Wed. Jul 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

साहित्य वह जिससे सबका हित हो, लिखो तो कुछ अच्छा लिखो : आशा शैली

 

हिमालिनी अंक अप्रैल। पंजाबी मूल की प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री एवं संवेदनशील साहित्यकार आशा शैली जी का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जुड़ाव उत्तराखंड की धरती से भी अत्यंत आत्मीय और गहन रहा है । उनकी रचनाओं में पर्वतीय जीवन की सहज संवेदनाएं, प्रकृति का अनुपम सौंदर्य, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा तथा समाज के प्रति सकारात्मक और प्रेरणादायी दृष्टिकोण प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त होता है । सरल, सरस और भावपूर्ण शैली उनकी साहित्यिक पहचान है, जो पाठकों के मन को सहज ही स्पर्श कर लेती है । साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान हिमाचल और उत्तराखंड की समृद्ध लोक एवं साहित्यिक परंपराओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान कर रहा है । हाल ही में नेपाल की प्रतिष्ठित हिमालिनी पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं मीडिया शिक्षाविद् प्रो. एस.एस. डोगरा ने हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय योगदान देने वाली आशा शैली जी से एक विशेष ऑनलाइन साक्षात्कार किया । प्रस्तुत हैं उस सारगर्भित एवं प्रेरणादायी संवाद के प्रमुख अंशः

० हिमाचल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उत्तराखण्ड से आपके गहरे जुड़ाव ने आपके साहित्य को किस प्रकार प्रभावित किया ?
– ये दोनों ही राज्यों मेरी कर्मभूमि हैं और इन राज्यों की सभ्यता व संस्कृति से उसके कर्म का प्रभावित होना स्वाभाविक ही है, विशेषकर लेखन का । क्योंकि भारत के ये दोनों राज्य एक दूसरे से जुड़े–गुंथे हैं, इनकी भौगौलिक स्थिति लगभग एक जैसी ही है । जहाँ मेरी शिक्षा उत्तराखण्ड (तद्कालीन उ.प्र.) की रही है वहीं विवाहोपरांत लम्बी अवधि तक हिमाचल मेरी कर्मभूमि रहा तो वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव मेरे साहित्य में स्पष्ट झलकता है ।
० आपकी रचनाओं में पहाड़, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है । क्या यह आपके व्यक्तिगत जीवन अनुभवों का प्रतिबिंब है ?
– जिसे हमने जिया, भोगा है वह लेखन में कैसे नहीं होगा ?
० आज के आधुनिक और तेज जीवन में साहित्य की संवेदनशीलता को बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है ?
– यदि आपके मन में संवेदना शेष है तो वह लेखन में भी रहेगी ही, चाहे आप कुछ भी कर लें वह समाप्त नहीं होगी ।
० आपकी कविताओं और लेखन में सकारात्मक सोच और प्रेरणादायक दृष्टिकोण प्रमुख रूप से दिखाई देता है । इसके पीछे आपकी जीवन–दृष्टि क्या है ?
– आप कविता लिखें या कहानी, वह आपके मन की सोच से अवश्य प्रभावित होती है । यहाँ मैं आपको एक बात यह जरूर बताना चाहूँगी कि जीवन में बड़े–बड़े संकटों से मुझे मेरे मन की सकारात्मकता ने ही उबारा है । मेरा मानना है कि ईश्वर सारे द्वार कभी भी बंद नहीं करता । शायद यही आस्था आपको सकारात्मक बनाती है, गिरकर फिर से उठने में सहायक होती है और कविता एवं कथात्मक साहित्य के लिए यह बहुत आवश्यक भी है । इसके विपरीत नकारात्मक साहित्य समाज में एक हताशा का संचार करता है । बल्कि मैं तो यह भी कहूँगी कि सकारात्मक सोच ही ठूंठ वृक्ष में नई कोंपलें भी उगा सकती है । इसके विपरीत लेख और इतिहास आदि दूसरी विधायें इससे अलग रहती हैं, क्योंकि उसमें कल्पना नहीं यथार्थ चित्रण होता है ।

