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थारु समुदाय की उत्पति एक सिंहावलोकन : मोहनलाल चौधरी

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | नेपाल अधिराज्य के पुर्व मेची से पश्चिम महाकाली तक तराई के जिला झापा, मोरंङ्, सप्तरी, उदयपुर, सुनसरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा, पर्सा, चितवन, नबलपरासी, रुपन्देही, कपिलवस्तु, बांके, दाङ्ग, बर्दीया, कैलाली, कंचनपुर, प्रत्येक जिला में कुछ कम, कुछ ज्यादा संख्या में थारु समुदाय की उपस्थिति दिखती है । थारु समुदाय की उपस्थिति तराई के उपर्युक्त उल्लेखित जिला के उत्तरी भाग, जहा जंगल है, पानी है, शांत वातावरण है, वहीं थारू की बस्ती रहती है । थारु झगडा–झंझट से दूर प्रकृति की गोद में रहना पसंद करते हैं ।
नेपाल सरकार के २०११ के जनगणना अनुसार थारु समुदाय की जनसंख्या १७,३७,४७० है, लेकिन ये संख्या वास्तविकता से बहुत अलग है । जनसंख्या तथ्यांक संकलन के समय थारु समुदाय में जनचेतना की कमी होने के कारण कोई चौधरी, कोई खां, वंठा, महतो, राउत, दास, पजियार, भण्डारी, बछार आदि–आदि उपनाम(थर) लिखाने के कारण थारु की संख्या अन्यत्र उपनाम(थर) में संलग्न होने के से थारू जनसंख्या कम दिखाई देती है ।

Mohanlal Cahudhary
मोहनलाल चौधरी

नेपाल के विभिन्न जिला में रहने वाले थारुओ के वेशभूषा, भाषा, सामाजिक व्यवहार, रहन–सहन, काला संस्कृति, घर की बनावट, शारीरिक तथा चेहरे में कुछ भिन्नता के साथ दिखने वाले तथा जिला अनुसार थारुओं की पहचान जैसे राणा थारुआें का कैलाली, कंचनपुर दंगौरा थारु, बांके और दाङ्ग–कछरीया, बर्दीया–पश्चिमी, कोचिला–पुर्वी, कोचिला,मोरङ्ग, सुनसरी, सप्तरी, सर्लाही, सिरहा, उदयपुर, रौतहट, बारा, पर्सा में गरहवरीया, अङ्कुटवा, सेठवा, लमपोछवा कुरी के थारु समुदाय का वास है । पहले एक दूसरे के साथ वैवाहिक संबंध नहीं होते थे, लेकिन अब किसी भी थारु का एक दूसरे कुरी में वैवाहिक संबंध दिखता है । पर्सा जिला में विवाह में लड़का पक्ष से दहेज मांग करने का रिवाज नहीं है, लड़की पक्ष से जो राजी–खÞुशी मिले वही लेने का रिवाज है । बारा, रौतहट और अन्य जिला में कम से कम मोटर साईकिल मांग करने का चलन है । इस कार्य को थारु कल्याण कारिणी सभा द्वारा बन्द कराना चाहिए । थारु कल्याण कारिणी सभा केन्द्र तथा प्रत्येक जिला में कार्यरत होते हुए भी उल्लेखनीय काम नहीं कर सका है ।
थारु समुदाय की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न इतिहासकार तथा विज्ञों ने समय समय पर अन्वेषण कर उल्लेख कियाहै जिनके विचार यहां उद्धृत किए गए हैं । इतिहास में ११वीं शताब्दी में भारतीय महाद्वीप में थारुआें का निवास दिखता है । १५ वीं शताब्दी में खान का शासन कामतपुर में था, जिसे अभी उत्तरी बंगाल कहते हैं (चटर्जी १८५१) में थारु की पहचान दिखती है । १६ वी शताब्दी में तिब्बत के बुद्धिष्ट इतिहासवेत्ता लामा तारानाथ ने थारु चम्पारण राज्य में वास करते थे यह उल्लेख किया है । १९ वी शताब्दी में ब्रिटिश विज्ञ (रिले १८९१) ने थारु की उत्पति राजस्थान के थार मरुभूमि में होने का विश्वास प्रकट किया जबकि एक किंवदंती के अनुसार मुस्लिम शासक अकबर ने १५६७ में राजपूत्र शासक के ऊपर चढ़ाई करके मार दिया तब उस राजा के राजकीय परिवार की महिलाएं अपने नौकर के साथ भाग गई और उस नौकर को अपने पति के रूप में वरन करके जो संतान जन्म लिया उसे राणा थारु के रूप में नेपाल के कैलाली ,कंचनपुर तथा भारत के नैनिताल, खेरी जिला में देखा जाता है । ये थारु राजपुत के संतान होने के बावजूद सुअर का मांस तथा मदिरा सेवन करके अपनी जात गँवायी (श्री वास्तव १९५८,१४) ।
