Tue. Sep 25th, 2018

बौद्ध धर्म में योग की महत्ता : डॉ. श्वेता दीप्ति

काठमांडू, हिमालिनी जून अंक |  योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । पहला है– जोड़ और दूसरा है समाधि । जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुँचना कठिन होगा । योग दर्शन या धर्म नहीं, गणित से कुछ ज्यादा है । दो में दो मिलाओ चार ही आएँगे । चाहे विश्वास करो या मत करो, सिर्फ करके देख लो । आग में हाथ डालने से हाथ जलेंगे ही, यह विश्वास का मामला नहीं है । ‘योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है । योग एक सीधा विज्ञान है । प्रायोगिक विज्ञान है । योग है जीवन जीने की कला । योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है । एक पूर्ण मार्ग है–राजपथ । दरअसल धर्म लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है । ‘–ओशो
जैसे बाहरी विज्ञान की दुनिया में आइंस्टीन का नाम सर्वोपरि है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन हैं पतंजलि । जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त दर्शनों, विधियों, नीतियों, नियमों, धर्मों और व्यवस्थाओं में योग श्रेष्ठ है ।
योग शब्द भारत और नेपाल में एक आध्यात्मिक प्रकिया के रूप में प्रचलित है । जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है । यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है । योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत‌ में लोग इससे परिचित हैं . ‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है । इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ– समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध । वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा । गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है ‘योगः कर्मसु कौशलम’ योग से कर्मो में कुशलता आती हैं) । स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है । कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं । इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलंबी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं । यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं । पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’, चित्त की वृत्तियों के निरोध . पूर्णतया रुक जाने का नाम योग है । इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैंः चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं ।
परंतु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है । उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है । पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का निस्शेष हो जाना । यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा । क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध दग्ध हो गया होगा । निरोध यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? योगस्थः कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो । विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों ।
संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक रूप से समझना बहुत सरल नहीं है । संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है । अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है । बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफÞी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं ।
इन विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में किस प्रकार ऐसा समन्वय हो सकता है कि ऐसा धरातल मिल सके जिसपर योग की भित्ति खड़ी की जा सके, यह बड़ा रोचक प्रश्न है परंतु इसके विवेचन के लिये बहुत समय चाहिए । यहाँ उस प्रक्रिया पर थोड़ा सा विचार कर लेना आवश्यक है जिसकी रूपरेखा हमको पतंजलि के सूत्रों में मिलती है । थोड़े बहुत शब्दभेद से यह प्रक्रिया उन सभी समुदायों को मान्य है जो योग के अभ्यास का समर्थन करते हैं ।
बौद्ध–धर्म में योग
प्राचीन बौद्धिक धर्म ने ध्यानापरणीय अवशोषण अवस्था को निगमित किया । बुद्ध के प्रारंभिक उपदेशों में योग विचारों का सबसे प्राचीन निरंतर अभिव्यक्ति पाया जाता है । बुद्ध के एक प्रमुख नवीन शिक्षण यह था की ध्यानापरणीय अवशोषण को परिपूर्ण अभ्यास से संयुक्त करे.े बुद्ध के उपदेश और प्राचीन ब्रह्मनिक ग्रंथों में प्रस्तुत अंतर विचित्र है ।
बुद्ध के अनुसार, ध्यानापरणीय अवस्था एकमात्र अंत नहीं है, उच्चतम ध्यानापरणीय स्थिति में भी मोक्ष प्राप्त नहीं होता ।