यह भी पढें   नेकपा एमाले सम्बद्ध विद्यार्थी संगठन अनेरास्ववियू ने किया प्रदर्शन

० पहाड़ी संस्कृति और लोक जीवन को साहित्य में सहेजना क्यों आवश्यक है ?
– सामान्यतया पहाड़ी जीवन सरल नहीं होता, दूसरे देशों की बात नहीं कहती, मैं अपने देश की बात करूँगी । भारत की सांस्कृतिक सम्पदा बहुत समृद्ध और मूल्यवान रही है । आप जानते हैं कि हमारी संस्कृति रामायण और महाभारत की संस्कृति है और यदि आप इसका अध्ययन करने लगेंगे तो एक से बढ़कर एक रोचक कथायें आपके सामने ऐसे आती जायेंगी कि आप उनसे स्वयं को अलग कर ही नहीं पायेंगे । ‘रामायण’ जहाँ मध्य भारत से दक्षिण की कथा है वहीं महाभारत उत्तरी भारत के कण–कण में है । हिमाचल के पहाड़ों में मैंने उसका अलग ही रूप देखा है जो उत्तराखण्ड में नहीं है । वहाँ के साहित्य में राम हमारे–आपके बीच के हैं । अब इस समृद्ध साहित्य को आप नहीं सहेजेंगे तो अपनी पहचान को ही खो देंगे ।
० हिमाचल और उत्तराखंड की साहित्यिक परंपराओं में आप कौन–सी समानताएँ और विशेषताएँ देखती हैं ?
– दोनों राज्यों में देव परम्परायें एक–सी हैं, जो हमारे साहित्य का हिस्सा हैं । दोनों राज्यों में मनु की नौका ठहरने का दावा करने वाले साहित्यकार हैं । जहाँ हिमाचल में मनाली को मनु की नाव के ठहराव के तौर पर देखा जाता है वहीं उत्तराखण्ड में माना गाँव को यह गौरव प्राप्त है । किन्तु जहाँ तक वर्तमान साहित्य की बात की जाए तो वह उत्तराखण्ड में अधिक समृद्ध जान पड़ता है । हालांकि हिमाचल का साहित्य भी कम नहीं, रूस के नागरिक साहित्यकार कवि, निबंधकार, यात्रा लेखक, निकोलाई रोरिख तो रशिया से आकर हिमाचल में ही बस गये थे और यहीं उन्होंने भरपूर साहित्य रचा । परन्तु सबसे बड़ी बात विपाशा के किनारे पर वेदव्यास जी का महाभारत रचना हिमाचल को समृद्ध बनाता है ।
० एक महिला साहित्यकार के रूप में आपके साहित्यिक सफर में कौन–कौन सी चुनौतियाँ और प्रेरणाएँ रहीं ?
– महिला साहित्यकार के नाते बस वही चुनौतियाँ सामने आती हैं कि किसी को गाककड फादर चुनो तभी आपकी नैया पार लगेगी, ऐसा मैं कर नहीं पाई पता नहीं क्यों ? इसलिए न इधर के हैं न उधर के ।
० आपकी दृष्टि में कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति है या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी ?
– बहुत कठिन प्रश्न है । हाँ, कोई समय ऐसा अवश्य था जब गीत सम्भावनाओं से भी आगे होते थे, परन्तु आज के समय में मुझे नहीं लगता कि कविता से हम कोई बड़ा बदलाव ला सकते हैं । आज कविता सिर्फ कवियों के बीच की वस्तु मात्र रह गई है । फिर भी मैं कहना चाहूँगी कि संवेदनशील मन कविता लिखे बिना नहीं रहता ।
० वर्तमान युवा पीढ़ी साहित्य और पुस्तकों से दूर होती दिखाई दे रही है । उन्हें साहित्य से जोड़ने के लिए क्या प्रयास होने चाहिए ?
– वर्तमान पीढ़ी पुस्तकों से अवश्य दूर हो रही है परन्तु साहित्य से नहीं । क्योंकि आज हमें इंटरनेट पर इतना कुछ मिल जाता है कि कभी–कभी आश्चर्य होने लगता है ।
० आपकी रचनाओं में रिश्तों की गर्माहट और मानवीय मूल्यों का विशेष स्थान है । क्या आज समाज में इन मूल्यों की कमी महसूस होती है ?
– बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है आपने । जी हाँ, प्रगति की अंधी दौड़ में मानवीय मूल्यों में कमी अवश्य आई है परन्तु अभी इतना निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है । जब तक भारत में जीवन की सनातन पद्धति बची है तब तक रिश्तों में गर्माहट भी रहेगी ।
० प्रकृति और पहाड़ों से आपका आत्मिक लगाव किस प्रकार आपकी लेखनी को ऊर्जा प्रदान करता है ?
– पता नहीं, बस सहज ही हो जाता है सब ।
० साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में आपके अनुसार आज सबसे बड़ी आवश्यकता क्या है ?
– प्रगति की दौड़ में अंधाधुंध शामिल न होना ।
० क्या आपको लगता है कि क्षेत्रीय साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त पहचान मिल रही है ?
– इसके लिए बहुत श्रम की आवश्यकता होती है । जहाँ तक मैं समझती हूँ हिन्दी का फलक बहुत विस्तृत है । जब हम क्षेत्रीय साहित्य को हिन्दी के पटल पर रखते हैं तब उसे हम निश्चित ही अंतरराष्ट्रीय फलक पर रखते हैं किन्तु जहाँ हम स्थानीय बोलियों को ही आधार मानकर चलते हैं तो उसका फलक छोटा कर देते हैं । आप ही बताइये, आकाश खिड़की से अधिक दिखाई देगा या छत पर से  ? इसलिए यदि हमें अपनी बात को जन–जन तक पहुँचाना है तो उसे हिन्दी के पटल पर रखना ही होगा ।

