Tue. Dec 11th, 2018

बालिका बलात्कृत एक दो नहीं अनगिनत घटनाएँ हैं जो मानवता को शर्मसार करती है : श्वेता दीप्ति

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

बेटियों को ही नहीं अपने बेटों को यह शिक्षा देनी होगी कि वो नारी को वह सम्मान दे

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक अगस्त २०१८ | कंचनपुर की घटना ने एक बार फिर से मानवता को शर्मसार कर दिया है । विगत के कुछ समाचार पर एक नजर जो निश्चय ही आपकी रूह को कँपाएगी । बारा सदरमुकाम कलैया की छ वर्षीया बालिका बलात्कृत होती है, बलात्कारी २८ वर्षीय युवक है । बलात्कार के बाद बलात्कारी प्राइवेट पार्ट में लकड़ी डालता है और यह कुकृत्य बालिका को मौत के मुँह में ले जाती है, क्या इस अपराधी को नपुंसक बनाकर तड़पा कर मौत की सजा नहीं देनी चाहिए ? वर्षों पहले ५० वर्ष का मानवबहादुर बुढाथोकी, जिसे औरत को देखते ही छटपटाहट होने लगती थी, बलात्कार और हत्या के आरोप में जलेश्वर कारागार में सजा काट रहा है जिस पर छः महिला की बलात्कार के बाद हत्या और २६ महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप है । कानूनी दुर्भाग्य यह कि जिसके लिए मौत की सजा भी कम थी वह जीवित है । सभ्य कहलाने वाले समाज का एक और नमूना ४३ वर्षीय पवन विष्ट जो भक्तपुर का है और बेल्जियम के ब्रुसेल्स में रहता था और जो रोज अपनी ही १३ वर्षीया बेटी का बलात्कार करता था । जिसे उसकी पत्नी ने ही पकड़ा, क्या इसके लिए मौत की सजा भी कम नहीं है ? खोटांग की ८ वर्षीया बालिका बलात्कार की शिकार होती है अपने ही काका १६ वर्षीय जिउधन राइ के द्वारा जो बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर देता है । एक दो नहीं ऐसी अनगिनत घटनाएँ हैं जो मानवता को शर्मसार करती है ।