दूसरे इतिहासवेत्ता मजुमदार (१९४४) अनुसार अथर्ववेद में ‘अथारु’ शब्द का अपभ्रंश होकर थारु के रूप में परिचित हुआ है, दूसरा ‘अथारु’ अर्थात् भगवान के लिए एक दीन का अपना श्रम निःशुल्क देने से थारु शब्द की उत्पति हुई है । लेकिन इतिहासवेत्ता श्रीवास्तव (१९५८) ने इसमें मतभिन्नता जाहिर करते हुए कहा है कि थारुओ में श्रम देने का क्षमता नहीं है, तसर्थ उपर्युक्त उल्लेखित बात का कोई औचित्य ही नहीं है । एक इतिहासवेता क्रूक १८९६ के अनुसार ‘थरथराना’ शब्द से थारु शब्द का उत्पति हुआ है, जिसका अर्थ होता है कम्पन । हस्तीनापुर में राजपुत शासक तथा मुस्लिम शासक बीच घमासान युद्ध हुआ और मुस्लिम शासक द्वारा राजपूत शासक की हत्या हुई । राजपूत राजा के मरने के बाद रानी से जन्मी संतान थारू हैं ।
उपर्युक्त उल्लेखित इतिहासवेता तथा विद्धानो ने जो भी लिखा, थारु खÞुद को नेपाल का आदिवासी मानते हैं और उनकी उत्पति नेपाल में ही हुई मानते हैं । विद्वान–लेखक विश्वास करते हैं कि थारु समुदाय रोजÞी–रोटी के खोज में भारत के गंगा के समतल भूमि से नेपाल अधिराज्य के तराई भूभाग में विचरण करते रहे हैं । लगातार एक जगह से दूसरे जगह घूमते रहने के कारण निम्न प्रकार है । प्रथम थारु समुदाय को कृषि कार्य के लिए जÞमीन की जरूरत थी और जनघनत्व बढ़ते जाने के बाद कृषि कार्य के लिए जमीन, जंगल के नजदीक उपलब्ध होने के कारण थारु समुदाय का बसोवास जिला के उत्तरी भाग वन जंगल के समीप दिखता है ।
(अटकिंसन १८८४, फार्नेजी १८६८, नेशफिलड १८८५ ए) दूसरा कारण ब्रिटिश शासक से बचने के लिए जंगल का उत्तरी भाग सुरक्षित था । (नेविल१९०५) जमींदार भूमिपति के चुंगल में फंस कर गुलाम बनने से मुक्ति पाने के लिए भी जंगल सुरक्षित था (अटकिंशन १८८१, रिस्ले १८९१, टर्नर १९३१) ।
नेपाल के पूर्व महान्यायधिवक्ता स्वर्गीय रामानन्द प्रसाद सिंह ने थारु की उत्पति के विषय में भारत के पटना में १७ मई १९३८ को प्रेस सम्मेलन किया था । उनके विचार अनुसार थारु की उत्पत्ति नेपाल में हुई है । थारु गौतम बुद्ध के ही संतान है । ओकाका और ओकामुखा बनारस के राजा थे । कपिल मुनि का आश्रम जो बाद में कपिलवस्तु के नाम से प्रचलित हुआ । राजा ओकाका अपनी पहली पत्नी की मृत्यु पश्चात वृद्धावस्था में दूसरा विवाह किया । दूसरी रानी ने उनसे अपने बेटा को राजा बनाने का शर्त कÞुबूल कराया । राजा ज्यादा आध्यात्मिक तथा शांत विचार के होने के कारण अपनी पहली रानी से जन्मे तीनों संतान को विद्रोह नहीं करने और उनके मरने के बाद ही अपने सौतेले भाई से राज्य छीन लेने को समझाया ।
तीन लड़का तथा एक लड़की प्रिया जो अविवाहित थी, कोशाला राज्य छोड़कर कपिल मुनि के आश्रम आ गई, कपिल मुनि के आदेश से वन जंगल काट कर बसोबास करने लगे । कपिल मुनि के आज्ञा अनुसार उस जगह का नाम कपिलवस्तु रखा गया ।
यह सत्य तथ्य बुद्धिष्ट साहित्य ‘ललित विस्तार’ और ‘जटक’ में उल्लेखित है । गौतम बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा को समाप्त करके सभी मनुष्यों को समान बताया । इस व्यवस्था ने ब्राह्मण को बहुत निरुत्साहित किया । गौतम बुद्ध ने सामाजिक तथा अध्यात्मिक विश्वास जिसे ‘व्रत छत्रीया’ कहते है, ‘व्रत’ तथा ‘उपवास’ में विश्वास कराया । गौतम वुद्ध के पिता राजा शुदोधन चक्रवर्ती राजा नहीं थे वे भूमिपति किसान थे । पेशा से थारु भी किसान है और ‘व्रत’ तथा ‘उपवास’ में विश्वास करते हैं ।
