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सत्ता के सीढ़ियों में EVM का खेल ना हो : कैलाश महतो

 
 कैलाश महतो, नवलपरासी, 25 सितंबर। सत्ता का नशा बड़े बड़े राजा, महाराजा, शासक, तानाशाह और राष्ट्र व सरकार प्रमुखों के चेहरों के नकाव हटाकर अर्श से फर्श पर ला देता है। कइयों धर से सर अलग हुए तो कइयों के काले चश्मे हट गये। कइयों के ताज जन आवेगों में बह गये तो कइयों के नामों निशान मिट गये। और कभी कभी सत्ता का नशा जब खुद हटता है तो पता चलता है कि उसके पैरों तले के जमीन इतना खिसक गया है कि शासक न तो जी सकता है, न मर सकता है।‎‎
वैसे – सत्ता आम जनता के लिए नहीं, कुछ चुनिन्दे विशिष्ट पात्रों के लिए ही होता है। सत्ता के अनेक रास्ते होते हैं, मगर अधिकांश रास्ते क्रूर ही होते हैं। नेपाल के इतिहास में पृथ्वीनारायण शाह का एकीकरण अभियान, जंग बहादुर राणा के कोत पर्व काण्ड, प्रचण्ड के माओवादी जनयुद्ध और जेन जी विद्रोह के क्रूर और हिंसक रबैये कुछ प्रमुख सत्तायी रास्ते रहे हैं।‎‎ रास्ते चाहे जो और जैसा भी हो, सत्ता से कद्र और सम्मान कमा लेने बाला शासक ही जनता का जननेता कहलाता है। नेपाली इतिहास में पृथ्वीनारायण शाह, राजा बीरेन्द्र, बी.पी कोइराला, गणेशमान सिंह, पुष्पलाल श्रेष्ठ, राम राजा प्रसाद सिंह, मदन भण्डारी, गजेन्द्र नारायण सिंह को जननेता का प्रतिष्ठा मिला है।‎‎
सत्ता निर्लज्ज एक धन्दा भी है। उसके लिए आदमी किसी भी हद को पार कर लेता है। सत्ता का रुप चाहे जैसा भी हो (राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, अवसरिक, प्रशासनिक), मगर वह मदमस्त और आकर्षण बेसुमार होता है। क्योंकि उसमें प्रतिष्ठा, कमाई, ऐश, कैश, शक्ति और पहचान सामेल होता है। यह पात्रों को कभी सुन्दर लिवास में नचवाता है, कभी नंगा घुमाता भी है।‎‎ हर सत्ता अपने को जनता का ठेकेदार समझता है – भले ही वह आउट डेटेड (out dated) और तिरस्कृत ही क्यों न हो। मगर वह टिके रहने के लिए अनेक तिकरमों को अपनाता है। उसी क्रम में जेन-जी नाम से सत्ता में आए रास्वापा और बालेन शाह का सरकार है जो स्थानीय निर्वाचन लगायत के निर्वाचनों में अब EVM (Electronic Voting Machine) का प्रयोग करना चाहता है। (स्रोत)‎‎
एक अति समान्य सा प्रश्न है – जिन पार्टी और नेताओं को जनता ने प्रचण्ड बहुमत दी हो, लगभग दो तिहाई की सरकार दी हो, जनता में अद्वितीय पकड़ हो, जन अपेक्षित वह काम करती हो, उन्हें अपने मतदाताओं से ज्यादा निर्जीव Voting Machine पर क्यों विश्वास होने लगी। वह भी इतने कम समय में?‎‎ दाल में या तो कुछ काला है, या हो सकता है कि दाल ही पूरे काला है।
जन लहर से निर्मित सरकार अगर जनता की प्रत्यक्ष मतों को बक्सा तक के पहुँच से कतराती हो तो मामला कोई समान्य नहीं है। इससे स्पष्ट है कि उसे लगने लगा है कि उसने जो मत पाया है, वह उसके या तो अपने नहीं है या अब होने बाला नहीं है, और उसने जो जनमत पाई है, अगले बार बिल्कुल उल्टा होने की निश्चितता दिखता है।‎‎
अधिकांश इंजिनियरों से भरपूर संसद और सरकार और उच्च शिक्षित महा पंडितों की शासन सत्ता में ऐसी कौन सी चेत आ गयी है कि अपनी लोकप्रियता से ही घबराहट होने लगी है ? आश्चर्य की बात यह है कि उनके जानकारी में यह क्यों नहीं है कि EVM पर भरोसा उन मुल्कों ने करना बन्द किया है – जिन्होंने उसे निर्माण किया था। पड़ोसी देश में ही उसका भारी विरोध चल रहा है और वहाँ से भी अब उसे हटाने की घमाशान चल रहा है। उस स्थिति में बालेन्द्र की सरकार अगर EVM को प्रयोग करने की सोंच निर्माण करती है तो यह ८वें आश्चर्य की बात स्पष्ट है। यह सत्ता को जबरजस्ती टिकाए रखने और मतदाताओं से छेडखानी करने का उत्तम साजिस है।‎‎ मनोविज्ञान कहता है – गलत लोग हद से ज्यादा आत्म विश्वासी होने का ढोंग करता है, हमेशा सतर्क रहने का उपाय खोजता है और समान्य चरित्र से अपने को थोड़ा अलग थलग दिखाने का प्रपंच करता है। वो उसकी बाध्यता और चालाकी दोनों होती हैं और वो राजनीतिक दरबार में सबसे ज्यादा बड़ा मीठा जहर है, जो देश और जनता के लिए चुनिन्दा अभिशाप है।‎‎
