Mon. May 25th, 2020

कविता

जब बाँट ही लिया दिल की ज़ागीर, तब क्यों पूछते हो दिल किधर गया : संजय कुमार सिंह

संवेदनशील कवि, उपन्यासकार, कहानीकार संजय कुमार सिंह की जिन्दगी से जुडी कुछ कविताएँ । पढें

अहम.. अपेक्षा.. उम्मीद… के सारे पत्ते पीले होकर गिरते देखती हूँ.. : सरिता सारस

प्रेम के गहरे क्षणों में मैं महसूस करती हूं तुम्हारा वृक्ष होना… अहम.. अपेक्षा.. उम्मीद…

अब भी करना छोड़दो पशुओं पर अत्याचार : कमला भंसाली जैन

“समय-सार” बने हम अभय-हिंसा के सेनानी, अपने से अपना कल्याण,प्रेषित हो जिन-वाणी। स्वयं-स्वयं का करे,अनुसंधान।

लाशों पर लाशें बिछी, गली–गली विरान गांव, शहर, कस्बे सभी, लगते आज वुहान : रामनिवास मानव

दोहे सन्दर्भ कोरोना डॉ. रामनिवास ‘मानव’ गली–मुहल्ले चुप सभी, घर–दरवाजे बंद कोरोना का भूत ही,

बस प्रेम होना चाहती हूं,मुझे प्रिय है मेरा अकेला होना, मुझे प्रिय है तुम्हारा साथ अनंत : सरिता सारस

मैं गुलाम नहीं होना चाहती मैं गुलाम नहीं होना चाहती अपनी आदतों की अपने शौकों