थारुओं की शारीरिक बनावट तथा चेहरा भी बुद्ध के पत्थर की मुर्ति से मिलती है । सारनाथ में स्थापित बुद्ध के धर्मचक्र परिर्वतन मुद्रा के पत्थर मूर्ति में हिन्दु धर्म के भावना जैसे जनेऊ नहीं लगाए है अर्थात् गौतम बुद्ध जनेउ (कबअचभम तजचभबम) नहीं पहनते थे । गौतम बुद्ध के जीवन गाथा में ‘यज्ञोपवीत’ और ‘चुड़ामणी’ कर्म का कोई स्थान नहीं था । ये बात बुद्धिष्ट धार्मिक साहित्य ‘ट्रीपितका’ में उल्लेखित है । इतिहासवेत्ता भिसेन्ट स्मिथ,ओल्देनवर्ग, बस्म ने बुद्ध आर्यन नहीं मंगोलियन थे, कहकर उद्धृत किया है । थारु की उत्पति कपिलवस्तु में ही हुआ है और वहाँ से वे नेपाल के विभिन्न जगह पर गए ।
लेखक ‘व्रांयन होडसन’ ने अपने पुस्तक में लिखा है कि बोडो, धिमाल तथा कोचे जाति मलेरिया के प्रवाह से मुक्त हैं । वे आगे कहते है कि इस उन्मुक्ति का कारण इन जातियों का उन स्थानों पर देशी होकर कम से कम तीन हजार वर्ष से बस्ती रही होगी । हमलोग नेपाल में गौतम बुद्ध का २५३२ निर्वाण दिवस आने वाले वैशाख में मनाने जा रहे हैं । इससे स्पष्ट होता है कि थारु समुदाय की उत्पति बुद्ध के समय या उससे पहले हुई होगी । ‘लर्नेड प्रगीतार ने पुस्तक (ज्ष्कतयचष्अब ितचबमष्तष्यल या ष्लमष्ब) में कहा है, यदि बुद्ध के समय में किसी जाति की उत्पति हुई है, तो वो है थारू समुदाय । नालंदा पाली विश्वविद्यालय के बुद्ध धार्मिक प्रोफेसर रीसा कश्यप ने कहा है कि बुद्धधर्म और थारु संस्कृति मिलती–जुलती है । बुद्धिष्ट साहित्यकार और इतिहासवेता तारानाथ ने कहा कि थारुओं की उत्पत्ति चम्पारण में हुई और चन्द्रगुप्त मौर्य के नाति अशोक का जन्म ‘पिपलीकरण’ में हुआ जो चम्पारण में पड़ता है ।
सिद्धार्थ ने अपने मामा के बेटी से विवाह किया, यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय या हिन्दु धर्म मानने वाले होते तो अपनी ममेरी बहन से विवाह नहीं करते । शाक्य और कोल्या के संतानों ने ही बौद्धधर्म को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह किया । गौतम बुद्ध के निर्वाण (भ्लष्निजतभलmभलत) प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध के बहुत शिष्य उनके परिवार से मिलने कपिलवस्तु आए । ये शिष्य बुद्ध के वास्तविक सिद्धांत जिसे ‘थेरवादिन्स’ कहते है, उसे प्रचार–प्रसार में लाए । थेरावाद बुद्दिज्म का सिद्धांत जिसे ‘स्थावीर’ कहते है उसी से थारू शब्द की उत्पत्ति हुई है । ‘स्थावीर’ से ‘थावीर’ हुआ और ‘थावीर’ से ‘थारू’ हुआ । इससे स्पष्ट होता है कि थारू गौतम बुद्ध के संतान हैं ।
विभिन्न समय में विभिन्न इतिहासकारों ने थारू समुदाय की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न बातों का उल्लेख किया है । जैसे थारू राजस्थान के थार मरुस्थल से आए है, वे राजपूत के संतान है, लेकिन ये सारी बातें किंवदंती दिखाई पड़ते हैं । थारू समुदाय मंगोलियन जाति के हैं,उनकी उत्पत्ति नेपाल में हुई है और थारू नेपाल के आदिवासी हैं ।
(लेखकः पूर्व मंत्री एवम वर्तमान में प्रदेश न.२ के नीति आयोग के सदस्य है ।)

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