यह भी पढें   हिन्दी केन्द्रीय विभाग द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन

 

० आपने अपने साहित्यिक जीवन में कौन–सा ऐसा क्षण अनुभव किया जिसे आप सबसे अधिक यादगार मानती हैं ?
– जब मैंने इलाहाबाद में महादेवी के आँगन में गीत पढ़ने से पहले आँगन की मिट्टी को मस्तक से लगाया तो एक तरफ गंगा की लहरों का नाद था और दूसरी ओर श्रोताओं की गंगा में बजती तालियों की याद जो आज भी बनी हुई है ।
० नई पीढ़ी के उभरते लेखकों और कवियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?
– अध्ययन, श्रम और परामर्श । दूसरों को पढ़ना बहुत आवश्यक होता है और अपने लेखन पर विद्वानों से परमर्श भी बहुत आवश्यक है ।
० आपके अनुसार एक सफल साहित्यकार बनने के लिए प्रतिभा अधिक महत्वपूर्ण है या निरंतर साधना ?
– दोनों, साधना के बिना आपकी प्रतिभा कुछ नहीं कर सकती ।
० यदि आपको अपने संपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व को एक पंक्ति में व्यक्त करना हो, तो आप क्या कहेंगी ?
– कर्म करो और फल ईश्वर पर छोड़ दो ।
० आने वाले समय में पाठकों को आशा शैली की कौन–सी नई साहित्यिक कृतियाँ देखने को मिल सकती हैं ?
– अभी तो उपन्यास ‘पारस’ और दोहा ‘सहस्त्राधिक’ पुस्तकें शायद इसी महीने हाथ में आ जायें । ‘रामकथा मन्दाकिनी’ पर काम कर रही हूँ । कुछ इधर–उधर बिखरी सामग्री भी है, जिससे शायद चार पुस्तकें और तैयार होंगी । समेट रही हूँ, आगे ईश्वर जाने ।
० आपकी लेखनी में आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर संतुलन दिखाई देता है । क्या यह आपकी निजी सोच का हिस्सा है ?
– यदि लेखक के स्वभाव में अध्यात्मिकता नहीं तो वह संवेदनशील भी नहीं हो सकता, यहाँ मैं कहना चाहूँगी कि मात्र मानवीय संवेदना ही पर्याप्त नहीं है उसे प्राणीमात्र के लिए ही नहीं कण–कण के लिए संवेदनशील होना ही पड़ेगा । इसके अतिरिक्त लेखक की विचारधारा हमेशा ही उसके साथ चलती है या यह कह सकते हैं आप कि लेखक हमेशा अपनी रचना में उपस्थित रहता है ।
० अंत में, साहित्य, समाज और संस्कृति के प्रति अपने पाठकों एवं श्रोताओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?
– साहित्य वह जिससे सबका हित हो, लिखो तो कुछ अच्छा लिखो । साहित्यकार की भूमिका माँ की होती है और हर रचना हमारी संतान । मुझे नहीं पता यह किसने लिखा है पर मैंने अपनी माँ से सुना था,
‘‘जननी जने तो भक्त जन, कै दाता कै सूर ।
नाहि त जननी बांझ रहे, कहा गवावे नूर । ।’’

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *