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मधेश की राजनीतिक यात्रा- पहचान की प्राप्ति, अधिकार की खोज और नेतृत्व की चुनौती : डॉ. सुशिल भट्टराई

 
डॉ. सुशिल भट्टराई

डॉ. सुशिल भट्टराई, 15 जुलाई । मधेशका राजनीतिक संघर्ष केवल सत्ता का सवाल नहीं, बल्कि पहचान, सम्मान और अधिकार की लड़ाई है । इतिहास के हर मोड़ पर मधेश ने संघर्ष किया, बलिदान दिया, लेकिन बदले में उपेक्षा ही पाई । आज भी इस क्षेत्र के लोग समान अधिकार, समावेशी विकास और सच्चे नेतृत्य की तलाश में हैं ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और

१. निरंतर का उत्पीड़न
मधेश का इतिहास केवल भूगोल की कथा मात्र नहीं, यह निरंतर की उपेक्षा, संघर्ष और पहचान की लड़ाई का जीवंत दस्तावेज है । राणाकाल से ही केंद्रीय सत्ता की नजर में मधेश एक “राजस्व संग्रह करने वाली भूमि” मात्र बन गया, पर वहाँ के लोगों को नागरिक का पूर्ण दर्जा नहीं मिला । पंचायती काल में ’एक भाषा, एक वेश’ की नीति ने मधेशी समुदाय की भाषा, संस्कृति और पहचान को और भी किनारे कर दिया । लोकतंत्र और बहुदल ’के आगमन के बाद मधेशी जनता में बड़ी आशा जगी, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे मधेश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही ।

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आंदोलन की तपिश, बलिदान

२. और चेतना का उदय
सशस्त्र माओवादी संघर्ष और उसके बाद के विभिन्न मधेश आंदोलनों ने नेपाली इतिहास में टर्निंग प्वाइंट का काम किया । उत्पीड़न के खिरफ और अपने ही देश के नेतृत्व से हुए भेदभाव के विरोध में साधारण मधेशी जनता ने बड़ा बलिदान दिया । अनेक निर्दोष नागरिकों ने मधेश और अधिकार के नाम पर अपनी आहुति इन आंदोलनों ने मधेश को दो बड़ी उपलब्ध्यों दींः

पहचान और गर्वः
सदियों से अपमानित महसूस कराए गए “मधेसी” शब्द पर आज गर्व करने की शक्ति बनी । “मैं मधेसी, मेरा मधेश“ का आत्मसम्मान जागा ।
राजनीतिक चेतना और सामथर्यः
मधेशी जनता में अपने अधिकार मांगने, सत्ता से सवाल करने और राजनीतिक रूप से सचेत होने का अभूतपूर्व साहस आया ।
संघीयता की अपूर्णता और

३. कागज का लोकतंत्र
आंदोलन की नींव पर देश संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र में तो प्रवेश कर गया, लेकिन मधेश ने जिस वास्तविक अधिकारयुक्त संघीयता की मांग की थी, वह अब भी अधूरी है । शक्ति और संसाधनों का केंद्रीकरण अभी भी काठमांडू में सीमित है । कागज पर लिखे बड़े–बड़े नारे, समावेशिता की बातें और लोकतंत्र के फल आम गरीब व पिछड़े मधेशी जनता के दरवाजे तक नहीं पहुंचे हैं । लंबे समय तक सत्ता की बागडोर संभालने वाले दल और नेताओं ने अलग–अलग प्रलोभन देकर मधेश की भावना को सत्ता पाने की सीढ़ी मात्र बनाया, जिससे मधेश अब भी आर्थिक और प्रशासनिक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहा है ।

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४. “मधेसी होना” और “मधेश को समझना” के बीच का अंतर
किसी भी नेतृत्व का मधेशी मूल का होना या मधेशी उपनाम (टाइटल ) लगाना मात्र मधेश का प्रतिनिधिंव नहीं है । मधेश की मिट्टी, यहाँ की वास्तविक गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की नाजुक स्थिति, और हर साल आने वाली बाढ़ की पीड़ा को समझने के लिए काठमांडू के वातानुकुलित कमरे या संभांत पालन–पोषण से काम नहीं चलता ।
मैथिली या भोजपुरी वोलना और मधेसी उपनाम होना सांकेतिक रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन जब तक नेता की चेतना और प्राथामिकताओं में मधेश के आम लोगों की समस्या नहीं आती, तब तक वास्तविक परिवर्तन असंभव है । मधेश को समझने के लिए वहाँ की सामाजिक संरचना, उत्पीड़न की गहराई और जनता के दैनिक संघर्ष को आत्मसात करने की क्षमता चाहिए, जो वर्तमान नेतृत्व में अभी भी कमी है ।

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निष्कर्ष
मधेश ने इतिहास में कई लोगों को नेता बनाया, कईयों को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया, लेकिन मधेशी जनताको आ अपनी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं मिला है । अब जरूरत सिर्फ भावनात्मक नारों और कागजी अधिकारों की नहीं; मधेश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो मधेश की मिट्टी और जनभावाना को सच्चे अर्थों में समझे और नीति निर्माण में उसका ठोस प्रतिबिंब उतार सके । 

 

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