Mon. Oct 5th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

‘हनुमान अंश’ सनातन चेतना के पुनर्जागरण का संकेत है !

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर। हाल में प्रदर्शित ‘हनुमान अंश’ ने जिस प्रकार सीमित बजट, बिना किसी बड़े सुपरस्टार और अपेक्षाकृत कम प्रचार के बावजूद दर्शकों के बीच असाधारण लोकप्रियता अर्जित की है, उसे केवल एक फिल्म की व्यावसायिक सफलता मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। यह घटना सनातन समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में हो रहे कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों की ओर संकेत करती है। 

फिल्म का विषय नीम करोली बाबा के जीवन, साधना, सेवा, भक्ति और हनुमान-आराधना से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार लगभग ₹2 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने पहले दिन मात्र लगभग रु १०  लाख से शुरुआत की, लेकिन सकारात्मक लोक प्रतिक्रया  के कारण इसकी कमाई लगातार बढ़ती गई और कुछ ही सप्ताह में ७५ करोड़ अधिक कमाई करने वाली फिल्म बन गई। यहाँ से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या भारतीय दर्शक लंबे समय से चले आ रहे उस विमर्श से आगे बढ़ रहे हैं जिसमें धर्म को केवल सामाजिक शोषण, जाति-विभाजन और रूढ़िवाद के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति रही है? ‘हनुमान अंश’ की सफलता अपने-आप में किसी राजनीतिक विचारधारा की पराजय का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि सनातन भारतीय समाज में धर्म, अध्यात्म और संत-परंपरा के प्रति व्यापक जनरुचि को केवल ‘अंधविश्वास’ या ‘सामाजिक पिछड़ेपन’ की श्रेणी में रखकर समझना अब स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि अब आमलोग भी धर्म के गहिराई को ध्यान-साधना के माध्यम से अनुभव कर स्वयम निर्णय लेने में सक्षम हो रहे हैं।

बड़े सितारों, भारी प्रचार और विशाल बजट वाली फिल्मों के बीच ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन उल्लेखनीय है। रिपोर्टों के अनुसार फिल्म लगभग ₹2 करोड़ के बजट में बनी और उसने 27–28 दिनों में ₹68–86 करोड़ के आसपास की कमाई के स्तर को छुआ। अलग-अलग रिपोर्टों में नेट और ग्रॉस कमाई के आँकड़ों में अंतर है, इसलिए इन संख्याओं को संबंधित व्यापारिक रिपोर्टों के संदर्भ में देखना चाहिए। वैसे इसका अधिक महत्वपूर्ण पक्ष कमाई की मात्रा से अधिक कमाई का पैटर्न है। पहले दिन केवल लगभग ₹10 लाख की शुरुआत और उसके बाद लगातार बढ़ती दर्शक संख्या बताती है कि फिल्म को शुरुआती सफलता किसी बड़े स्टार-फैन क्लब या भारी विज्ञापन अभियान से नहीं मिली। Word of mouth ने इसे आगे बढ़ाया। अर्थात् दर्शक स्वयं दूसरे दर्शकों को फिल्म देखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। यही इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत है।

आधुनिक सनातन विमर्श में धर्म की आलोचना करना कोई नई बात नहीं है। जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता, सामाजिक असमानता और धार्मिक रूढ़ियों की आलोचना सनातनी समाज-सुधार की महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा रही है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब धर्म और धर्म के नाम पर बनी सामाजिक विकृतियों को एक ही चीज मान लिया जाता है। सनातनी परंपरा में धर्म का अर्थ केवल वर्ण व्यवस्था ही नहीं है, वल्कि धर्म का संबंध—सत्य, कर्तव्य, आत्मसंयम, सेवा, करुणा, लोककल्याण, आत्मज्ञान, साधना और नैतिक जीवन से भी है। उपरोक्त विशेषणों के अभाव में धर्म का कोई मूल्य नहीं रह जाता। ‘हनुमान अंश’ जिस संत-परंपरा को सामने लाता है, उसकी लोकप्रियता इसी दूसरे आयाम को रेखांकित करती है। यदि किसी धार्मिक फिल्म की लोकप्रियता को केवल ‘हिन्दू बनाम गैर-हिन्दू’ के संघर्ष में पढ़ा जाए तो हम उसके वास्तविक सामाजिक संदेश को बिकृत कर देंगे। सनातन संत परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि उसने बार-बार जन्म से अधिक ज्ञान, आचरण और भक्ति को महत्व दिया। कबीर, रविदास, नामदेव, तुकाराम, चैतन्य, नानक, रामानंद और अनेक संतों की वाणी में सामाजिक अहंकार तथा बाहरी आडंबर की आलोचना मिलती है। इसलिए हिन्दू आध्यात्मिक परंपरा को केवल ‘जातिवादी व्यवस्था’ के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से अधूरा चित्र है। यह कहना भी उतना ही गलत होगा कि हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव था ही नहीं। भेदभाव की वास्तविक ऐतिहासिक समस्याओं को स्वीकार करना आवश्यक है; क्योंकि वर्तमान संविधान में भी जाती के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की गई है। परन्तु जातीयता के आधार पर पूरे धर्म और उसकी आध्यात्मिक परंपरा की सम्पूर्ण व्याख्या करना पूर्णतः अनुचित है।

