97 वर्षीय गुणमाया बोहरा की अदम्य जीवन गाथा, भोटेकोशी बाढ़ में चमत्कारी बचाव
काठमांडू, 5 सितंबर । वीर अस्पताल के बेड नंबर 290 पर लेटी 97 वर्षीय गुणमाया बोहरा के दोनों हाथ-पैर नीले और काले पड़ चुके हैं। शरीर के असहनीय दर्द के कारण वह कभी-कभी छटपटा उठती हैं, कुछ देर स्थिर रहती हैं और फिर उनकी पीड़ा छलक उठती है।
81 साल पहले उजड़ा था सुहाग, अपनों के लिए खपाई जिंदगी
गुणमाया का जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान है। नुवाकोट के सूर्यगढ़ी में जब उनकी शादी हुई, तब वह महज 8 वर्ष की थीं। विवाह के 8 साल बाद ही उनके पति होमप्रसाद बोहरा का निधन हो गया। पति की मृत्यु के चार साल बाद माता-पिता और फिर भाई भी चल बसे। 20 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उनका कोई भी सगा खून का रिश्तेदार नहीं बचा। इसके बाद उन्होंने पति के परिवार को ही अपना मान लिया। अपनी तीन देवरानी-जेठानी के साथ घर संभालते हुए उन्होंने 13 भतीजों और 12 भतीजियों को अपने हाथों से पाल-पोसकर बड़ा किया। उन्हें भुने हुए मकई का नाश्ता कराकर स्कूल भेजती थीं ताकि वे पढ़-लिखकर बड़े इंसान बन सकें।
वृद्धाश्रम में सुकून और भयानक आपदा
अपने नाती-पोतों को मिलने में आसानी हो, इसलिए 83 वर्ष की आयु में उन्होंने देवीघाट स्थित ज्येष्ठ नागरिक प्रतिष्ठान के वृद्धाश्रम में रहने का फैसला किया। वहां उनका मन भी लग गया था। लेकिन 10 भदौ को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ल्हेन्दे घाटी में भारी हिम-चट्टान खिसकने से भयानक बाढ़ आई और त्रिशूली नदी तक तबाही मचा दी। बाढ़ के वक्त गुणमाया वृद्धाश्रम के भूतल पर थीं। पानी के तेज बहाव ने उन्हें एक कोने में धकेल दिया, जहां बहाव अपेक्षाकृत कम था, जिससे चमत्कारिक रूप से उनकी जान बच गई, जबकि पानी के सीधे रास्ते में आने वाले लोग नहीं बच सके।

रेस्क्यू और अस्पताल का सफर
मलबे में दबी गुणमाया को नेपाली सेना और नेपाल पुलिस ने करीब चार घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एक्सकेवेटर (जेसीबी) की मदद से सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद स्थानीय लायंस क्लब के तीन स्वयंसेवकों ने उन्हें तुरंत एम्बुलेंस के जरिए काठमांडू के वीर अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचाया।
“पानी ने मुझे क्यों मारा?”
अस्पताल में भर्ती होने के बाद गुणमाया बहुत कम बोलती हैं। रात के वक्त वह कभी-कभार आश्रम में गाए जाने वाले भजन “हरे राम, हरे कृष्ण” गुनगुनाती हैं और एक ही सवाल बार-बार दोहराती हैं- “पानी ने मुझे क्यों मारा?” चिकित्सकों के अनुसार वह गहरे मानसिक आघात (ट्रॉमा) से गुजर रही हैं। उनके नाती दीपक बोहरा उन्हें सांत्वना देने के लिए समझाते हैं कि गोसाईंकुंड फटने से पानी आ गया था।

उम्र के हिसाब से उनका शरीर काफी मजबूत है। शुरुआत में केवल जूस पीने वाली गुणमाया ने अब भरपेट खाना शुरू कर दिया है। आज उनका सगा कोई जीवित नहीं है, लेकिन उनके वे ही 25 भतीजे-भतीजियां और नाती-पोते अस्पताल में बारी-बारी से उनकी पूरी लगन के साथ देखभाल कर रहे हैं।