एक नजर विगत के आँकड़े पर

एक वर्ष पूर्व का सरकारी आँकड़ा कहता है कि बीते ७ वर्ष में ६ हजार ६ सौ २७ पीडि़ता बलात्कार की शिकार हुई हैं । जिसमें ४ हजार ५ सौ ८९ का बलात्कार के बाद उद्धार किया गया । २ हजार ३८ पीडि़ता का बलात्कार के बाद हत्या का रिकार्ड प्रहरी कार्यालय में है । प्रत्येक वर्ष ९ सौ ४६ तथा प्रत्येक महीने ७८ महिला बलात्कार का शिकार होती हैं यह रिपोर्ट में उल्लेख है ।
तराई तथा विकट ग्रामीण क्षेत्र में बलात्कार की घटना बढ़ रही है लेकिन सामने हर घटना आ नहीं पाती । जिसका कारण सामाजिक बदनामी और आर्थिक कमजोरी होती है ।
एक तथ्याङ्क बताता है कि बलात्कार की घटना की जितनी ही शिकायत सम्बन्धित निकाय में हो रही है उससे अधिक बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि हो रही है । तथ्याङ्क कहता है कि पूर्वी नेपाल में सबसे अधिक १ हजार ३ सौ ४३ बलात्कार तथा ५ सौ ८९ की बलात्कार के बाद हत्या की गई है । इसी तरह पश्चिम नेपाल में २ सौ ७७ बलात्कार की शिकार हुई हैं तो १३८ की बलात्कार पश्चात हत्या की गई है । काठमाडौं में ही सिर्फ ६ सौ १० बलात्कार की शिकायत दर्ज हुई है तो १ सौ ५५ की बलात्कार पश्चात हत्या का तथ्यांक में उल्लेख है । आँकड़े पुराने जरुर हैं पर समाज का भयावह सच यही है और इस भयावहता का आँकड़ा बढ़ता है जा रहा है ।
आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज ? क्या हम सचमुच सभ्य समाज में साँस ले रहे हैं ? क्या अपनी ही परम्परा और संस्कृति, जिसमें नारी को देवीतुल्य माना गया है, उसकी ही नीलामी कर चुके हैं ? क्या हमारी परवरिश में कमी हो रही है ? उससे भी अधिक अगर शर्मनाक कुछ है तो वह है मौन समाज, स्वार्थी राजनीति और राजनीतिज्ञ, कायर संघ संस्थाएँ और नपुंसक कानून । आँकड़ा बताता है कि नेपाल में हर रोज तीन से अधिक बलात्कार की घटना होती है । जबकि गौर किया जाय तो यह आँकड़ा इससे भी अधिक जा सकता है । क्योंकि बच्चियाँ अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं और यौन शोषण के घरेलु मामले अक्सर घर में ही दबा दिए जाते हैं । चाचा, काका, दादा, नाना, मामा, भाई ये सारे रिश्ते गाली बनते जा रहे हैं और इस हालात में तो सभ्य मनुष्य होने के दावे खोखले नजर आते हैं, जब बेटियाँ अपने पिता से बलात्कृत होती हैं । कहाँ सुरक्षित हैं बेटियाँ ? आखिर कहाँ चूक रहे हैं हम ? युवा होने की देहरी पर खड़ा बालक हो, व्यस्क हो, अधेड़ हो या बुजुर्ग हों आखिर इनकी यौन लिप्सा क्यों इन्हें हैवान बना देती है ? क्यों आग लग जाती है उनके अंगों में, जिसे ठंडा करने के लिए ये नैतिकता, मानवता और यहाँ तक कि रिश्तों की भी बलि चढ़ा देते हैं ? यहाँ सिर्फ प्रश्न है खुद से, समाज से, शासक से और इन नरपिशाचों से भी जिसने उसी कोख से जन्म लिया है और उसी स्तन का दूध पिया है जिसके लिए ये हैवान हो जाते हैं ।
आज जब समाज बेटे–बेटियों में फर्क कम करने लगा है तो स्वाभाविक तौर पर बेटियाँ दहलीज पार करती हैं, समाज के हर तबके के लोगों से उनका सम्पर्क होता है, बाहरी दुनिया से वो परिचित होती हैं, किन्तु वो कहाँ समझ पाती हैं कि इनमें से ही कोई दरिंदा उस पर अपनी कुत्सित नजर जमाए बैठा है जो अवसर मिलते ही उसे नोंचने को और भोगने को तैयार है ? खुलापन और आधुनिकता इस अंध यौन लिप्सा के सामने असहाय क्यों हैं ? पहले किशोर किशारियों के आपस में न मिल पाने को दोष दिया जाता था, तो अब कहा जा रहा है कि युवतियां बिंदास व उन्मुक्त हो रही हैं तथा युवाओं से अधिक घुलमिल रही हैं, जिस कारण वे कभी रेप तो कभी गैंगरेप या फिर कभी अपने ही किसी रिश्तेदार की शिकार हो जाती हैं । कितनी खोखली दलील है ये । अगर वस्त्र और जवानी इन बलात्कारियों को बलात्कार के लिए उकसाती है तो ५ माह या, ५ महीने की बच्चियाँ इन्हें क्यों आकर्षित करती हैं ? सीधा सा जवाब है कि इनकी विकृत मानसिकता इन्हें उकसाती है जहाँ सिर्फ उन्हें वो माध्यम चाहिए जहाँ वो खुद को ठंडा करना चाहते हैं ।