अपने विचार के पूर्ण विराम प्राप्त करने के बजाय, किसी प्रकार की मानसिक सक्रियता होनी चाहिए एक मुक्ति अनुभूति, ध्यान जागरूकता के अभ्यास पर आधारित होना चाहिए । बुद्ध ने मौत से मुक्ति पाने की प्राचीन ब्रह्मनिक अभिप्राय को ठुकराया.ब्रह्मिनिक योगिन को एक गैरद्विसंक्य दृष्टिगत स्थिति जहाँ मृत्यु मे अनुभूति प्राप्त होता है, उस स्थिति को वे मुक्ति मानते है ।
बुद्ध ने योग के निपुण की मौत पर मुक्ति पाने की पुराने ब्रह्मिनिक अन्योक्त (“उत्तेजनाहीन होना, क्षणस्थायी होना”) को एक नया अर्थ दिया उन्हें, ऋषि जो जीवन में मुक्त है के नाम से उल्लेख किया गया था ।
योगकारा बौद्धिक धर्म
योगकारा–संस्कृतस् योग का अभ्यास । शब्द विन्यास योगाचारा, दर्शन और मनोविज्ञान का एक संप्रदाय है, जो भारत में ४ वीं से ५ वीं शताब्दी मे विकसित किया गया था ।
योगकारा को यह नाम प्राप्त हुआ क्योंकि उसने एक योग प्रदान किया, एक रूपरेखा जिससे बोधिसत्त्व तक पहुँचने का एक मार्ग दिखाया है । ज्ञान तक पहुँचने के लिए यह योगकारा संप्रदाय योग सिखाता है ।
छअन (सिओनर जÞेन) बौद्ध धर्म
जÞेन –जिसका नाम संस्कृत शब्द “ध्यान से” उत्पन्न किया गया चीनी “छअन“ के माध्यम से महायान बौद्ध धर्म का एक रूप है । बौद्ध धर्म की महायान संप्रदाय योग के साथ अपनी निकटता के कारण विख्यात किया जाता है । पश्चिम में, जेन को अक्सर योग के साथ व्यवस्थित किया जाता है, ध्यान प्रदर्शन के दो संप्रदायों स्पष्ट परिवारिक उपमान प्रदर्शन करते है । यह घटना को विशेष ध्यान योग्य है क्योंकि कुछ योग प्रथाओं पर ध्यान की जÞेन बौद्धिक स्कूल आधारित है । योग की कुछ आवश्यक तत्व सामान्य रूप से बौद्ध धर्म और विशेष रूप से जÞेन धर्म में महत्वपूर्ण हैं ।
भारत और तिब्बत के बौद्धिक धर्म
योग तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्र है । न्यिन्गमा परंपरा में, ध्यान का अभ्यास का रास्ता नौ यानों, या वाहन मे विभाजित है, कहा जाता है यह परम व्यूत्पन्न भी है । अंतिम के छह को “योग यानास” के रूप मे वर्णित किया जाता है, यह है, क्रिया योग, उप योग (चर्या), योगा याना, महा योग, अनु योग और अंतिम अभ्यास अति योग सरमा परंपराओं ने महायोग और अतियोग की अनुत्तारा वर्ग से स्थानापन्न करते हुए क्रिया योग, उपा (चर्या) और योग को शामिल किया हैं । अन्य तंत्र योग प्रथाओं में १०८ शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास शामिल हैं । अन्य तंत्र योग प्रथाओं १०८ शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास को शामिल हैं ।
यह न्यिन्गमा परंपरा यंत्र योग का अभ्यास भी करते है । (तिब. तरुल खोर), यह एक अनुशासन है जिसमे सांस कार्य (या प्राणायाम), ध्यानापरणीय मनन और सटीक गतिशील चाल से अनुसरण करनेवाले का ध्यान को एकाग्रित करते है । लुखंग मे दलाई लामा के सम्मर मंदिर के दीवारों पर तिब्बती प्राचीन योगियों के शरीर मुद्राओं चित्रित किया जाया है ।
चांग (१९९३) द्वारा एक अर्द्ध तिब्बती योगा के लोकप्रिय खाते ने कन्दली (तिब.तुम्मो) अपने शरीर में गर्मी का उत्पादन का उल्लेख करते हुए कहते है कि “यह संपूर्ण तिब्बती योगा की बुनियाद है . चांग यह भी दावा करते है कि तिब्बती योगा प्राना और मन को सुलह करता है, और उसे तंत्रिस्म के सैद्धांतिक निहितार्थ से संबंधित करते है ।
योग की महत्ता सदैव थी सदैव रहेगी । सवाल सिर्फ इतना है कि बदलना हमे स्वंय को है हमें ईश्वर को जानना है, सत्य को जानना है, सिद्धियाँ प्राप्त करना हैं या कि सिर्फ स्वस्थ रहना है, तो पतंजलि कहते हैं कि शुरुआत शरीर के तल से ही करनी होगी । शरीर को बदलो मन बदलेगा । मन बदलेगा तो बुद्धि बदलेगी । बुद्धि बदलेगी तो आत्मा स्वतः ही स्वस्थ हो जाएगी । आत्मा तो स्वस्थ है ही । एक स्वस्थ आत्मचित्त ही समाधि को उपलब्ध हो सकता है । जिनके मस्तिष्क में द्वंद्व है, वह हमेशा चिंता, भय और संशय में ही ‍जीते रहते हैं । उन्हें जीवन एक संघर्ष ही नजर आता है, आनंद नहीं । योग से समस्त तरह की चित्तवृत्तियों का निरोध होता है – योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । चित्त अर्थात बुद्धि, अहंकार और मन नामक वृत्ति के क्रियाकलापों से बनने वाला अंतस्करण । चाहें तो इसे अचेतन मन कह सकते हैं, लेकिन यह अंतस्करण इससे भी सूक्ष्म माना गया है । योग विश्वास करना नहीं सिखाता और न ही संदेह करना । और विश्‍वास तथा संदेह के बीच की अवस्था संशय के तो योग बहुत ही खिलाफ है । योग कहता है कि आपमें जानने की क्षमता है, इसका उपयोग करो और सदैव मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहो ।

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