हम एक क्षण के लिए गलत ही हों – मगर जरा गौर कर लें कि इतने सादगी और समेटे हुए लहजे में देश के प्रधानमंत्री अपने देश और जनता के वीभत्स समस्याओं को लेकर एक तरफ विश्व मंच पर खड़ा होने पहुँचा हो, उसमें उनके स्वागत में दश लोग भी न दिखते हो तो उसका अंतर्राष्ट्रीय सन्देश क्या बनता है? या वह भी देश सेवा का कोई रुप है?‎‎
ध्यान देने योग्य बात है कि शुरु के एक दो निर्वाचनों के परिणाम बाद किसी मुक नेता का विश्व मंच पर जितना सम्मान होता था, आज वह नहीं दिखता। बदले में हँसी की शुरुआत होने लगी है। क्यों? क्योंकि ‎‎उनकी जीत की असली वजह से सब वाकिफ हो चुके हैं, और वही कारण है कि जो महत्व और तजब्बो पहले मिला करता था, वो अब नहीं है।
अमेरिका के धरती पर किसी एक दो द्वारा घंटी बजा देने और पाँच दश गाड़ियों की काफिला लगा देने को अगर हम अपने सम्मान की बात समझें तो हम अपने आपको कहीं न कहीं मज़ाक बनाने का रफ़ स्केच तैयार कर रहे हैं। क्योंकि ट्रम्प का स्वाभाव है किसी को उसके संवेदनशिल जुड़ाव को ही प्रयोग कर उसे बेइज्जत करना।
अमेरिका का ताज़ा प्रयोग है उसके एक प्रतिष्ठित पत्रिका “The Grayzone” का ZenZ आन्दोलन तैयारी से लेकर ZenZ विद्रोह करबाने, निर्वाचन में सहयोग करने और अरबों रकम लगानी करनेतक का फेहरिश्तों से पर्दों को हटबाना। और वो इसलिए किये/ करबाए जाने के अनुमान है कि उसके साथ किये गये वायदे और स्वार्थ को पूरा होने में उत्पन्न किसी बाधे को कॉउंटर करना। अमेरिका के इस प्राथमिक चाल से बात नहीं सुलझाया गया तो फिर अगले कदम की तैयारियाँ भी उसके लिए समान्य है।
अमेरिका है तो उससे बहुत होशियारी पूर्वक मित्रता रखना होगा। कुछ लाल बुझक्कड़ मिडियाओं और पत्रकारों के अनुसार जैसा अमेरिका का कमजोर होने का प्रचार किया जा रहा है, अगर वैसा होता तो आज भी दुनियाँभर में घुम घुमकर वो युद्ध न तो करता, न करबाता। अमेरिका के UN महासभा में पहुँचे इरानी राष्ट्रपति और परराष्ट्र मन्त्री को अमेरिका में ही रोक लेना स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका आज भी वही करता है, जो उसके दिमाग में उसके लाभ के लिए आता है।
कुछ अन्धभक्तों का ये मानना कि अमेरिका ने प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह को चिनिया राष्ट्रपति के स्तर में सम्मान दिया है तो वह अमेरिकी पॉलिसी है उस वक्ततक के लिए, जबतक उसका स्वार्थ नेपाल से पूरा न करबा ले। बाँकी बात समझने की है। और उसे कोई कुछ नहीं कर पाता केवल ट्रम्प के उपर हास्यास्पद मिडिया ट्रायल करने के।
हमारा स्वार्थ नेपाल और नेपाली है। होना  भी चाहिए। व्यक्ति सत्ता से ज्यादा आवश्यक नेपाली सत्ता और सम्मान का होना चाहिए।
देश के निर्वाचन में EVM का चालाक खेल नहीं, स्वच्छ और देशहित की चुनाव प्रणाली चाहिए। सारे वर्ग, धर्म, समुदाय, लिंग और क्षेत्रों की राज्य और राजनीति में पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व चाहिए। सरकार इन जनहित के मामलों में खड़ा उतरी तो EVM नहीं, PVH (Peoples’ Voting Hands) ही काफ़ी है। जनता उन्हीं पार्टी और नेताओं को पसन्द करेगी।
कैलाश महतो

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