आज नेपाल की राजधानी सुरक्षित नहीं है तो दूर दराज के शहर या गाँव कहाँ से सुरक्षित होंगे । पहले केंद्र सरकार थी पर अब देश में राज्य सरकार अस्तित्व में हैं किन्तु बलात्कार से सम्बन्धित हमारे यहाँ कानून इतने कमजोर हैं कि उससे डर हो ही नहीं सकता । साथ ही बलात्कार करने वाला पक्ष कभी–कभी इतना प्रभावशाली होता है कि केस दर्ज होने से पहले उसे निपटा दिया जाता है । पुलिस की उपस्थिति में मिलापत्र के द्वारा पीडि़त पक्ष का मुँह बन्द कर दिया जाता है । सरकार के पास वर्तमान युवा पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए न तो कोई योजना है और न ही सामाजिक संस्कार व रोजगार देने की कोई व्यवस्था । कुछ लोग इन सबके पीछे आधुनिकता का हवाला देते हैं और कोसते हैं जो कि हकीकत से कोसों दूर है, क्योंकि बलात्कार अनादिकाल से अस्तित्व में रहा है ।
कुछ वर्ष पहले दिल्ली में जब निर्भया हत्याकांड हुआ था तो पूरा विश्व उस नृशंस बलात्कार और हत्याकांड से काँप उठा था । एक चलती बस में उस युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद जिस बर्बरता के साथ उसकी हत्या कर दी गई थी उसने नारी सुरक्षा पर सवाल खड़े करते हुए एक जनांदोलन की शक्ल ले ली थी । नई डाक्यूमेंट्री के तहत उस बस के ड्राइवर मुकेश सिंह के इंटरव्यू ने भारत की पुरुष मानसिकता की कलई खोल दी थी । मुकेश का कहना था कि रात को नौ बजे के बाद सड़क पर अपने दोस्त के साथ घूमने और सिनेमा या डिस्को जाने वाली महिला कतई अच्छी नहीं हो सकती । उसने यहाँ तक कहा कि निर्भया ने अगर चुपचाप रेप करा लिया होता तो उसकी मौत नहीं होती । क्या कहेंगे इस मानसिकता को ? सीधी सी बात है कि औरत को सिर्फ एक शरीर माना जा रहा है जिसे भोगने का पूरा हक पुरुषों को है । उसे चुपचाप उनकी हर बात मान लेनी चाहिए । वह ड्राइवर तो अनपढ था पर एक कटु सत्य तो यह है कि अक्सर पढे लिखे पुरुष भी औरतों को भोगने की चीज ही समझते हैं और ऐसे किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं, जहाँ वो फायदा उठा सकते हों । यह बलात्कार कभी तो मानसिक होता है और कभी शारीरिक । सैक्स सर्वे पर गौर करें तो जो सामने आता है वह यह कि, कुछ पुरुषों को महिलाओं का उन्नत सीना आकर्षित करता है तो कुछ को उन के हिप्स आकर्षित करते हैं । यहां तक कि कुछ पुरुष तो किसी महिला की चाल पर ही फिदा हो जाते हैं और यह कारण बन जाता है बलात्कार का । अब यहाँ महिलाएँ अपनी शारीरिक संरचना तो बदल नहीं सकती तो वो दोषी कैसे हो जाती हैं ? उनका दोष यही है कि वो घर से बाहर पुरुष समाज के साथ उठ बैठ रही हैं । मैं मानती हूँ कि हर बार पुरुष दोषी नहीं होते उन्हें कई बार महिलाएँ यूज करती हैं और उकसाती भी हैं, पर यह सामान्यतया बलात्कार के केस में नहीं होता यहाँ लाभ और हानि को देखकर रिश्ते बनते हैं और खत्म होते हैं ।
बलात्कार में एक वजह परपीड़न की प्रवृत्ति भी है । इस प्रवृत्ति के लोग, दूसरों को कष्ट पहुंचा कर खुद आनंदित होते हैं । अगर सर्वेक्षण किया जाय तो सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं में इस प्रवृत्ति की स्पष्ट झलक मिलती है तभी तो बलात्कार के बाद भी वो हैवानियत का नमूना छोड़ जाते हैं पीडि़ता के शरीर को क्षतविक्षत कर के । इसके पीछे नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक कारण है । नशे का आदी इंसान अपना आपा खो बैठता है तथा उस की यौन उत्तेजना में बढ़ोतरी हो जाती है और अंत एक भयावह दुष्कर्म से होता है । एक मनोवैज्ञानिक कारण भी उभर कर सामने आता है । शहरों में जिस तरह से आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उस से भी आम लोगों में कुंठा बढ़ रही है । कहीं ना कहीं उनकी अपनी सत्ता खतरे में नजर आती है क्योंकि सदियों से पुरुष महिलाओं का शोषण करता आया है । उन्हें भोग की वस्तु माना जाता है । पुरुषों के इस नजरिए के चलते भी महिलाएँ बलात्कार की शिकार होती हैं । किन्तु इसकी संख्या आँकड़ों की दृष्टिकोण से कम है । ग्रामीण पुरुष, मजदूर वर्ग, ड्राइवर से जुड़ी घटनाएँ अधिक सामने आती हैं ।