यह भी पढें   सिद्धार्थ बैंक और दराज ने दशैं पर ‘10–10 दशैं धमाका’ ऑफर किया लॉन्च

मार्क्सवादी सामाजिक विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण उपकरण वर्ग-संघर्ष और शोषक-शोषित संबंध का विश्लेषण है। इस दृष्टिकोण ने आर्थिक असमानता और सत्ता-संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन एक पूर्णतः भौतिकवादी विचारक के विचार को सनातनी आध्यात्मिक समाज को केवल ‘शोषक बनाम शोषित’ के द्वैत से समझना अयोग्यता का प्रमाण है। सनातन दर्शन मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी नहीं मानता। वह उसे—शरीर → मन → बुद्धि → चित्त → आत्मा एवं परमात्मा की बहुस्तरीय सत्ता के रूप में देखता है। इसीलिए सनातन चिंतन में जीवन का लक्ष्य केवल आर्थिक समानता नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का संतुलन  के साथ साथ त्याग, तपस्या, ध्यान और समाधि भी है। जिसका विन्दु भर बोध भी वामपंथियों के चेतना में नहीं है। वैसे भी मात्र भौतिकवादी दृष्टिकोण पशुता का ही द्योतक है। क्योंकि अधूरा ज्ञान दुर्घटना का कारक होता है।  अतः ‘हनुमान अंश’ जैसी धार्मिक, आध्यात्मिक और सामजिक फिल्म की लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि आधुनिक उपभोक्तावादी जीवन के बीच भी लोग अर्थ से आगे अर्थपूर्णता, भौतिकता से आगे आध्यात्मिक और लौकिकता से आगे पारलौकिकता को खोज रहे हैं।

इस विश्वचार्चित फिल्म का केंद्र नीम करोली बाबा हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार फिल्म उनके जीवन और शिक्षाओं को आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। फिल्म की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि यहाँ धर्म किसी विवादात्मक राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा, प्रेम और आत्मीयता के रूप में प्रस्तुत होता है। फिल्म के आधिकारिक प्रचार-विवरण में भी संत-परंपरा, सेवा, विनम्रता और प्रेम को केंद्रीय भाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यही बात महत्वपूर्ण है। जब धर्म का चेहरा सेवा बनता है, तो वह केवल धार्मिक पहचान नहीं रह जाता; वह सामाजिक नैतिकता और सामूहिक स्वीकार्यता बन जाता है।

यह भी पढें   समीक्षा : हृदय के पन्ने

‘हनुमान अंश’ की सफलता का सबसे रोचक पहलू उसका प्रचार-तंत्र है। समाचार के अनुसार फिल्म ने भारी पारंपरिक प्रचार के बजाय सीमित प्रचार और सामुदायिक भंडारों जैसे माध्यमों का सहारा लिया तथा बाद में दर्शकों की मौखिक अनुशंसा से इसकी लोकप्रियता बढ़ी। इसका अर्थ यह नहीं कि दर्शकों ने किसी राजनीतिक अभियान के तहत फिल्म को सफल बनाया। बल्कि इसके विपरीत, यह स्वैच्छिक सांस्कृतिक भागीदारी का उदाहरण दिखाई देता है। एक व्यक्ति फिल्म देखता है। उसे अनुभव प्रभावित करता है। वह दूसरे को बताता है। दूसरा तीसरे को। और धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक लहर पैदा हो जाती है।

वैश्विक व्यक्तित्वों की प्रतिक्रिया जैसे भारतीय क्रिकेट के पूर्व खिलाड़ी बिरेन्द्र सहवाग ने भी फिल्म की प्रशंसा की और नीम करोली बाबा से अपने पुराने आध्यात्मिक संबंध का उल्लेख किया। इसीतरह प्रेमानंद महाराज जी ने फिल्म के टीम को आचरण शुद्धि के लिए अभिप्रेरित करना इसकी महिमा को वैश्विक करने और दर्शको के मानस पटल पर कौतुहल पैदा करने का काम किया। यह घटना बताती है कि आध्यात्मिक विषय केवल किसी एक आयु, वर्ग या पेशे तक सीमित नहीं हैं। एक ओर आधुनिक खेल-जगत का व्यक्ति है, दूसरी ओर संत-परंपरा; दोनों के बीच संबंध स्थापित हो रहा है। इससे संकेत मिलता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता को अनिवार्यतः एक-दूसरे का विरोधी मानना अपांग बुद्धि का प्रमाण है।

