक योगदान को चैनलाइज करने के लिए एक एनआरएन इन्भेष्टमेन्ट लिमिटेड नामक कम्पनी सन् २०१२ में दर्ता हुआ, पर इसका भी काम पूरे दक्षता से नहीं हो पा रहा है । भविष्य में कुछ अच्छा होने की उम्मीद की जा सकती है ।
अन्त में
एक सकारात्मक पक्ष में एन.आर.एन. के विदेशी पासपोर्टवालों को नेपाली पासपोर्ट भी उपलब्ध कराने की बात आई है । इस संबंधी एक बील संसद में प्रस्तावित है । इस्के अन्तर्गत नेपाल के राजनीति में भाग लेने के अलावा अन्य सभी अधिकार उन्हें प्राप्त होंगे । इससे उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार मिलेगा । जिससे वे आर्थिक रुप से खुलकर अधिकतम रुप में लगानी कर सकेंगे । इसके साथ ही एनआरएन संबंधी ऐन में सल्लाहकार समिति का जो प्रावधान है, उसको भी जल्द से जल्द कार्यान्वयन में लाना चाहिए । इससे सरकार और एन.आर.एन के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बन कर समन्वय बढ़ेगा और लगानी में वृद्धि होगी । सरकार के तरफ से लगानी करनेवाले सभी को सीआईपी (कमर्सियल इम्पोटेंट पर्सन) कार्ड प्रदान होना चाहिए । इससे लगानीकर्ता को एक और आत्मसन्तुष्टि मिलेगी और एक मनोवैज्ञानिक स्टेटस मिलेगा, जिससे वे अधिक से अधिक मात्रा में आर्थिक योगदान कर नेपाल के चौतरफी विकास में सहभागी हो सकेंगे ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of