यौन शिक्षा का अभाव

यह एक शाश्वत सत्य है कि मानव जीवन की एक बुनियादी आवश्यकता है सेक्स । समाज ने इस के लिए विवाह के रूप में एक उचित व्यवस्था की है । जो उच्छृंखलता पर बंदिश लगाने का काम करती है । विवाह के बाद स्त्री व पुरुष दोनों ही अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं, किन्तु आज इन सबका स्वरूप बदल रहा है । वर्तमान में हमारे समाज में युवाओं के मुकाबले युवतियों की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है । शादियाँ देर से हो रही हैं । कुछ युवतियां व युवक शादी के बंधन में बंधना ही नहीं चाहते । वे शिक्षा व रोजगार में स्थायित्व पाने के फेर में भी अपनी सैक्स जैसी बुनियादी आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते या लिव इन रिलेशनशिप के जरिए अपनी जैविक आवश्यकता पूरी करते हैं । पाश्चात्य देशों की इस विकृति ने हमारे समाज को भी प्रभावित किया है । मानसिक कुंठा युवाओं को बीमार कर रही है । जिसका भयावह रूप उन्हें बलात्कारी भी बना रहा है । इतना ही नहीं घटिया शिक्षा पद्धति की वजह से अल्प मानसिक विकास के कारण भी कई युवा ड्रग्स, शराब और ग्लैमर के नशे में बलात्कार को रोमांच का हिस्सा मान लेते हैं । असामान्य यौन प्रवृत्ति के युवक, युवतियों के विरुद्ध हिंसा करने लगते हैं और परिणति बलात्कार के रूप में होता है । पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण पुरुष हमेशा औरतों पर हुकूम चलाने वाली सोच रखते हैं या जो हमेशा यह चाहते हैं कि महिलायें उनके सामने दब कर रहे, और यह सोच कई बार उन्हें इस कुकृत्य के लिए प्रवृत्त कर देता है । क्योकि अगर महिलायें उनकी बात नहीं मानती हैं तो उनको यह अपना अपमान लगता है और वह इसका बदला लेने के लिए यह घिनौना काम भी कर देते हैं ।
एक मानसिक विकृति का खुलासा एक सर्वे में हुआ कि जिन मर्दों की सूरत खराब होती हैं या उनकी सोच विकृत होती है तो इस तरह के पुरुषों को किसी खुबसूरत स्त्री का प्यार नहीं मिल पा रहा होता है । तब अपनी इस कमजोरी के चलते इस तरह के लड़के या पुरुष बीमार मानसिकता के शिकार बन जाते हैं और कामुकता पूर्ति के लिए इस तरह के काम करते हैं ।
कई बार जिन लोगों के दिमाग में २४ घंटे ही सेक्स जैसी चीज या अश्लील विचार चलते रहते हैं उन के लिए बलात्कार एक मजे की चीज होती है ।

समाधान

बलात्कार कैंसर से भी गम्भीर एक रोग बन गया है और इसकी शिकार आए दिन हमारी बेटियाँ या बहनें हो रही हैं । अगर इस सन्दर्भ में यह कहूँ कि कैंसर तो उस मरीज को क्षति पहुंचाती है जो इस बीमारी से ग्रसित है, मगर बलात्कार जैसी घृणित मानसिकता तथा ये जघन्य अपराध पीडि़ता के साथ–साथ पूरे परिवार, समाज तथा देश को क्षति पहुंचाती है तो गलत नहीं होगा ।
हमें अपनी बेटियों को सतर्क करने की आवश्यकता है । उनहें मानसिक और शारीरिक तौर से यह सिखाने की जरुरत है कि वह कमजोर नहीं है उसे ऐसी किसी अनपेक्षित हालात से बहादुरी से लड़ना चाहिए । किसी भी अवांछित हरकत करने वाले शख्स की तुरंत शिकायत करनी चाहिए चाहे वो कोई अपना ही क्यों ना हो । अगर ऐसी किसी दुर्घटना का बदकिस्मती से बेटियाँ शिकार होती हैं तो उनके मनोबल को बनाए रखने की जिम्मेदारी परिवार की है, समाज की है । ऐसी हालत में उन्हें यह समझाना चाहिए कि दोषी वह नहीं है इसलिए लज्जित उसे नहीं होना है बल्कि इस अन्याय से डट कर मुकाबला करना है ।
बेटियों को ही नहीं अपने बेटों को यह शिक्षा देनी होगी कि वो नारी को वह सम्मान दे, जिस की वह हकदार है । हमें युवाओं के मन में यह कूटकूट कर भरना होगा कि एक आदर्श समाज निर्माण के लिए महिलाओं का सम्मान करना अति आवश्यक है । साथ ही सरकारी स्तर पर स्कूलों में नैतिक शिक्षा को लागू करना होगा । क्योंकि कहीं ना कहीं हम अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं । पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण हमारी पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर रही है । अच्छे साहित्य, अच्छे कार्यक्रम की ओर बच्चों को आकर्षित करना, टीवी चैनलों से अधिक खेलकूद की ओर लगाव पैदा करना होगा । बलात्कारी मनोवृत्ति के फैलाव को रोकने के लिए नैतिक शिक्षा का विस्तार व सामाजिक मूल्यों का विकास अति आवश्यक है । सामाजिक मूल्यों के विकास में लोक संस्कृति, इतिहास तथा साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इन को बढ़ावा देना भी जरूरी है । बलात्कारियों के लिए त्वरित अदालत के द्वारा फाँसी की सजा की व्यवस्था की जानी चाहिए । इतना ही नहीं पुरुषों को आगे आना होगा । उन्हें खुलकर महिलाओं के पक्ष में खड़ा होना होगा । तभी इस भयावह समस्या का समाधान सम्भव है ।

 

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