‘वामपंथी एजेंडा, अर्थात— धर्म = अंधविश्वास, हिन्दू परंपरा = जातिगत शोषण, धार्मिक आस्था = सामाजिक पिछड़ापन, संत परंपरा = रूढ़िवाद और हिन्दू पहचान = केवल सत्ता-संरचना जैसी एकांगी धारणाएँ बनाई जाती हैं तो ‘हनुमान अंश’ की सफलता निश्चित रूप से उस दृष्टिकोण के लिए एक गंभीर चुनौती है। क्योंकि करोडो दर्शकों का किसी आध्यात्मिक कथा की ओर आकर्षित होना यह बताता है कि धर्म भारतीय समाज के लिए अभी भी जीवित सांस्कृतिक अनुभव है।

ध्यान रहे! आज का युवा इंटरनेट, विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्वीकरण और आधुनिक शिक्षा से जुड़ा हुआ है। फिर भी वही युवा आध्यात्मिक विषयों की ओर आकर्षित हो रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह विज्ञान छोड़कर अंधविश्वास की ओर जा रहा है। संभवतः वह आधुनिक जीवन की भौतिक उपलब्धियों के साथ अर्थ, शांति, पहचान और आध्यात्मिक संतुलन भी खोज रहा है। यही कारण है कि नीम करोली बाबा जैसे संतों की कथाएँ नई पीढ़ी में भी रुचि पैदा कर सकती हैं।

सनातन सभ्यता हजारों वर्षों की बहुस्तरीय परंपरा है। इसमें—वेद हैं, उपनिषद हैं, बुद्ध हैं, महावीर हैं, राम हैं, कृष्ण हैं, शिव हैं, हनुमान हैं, कबीर हैं, नानक हैं, तुलसी हैं, रविदास हैं, चैतन्य हैं और असंख्य लोक-संत हैं। इस परंपरा में संघर्ष भी हैं, सुधार आंदोलनों की आवश्यकता भी रही है और सामाजिक विकृतियाँ भी रही हैं। लेकिन इसी के साथ आत्म-सुधार की अंतर्निहित क्षमता भी रही है। इसलिए सनातन सभ्यता को केवल ‘शोषक बनाम शोषित’ की कहानी में बदल देना उसकी विशालता को सीमित कर पद और पैसो के बलपर अपनी क्षुद्रता को प्रदर्शित करना भर है। अतः इस फिल्म की सफलता से सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह नहीं निकलता कि अब किसी एक विचारधारा की जीत हो गई। बल्कि इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि—सनातन समाज की धार्मिक चेतना को समझने के लिए सनातन समाज की अपनी सांस्कृतिक भाषा को समझना पड़ेगा। ज्ञातव्य हो ! हनुमान भारतीय मानस में केवल एक धार्मिक पात्र नहीं हैं। वे—भक्ति के प्रतीक हैं, शक्ति के प्रतीक हैं, सेवा के प्रतीक हैं, विनम्रता के प्रतीक हैं, कर्तव्य के प्रतीक हैं और राम के प्रति पूर्ण समर्पण के प्रतीक हैं। इसलिए जब कोई आधुनिक फिल्म इस प्रतीक को समकालीन कथा के माध्यम से प्रस्तुत करती है और दर्शक उसे स्वीकार करते हैं, तो समझ लेना चाहिए कि यह सांस्कृतिक स्मृति की शक्ति का प्रमाण है।

यह भी पढें   बागलुङ भूस्खलन – लापता महिला का मिला शव, मृतकों की संख्या १३ पहुँची

निष्कर्ष

‘हनुमान अंश’ की असाधारण सफलता को न तो केवल बॉक्स ऑफिस की घटना मानना चाहिए और न ही जल्दबाजी में किसी राजनीतिक विचारधारा की पूर्ण पराजय घोषित करनी चाहिए। लेकिन इसके सामाजिक-सांस्कृतिक संकेत को नजरअंदाज करना भी कठिन है। सीमित बजट, बड़े सितारों के अभाव और कमजोर शुरुआती प्रदर्शन के बावजूद word of mouth से फिल्म का तेजी से आगे बढ़ना बताता है कि सनातन दर्शक आध्यात्मिक और संत-परंपरा आधारित कथाओं के लिए गहरी रुचि रखते हैं। इस घटना से एक बड़ा विमर्श जन्म लेता है—सनातन समाज को केवल जाति, वर्ग, शोषक-शोषित और सत्ता-संघर्ष के चश्मे से नहीं समझा जा सकता। यहाँ धर्म केवल संस्था नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए जीवन-अनुभव, सांस्कृतिक स्मृति, नैतिकता और आत्मिक आश्रय भी है।

इस अर्थ में ‘हनुमान अंश’ किसी विचारधारा को पराजित करने से अधिक सनातन चेतना की उस गहराई को सामने लाने वाली सांस्कृतिक घटना है जिसे लंबे समय तक केवल राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष की भाषा में पूरी तरह समझा नहीं जा सका। और शायद इसका सबसे सार्थक संदेश यही है—“जिस समाज की आत्मा को केवल उसके दोषों से परिभाषित किया जाएगा, वह समाज एक दिन अपनी आत्मा की ओर लौटकर अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं खोजेगा।”

विद्यावाचस्पति अजय कुमार झा 

प्राचार्य, श्रा रामनंदन विशेश्वर महेंद्र क्याम्पस 

जलेश्वर, महोत्तरी, नेपाल

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com